भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को आर्थिक विकास में कैसे बदलें?
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संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024 के अनुसार, भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। भारत की युवा आबादी उसकी आर्थिक शक्ति बन सकती है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास आवश्यक हैं।
लेखक पॉल अलापट का मुख्य तर्क है कि भारत को जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए तत्काल और समन्वित सुधार करने होंगे। अन्यथा, यह अवसर आर्थिक समृद्धि में बदलने के बजाय बेरोजगारी और सामाजिक चुनौतियों का कारण बन सकता है।
प्रमुख आँकड़े एवं चुनौतियाँ –
- कामकाजी आबादी: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2025 में भारत की लगभग 68% आबादी 15–64 वर्ष आयु वर्ग में है।
- महिला श्रमबल भागीदारी: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023–24 के अनुसार, 15 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं की श्रमबल भागीदारी दर 41.7% रही।
- युवा बेरोजगारी: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023–24 के अनुसार, 15–29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 10.2% थी।
मुख्य चुनौतियाँ –
रोजगार की कमी, कौशल-अंतर, कमजोर विनिर्माण क्षेत्र, एमएसएमई की समस्याएँ, महिला भागीदारी में बाधाएँ तथा बुनियादी ढाँचे की कमी।
आवश्यक सुधार: छह प्रमुख उपाय
- शिक्षा एवं कौशल: सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारना और अप्रेंटिसशिप तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण बढ़ाना।
- कारोबार में सुगमता: अनावश्यक नियमों, अनुमोदनों और नौकरशाही की प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
- विनिर्माण एवं एमएसएमई : श्रम-प्रधान उद्योगों, छोटे उद्यमों और पर्यटन क्षेत्र को प्रोत्साहन देना।
- महिला सशक्तीकरण: क्रेच, सुरक्षित परिवहन, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के समान अवसर उपलब्ध कराना।
- बुनियादी ढाँचा: बिजली, जल, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।
- सेवा क्षेत्र का विस्तार: स्वास्थ्य, पर्यटन, डिजिटल सेवाओं और अन्य रोजगार-सघन क्षेत्रों में अवसर पैदा करना।
- भारत को पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की सफल रणनीति को तेजी से अपनाना चाहिए।
सरकारी पहल –
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020
- कौशल भारत मिशन एवं राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना
- मेक इन इंडिया एवं उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना
- पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश आर्थिक विकास और विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। नाइजीरिया और श्रीलंका इस बात की चेतावनी देते हैं कि अगर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो डेमोग्राफिक मौका हाथ से निकल जाता है। और एक बार खिड़की बंद होने के बाद आगे का रास्ता मुश्किल हो जाता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित पॉल अलापट के लेख पर आधारित। 14/10/26