ओलंपिक का सपना, चुनौतियां अपार
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देश को 2036 ओलंपिक की मेजबानी की आकांक्षा रखने के साथ-साथ अपने खिलाड़ियों के प्रदर्शन, खेल प्रशिक्षण प्रणाली और संस्थागत व्यवस्था को भी मजबूत करना चाहिए।
केवल बड़े खेल आयोजनों की मेजबानी करना खेल महाशक्ति बनने का प्रमाण नहीं है। इसके लिए व्यक्तिगत खेलों में पदक क्षमता बढ़ाना, प्रतिभाओं की पहचान करना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना और सरकारी धन के उपयोग की प्रभावी निगरानी करना आवश्यक है।
भारत के खेल प्रदर्शन की प्रमुख चुनौतियाँ –
(क) व्यक्तिगत खेलों में सीमित सफलता –
भारत ने टीम खेलों और कुछ चुनिंदा व्यक्तिगत खेलों में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन तैराकी, जिम्नास्टिक्स, साइक्लिंग और फेंसिंग जैसे खेलों में व्यापक पदक क्षमता विकसित करना आवश्यक है। पदकों की संख्या बढ़ाने के लिए केवल कुछ सफल खिलाड़ियों पर निर्भर रहने के बजाय अनेक खेल विधाओं में प्रतिस्पर्धी खिलाड़ियों का आधार तैयार करना होगा।
(ख) खेल अवसंरचना का असमान वितरण –
- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में आधुनिक खेल सुविधाओं की कमी है।
- प्रशिक्षित कोचों तथा खेल वैज्ञानिकों की सीमित उपलब्धता है।
- खिलाड़ियों को गुणवत्तापूर्ण उपकरण, पोषण और चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराने में असमानता है।
- प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए स्कूल स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक स्पष्ट मार्ग का अभाव है।
(ग) सार्वजनिक धन की जवाबदेही –
संपादकीय के अनुसार, खिलाड़ियों की तैयारी पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सार्वजनिक धन का उपयोग वास्तविक खेल विकास में हो।
इसके लिए आवश्यक है कि सरकार केवल खर्च की गई राशि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण की गुणवत्ता, खिलाड़ियों की प्रगति, सुविधाओं की उपलब्धता और दीर्घकालीन परिणामों का भी मूल्यांकन करे।
(घ) खेल प्रशासन की चुनौतियाँ –
खेल संघों में पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता, खिलाड़ियों की शिकायतों का समाधान तथा प्रशासनिक जवाबदेही खेल विकास के महत्वपूर्ण पहलू हैं। इन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
(ङ) खेल संस्कृति का अभाव –
अनेक परिवारों और शिक्षण संस्थानों में खेलों को शिक्षा के समान महत्व नहीं मिलता। इससे प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित अभ्यास और प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित हो सकते हैं।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 06/10/26