पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियाद है

Afeias
14 Oct 2026
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सूचना का अधिकार (आरटीआई), पारदर्शी शासन और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने सार्वजनिक विभाग को आरटीआई के दायरे से बाहर करने का प्रयास किया, और बाद में उसको वापस लिया। यह इस बहस को सामने लाता है कि सरकार और नागरिकों के बीच सूचना का प्रवाह कितना जरूरी है।

मुख्य बिंदु-

  • आरटीआई और लोकतंत्र – आरटीआई अधिनियम, 2005 नागरिकों को सरकारी कामकाज से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है। इससे प्रशासन में जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण मजबूत होता है।
  • अपवाद की आवश्यकता – सीमित रूप में आरटीआई में राष्ट्रीय सुरक्षा, खुफिया गतिविधियों आदि से जुड़ी संवेदनशील सूचनाओं को पहले से ही कुछ छूट दी गई है। इसलिए अतिरिक्त व्यापक छूट पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है।
  • तमिलनाडु का मामला – सरकार ने 21 सितंबर को सार्वजनिक विभाग (लॉ एंड ऑर्डर) को आरटीआई से बाहर करने का आदेश जारी किया। लेकिन यह आदेश सार्वजनिक होने से पहले ही आरटीआई आवेदनों को अस्वीकार करने में इस्तेमाल होने लगा। बाद में सरकार ने आदेश वापस ले लिया।
  • सूचना आयोगों की कमजोरी – सतर्क नागरिक संगठन की 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2025 तक तमिलनाडु सूचना आयोग में 41,059 अपील और शिकायतें लंबित थीं। देश के 29 सूचना आयोगों में कुल लंबित मामलों की संख्या 4,13,972 थी।
  • संस्थागत सुधार जरूरी – केवल आरटीआई कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। सूचना आयोगों में पर्याप्त आयुक्तों की नियुक्ति, लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा और सूचना अधिकारियों की जवाबदेही भी आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सूचना आयोगों में रिक्तियाँ भरने और आयोगों को प्रभावी ढंग से काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

पारदर्शिता सुशासन का साधन है। सरकार को गोपनीयता केवल उन मामलों में रखनी चाहिए, जहाँ कानून और सार्वजनिक हित इसकी स्पष्ट आवश्यकता बताते हों। इसके बजाय आरटीआई को मजबूत करना, सूचना आयोगों की क्षमता बढ़ाना और समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना जवाबदेह, सहभागी और नागरिक-केंद्रित शासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

‘द हिंदू‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29/09/26