जलवायु परिवर्तन और भारत
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औद्योगिक क्रांति के बाद कोयला, तेल और गैस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के कारण कार्बन उत्सर्जन बढ़ा, और पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगा। 2015 के पेरिस समझौते (सीओपी21) में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन दुनिया अभी इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में संघर्ष कर रही है।
कार्बन उत्सर्जन में भारत की भूमिका पर कुछ बिंदु –
- भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक है। लेकिन केवल वर्तमान उत्सर्जन देखना उचित नहीं है। ऐतिहासिक उत्सर्जन भी महत्वपूर्ण है।
- भारत की आबादी दुनिया की लगभग 18% है, लेकिन पिछले लगभग 270 वर्षों के वैश्विक उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी करीब 3.5% रही है।
- प्रति व्यक्ति उत्सर्जन भी भारत में विकसित देशों की तुलना में काफी कम है:
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- भारत — लगभग 2.2 टन
- यू.के. — लगभग 4.3 टन
- अमेरिका — लगभग 14.2 टन
- वैश्विक औसत — लगभग 4.7 टन
- इसलिए विकासशील देशों से यह कहना कि वे तुरंत औद्योगीकरण और ऊर्जा उत्पादन कम करें, जलवायु न्याय के दृष्टिकोण से उचित नहीं है।
- विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि औद्योगिक विकास और जीवाश्म ईंधन के बड़े पैमाने पर उपयोग की शुरुआत वहीं हुई। इसलिए विकसित देशों को अपने उत्सर्जन में तेजी से कमी करनी चाहिए। विकासशील देशों को जलवायु वित्त देना चाहिए। नई और स्वच्छ तकनीक उपलब्ध करानी चाहिए।
- दूसरी ओर, भारत ने अपने जलवायु लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं –
भारत ने 2030 तक अपनी स्थापित बिजली क्षमता का 40% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था और इसे समय से 9 वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया है।
भारत का लक्ष्य 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करना है। भारत का उद्देश्य केवल विकास करना नहीं, बल्कि सतत विकास और सभी नागरिकों के बेहतर जीवन-स्तर को सुनिश्चित करना है।
अतः जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी केवल वर्तमान उत्सर्जन से तय नहीं होनी चाहिए। ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 21/09/26