भारत में संपन्न हुई ब्रिक्स की महत्वपूर्ण बैठक
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हाल ही में 18वीं ब्रिक्स सम्मेलन भारत में सम्पन्न हुआ है। इस सम्मेलन का केंद्र बदलती वैश्विक शक्ति संरचना और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती भूमिका रहा है। पूरे सम्मेलन में अलग-अलग हितों और मतभेदों के बावजूद ब्रिक्स देश पारंपरिक पश्चिम-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था में बदलाव के लिए साझा आधार पर बल देते रहे।
कुछ बिंदु-
- बहुध्रुवीय विश्व की मांग – सम्मेलन में वैश्विक संस्थाओं में सुधार करते हुए अधिक प्रतिनिधित्व पर जोर दिया गया। विशेषरूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत व ब्राजील की बड़ी भूमिका का समर्थन किया गया।
- आर्थिक सहयोग पर जोर – सदस्य देशों के बीच व्यापार बढाने और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पारंपरिक वित्तीय निर्भरता को कुछ सीमा तक कम करना है।
- ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की मुलाकात – पश्चिम एशिया के संघर्ष में अलग-अलग पक्षों से जुड़े इन दोनों देशों को उच्च स्तरीय संवाद का अवसर मिला।
- चीन के साथ भारत का संबंध – चीनी प्रधानमंत्री के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात को दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य करने की राजनीतिक इच्छा के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
- वैश्विक दक्षिण और बाकी के देशों के बीच संतुलन बनाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका – भारत ने एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों से संबंध बनाए रखते हुए रूस, चीन, ईरान आसियान और अफ्रीकी देशों के साथ भी संवाद जारी रखा है। यही संतुलन भारत की कूटनीतिक उपयोगिता को बढ़ाता है।
ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग मंच नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज बन रहा है। इसके सामने आंतरिक मतभेद, सदस्य देशों के अलग-अलग रणनीतिक हित और संस्थाएं मौजूद हैं। फिर भी सुरक्षा परिषद् सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, दक्षिण के बीच आपसी सहयोग और वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवीय व्यवस्था की मांग में इस समुह की भूमिका उल्लेखनीय है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 सितंबर, 2026