विदेशों में कौशल आधारित रोजगार के अवसर
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भारत दुनिया की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। हमारे 1.05 करोड़ लोग विदेशों में रहते हैं। हम सबसे ज्यादा रेमिटेंस यानी वापस धनप्रेषण भी प्राप्त करते हैं। वर्तमान में हमारा वैश्विक श्रम कम कौशल पर आधारित है।
विकसित देशों में श्रम योग्य व्यक्तियों की आबादी घट रही है। साथ ही शिक्षण तथा कौशल-प्रशिक्षण की कमी भी कुशल श्रमिकों की कमी की वजह बन रही है। मांग अब बुनियादी ढांचे और निर्माण, लॉजिस्टिक्स और परिवहन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाओं, हरित परिवर्तन उद्योग, आतिथ्य, स्वास्थ्य व सामाजिक सेवा तक विस्तारित हो रही है। लेकिन भारत का श्रमबल अब भी पारंपरिक रूप पर निर्भर है।
नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में भारतीय श्रमिकों के यूएई प्रवासन के विश्लेषण में पाया गया कि प्रवासन ने पारिश्रमिक दोगुना किया है, पर वास्तविक आय को 10% घटा दिया है। इससे उनकी निजी खुशहाली व संतुष्टि में गिरावट आई।
हम भविष्य के लिए क्या कर सकते हैं?
- हमें मांग आधारित कौशल युक्त श्रमिकों के प्रवासन की ओर बढ़ना चाहिए। इसके लिए माइग्रेशन डैशबोर्ड, विदेशी भाषाओं का प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन और नियोक्ता साझेदारियों की आवश्यकता है।
- राज्यों को मोबिलिटी रिसोर्स सेंटर भी स्थापित करने चाहिए। इनमें परामर्श, करियर मार्गदर्शन, गंतव्य देश की जरूरतों की जानकारी, दस्तावेजीकरण और प्रस्थान पूर्व सहयोग प्रदान किया जाए।
- प्रवासी श्रमिकों के लिए समर्पित प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए, जो उनकी चिंताओं को मेजबान देश तक पहुँचा सके, ताकि कानूनी सुरक्षा व शिकायत निवारण संभव हो सके।
- राज्य को सर्कुलेशन माइग्रेशन को बढ़ावा देना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय काम के अनुभव के साथ लौटने वाले श्रमिकों को बाजार में दोबारा प्रवेश प्राथमिकता के आधार पर मिले तथा सहयोग भी मिले, ताकि प्रवासन ‘ज्ञान व पूर्ण हस्तांतरणीय’ भी बन सके।
लेकिन इन सबके साथ घरेलू स्तर पर उत्पादक रोजगार को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रवासन आवश्यकता नहीं बल्कि विकल्प बने।
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