सार्वजनिक संस्थानों का अराजनीतिकरण जरूरी है
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लोकतंत्र में राजनीति आवश्यक है, लेकिन सार्वजनिक संस्थानों और स्थानों को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो यह लोकतंत्र ओर संस्थाओं; दोनों के लिए ही नुकसानदायक हो सकता है।
हाल के कुछ वर्षों में हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। चाहे वह सरकारी कार्यक्रमों का प्रोटोकॉल हो, फिल्मों की कहानी, सड़क के गड्ढे हों या खानपान से जुड़े सवाल, सभी में राजनीति की घुसपैठ ने समस्या खड़ी कर दी है।
इसका सबसे ज्यादा प्रभाव शैक्षणिक संस्थाओं पर पड़ा है। विश्वविद्यालय और कॉलेज मूलत: ज्ञान, शोध, संवाद और विचार-विमर्श के केन्द्र होने चाहिए। लेकिन वे राजनीतिक विचारधाराओं और गुटीय संघर्ष के मैदान बन रहे हैं।
राजनीति करना ठीक है, लेकिन मुद्दों का राजनीतिकरण किया जाना ठीक नहीं कहा जा सकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब संस्था का प्राथमिक उद्देश्य पीछे चला जाए, और राजनीतिक पहचान सबसे महत्वपूर्ण बन जाए।
देश के विकास के लिए संस्थाओं की भूमिका की समीक्षा की जानी चाहिए। एक प्रकार से उनका अराजनीतिकरण किया जाना चाहिए। ऐसा वातावरण निर्मित किया जाए, जिसमें शिक्षक पढ़ा सकें, वैज्ञानिक शोध कर सकें, विद्यार्थी बिना किसी भय के विचार व्यक्त कर सकें, प्रशासनिक विभाग निर्णय ले सकें तथा व्यापार व्यावसायिक प्राथमिकताओं के अनुसार चल सकें। कुल मिलाकर, सार्वजनिक संस्थान राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित पक्षपातपूर्ण व्यवहार से दबे न हों।
सार्वजनिक संस्थान किसी एक राजनीतिक समूह की बपौती नहीं बनने चाहिए। इसे किसी विशेष विचारधारा का नहीं, बल्कि सभी नागरिकों का समान मंच होना चाहिए।
एक परिपक्व लोकतंत्र वह होता है, जहाँ राजनीतिक असहमति के लिए पर्याप्त स्थान हो, और फिर भी संस्थाएं अपने मूल उद्देश्य से विचलित न हों। सार्वजनिक हित की कीमत पर राजनीति का विस्तार लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है।
(‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 22/08/26)