26-08-2026 (Important News Clippings)

Afeias
26 Aug 2026
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Date: 26-08-26

Root causes

India’s youth crisis is about the absence of jobs, not just examination reform

Editorial

It has been a few weeks since the youth agitation forced the resignation of then Union Education Minister Dharmendra Pradhan. The government conceded the students’ demands for examination reform, which found an echo in the Prime Minister’s Independence Day address, when he announced free online coaching for competitive examinations using India’s digital public infrastructure. MoSPI’s survey data bears out why this would be welcome to students -private coaching costs 16% of what an Indian fa- mily spends on a child’s education, against 12.5% in 2018, and nearly a quarter of that budget by the higher secondary years which is when the student prepares for competitive exams. Cheap- er coaching is of limited value as quality professional education remains confined to a handful of institutions. For instance, over 22 lakh candidates appeared in this year’s medical entrance exam for about 1.4 lakh undergraduate seats with fewer than 10,000 of them at the top 50 colleges. The situation is similar to the Joint Entrance Examination for engineering colleges. That is perhaps why, for the first time since the All India Survey on Higher Education began in 2011, undergraduate enrolment fell by 93,322 in 2023-24, particularly among young men. The fall was the sharpest in Uttar Pradesh, where The Hindu’s analysis found undergraduate enrolment down 1.53 lakh even as diploma enrolment rose 1.38 lakh. An analysis of Periodic Labour Force Survey unit-level data found that of every 100 graduates aged 15 to 29 in 2025, only 26 were in regular salaried employment, and just four had a salaried job with a contract and social security. The youth employment crisis therefore has two ends – in the preparation for jobs, and in jobs themselves. Mere free coaching would address neither.

The structural problems in the Indian economy, despite the government’s touting of 6%-6.5% growth, are now too obvious to ignore. Manufacturing, the job sector best placed to absorb India’s college graduates, remains at around a sixth of gross value added, nowhere near the quarter of the economy the government has long promised. Meanwhile, the private sector has been retreating from its task as corporate investment has fallen from 17.3% of GDP in 2007-08 to 10.3% in 2024-25, unmoved by the cut in corporate tax from 30% to 22% in 2019. The steps required of the Union government are clear: public investment in industrial capacity, support for industry disciplined by export performance rather than domestic protection, and tempering a regulatory and enforcement zeal that seems to selectively target enterprises, affecting the jobs-catering medium-sized companies in particular. This route has a better chance of delivering jobs for the youth at the scale needed and as countries such as Vietnam have shown.


Date: 26-08-26

यदि एआई नीति को केंद्र में रखते तो विकास दर बढ़ती

संपादकीय

एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य देशों के मुकाबले भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है, फिर भी वैश्विक फंड मैनेजर्स ने पिछले चार माह में दूसरी बार भारत को निवेश-गंतव्य के रूप में सबसे नीचे रखा है। बीओए के ताजा सर्वे में इस अनिच्छा का मुख्य कारण बताया गया- देश का एआई के स्तर पर कम निवेश, चिप और सेमीकंडक्टर उत्पादन में पिछड़ना, कमजोर ग्रोथ और सुधारों को लेकर अस्पष्ट नीति । ऐसा नहीं है कि भारत की आधारभूत आर्थिक नीति को लेकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को कोई चिंता है। उनकी चिंता तुलनात्मक स्थिति को लेकर है, जहां चीन, जापान, ताइवान तो दूर, इंडोनेशिया और फिलिपींस भी इस दौड़ में काफी आगे बढ़ चुके हैं। अभी कुछ साल पहले तक भारत इन निवेशकों का सबसे आकर्षक गंतव्य था । लेकिन एआई की दौड़ के लिए अपेक्षित फंड्स की कमी, सेमीकंडक्टर उत्पादन के लिए प्रचुर बिजली-पानी की उपलब्धता का भरोसा न होने ने विदेशी कंपनियों को ताइवान को चुनने को मजबूर किया। चीन 7 वर्षों से लगातार अमेरिका से ज्यादा खर्च एआई और इसके शोध पर कर रहा है और क्वांटम कंप्यूटिंग में भी अग्रणी है। दक्षिण कोरिया भी प्रोडक्ट इनोवेशन में चीन और अमेरिका के साथ खड़ा है। एआई की दौड़ में हमारी सरकार ने भी प्रयास किए हैं, लेकिन निजी उद्योग ने रिसर्च में निवेश से पल्ला झाड़ लिया। भारत सेमीकंडक्टर निर्माण की दौड़ में फाउंड्रीज से आगे नहीं बढ़ पाया है। अगर अपेक्षित सुधार के साथ एआई नीति को केंद्र में रखा जाता तो विकास दर 8 से 9 प्रतिशत भी हो सकती थी।


Date: 26-08-26

कामचलाऊ कौशल विकास

संपादकीय

नीति आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच बढ़ते अंतर की जो तस्वीर प्रस्तुत की, उस पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। इस रिपोर्ट में नीति आयोग ने कमजोर व्यावहारिक सीख, सतही इंटर्नशिप एवं अप्रेंटिसशिप के साथ-साथ करियर गाइडेंस की कमी को जिस तरह प्रमुख चुनौतियों में गिना, उससे यह स्पष्ट है कि कौशल विकास के जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और जिनमें अच्छी-खासी धनराशि भी खर्च की जा रही है, वे उद्योग जगत की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि कौशल विकास के कार्यक्रमों में युवा कुछ सीखने के स्थान पर कामचलाऊ प्रशिक्षण पा रहे और केवल प्रमाण पत्र हासिल करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं? यह सही समय है कि इन कार्यक्रमों के संचालन में आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों का सहयोग लिया जाए। इन कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते समय कारोबार जगत को भी साथ लेना चाहिए, ताकि यह जाना जा सके कि उसे कैसे कौशल से लैस युवाओं की आवश्यकता है। ध्यान रहे कारोबार जगत यह शिकायत करता रहता है कि उसे जैसे कुशल युवा चाहिए, वैसे नहीं मिल पा रहे हैं। निःसंदेह यह भी चिंताजनक है कि नीति आयोग की रिपोर्ट शिक्षा व्यवस्था की खामियां भी बयान कर रही है। यह ठीक नहीं कि उच्च शिक्षा पाने वाले 80 प्रतिशत छात्रों ने प्रैक्टिकल अनुभव की कमी को बड़ी समस्या बताया। शायद इसी कारण केवल 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट ही ऐसे काम में हैं, जो उनकी शिक्षा स्तर के अनुरूप है।

आज जब सामान्य बीए, बीकाम और बीएससी की डिग्रियां रोजगार पाने में सहायक नहीं बन पा रही हैं, तब फिर डिग्रीधारकों को किसी ऐसे कौशल से लैस किया ही जाना चाहिए, जो उन्हें रोजगार दिला सके। विडंबना यह है कि बड़ी संख्या में छात्र सामान्य डिग्रियां हासिल करते हैं और फिर वे सरकारी नौकरियों की तलाश करने लगते हैं। आज जब हर क्षेत्र में कौशल की मांग है, तब बीए, बीकाम, बीएससी आदि की पहले जैसी पढ़ाई का क्या औचित्य ? देश को केवल डिग्रीधारी युवाओं की जरूरत नहीं, बल्कि डिग्री संग किसी कौशल से लैस युवाओं की आवश्यकता है। आज की पीढ़ी को यह संदेश देना होगा कि उन्हें ऐसे किसी कौशल से लैस होना होगा, जिसकी बाजार में मांग हो। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो युवा डिग्री तो हासिल कर लेंगे, लेकिन उन्हें नौकरी पाने में कठिनाई होगी। वर्तमान में डिग्री हासिल कर लेने और नौकरी के लिए सक्षम होने में स्पष्ट अंतर स्थापित हो गया है। इस अंतर को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने के लिए नीति आयोग के इस सुझाव पर यथाशीघ्र अमल किया जाए कि स्कूल से लेकर कालेज स्तर तक रोजगार और उद्यमिता से जुड़े कौशल की सीख दी जाए।


Date: 26-08-26

ताक पर औचित्य

संपादकीय

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जो कानून या नियम-कायदे कभी आपात स्थिति या बहुत जरूरी होने पर ही प्रयोग किए जाने के लिए बनाए गए होंगे, उन्हें कई बार कुछ खास लोगों को विशेष सुविधा मुहैया कराने का औजार बना लिया जाता है। यह एक तरह से किसी कानून का दुरुपयोग है और जब लगातार ऐसा होता है, तो सवाल उठता है कि क्या सरकार नागरिकों के प्रति किसी कानून को बरतने के मामले में अपने स्तर से भी भेदभाव करती है। वरना क्या वजह है कि जघन्य अपराधों में दोषी ठहराए गए किसी सजायाफ्ता को सिर्फ इसलिए बार- बार किसी कानून का लाभ दिया जाता है कि वह ऊंची रसूख वाला है या फिर उसकी खासी राजनीतिक पैठ है ? गौरतलब है कि हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर इक्कीस दिन की फरलो दी गई है। यानी इस सुविधा के मिलने के बाद फिर से राम रहीम रोहतक स्थित सुनारिया जेल से बाहर निकल कर अपने आश्रम में रहेगा। इससे पहले भी उसे बारह बार पैरोल और पांच बार फरलो की सुविधा मिल चुकी है। ऐसा लगता है कि राम रहीम अपनी सजा को सिर्फ औपचारिकता भर के लिए अपनी सुविधा के मुताबिक काट रहा है और उसे जब जरूरत पड़ती है, वह किसी न किसी बहाने जेल से बाहर आने का रास्ता बना लेता है।

सवाल है कि जिन नियम-कायदों के तहत राम रहीम इस तरह की छूट बार-बार दी जा रही है, क्या सरकार यह दावा करने की स्थिति में है कि इस मामले में वह पूरी तरह तटस्थ और न्याय के तकाजे के मुताबिक काम कर रही है। बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध में जिस व्यक्ति को सजा हुई, उसे लेकर इस स्तर पर जाकर नरमी बरतने का आखिर क्या कारण है ? इस पर विपक्षी दलों और अनेक सामाजिक संगठनों की ओर से तीखी आपत्ति और विरोध जाहिर किए जाने पर सरकार की सफाई है कि राम रहीम को इस तरह की रिहाई नियमों के तहत दी जाती है। क्या सरकार गंभीर अपराधों की सजा काटने वाले अन्य लोगों के प्रति भी समान मानकों के तहत ऐसा ही रुख अपनाती है? फिर किसी भी कैदी को लेकर इतना उदार रवैया दिखाने की क्या वजह हो सकती है कि पिछले दस साल में उसे सत्रह बार अलग-अलग कारणों से कभी पैरोल पर, तो तभी फरलो पर जेल से बाहर अपना समय सुविधाजनक तरीके से काटने की छूट दी जाती है?

यॉं राम रहीम को इस तरह जेल से बाहर रहने की सुविधा मुहैया कराते हुए शायद केवल उसकी जरूरतों का ही ध्यान रखा जाता है। मगर एक विचित्र संयोग यह भी देखा गया है कि जब भी उसके प्रभाव क्षेत्र में चुनाव होने वाले होते हैं, तब आमतौर पर उसे खासी अवधि के लिए पैरोल या फिर फरलो की सुविधा मिल जाती है। फिलहाल पंजाब में विधानसभा चुनावों का समय करीब है और कई उत्तरी राज्यों सहित हरियाणा तथा पंजाब में राम रहीम के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। ऐसे में स्वाभाविक ही ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि राम रहीम को दरअसल चुनावी लाभ उठाने के मकसद से बार-बार जेल से बाहर निकलने की इजाजत दी जाती है। सरकार को शायद इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि राम रहीम के प्रति इस तरह उदारता बरतने के क्रम में कानून की मनमानी व्याख्या करने की वजह से न्याय की अवधारणा को किस स्तर पर चोट पहुंच रही है।


Date: 26-08-26

बारिश में बार-बार डूबते और डराते शहर

के के पाण्डेय,( नगर प्रबंधन विशेषज्ञ )

मानसून की विदाई का वक्त आ गया, लेकिन कमजोर मानसून के बावजूद असामान्य बारिश ने समूची शहरी व्यवस्था को पानी-पानी कर दिया है। सोमवार को महज कुछ घंटों की बारिश ने दिल्ली-एनसीआर के कई क्षेत्रों में जलभराव की गंभीर स्थिति पैदा कर दी। यहां तक कि कनॉट प्लेस, आईटीओ जैसे पॉश इलाकों में भी दो से तीन फीट तक पानी जमा हो गया। आलम यह रहा कि गुरुग्राम में 20 स्कूल बसें करीब तीन फीट पानी में घंटों फंसी रहीं और मासूम बिलखते रहे।

अन्य शहरों की कहानी भी इससे अलग नहीं है। प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाना क्षेत्र की गिनती अब जलभराव से जूझने वाले इलाकों में होने लगी है। वाराणसी में तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर और इसके सर सुंदरलाल अस्पताल में कमर तक पानी भर गया। कुछ इसी तरह की तस्वीरें बिहार, झारखंड, ओडिशा के शहरों से भी आ रही हैं, जो स्पष्ट संकेत है कि शहरी जलभराव की समस्या साल-दर-साल मुश्किलें बढ़ाती जा रही है ।

अनुमानों की मानें, तो हमारी अर्थव्यवस्था को शहरी बाढ़ (इसमें जलभराव भी शामिल है) के कारण हर साल तकरीबन 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। मानसून आते ही न सिर्फ आवागमन, बल्कि बच्चों के पठन-पाठन, कारोबार आदि से जुड़ी तमाम गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं। साथ ही मलेरिया, डेंगू और पेट संबंधी बीमारियां भी फैलने लगती हैं।

मानसूनी बारिश में जल भराव के मुख्यतः छह कारण हैं। पहला, शहरों का अनियोजित विकास । हमारे शहरों ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो अव्यवस्थित विकास का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। वहां सड़कों या नालियों जैसी बुनियादी सेवाओं का उचित प्रबंधन नहीं है । नतीजतन, हल्की बारिश में भी सड़कें डूबने-उतराने लगती हैं। दूसरा कारण है, पानी के प्राकृतिक बहाव के हिसाब से नियोजन संबंधी योजनाओं का अभाव। इसका परिणाम हम गुरुग्राम और बेंगलुरु जैसे शहरों में देख सकते हैं,

जहां बड़ी-बड़ी आवासीय कॉलोनियों के सामने सड़कों पर कमर तक पानी भर जाता है। नियोजनसंबंधी योजनाओं में तालाब और झीलों के संरक्षण की भी उचित व्यवस्था नहीं की गई है, जिस कारण या तो उन पर अतिक्रमण हो गया या फिर वे दम तोड़ चुकी हैं।

जल निकासी की कमजोर व्यवस्था जलभराव का तीसरा बड़ा कारण है । यह नियोजित और अनियोजित, दोनों क्षेत्रों में दिखता है। मिसाल के लिए, कई जगहों पर स्टॉर्म वाटर ड्रेन की व्यवस्था नहीं है, या है भी, तो जर्जर अवस्था में है । जो लोग स्टॉर्म वाटर ड्रेन से परिचित नहीं हैं, उनको बता दूं कि यह बड़ी नाली होती है, जिससे उस समय भी पानी का सुगम बहाव सुनिश्चित होता है, जब वह अचानक काफी अधिक मात्रा में बरसता है। चौथा कारण है, सड़कों की दयनीय स्थिति । अधिक बारिश होने पर सड़कें और नालियां एक हो जाती हैं। पांचवां कारण है, कूड़े की समयबद्ध निकासी न होना । घरों अथवा कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे का सभी जगह उचित प्रसंस्करण नहीं हो रहा, जिस कारण वे नालियों को जाम कर देते हैं। और छठा है-जलवायु परिवर्तन के कारण बार- बार की अतिवृष्टि । इसमें बारिश अचानक इतनी अधिक मात्रा में बरस जाती है कि वह कभी-कभी ‘शहरी बाढ़’ का कारण बन जाती है। सोमवार को ही दिल्ली के जनकपुरी इलाके में 70 मिलीमीटर से अधिक बारिश हुई।

ऐसा नहीं है कि जलभराव के समाधान के प्रयास नहीं हो रहे। बीते कुछ वर्षों में सरकार की ओर से कई योजनाएं शुरू की गई हैं। मसलन, साल 2017 में केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की, जो शहरी बाढ़ से निपटने और प्रबंधन की एक रूपरेखा है। इसी तरह, साल 2019 में इसी मंत्रालय ने शहरी जल निकासी के लिए स्टॉर्म वाटर ड्रेन को लेकर एक ‘मैनुअल’ जारी किया, जो बारिश के पानी की निकासी की व्यवस्था के लिए एकीकृत दिशा-निर्देश प्रदान करता है। दरअसल, किसी भी शहर में बमुश्किल दस से बीस प्रतिशत क्षेत्रों में ही ऐसी बड़ी नालियां हैं। यहां तक कि गुरुग्राम जैसे आधुनिक बड़े शहरों में भी इसका अभाव दिखता है। इसलिए, अगर हम इन इलाकों में जलभराव से पार पाना चाहते हैं, तो स्टॉर्म वाटर ड्रेन के निर्माण पर जोर देना चाहिए। इन इलाकों में सड़कों के किनारे इतनी जगह है भी कि ऐसी नालियां बनाई जा सकें।

साल 2021 में जारी नदी – केंद्रित शहरी नियोजन दिशा-निर्देश भी जल निकासी के रास्ते बताते है । अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन ऐंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत) जैसी योजनाओं ने सरकार की प्रतिबद्धताएं साबित की हैं। इनमें अमृत में तो करीब 10 हजार करोड़ रुपये तक की राशि पानी निकासी व जल निकायों के संरक्षण के लिए बीते कुछ वर्षों में आवंटित या स्वीकृत की गई है। इसके अलावा हरित क्षेत्रों का भी विस्तार किया गया है और मिट्टियों में बारिश के पानी को सोखने की क्षमता बढ़ाने के लिए 1,600 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। गृह मंत्रालय ने भी आपदा प्रबंधन के अंतर्गत ‘अर्बन फ्लड मैनेजमेंट’ पर 5,500 करोड़ रुपये 18 शहरों को आवंटित या स्वीकृत किए हैं। 16वें वित्त आयोग और सिटी चैलेज फंड में अगले पांचसाल के लिए धन की अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, कुछ अन्य प्रयास भी हो रहे हैं, जैसे गुवाहाटी में वाटर रिंग रोड का निर्माण । विदेश की बात करें, तो यूरोप में कैनाल सिस्टम एक बड़ा उदाहरण है, जिस कारण वहां पानी शहरों में टिकता नहीं।

हालांकि, इस तरह की कोई भी योजना तभी अपना सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकती है, जब जन सहयोग, नियोजन और प्रबंधन, तीनों में बेहतर समन्वय हो, लेकिन सच्चाई यह है कि विकास कार्यों में जुटी हमारी एजेंसियों, नगर निकायों और राज्य सरकार के अन्य विभागों में तालमेल का खासा अभाव है। वास्तव में, समस्या संसाधन की नहीं, बल्कि समन्वय की कमी है। इसी के कारण जो पैसे आते हैं, उनका उचित उपयोग नहीं हो पाता।

इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर जन-जागरूकता अभियान भी चलाना चाहिए। मसलन, अच्छा फुटपाथ जलभराव की समस्या दूर कर सकता है, यह लोगों को बताया जाना चाहिए, तभी इसका अतिक्रमण भी बंद हो सकेगा। इसी तरह, टूटी-फूटी सड़कों को ठीक करने के लिए कुछ लोगों को बतौर ‘दबाव समूह’ काम करना चाहिए, ताकि स्थानीय निकाय उनको बनाने को तत्पर हों । यह समझने की दरकार है कि स्थानीय नगर निकायों पर बड़ी जिम्मेदारी है। उनकी मुस्तैदी जलभराव की समस्या का समाधान पेश कर सकती है।