सहकारिता: भारत के विकास का श्रमिक-केंद्रित मॉडल

Afeias
31 Jul 2026
A+ A-

To Download Click Here.

भारत की अर्थव्यवस्था में आज बड़े कॉरपोरेट और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी व्यापार मॉडल का वर्चस्व है। इससे आर्थिक विकास तो होता है, लेकिन आय असमानता, श्रमिकों का शोषण, क्षेत्रीय विषमताएँ और सामाजिक असंतुलन जैसी समस्याएँ भी बढ़ती हैं। ऐसे समय में सहकारी मॉडल एक वैकल्पिक और अधिक समावेशी विकास का रास्ता दिखाता है।

सहकारी मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है? –

सहकारी संस्थाएँ लाभ कमाने से अधिक अपने सदस्यों के आर्थिक और सामाजिक हितों को प्राथमिकता देती हैं। इनमें प्रत्येक सदस्य की समान भागीदारी होती है और निर्णय लोकतांत्रिक तरीके से लिए जाते हैं। इससे छोटे किसानों, कारीगरों और ग्रामीण उद्यमियों को बाज़ार में बेहतर अवसर मिलते हैं।

कुछ तथ्य –

  • सहकारिता मंत्रालय की स्थापना 6 जुलाई 2021 को की गई। इसका उद्देश्य सहकारी आंदोलन को कृषि तक सीमित रखने के बजाय डेयरी, मत्स्य पालन, बैंकिंग, आवास, उपभोक्ता सेवाओं, निर्यात तथा अन्य सेवा क्षेत्रों तक विस्तारित करना है।
  • भारत में 8.5 लाख से अधिक सहकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं, जिनसे लगभग 30 करोड़ से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।
  • भारत के डेयरी क्षेत्र में सहकारिता की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (अमूल) है, जिसने लाखों दुग्ध उत्पादकों की आय बढ़ाई।
  • संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को “अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष” घोषित किया था, जिसका विषय था: “Cooperatives Build a Better World”।

सरकार की प्रमुख पहलें –

  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियाँ करने की अनुमति दी गई है, ताकि वे बहुउद्देशीय ग्रामीण सेवा केंद्र बन सकें।
  • राष्ट्रीय स्तर की बहु-राज्य सहकारी समितियों का गठन किया जा रहा है, ताकि किसानों और उत्पादकों को राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाज़ार तक पहुँच मिल सके।
  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति तैयार की जा रही है, जिससे पूरे देश में सहकारिता क्षेत्र को एक समान दिशा मिल सकेगी।
  • डिजिटल तकनीक, क्षमता निर्माण और बाज़ार से बेहतर जुड़ाव पर विशेष बल दिया जा रहा है।

चुनौतियाँ –

हालाँकि सहकारी क्षेत्र की संभावनाएँ व्यापक हैं, लेकिन इसके सामने कई समस्याएँ भी हैं —

  • भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन
  • राजनीतिक हस्तक्षेप
  • कई सहकारी संस्थाओं की वित्तीय कमजोरी
  • राज्यों और स्थानीय समुदायों की यह आशंका कि राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के कारण उनका नियंत्रण कम हो सकता है।

इसलिए आवश्यक है कि केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय समन्वय, तथा तकनीक और मानव श्रम के बीच संतुलन बनाया जाए।

व्यापक महत्व –

यदि सहकारी संस्थाएँ केवल कृषि ऋण तक सीमित न रहकर उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात में भी सक्रिय होती हैं, तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकती हैं।

यह मॉडल वैश्विक पूँजीवाद के कारण उत्पन्न सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का भी संतुलित समाधान प्रदान कर सकता है।

आज विश्व के अनेक देश सहकारी मॉडल में नई रुचि दिखा रहे हैं, क्योंकि अत्यधिक पूँजीवादी व्यवस्था की सीमाएँ स्पष्ट होती जा रही हैं। भारत के पास अवसर है कि वह अपने विशाल सहकारी नेटवर्क को एक वैश्विक आदर्श के रूप में विकसित करे।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (08/07/26)