औद्योगिक दुर्घटनाएँ: आकस्मिक नहीं, बल्कि पूर्वानुमानित त्रासदियाँ

Afeias
10 Jul 2026
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प्रस्तावना

भारत में औद्योगिक दुर्घटनाओं को प्रायः दुर्भाग्यपूर्ण और अप्रत्याशित घटनाओं के रूप में देखा जाता है। किंतु वास्तविकता यह है कि अधिकांश औद्योगिक दुर्घटनाएँ अचानक घटित नहीं होतीं, बल्कि वे संगठनात्मक कमजोरियों, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अपर्याप्त नियमन तथा श्रमिकों की सुरक्षा के प्रति उदासीनता का परिणाम होती हैं। हाल ही में सूरत और विशाखापत्तनम में हुई घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में औद्योगिक दुर्घटनाएँ अब अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि एक व्यापक संरचनात्मक समस्या का संकेत हैं।

हाल की दुर्घटनाएँ और उनकी समानता

कुछ ही दिनों के अंतराल में दो बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाएँ हुईं —

  • सूरत में एक सेप्टिक टैंक में जहरीली गैसों के कारण चार श्रमिकों की मृत्यु हो गई।
  • विशाखापत्तनम के एक इस्पात संयंत्र में विस्फोट से नौ श्रमिकों की जान चली गई।

पहली दृष्टि में दोनों घटनाएँ अलग-अलग प्रतीत होती हैं। एक घटना सीमित स्थान (Confined Space) में विषैली गैसों के संपर्क से जुड़ी थी, जबकि दूसरी भारी उद्योग और पिघले हुए इस्पात से संबंधित थी। फिर भी दोनों में एक समानता थी—इनसे जुड़े जोखिम पहले से ज्ञात थे तथा इनके लिए सुरक्षा उपाय दशकों पहले विकसित किए जा चुके थे।

दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं पूर्वानुमानित?

आधुनिक उद्योगों को विषैली गैसों, ऊँचे तापमान, भारी मशीनरी और दबावयुक्त प्रणालियों से उत्पन्न जोखिमों की पूरी जानकारी है।

सेप्टिक टैंक और सीमित स्थानों में सुरक्षा उपाय

ऐसे कार्यस्थलों पर निम्नलिखित उपाय अनिवार्य हैं—

  • यांत्रिक वेंटिलेशन (Mechanical Ventilation)
  • श्वसन उपकरण (Breathing Apparatus)
  • सुरक्षा हार्नेस और रिट्रीवल लाइन
  • प्रशिक्षित बचाव दल की उपलब्धता, तथा
  • बिना सुरक्षा उपकरणों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध।

इसके बावजूद यदि ऐसी दुर्घटनाएँ होती हैं, तो यह सुरक्षा प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है।

इस्पात उद्योग में जोखिम

इस्पात निर्माण स्वाभाविक रूप से जोखिमपूर्ण उद्योग है, क्योंकि इसमें अत्यधिक तापमान, दबावयुक्त गैसें, भारी उपकरण और विशाल मात्रा में ऊष्मा ऊर्जा शामिल होती है।

उद्योग इन जोखिमों से परिचित है और इनके नियंत्रण हेतु मानक प्रक्रियाएँ उपलब्ध हैं। अतः ऐसी दुर्घटनाएँ तकनीकी असफलता से अधिक प्रबंधन संबंधी कमियों की ओर संकेत करती हैं।

संगठनात्मक कमजोरियाँ: दुर्घटनाओं का वास्तविक कारण

औद्योगिक सुरक्षा के क्षेत्र में यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि बड़ी दुर्घटनाएँ किसी एक गलती का परिणाम नहीं होतीं। वे लंबे समय से जमा होती आ रही संस्थागत कमजोरियों का परिणाम होती हैं।

विशाखापत्तनम दुर्घटना के संदर्भ में जिन मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया गया, उनमें शामिल हैं —

  • कर्मचारियों की संख्या में कमी
  • कार्यभार में वृद्धि
  • पुरानी होती मशीनरी
  • रखरखाव कार्यों का टलना
  • ठेका श्रमिकों पर बढ़ती निर्भरता, तथा
  • सुरक्षा निवेश में कमी।

ये सभी कारक मिलकर दुर्घटना की संभावना को बढ़ाते हैं।

ठेका श्रमिकों की बढ़ती असुरक्षा

दोनों घटनाओं में ठेका श्रमिकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि ठेका श्रमिक अधिक जोखिम का सामना करते हैं, क्योंकि —

  • उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता।
  • सुरक्षा संबंधी जवाबदेही स्पष्ट नहीं होती।
  • कार्यस्थल पर निगरानी कमजोर होती है, तथा
  • नौकरी की असुरक्षा के कारण वे जोखिमों की शिकायत करने से बचते हैं।

भारत में अनुबंध श्रम के बढ़ने से कार्यस्थल सुरक्षा की समस्या और गंभीर बन गई है।

सामाजिक और संरचनात्मक आयाम

औद्योगिक दुर्घटनाएँ केवल तकनीकी समस्या नहीं हैं। वे सामाजिक असमानताओं से भी जुड़ी हुई हैं।

  1. जाति और वर्ग आधारित जोखिम

सेप्टिक टैंक की सफाई और अन्य खतरनाक कार्य अक्सर समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों द्वारा किए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि औद्योगिक जोखिम समान रूप से वितरित नहीं हैं।

  1. मानव संसाधन की कमी

कई उद्योग न्यूनतम कर्मचारियों के साथ कार्य करते हैं, जिससे श्रमिकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और मानवीय त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है।

  1. “सुरक्षा से अधिक लागत” की मानसिकता

आर्थिक दबाव से जूझ रहे कई उद्योग सुरक्षा को निवेश के बजाय खर्च मानते हैं। इसके परिणामस्वरूप—

  • रखरखाव कार्य टाले जाते हैं।
  • सुरक्षा प्रशिक्षण कम कर दिया जाता है, तथा
  • आधुनिक उपकरणों की खरीद स्थगित हो जाती है।

यह दृष्टिकोण अंततः बड़ी दुर्घटनाओं को जन्म देता है।

नियामक चुनौतियाँ

भारत ने कार्यस्थल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020 (OSHWC Code, 2020) लागू की है। किंतु इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी चुनौती बना हुआ है।

मुख्य समस्याएँ हैं—

  • निरीक्षण तंत्र की कमजोरी
  • सुरक्षा ऑडिट का अभाव
  • अनुपालन सुनिश्चित करने की सीमित क्षमता, तथा
  • छोटे और मध्यम उद्योगों में सुरक्षा संस्कृति का अभाव।

आगे की राह

औद्योगिक दुर्घटनाओं को कम करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं—

सुरक्षा संस्कृति का विकास

सुरक्षा को केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि संस्थागत मूल्य बनाया जाए।

नियमित प्रशिक्षण

स्थायी और ठेका; दोनों प्रकार के श्रमिकों को अनिवार्य सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाए।

जवाबदेही सुनिश्चित करना

  • स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट
  • तकनीकी आधुनिकीकरण
  • स्वचालन, गैस डिटेक्टर, सेंसर और पूर्वानुमान आधारित रखरखाव तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाए।
  • ठेका श्रमिकों की सुरक्षा, तथा
  • प्रभावी कानूनी प्रवर्तन।

निष्कर्ष

यदि भारत को सुरक्षित और समावेशी औद्योगिक विकास सुनिश्चित करना है, तो उसे “लागत से पहले सुरक्षा” की संस्कृति अपनानी होगी। श्रमिकों का जीवन केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास का सबसे मूल्यवान संसाधन है।

इसलिए औद्योगिक प्रगति और मानव सुरक्षा को साथ-साथ आगे बढ़ाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (11/06/26)