बढ़ते ऊर्जा संकट को कैसे संभाले सरकार
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भारत की ऊर्जा नीति को एक बड़े बदलाव की जरुरत है। कुछ महीनों से चले रहे ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते अब समय आ गया है, जब सरकार को उद्योगों और शोधकर्ताओं से सलाह लेकर एक दीर्घावधि योजना बनानी चाहिए, और उसे तेजी से लागू करना चाहिए।
इस योजना का मुख्य केन्द्र निम्न बिन्दुओं पर आधारित हो सकता है –
- आयातित हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता कम करनी होगी।
- आयातित गैस के बजाय कोयले से उर्वरक बनाने का प्रयत्न करना, जैसा कि चीन ने किया है।
- आर्गेनिक या जैविक कूड़े से बायोगैस बनाना।
- पेट्रोल के साथ इथैनॉल मिलाने का रास्ता हम पहले ही तय कर चुकें हैं। लेकिन यह विवादित है, क्योंकि हमारी गाड़यों के इंजन इसके अनुकूल नहीं हैं। हमने ब्राजील से यह सीखा है। वहाँ की ज्यादातर गाडि़यां 2003 से इथेनॉल पर चलती हैं। वे 0-100% तक की इथेनॉल मिलावट को संभाल सकती हैं। लेकिन भारत में क्या यह उचित है? यह इलेक्ट्रिक वाहन का युग है। गत वित्त वर्ष में बिकने वाली गाडि़यों में 4.5% इलेक्ट्रिक थीं। ऐसे में इथेनॉल को बनाने के लिए मक्का और गन्ने की फसल के लिए जरूरी उर्वरक की बढ़ती कीमतों के साथ बहुत संभव है कि इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री और तेज हो जाए।
स्थितियों को देखते हुए सरकार को ऊर्जा घटकों से बचने के बेहतर तरीकों की नितांत आवश्यकता है।
(‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-09/06/2026)