23-06-2026 (Important News Clippings)
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Deadly fumes
Strict enforcement of safety norms is absent in many industrial units
Editorial
Tamil Nadu has witnessed its deadliest industrial ammonia gas leak tragedy, which has so far claimed the lives of eight migrant women workers at a private seafood processing unit in Tiruvallur district. Some of the 68 hospitalised workers are in intensive care on oxygen support. Since the 1980s, the State has battled ammonia leaks in factories every few years, mostly in and around Chennai. Other than in Thoothukudi in 2024, where one worker died, such accidents have at worst led to the hospitalisation of large numbers of people with eye irritation and breathing difficulties. There were no casualties even when an estimated 67.638 tonnes of ammonia leaked from the undersea pipeline of a private company in Ennore during Cyclone Michaung in 2023. The scale of the tragedy at St. Peter & Paul Seafood Exports Pvt. Ltd., Tiruvallur, indicates that the colourless pungent gas may have accumulated in the atmosphere at fatal concentrations. The leak occurred when workers were resting in factory accommodation, on Sunday. Had the incident occurred on a working day, the number of people exposed to the leak from the ammonia pipeline to the ice-flake machinery could have been significantly higher.
While a committee comprising the Director of Industrial Safety and Health (DISH), the Member Secretary of the TN Pollution Control Board, and the Additional Director of Public Health is conducting an inquiry, disturbing facts have emerged. The factory reportedly failed to rectify serious deficiencies, pointed out during an earlier DISH inspection, including the absence of a suitable alarm system and fire hydrant. It had also not obtained a revised plan approval for installing an ice-flaking machine. That matter is sub judice. Investigations will reveal whether these shortcomings had any bearing in this tragedy. What is clear, however, is that had the recommendations made by DISH in the Ennore case been universally enforced in factories using ammonia, the scale of the current tragedy could have been contained. DISH had recommended the provision of adequate ammonia sensors in the plant and surrounding areas for early warning, along with water-curtain systems linked to ammonia alarms and fire-water nozzles for ammonia feed pumps to reduce the impact of leaks. The government has now decided to form a committee to inspect all 6,669 hazardous industries. However, numerous checks and balances exist under the Tamil Nadu Control of Industrial Major Accident Hazards Rules, 1994. What is required is strict enforcement through a coordinated approach, stronger penalties for violators, and the political will to act decisively against them.
लापरवाही की आग
संपादकीय
बहुत दिन नहीं हुए, जब देश की राजधानी में अवैध रूप से बनाए और संचालित किए जा रहे होटल में आग लगने से 20 से अधिक लोग मारे गए थे। माना गया था कि इस दिल दहलाने वाली घटना से सीख ली गई होगी और कम से कम देश के प्रमुख शहरों में सभी व्यावसायिक इमारतों में आग से बचाव के उपायों की जांच-परख की गई होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक व्यावसायिक इमारत में आग लगने की घटना से पता चलता है कि ऐसा नहीं किया गया। इस घटना में इस इमारत में चल रहे एक कोचिंग सेंटर के 15 से अधिक छात्रों की जान चली गई।
इस घटना पर राज्य सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि आग लगने के कारणों की गहन जांच की जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन हर बार ऐसा ही तो होता है। जब भी किसी अग्निकांड में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं तो कुछ दिन तक शासन-प्रशासन की संवेदना, सजगता और सक्रियता दिखती है, लेकिन फिर सब कुछ पहले की तरह हो जाता है। ऐसी अधिकतर घटनाओं में आम तौर पर यही सामने आता है कि संबंधित इमारत में या तो आग से बचाव के पर्याप्त उपाय नहीं थे या वे काम नहीं कर रहे थे।
आग लगने की कई घटनाओं में यह भी सामने आता है कि बड़ी-बड़ी इमारतों में हर तरह की गतिविधियां अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए बिना ही शुरू हो जाती हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि यदि आग लगने की घटनाओं की जांच रपट समय रहते आ भी जाती है तो ठोस कार्रवाई नहीं होती। कई घटनाओं में इस कारण भवन स्वामी की तो गिरफ्तारी हो जाती है कि उसने आग से बचाव के पर्याप्त प्रबंध नहीं कर रखे थे, पर सरकारी एजेंसियों के वे अधिकारी-कर्मचारी कठिनाई से ही किसी कठोर कार्रवाई के दायरे में आते हैं, जिन पर यह देखने की जिम्मेदारी होती है कि प्रत्येक इमारत में आग से बचाव के प्रभावी उपाय हों।
लखनऊ की दर्दनाक घटना पर अभी यह सामने आना शेष है कि आग ने इतना विकराल रूप क्यों ले लिया और उसमें फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने में वांछित सफलता क्यों नहीं मिली, लेकिन इसमें तो कोई संशय ही नहीं कि कहीं न कहीं लापरवाही बरती गई। हादसे कहीं भी हो सकते हैं, पर वे तब बड़ी जनहानि का कारण बनते हैं, जब सुरक्षा उपायों की अनदेखी एक तरह की अंधेरगर्दी में बदल जाती है।
लापरवाही की यह आग केवल लोगों की जिंदगियां ही नहीं लील रही, बल्कि देश की बदनामी भी करा रही है। दिल्ली और लखनऊ जैसी घटनाएं यही बताती हैं कि अपने यहां प्रमुख शहरों में भी सार्वजनिक सुरक्षा एक तरह से भगवान भरोसे है। हम विकसित देश बनने के तो आकांक्षी हैं, लेकिन उन जैसे तौर-तरीके अपनाने के लिए तत्पर नहीं। हमें प्रायः ही इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
Date: 23-06-26
चुनौतियों के साथ अवसरों का भी दौर
प्रो. गौरव वल्लभ, ( लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं )
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। एक ओर खुदरा महंगाई दर रिजर्व बैंक के लक्ष्य से नीचे बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर थोक महंगाई में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के भू-राजनीतिक तनावों में कमी के बाद रुपया फिर मजबूती की ओर बढ़ा है, देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है और भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। यह तस्वीर आश्वस्त करने वाली है, पर इसके भीतर कुछ ऐसे संकेत भी छिपे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण संकेत थोक और खुदरा महंगाई के बीच बढ़ता अंतर है। हाल में थोक महंगाई तेजी से बढ़ी है, जबकि खुदरा महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रहती। उत्पादन लागत में होने वाली वृद्धि का बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता ही है। इसलिए आज जो दबाव उद्योगों और उत्पादकों पर दिखाई दे रहा है, उसका असर आने वाले समय में आम उपभोक्ता की जेब पर भी पड़ सकता है।
थोक महंगाई मुख्यतः उन लागतों को दर्शाती है, जिनका सामना उत्पादकों को करना पड़ता है। जब ऊर्जा, परिवहन, आयातित कच्चे माल और विनिर्माण की लागत बढ़ती है, तब कंपनियां शुरुआत में अपने मुनाफे में कटौती करके कुछ बोझ स्वयं वहन करती हैं, पर यदि लागत का दबाव बना रहता है तो अंततः कीमतों में वृद्धि करनी पड़ती है। थोक महंगाई में हाल की तेजी को केवल एक अस्थायी घटना मानना उचित नहीं होगा। इस बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण ऊर्जा लागत है। वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ईंधन और बिजली की ऊंची कीमतों ने उत्पादन लागत को बढ़ाया है। सकारात्मक पक्ष यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक तेल कीमतों में नरमी आई है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह राहत के साथ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर भी है।
अक्सर कम तेल कीमतों को अतिरिक्त खर्च करने का अवसर समझ लिया जाता है, पर यह दृष्टिकोण दूरदर्शी नहीं होगा। बाजारों के उतार-चढ़ाव स्थायी नहीं होते। समझदारी इसी में है कि अनुकूल परिस्थितियों का उपयोग आर्थिक बुनियाद को मजबूत करने में किया जाए। सबसे पहले घटी तेल कीमतों से होने वाले लाभ का उपयोग बाहरी क्षेत्र की मजबूती के लिए किया जाना चाहिए। जब तेल आयात बिल घटता है तो चालू खाते का संतुलन बेहतर होता है। इस अवसर का उपयोग विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत करने में किया जा सकता है। मजबूत भंडार केवल आर्थिक शक्ति का प्रतीक नहीं होते, बल्कि भविष्य के वैश्विक झटकों के खिलाफ सुरक्षा कवच भी प्रदान करते हैं।
दूसरा, यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का उपयुक्त समय है। पिछले एक दशक में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रत्येक नई प्रगति भारत की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता को कम करेगी। यह पर्यावरण संरक्षण संग आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है। तीसरा, कम ऊर्जा लागत भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए भी अवसर लेकर आई है। ढुलाई खर्च घटने से भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। लक्ष्य निर्यात बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी को स्थायी रूप से मजबूत करना होना चाहिए।
यह समय ऊर्जा आधारित विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने के भी अनुकूल है। बेहतर अवसंरचना, विशाल घरेलू बाजार, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं और अपेक्षाकृत कम ऊर्जा लागत भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प बनाती हैं। यदि नीतिगत स्थिरता और सुधारों की गति बनी रहती है तो भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकता है। हालांकि इन अवसरों का पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब वित्तीय अनुशासन कायम रहे। तेल कीमतों में गिरावट के समय सरकारों पर अतिरिक्त खर्च बढ़ाने का दबाव बनता है, पर दीर्घकालिक आर्थिक हित इसी में हैं कि इस बचत का उपयोग पूंजीगत निवेश बढ़ाने, राजकोषीय घाटा कम करने और रणनीतिक भंडार निर्माण में किया जाए। हाल के वर्षों में भारत ने राजकोषीय विश्वसनीयता को अपनी एक बड़ी ताकत बनाया है। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, उधारी की लागत कम हुई है और रुपये को स्थिरता मिली है। इस उपलब्धि को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
हमारी आर्थिकी अभी भी मानसून जैसे कारकों के प्रति संवेदनशील है। यदि वर्षा कम हुई तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। इसलिए खाद्यान्न भंडार और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। वास्तविक आर्थिक नेतृत्व की पहचान संकट के बाद प्रतिक्रिया देने में नहीं, बल्कि संकट आने से पहले तैयारी करने में होती है। तेल की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं फिर बाधित हो सकती हैं और पूंजी प्रवाह अधिक अस्थिर हो सकता है। महान राष्ट्र केवल संकटों का सामना करके नहीं, बल्कि अवसरों का सही उपयोग करके आगे बढ़ते हैं। आज भारत के सामने ऐसा ही एक अवसर है।
Date: 23-06-26
त्रासदी रोकने के प्रयास या नई आपदा का पूर्वाभ्यास
अमित कपूर, ( लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ कम्पेटिटिवनेस के अध्यक्ष हैं )
दिल्ली में जून के महीने में हुईं भीषण आग की दो घटनाओं में एक अजीब समानता है। 13 जून, 1997 को ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा हॉल अग्निकांड में 59 लोग दम घुटने से मर गए। इस सिनेमा हॉल में मुनाफे के लिए गैर-कानूनी तौर पर बदलाव किए गए थे। वहीं, 3 जून, 2026 को कुछ ही किलोमीटर दूर हौज रानी में, फ्लरिश स्टे बेड-ऐंड – ब्रेकफास्ट में 21 लोगों की मौत हो गई। इस इमारत में सिर्फ छह कमरों की अनुमति के बावजूद 26 कमरे चल रहे थे और इसे अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र भी प्राप्त नहीं था। इन दोनों त्रासदियों के बीच 29 साल का अंतर है, फिर भी इनसे मिलने वाले सबक कहीं नजर नहीं आते। यह समानता मेरे लिए बहुत ही व्यक्तिगत है। मेरी बुआ रेखा मेहरा, और मेरे रिश्ते के भाई वेदांत मेहरा, उपहार सिनेमा हॉल में मरने वाले 59 लोगों में शामिल थे, और इस जून में यह दुख ऐसे लौट आया मानो इतने साल बीते ही न हों।
हौज रानी में मारे गए लोग शहर की छिपी हुई अर्थव्यवस्था की एक झलक थेः कामगार और ऐसे मरीज जो इलाज के लिए महाद्वीप पार करके आए थे क्योंकि उनके अपने देश में इलाज का खर्च वहन करना संभव नहीं था। मृतकों में से 11 विदेशी नागरिक थे। इसके बाद की प्रशासनिक प्रक्रिया जानी-पहचानी सी रही। एक रसोइये को हिरासत में लिया गया, मालिक को गिरफ्तार किया गया और अनधिकृत अतिथि गृहों पर कार्रवाई की घोषणा की गई। सजा देने में जो दक्षता होती है, वह रोकथाम में नहीं दिखती, जो भ्रष्टाचार से लथपथ अफसरशाही की दलदल में दबी पड़ी है।
इस आग से जुड़ा सबसे कठिन सवाल यह है कि भारत में विकास और शहरीकरण का क्या अर्थ है। हमने एक ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित कर ली है जो आईफोन से लेकर बिरयानी तक सब कुछ 10 मिनट में घर तक पहुंचा सकती है, लेकिन एक गली के जरिये दमकल गाड़ी को 20 मिनट में नहीं पहुंचा सकती । आज हमारे शहरीकरण का अधिकांश हिस्सा अधिकतम किराये के लिए जमीन हथियाने, तय सीमा से अधिक ऊंची इमारतें बनाने और अस्पतालों का इस बात की परवाह किए बिना विस्तार करने से जुड़ा है कि वहां आने वाले मरीजों के सोने की व्यवस्था कहां होगी । सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर विकास को मापना प्रगति माना जा सकता है, लेकिन यह पूरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है।
यह सिर्फ आग लगने की घटना नहीं है, राष्ट्रीय राजधानी में बुनियादी ढांचे की विफलता एक आम समस्या है। जुलाई 2024 में ओल्ड राजेंद्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के बाढ़ग्रस्त बेसमेंट में तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों की डूबने से मौत हो गई, जबकि वहां पुस्तकालय होना ही नहीं चाहिए था । इसी साल फरवरी में जनकपुरी में कमल ध्यानी अपनी मोटरसाइकल लेकर जल बोर्ड के एक ऐसे 14 फुट गहरे गड्ढे में जा गिरे, जिस पर कोई निशान या चेतावनी नहीं लगी थी । एक अनुमान के अनुसार, 2019 से राजधानी में आग लगने की घटनाओं में 500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। समाजशास्त्री चार्ल्स पेरो ने उत्पन्न आपदाओं का वर्णन करने के लिए ‘सामान्य दुर्घटनाएं’ शब्द का प्रयोग किया, जो किसी व्यक्ति की गलती के बजाय जटिल सिस्टम की वजह से होती हैं। हमारे शहरों ने इस अवधारणा को और भी पुख्ता किया हैः ये मौतें सामान्य हैं, दुर्घटनाएं नहीं। ये उन फैसलों का नतीजा हैं जो लिए गए, टाले गए या जिनसे पैसे कमाने की कोशिश की गई। देश में ऐसे स्थान क्यों मौजूद हैं ? भारत के टियर-1 शहरों में, अनौपचारिकता शायद ही कभी नियोजन की कमी होती है, बल्कि यह स्वयं नियोजन का एक तरीका है। ये स्थान इसलिए बनते और सहन किए जाते हैं क्योंकि ये उपयोगी हैं। हर अस्पताल, मॉल और ऑफिस टावर सस्ते कमरों और लचीले श्रम की मांग पैदा करता है, जो किसी स्वीकृत योजना में उपलब्ध नहीं होते, इसलिए अनधिकृत बस्तियां इनकी पूर्ति करती हैं। जिसे हम अवैध निर्माण कहते हैं,
वह शहर द्वारा अपनी आवास समस्या को गरीबों पर थोपने जैसा है। हौज रानी गेस्ट हाउस नियोजन की अवहेलना करते हुए नहीं बने, वे इसलिए बने क्योंकि नियोजन ने एक खालीपन छोड़ दिया और किराये ने उसे भर दिया। किसी शहर की प्रगति का एक उचित मापदंड यह है कि वह अपने सबसे कमजोर निवासियों को कितने अच्छे विकल्प प्रदान करता है। इस मापदंड के अनुसार, एक महानगर जो किफायती आवास और सुरक्षित आवास के बीच चयन करने के लिए मजबूर करता है, वह विकसित नहीं हो रहा है, बल्कि केवल विस्तार कर रहा है। संस्थागत भ्रष्टाचार के नीचे एक ऐसी चीज छिपी है जिसके खिलाफ कानून बनाना कहीं अधिक कठिन है, एक नैतिक पतन जो रोजमर्रा के नागरिक जीवन में समा चुका है। यह नागरिकों के रूप में हमारी चुप्पी में भी झलकता है। हममें से कुछ ही लोग यह सोचने के लिए रुकते हैं कि जिस इमारत में हम सोते हैं उसे किसने मंजूरी दी थी या उसका आपातकालीन निकास कहां जाता है। हम भारत के नागरिक सवाल पूछना और जीवन की उस गुणवत्ता पर जोर देना भूल गए हैं जो मायने रखती है। हमने मात्रा को ही प्राथमिकता दी है, ज्यादा मंजिलें ज्यादा वर्ग फुट, तेज डिलिवरी, जबकि एक सुरक्षित कमरा या पैदल चलने योग्य सड़क जैसी बुनियादी गरिमा हमारी सामूहिक कल्पना से ओझल हो गई है। जो समाज बेहतर की मांग नहीं करता, उस पर निश्चित रूप से वही लोग शासन करेंगे जो उसे प्रदान नहीं करते। अंततः, यह नैतिकता का मामला है, जो हर स्तर पर खो गई है।
उपहार के पीड़ितों के परिवार, जिनमें मेरा परिवार भी शामिल है, उन्होंने अगली आगजनी को रोकने के लिए दो दशकों से अधिक समय अदालतों में बिताया। फिर भी, उसी महीने, उसी शहर में, उन लोगों के साथ आगजनी हुई जिनके पास जवाब मांगने की शक्ति और भी कम थी। हौज रानी में लगी पीली टेप कुछ ही दिनों में हट जाएगी और गली फिर से गुलजार हो जाएगी, क्योंकि जरूरत सुधार का इंतजार नहीं करती। उन 21 मृतकों के लिए एकमात्र स्मारक एक ऐसा शहर हो सकता है जहां वे सुरक्षित होते, जहां अस्पताल के पास का कमरा पाने के लिए जान जोखिम में न डालनी पड़े, और जहां अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र किसी इमारत का विवरण हो, न कि केवल एक फाइल को सजाने के लिए। इससे कम कुछ भी हो, तो मान लीजिए कि हम मृतकों का शोक नहीं मना रहे, बल्कि अगली बार ऐसी ही घटना के लिए पूर्वाभ्यास कर रहे हैं।
लापरवाही की आग
संपादकीय

उतर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को एक व्यावसायिक इमारत में आग लग जाने से विद्यार्थियों समेत कम से कम 15 लोगों की मौत की घटना ने एक बार फिर भवनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश भर में आए दिन इस तरह के हादसे हो रहे हैं, लेकिन न तो शासन-प्रशासन और न ही भवन मालिकों की ओर से व्यवस्था को सुधारने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने को लेकर कोई गंभीरता नजर आती है। हालांकि, कोई हादसा किसी मामूली कोताही का नतीजा हो सकता है, लेकिन उससे सबक लेकर अगर भविष्य में सावधानी बरतने और बचाव के जरूरी इंतजाम नहीं किए जाते हैं, तो यह आपराधिक लापरवाही को दर्शाता है। सवाल है कि हादसे के तत्काल बाद सरकार की ओर से जो गंभीरता दिखाई जाती है, वह व्यावसायिक इमारतों में सुरक्षा प्रबंधों को पुख्ता करने के मामले में नजर क्यों नहीं आती है? जांच का दायरा और उसके नतीजों का प्रभाव सिर्फ संबंधित हादसे तक ही सीमित क्यों रह जाता है?
खबरों के मुताबिक, जिस व्यावसायिक इमारत में आग लगी, वहां विद्यार्थियों के लिए कोचिंग सेंटर और कैफे संचालित किए जाते थे। यह रिहायशी इलाका है, जहां ज्यादातर आर्थिक रूप से संपन्न लोग रहते हैं। आग इतनी तेजी से फैली कि इमारत से बाहर निकालने का रास्ता भी अवरुद्ध हो गया और कुछ लोग अंदर ही फंसे रह गए। हादसे की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दमकल कर्मियों को दीवार में छेद कर दूसरी इमारत की छत के रास्ते मृतकों के शवों और घायलों को बाहर निकालना पड़ा। ऐसे में सवाल है कि जब इस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही थीं, क्या वहां आपात स्थिति में सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त नहीं किए गए थे? लोगों के बाहर निकलने के लिए क्या वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था मौजूद नहीं थी। जाहिर है कि इन सभी सवालों के जवाब गहन जांच के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन यह देखना होगा कि क्या इस हादसे के सभी दोषियों को न्याय के कठघरे में लाया जाएगा या नहीं।
गौरतलब है कि हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में आग की ऐसी ही एक घटना में इक्कीस लोगों की जान चली गई थी। पिछले वर्ष जुलाई में दिल्ली के राजेंद्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के तहखाने में जलभराव के कारण तीन युवाओं की मौत हो गई थी। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि देश भर में व्यावसायिक इमारतों में सुरक्षा मानकों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पिछले दिनों आग की कई घटनाओं में जांच के बाद यह बात सामने आई है कि संबंधित भवन मालिकों के पास अग्नि सुरक्षा अनापत्ति प्रमाणपत्र ही नहीं था। इससे यही साबित होता है कि ऐसे हादसों के लिए न केवल भवन मालिक, बल्कि सरकार के संबंधित महकमों के अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। जिन व्यावसायिक इमारतों में हर समय खासी संख्या में लोग मौजूद रहते हैं, वहां आग लगने या अन्य किसी आपात स्थिति में बचने के लिए सुरक्षा इंतजामों की जांच और निगरानी करने की जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों की नहीं, तो और किसकी है। जरूरत इस बात की है कि नियमों की अनदेखी करने या उन्हें ताक पर रख कर गतिविधियां संचालित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की भी जावबदेही तय की जाए।
Date: 23-06-26
अल नीनो से उभरी चुनौतियां
ऋतुपर्ण दवे

पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म होने पर अभी अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। इससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने लगा है। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों ने जहां पहले ही चिंता बढ़ा रखी है, वहीं अब एक नई प्राकृतिक आपदा मुंह बाए खड़ी है।
यह है अल-नीनो, जिसने प्रशांत महासागर में दस्तक दे दी है। इसका असर देश भर में मानसून पर पड़ना तय माना जा रहा है। इतना ही नहीं अल-नीनो का प्रभाव मानसून के बाद भी जारी रहने की आशंका ने चिंता बढ़ा दी है। इसके सितंबर तक बने रहने की स्थिति ने कृषि क्षेत्र और पेयजल की उपलब्धता पर गंभीर संकट के संकेत दे दिए हैं। अमेरिकी मौसम एजंसी ‘नेशनल ओशेनिक एंड एटमास्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ के अनुसार, यह जून से जुलाई के दौरान दस्तक देने वाला है। इस बार प्रशांत महासागर का तापमान मई में ही सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो गया। भू-मध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज होना बताता है कि आगे यह स्थिति और बिगड़ सकती है।
भारतीय मौसम विभाग भी मानता है कि अल-नीनो का सीधा असर मानसून में होने वाली बारिश पर पड़ेगा यानी बारिश कम होगी। जाहिर है कि देश में सूखे की संभावना बढ़ेगी। सामान्य हालात में प्रशांत महासागर क्षेत्र में चलने वाली तेज हवाएं गर्म पानी को एशिया और आस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं, जिससे भारत में अच्छी वर्षा होती है। मगर जब अल-नीनो का प्रभाव रहता है, तो ये हवाएं कमजोर हो जाती हैं, जिससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू के तट के पास का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक बारिश चक्र में भारी उथल-पुथल होती है। समुद्र की इस गर्मी को वायुमंडल में फैलने में थोड़ा समय लगता है जिसका प्रभाव दूसरे वर्ष के तापमान में वृद्धि के रूप में सामने आता है।
अल-नीनो एक प्राकृतिक और मौसमी जलवायु चक्र है। इससे मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है। अमूमन यह घटना हर दो साल में घटित होती है और इसका असर दुनिया भर के मौसम, तापमान और बारिश पर पड़ता है। भारत में कम वर्षा होने से सूखे जैसे हालात फिर बन सकते हैं। इस बार इसे सुपर अल-नीनो कहा जा रहा है। इसका असर इस साल के आखिर तक रहेगा।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जुलाई, अगस्त और सितंबर के प्रारंभ में भले ही इसका प्रभाव कम दिखे, लेकिन सितंबर जाते-जाते इसके ज्यादा शक्तिशाली होने की संभावना है। अल-नीनो शब्द स्पेनी भाषा का है। दक्षिण अमेरिकी मछुआरों का ध्यान सबसे पहले 1600 के दशक में, पेरू में उस घटना पर गया, जिसमें उन्होंने पाया कि प्रशांत महासागर में जल का तापमान आम तौर पर दिसंबर के आसपास कई बार बढ़ जाता है, जो कि क्रिसमस का समय होता है। इसी कारण इसे ‘अल नीनो डी नविदाद’ नाम दिया गया। इसे बाद में ‘अल-नीनो’ कहा जाने लगा। इसी तरह एक घटना ला-नीनो भी होती है, जो इसके उलट होती है। ये अल-नीनो चक्र की विपरीत अवस्था होती हैं। ला-नीनो की शीत अवस्था होती है, यह पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र के असामान्य शीतलन को दर्शाता है। फिलहाल भारत में अल-नीनो को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसने पूरे यूरोप को बुरी तरह से प्रभावित किया और अब भारत पर इसका व्यापक असर पड़ने की संभावना है।
इससे पैदा होने वाली खतरनाक स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे निपटने के लिए हरसंभव कोशिश की जा रही है। भारतीय उपमहाद्वीप में ज्यादातर आबादी अब भी खेती-किसानी पर निर्भर है, जो मानसून के लिए टकटकी लगाए रहती है। भले ही सिंचाई के कितने साधन हो गए हों, लेकिन वर्षा जल और मानसून का अपना महत्त्व है। भारतीय मौसम विभाग वर्ष 2026 में अल-नीनो की वजह से मानसून के कमजोर रहने की आशंका पहले ही जता चुका है। आर्थिक जगत में भी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इससे ग्रामीण अंचलों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। यदि इस बार भी ऐसा हुआ, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था को तो प्रभावित करेगा ही, साथ ही किसानों के लिए भी मुश्किलें बढ़ जाएंगी।
निश्चित रूप से वर्षा कम होने से धान, दाल, मक्का और मूंगफली जैसी खरीफ फसलों की जहां बुआई प्रभावित होगी, वहीं उपज पर भी असर पड़ेगा। हाल में आई मौसम संबंधी रपट ने चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि जून से अगस्त के बीच अल-नीनो की घटना अस्सी फीसद होने की संभावना है। जबकि कम से कम नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना नब्बे फीसद से भी ज्यादा है। थोड़ी राहत की बात यह है कि भारत में जलाशयों का जलस्तर सामान्य भंडारण के आसपास है और देश भर में सब्जियों की आवक के आंकड़े भी संतोषजनक हैं। मगर यह मौजूदा स्थिति है, भविष्य में ऐसी स्थिति बनी रहगी या नहीं, इस बारे में अभी से कुछ कह पाना मुश्किल है। निश्चित रूप से खाने-पीने की चीजों और र्इंधन की कीमतों में अचानक और बार-बार बदलावों से महंगाई बढ़ेगी और इसका असर आम आदमी पर ही पड़ेगा।
सरकार को अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं से निपटने के लिए व्यापक एवं स्थायी रणनीति बननी चाहिए। इसके लिए वर्षा जल संग्रह को न केवल प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, बल्कि इसे अनिवार्य भी किया जाना चाहिए। यदि घर-घर वर्षा जल संचय यानी बारिश के पानी को बर्बाद होने से बचाने और उसे भविष्य के उपयोग के लिए जमा किया जाने लगे, तो काफी हद तक पानी की समस्या से निपटा जा सकता है। जब हमारे अपने कुएं, तालाब, पोखर और ट्यूबवेल भरे होंगे, तो कुछ वर्षों के अंतर से आने वाले अल-नीनो के असर से आसानी से निपटा जा सकता है। केवल सरकार पर निर्भर रहने से कुछ ज्यादा हासिल होने वाला नहीं, समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
देश में गर्मी के दस्तक देते ही विभिन्न राज्यों में पानी की किल्लत की तस्वीरें सामने आने लगती है। हर साल तो अल-नीनो आता नहीं, लेकिन भूजल संकट जरूर रहता है। ऐसे में सरकार को इस बाबत कानून बना कर घर-घर वर्षा जल संचय को अनिवार्य किए जाने जैसे कदम उठाने होंगे। बारिश कम होने से फसलों की बुआई और पैदावार पर सीधा असर पड़ता है। इससे धान, दाल, सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। वैसे भी बारिश की कमी से खेतों में नमी कम हो जाती है और इससे फसलें सही तरीके से विकसित नहीं हो पाती हैं। यह किसानों पर भी भारी पड़ता है, उन्हें सूखे के जोखिम के बावजूद सिंचाई के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है, जो उनकी आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त भार डालता है।