एसआईआर पर अनेक सवाल
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देश में मतदाता सूची से जुड़ा विशेष गहन पुनरीक्षण या एसआईआर का काम कुछ समय से चल रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में न्यायालय ने कई महीनों तक इस प्रक्रिया की संवैधानिकता पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की दिशा में एक कदम बताया है। न्यायालय की इस देरी के कई प्रभाव हुए हैं –
- न्यायालय ने संवैधानिक सवाल पर निर्णय तो दे दिया कि एसआईआर लागू करना सही था,लेकिन इसे लागू करने के गलत तरीके पर काई टिप्पणी नहीं की है।
- न्यायालय की ओर से की गई देरी का नतीजा यह हुआ कि रोल में कुल 10% से ज्यादा की कमी आई। लगभग 6.5 करोड़ नाम हटाए गए। तमिलनाडु को छोड़कर ज्यादातर राज्यों की मतदाता सूची में लैंगिक अनुपात में एक अजीब गिरावट देखी गई है। एसआईआर की कमियों के कारण अल्पसंख्यकों और पिछड़े लोगों के एक बड़े हिस्से को मनमाने ढंग से हटाया गया है। इससे कई चुनाव क्षेत्रों के नतीजों पर असर पड़ा।
- याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत ‘केवल’ लक्षित चुनाव क्षेत्र में पुनरीक्षण की अनुमति दी गई है, पूरे राज्य में नहीं। न्यायालय ने इसे पूरी तरह से उलटते हुए कह दिया कि ‘केवल’ की जगह ‘किसी’ पढ़ा जाना चाहिए। इस कथन ने करोड़ों पंजीकृत मतदाताओं की पहचान को दांव पर लगा दिया है।
- यहाँ 1995 के लाल बाबू हुसैन मामले की चर्चा भी की जानी चाहिए। इस मामले में न्यायालय ने कहा था कि मतदाता सूची से हटाये गए किसी भी एक नाम के पीछे अपने अलग-अलग तथ्य हो सकते हैं।
न्यायालय भी मानता है कि सही मतदाता सूची ही सही चुनावों की नींव होती है।फिर कानूनी पंजीकृत मतदाताओं को गलत तरीके से क्यों हटाया जा रहा है?
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-29/05/2026)