वित्तीय संकट से जूझती सरकार
To Download Click Here.

भारत पर छाए आर्थिक संकट के मद्देनजर सरकार अपने खर्चों में कटौती कर रही है। मंत्री अपने काफिले कम कर रहे हैं, और नौकरशाह हवाई यात्रा के बिना भी काम चला रहे हैं। किफायत एक अच्छाई है। इस अच्छी आदत को तब भी बनाए रखना चाहिए, जब होर्मुज संकट खत्म हो जाए। क्योंकि बचाया हुआ तेल का हर बैरल, सोने का हर टुकड़ा और उर्वरक की हर बोरी रुपये को मजबूत बनाती है।
इस बीच जरूरी व्यय को बंद करना बेवकूफी हो सकती है। उदाहरण के लिए, क्या बुनियादी ढांचे के कामों में कटौती से वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है? नहीं। इससे रोजगार, आय और मांग पर असर पड़ेगा, और अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाएगी। बढ़ता कैश ट्रांसफर पहले हानिकारक लग रहा था, लेकिन अब उसे रोकने से गरीब परिवारों के लिए मुश्किल बढ़ सकती है।
सरकार ने सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर लोगों के उपयोग को नियमित करने की कोशिश की है। यह भी अर्थव्यवस्था को संतुलित रखने का अच्छा तरीका है। इससे इन पदार्थों की मांग घटेगी, फोरेक्स बचेगा। सार्वजनिक कार्यों के लिए सरकार के खजाने में कुछ पैसा रहेगा। हाँ, स्वर्ण की तस्करी बढ़ सकती है।
यदि सार्वजनिक कार्यों की बात करें, तो इस वर्ष के संकट में बराबर चलने के लिए यह बहुत बड़ी कुंजी है। इस हेतु सरकार को राजस्व अधिक चाहिए। इसके लिए अगर कर बढ़ाया जाए, तो उपभोक्ता को पिछले कुछ सालों में दिए गए नीति आयोग के सुझावों पर काम करना चाहिए –
- एक सुझाव नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन है। पिछले चार सालों में सरकार ने कोयला ब्लॉक जैसी मुख्य संपत्ति से 5.3 लाख करोड़ रुपये कमाए हैं। इसी प्रकार से खाली भूमि को भी धीरे-धीरे बेचा जा रहा है।
2022 में नेशनल लैंड मोनेटाइजेशन कॉर्पोरेश्शन बन गया है। रेलवे और रक्षा जैसे बड़े मंत्रालयों समेत सरकार के पास लगभग 15,500 वर्ग कि.मी. भूमि है। इससे धन जुटाने के प्रयास जारी रखे जाने चाहिए।
(‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-14/05/2026)