समय के साथ पाठ्यपुस्तकों में बदलाव जरूरी
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किसी भी देश और समाज में स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों की अहम् भूमिका होती है। दुनिया भर में होने वाले तमाम परिवर्तनों के साथ इन किताबों का स्वरूप बदलना जरूरी होता है। पाठ्यपुस्तकों में किए जाने वाले बदलावों का द्वंद्व न केवल भारत बल्कि यूनान, जापान, अमेरिका, स्पेन, रोम, ऑस्ट्रिया जैसे कई देशों में देखा गया है।
भारत में नई शिक्षा नीति, 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क-2023 के अंतर्गत पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है। पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा जा रहा है। कुछ के सिर्फ अध्याय बदले जा रहे हैं। कुछ के लिए ज्ञानपरक कसौटियां बनाई जा रही हैं। ये कसौटियां इस प्रकार की हैं –
- विषयों व पाठों की अंतर्रचना ऐसी हो, जिसमें बदलते समाज की अभिव्यक्ति हो।
- बच्चों को मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर, जीवन के ज्ञान से जोड़ा जाना चाहिए।
- बच्चों में सहज, सरल एवं रोचक ढंग से जिज्ञासा बढ़ाई जाए।
- समता, न्याय, भाईचारा, समरसता व सांविधानिक मूल्यों को रोचक ढ़ंग से पढ़ाया जाए।
- अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच एक निरंतरता इसमें दिखनी चाहिए।
परियोजना को संभव बनाने की चुनौतियां –
- देश के शिक्षित एवं जागरुक वर्ग और शिक्षकों को यह समझना जरूरी है कि बदलते समाज में सामाजिक ज्ञान को देखने, समझने व पढ़ने की रुढि़गत सोच बदली जाए।
- सामाजिक सच्चाइयों के पुराने चले आ रहे रूढि़वादी पाठ्यक्रमों को बदलने के लिए सामाजिक परिवेश को तैयार करना।
- ऐसा बदलाव लाने के लिए मुख्यत: शिक्षक और प्रबुद्ध वर्ग व समाजशास्त्रियों के बीच संवाद आयोजित करना।
- देश की विविध, जटिल और तेजी से बदलती सामाजिक सच्चाई में से समाहारी और कोमल मन को सहज ग्राह्य को चुनने की प्राथमिकता।
यह सत्य है कि विकासशील समाज के सामाजिक विज्ञान को गतिशील होना ही चाहिए। इसके लिए हमें अपनी पाठ्यपुस्तकों की बार-बार समीक्षा करनी होगी।
(समाचार पत्र पर आधारित – 16 अप्रैल, 2026)