20-05-2026 (Important News Clippings)
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Let Cohabiting Dogs And Humans Be
ET Editorials
In much of the West, the dog has been domesticated into an accessory — leashed, licensed, confined to homes or kennels. Yet, in the Indian subcontinent and some other regions, dogs remain free citizens, sharing streets, footpaths, courtyards, many public spaces with humans. Like cats in Türkiye, they are not treated as intruders but as fellow citizens.
The Western allergy to non-human city animals stems from a fetish for control: cities must be sterilised, wildlife (barring mostly trees and birds) banished, creatures treated as property. In Indian cities, hygiene and safety are a work-in-progress for humans, and dogs have been part of this ongoing municipal project of public maintenance. The street dog has street credibility here, on par with the one that accompanied Yudhishtir on his final journey to Mt Meru/heaven and revealing itself to be Dharma. Sterilised and safe, ownerless dogs form a unique part of our civic fabric, one of the few reminders that our cities are ecosystems, not concrete agglomerations.
Human resistance against this coexistence suspiciously smacks of Western-style anthropocentrism, even colonial mindset (‘Dogs and Indians Not Allowed’), passed off as concern for humans. Of course, these animals should be kept away from high-traffic and high-footfall areas like stations and airports, public institutions like schools and hospitals, and highways for the protection and ease of both parties. However, for city spaces in general, peaceful humandog coexistence has certainly and overwhelmingly been the happy rule, not the unfortunate exception. A happy, civilised society doesn’t exile other species it has cohabited with peacefully all this while. It recognises their right to share space that’s home for all citizens.
डिजिटल इंडिया से लाभ तो बढ़े, पर नौकरियां घटी हैं
संपादकीय
सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा असंगठित क्षेत्रों के उद्यमों की स्थिति पर जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के अनौपचारिक गैर-कृषि क्षेत्र में उद्यमों की संख्या और लाभ तो बढ़े हैं, लेकिन उसके अनुपात में रोजगार नहीं । रिपोर्ट का चौंकाने वाला अंश है इस सेक्टर द्वारा 2024 के मुकाबले 2025 में डिजिटल एडॉप्शन 17.9% से बढ़ाकर 31.1 होना। वहीं 2024 में 1.10 करोड़ अतिरिक्त जॉब्स पैदा हुए थे, अलगे वर्ष यह संख्या 74.50 लाख रही। यानी डिजिटल विस्तार हुआ लेकिन जॉब्स घटे । इसका कारण था अनेक उत्पादक और सेवा उपक्रमों में बिलिंग, लेखा, डिलीवरी, ऑर्डर्स लेने और सम्पर्क करने के कार्य में मानव की जगह तकनीकी का प्रयोग । यही कारण था कि लाभ बढ़ा, उद्यम बढ़े लेकिन काम कम हुए। कुल उद्यमों की संख्या 8% बढ़कर 7.92 करोड़ हुई और कुल 12.81 करोड़ लोगों को काम मिला। डिजिटल प्रयोग के कारण सकल वैल्यू एडेड 10.87% बढ़ा लेकिन जॉब ग्रोथ मात्र 6.18%। सरकार गिग वर्कर्स की संख्या बढ़ने से खुश है और उन्हें कुछ सामाजिक सुरक्षा स्कीमों के तहत लाना चाहती है। लेकिन क्या इससे घटते जॉब्स भी उतनी ही संख्या में बढ़ेंगे? सेवाओं और रिटेल ट्रेड में डिजिटल यूज सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। उधर नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि देश की 500 लिस्टेड बड़ी कंपनियों में साल-दर-साल मुनाफा 14-18% बढ़ा है, लेकिन उसके मुकाबले इंफ्रास्ट्रक्चर / नई उत्पादन इकाइयों या मशीन में निवेश आधा रह गया है। आयोग इसे बैलेंसशीट पैराडॉक्स की संज्ञा देता है।
Date: 20-05-26
होर्मुज संकट ने ऊर्जा सुरक्षा का एक अवसर भी दिया है
अमिताभ कांत, ( नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा )
होर्मुज स्ट्रेट बंद है और वैश्विक सप्लाई ठप हो चुकी है। ऐसे में प्रधानमंत्री की सलाह महज संयम की अस्थायी अपील नहीं है। यह संकेत है कि ऊर्जा-सुरक्षा भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है। जब नागरिकों को सार्वजनिक परिवहन साधनों से चलने, ईंधन की खपत कम करने, रेल से माल ढुलाई, अनावश्यक विदेशी यात्राएं सीमित करने की सलाह दी जा रही है तो संदेश साफ समझ आना चाहिए। एक सुदूर, संकरे समुद्री मार्ग में व्यवधान का भारत में परिवारों के बजट, फैक्ट्रियों की लागत, परिवहन व्यवस्था और विदेशी मुद्रा तक पर गहरा असर पड़ा है।
हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में हैं और हमारी ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती रहेगी। फिर भी हम जीवाश्म ईंधन के आयात पर अधिक निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल और लगभग 50% गैस आयात करता है। मौजूदा संकट से पहले भी हमारा जीवाश्म ईंधन आयात बिल लगभग 180 अरब डॉलर था। यही कारण है कि हमारा उद्देश्य ऐसा स्वच्छ ऊर्जा तंत्र बनाना होना चाहिए, जो सस्ता, भरोसेमंद, विविधतापूर्ण व घरेलू हो।
भारत इस दिशा में पहले ही बड़ी प्रगति कर चुका है। गैर-जीवाश्म ईंधन में हमारी स्थापित क्षमता 283 गीगावाट पार कर चुकी है। इसमें 150 गीगावाट से अधिक सौर और 56 गीगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। 2030 की समयसीमा से पहले ही हमने बिजली की कुल स्थापित क्षमता में 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है। देश में 2.8 करोड़ घर विद्युतीकृत हो चुके हैं और 10 करोड़ से अधिक परिवारों को खाना पकाने का स्वच्छ ईंधन मिल चुका है। ये बहुत बड़े बदलाव हैं।
आर्थिक समीकरण भी बदल चुके हैं। भारत में सौर ऊर्जा अब बिजली उत्पादन के सबसे सस्ते स्रोतों में शामिल है। ग्रीन अमोनिया की नीलामियों में भी भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर से कहीं कम कीमतें सामने आई हैं। यह प्रगति बताती है कि स्वच्छ तकनीकें अब भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में मजबूती से पैठ बना चुकी हैं।
लेकिन अगला चरण कहीं अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए। हमें 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म लक्ष्य के परे सोचने की जरूरत है। 2025 में चीन ने एक साल में ही अपनी रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में 400 गीगावाट से अधिक का विस्तार किया, जबकि हम 56 गीगावाट ही जोड़ पाए। जलवायु के नजरिए से भारत को विशेष लाभ प्राप्त है और अगर हमारा उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा है तो भारत को 1500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य तय करना चाहिए। यह महत्वाकांक्षी जरूर होगा, लेकिन नामुमकिन नहीं।
यह लक्ष्य बाजारों, निर्माताओं, राज्यों और निवेशकों को भी साफ संकेत देगा कि भारत अगले दशक के ऊर्जा बदलावों को पांच वर्षों में हासिल करने का इरादा रखता है। इस महत्वाकांक्षा के बिना भारत के लिए डेटा सेंटर संचालित कर पाना और एआई की अगली लहर का नेतृत्व कर पाना संभव नहीं होगा। क्योंकि नए डेटा सेंटरों को स्वच्छ ऊर्जा से ही चलाना होगा।
अकेले उत्पादन क्षमता बढ़ोतरी से यह महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। यदि हम ग्रिड निर्माण में पिछड़े तो 1500 गीगावाट का स्वच्छ ऊर्जा तंत्र नहीं बना पाएंगे। उत्पादन क्षमता को बिजली निकासी व्यवस्था, ग्रिड स्थिरता और मांग-आधारित तत्परता के साथ कदमताल करनी होगी। रिन्यूएबल एनर्जी के लिहाज से समृद्ध क्षेत्रों में ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार तेजी से करना होगा। यह युद्ध स्तर पर होना चाहिए और इस प्रयास में डिजिटाइजेशन की प्रमुख भूमिका होगी। फिर स्टोरेज भी उतना ही अहम है। इसी के जरिए रुक-रुककर मिलने वाली रिन्यूएबल एनर्जी चौबीसों घंटे की भरोसेमंद बिजली में बदलती है। रिन्यूएबल एनर्जी के हर बड़े टेंडर में भरोसेमंद और डिस्पैचेबल बिजली सप्लाई के प्रावधान होने चाहिए।
Date: 20-05-26
5 अक्षरों का यह फॉर्मूला क्लाइमेट बचाने की कुंजी साबित हो सकता है
प्रो. चेतन सिंह सोलंकी, ( आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर )
जलवायु परिवर्तन पर चर्चा तो आज हर जगह होती है, लेकिन कार्रवाई अकसर प्रतीकात्मक कदमों तक सीमित रह जाती है। ये प्रयास समस्या का केवल छोटा हिस्सा छूते हैं। जबकि असली कारण हमारा रोजमर्रा का आधुनिक जीवन है। हम कैसे ट्रैवल करते हैं, क्या खरीदते हैं, क्या खाते हैं, कितनी ऊर्जा इस्तेमाल करते हैं, ये सब कदम जाने-अनजाने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं और जलवायु परिवर्तन में योगदान देते हैं।
अपने रोजमर्रा के जीवन में हम हर मिनट पर्यावरण को खराब करने का काम करते हैं और मनुष्य चाहते हैं कि हमारे द्वारा फैलाई गई सारी गंदगी को साफ करने का काम पेड़ों को करना चाहिए। बेचारे पेड़ हमारे लिए भला कितना पर्यावरण बचा सकते हैं? कई लोग मुझसे पूछते हैं कि यदि पेड़ लगाने, प्लास्टिक का उपयोग कम करने, सोलर पैनल लगाने से भी पर्यावरण खराब होने से नहीं बच सकता तो हमें क्या करना चाहिए? इसलिए मैंने सरल, याद रखने लायक और 360 डिग्री को कवर करने वाला एक फॉर्मूला बनाया है। इसे मैं TUPEE (टुपी) कहता हूं। यह समझिए कि टुपी एक कैरेक्टर है, जो हमें दैनिक जीवन में याद दिलाता है कि पर्यावरण को ठीक करने के लिए हमें क्या करना चाहिए।
TUPEE का फुल फॉर्म है : T या ट्रैवल लेस (कम यात्रा), U या यूज़ आइटम्स वाइज़ली (सामानों का समझदारी से उपयोग), P या पर्चेस कॉशियसली (सावधानी से खरीदारी), E या ईट केयरफुली (सजग भोजन) और E या एलिमिनेट इलेक्ट्रिसिटी वेस्ट (बिजली की बर्बादी खत्म करना)। ये पांच क्षेत्र हमारे जीवन के लगभग पूरे कार्बन फुटप्रिंट को कवर करते हैं। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र से, ग्लोबल लेवल पर लगभग 20 से 25% कार्बन उत्सर्जन होता है। यानी अगर हम इन पांचों में सुधार करें, तो अपने दैनिक जीवन में काफी हद तक पर्यावरणीय प्रभाव को नियंत्रित कर सकते हैं।
सबसे पहले, टी की बात करें। परिवहन वैश्विक उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा है। हर अनावश्यक यात्रा ईंधन जलाती है और कार्बन बढ़ाती है। इस बार गर्मी की छुट्टी में लंबी दूरी की यात्रा न करें। 4-5 लोगों का परिवार यदि लंबी दूरी की यात्रा छुट्टी मनाने के लिए करता है तो लगभग 2-3 पेड़ों को काटने के बराबर कार्बन उत्सर्जन करता है। इसकी गणना ऐसी लाखों यात्राओं के हिसाब से कर लीजिए। और हां, छोटी या एकाध किमी की दूरी के लिए या तो पैदल ही चलें या साइकिल का उपयोग करें।
दूसरा, यू। सिंगल-यूज़ आइटम का उपयोग न करें। हम चीजें जल्दी बदलते हैं- कपड़े, गैजेट, फर्नीचर। इनके निर्माण में ऊर्जा, पानी और संसाधन लगते हैं। हर उत्पाद का अपना कार्बन होता है। यदि हम वस्तुओं का जीवनकाल बढ़ाएं, मरम्मत करके पुन: उपयोग करें, तो व्यापक प्रभाव वाले इस क्षेत्र में कमी ला सकते हैं।
तीसरा, पी। जरूरत और इच्छा में फर्क करना आज सबसे बड़ा जलवायु कदम है। हर नई खरीद उत्पादन, पैकेजिंग और परिवहन की मांग पैदा करती है। जितना हो सके, नई खरीदारी को टालते जाएं। एक, दो या छह महीने तक आगे बढ़ा दें। चौथा, ई। आधुनिक मनुष्य का खाना भी खतरनाक हो गया है। केवल हमारे भोजन के कारण विश्व का लगभग 25% कार्बन उत्सर्जन होता है। स्थानीय या मौसमी भोजन ही करें। फ्रिज के सामान का कम से कम उपयोग करें। पांचवां भी ई। बिजली उत्पादन- खासकर कोयले से- कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत है। अनावश्यक लाइट और उपकरण बंद करना, एसी की टेम्परेचर सेटिंग 26 डिग्री पर रखना और एनर्जी ऐफिशिएंट 5 स्टार उपकरण ही अपनाना, चाहे वे थोड़े महंगे क्यों न हों। ये इसके उपाय हैं। समाधान रोजमर्रा के जीवन में ही है।
आवारा आतंक पर सख्ती
संपादकीय
यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस आदेश को वापस लेने से मना कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों, बस एवं रेलवे स्टेशनों, खेल परिसरों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और उनकी नसबंदी की जाए। इस आदेश में संशोधन-परिवर्तन करने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि लोगों को कुत्तों के काटने के खतरे के बिना स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार है। निःसंदेह पशु प्रेमियों और विशेष रूप से डाग लवर्स को सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती रास नहीं आएगी, पर आखिर ऐसे लोग इसकी अनदेखी कैसे कर सकते हैं कि आवारा कुत्ते आतंक का पर्याय बन गए हैं? हर दिन ऐसी खबरें आती हैं कि आवारा कुत्तों ने किसी बच्चे, महिला या बुजुर्ग को दौड़ाकर काट खाया। कुछ दिल दहलाने वाली खबरें तो ऐसी भी आती हैं कि आवारा कुत्ते किसी शिशु को नोचकर खा गए या फिर किसी दोपहिया वाहन वाले को दौड़ाने के चलते वह दुर्घटना का शिकार होकर या तो गंभीर रूप से घायल हो गया या फिर उसकी मौत ही हो गई। एक सच्चाई यह भी है कि रेबीजग्रस्त कुत्तों के काटने से भी तमाम लोगों की जान जा रही है। साफ है कि ऐसी घटनाओं से मुंह फेरकर आवारा कुत्तों को हर जगह विचरने की आजादी चाहने वाले मानव जीवन की महत्ता समझने से इन्कार कर रहे हैं। वे आवारा कुत्तों को हर जगह घूमने देने के तो पक्षधर हैं, पर उनकी देखभाल करने को तैयार नहीं। आखिर यह दोहरा मानदंड नहीं तो और क्या है?
आवारा कुत्तों की समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है। उनकी तेजी से बढ़ती आबादी कस्बों और गांवों के लोगों को भी आतंकित कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रूप से बीमार और रेबीजग्रस्त आवारा कुत्तों को मारने पर विचार करने की भी बात कही। यह टिप्पणी कठोर लग सकती है, लेकिन आखिर मानव समाज के लिए खतरा बने कुत्तों का निदान क्या है? आवारा कुत्तों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण का यह मतलब नहीं हो सकता कि उन्हें मनुष्यों से अधिक महत्व दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह तो दोहरा दिया कि उसके आदेश का पालन न करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, लेकिन यह ध्यान रहे कि हमारे नगर निकाय आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने के मामले में अत्यंत सुस्त और संसाधनहीन हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक स्थलों पर उनकी संख्या बढ़ती जा रही है और उनके काटने की घटनाएं बेतहाशा बढ़ रही हैं। उचित यह होगा कि राज्य सरकारें अपने स्थानीय निकायों को ऐसे संसाधनों से लैस करें, जिससे वे आवारा आतंक पर काबू पा सकें। उन्हें आवारा कुत्तों के साथ-साथ अन्य बेसहारा पशुओं को नियंत्रित करने के लिए भी सक्रिय होना चाहिए, क्योंकि वे भी समस्या बन गए हैं।
Date: 20-05-26
खाड़ी देशों में संकट और भारत के लिए विकल्प
अजय कुमार, ( लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष हैं और पूर्व रक्षा सचिव हैं। )
कई दशकों तक खाड़ी देश एक सरल सूत्र का पालन करते रहे। जैसे कि अमेरिकी सुरक्षा खरीदो, सभी को तेल बेचो और बाकी जगहों पर भी अपने विकल्प खुले रखो। इस कारण इस क्षेत्र में बहुत समृद्धि आई लेकिन अब पश्चिम एशिया संकट ने इसका विरोधाभास उजागर कर दिया है। मसलन, अपनी सुरक्षा को उस महाशक्ति पर छोड़ देना जिसके हित कभी पूरी तरह से अपने ही हितों से मेल नहीं खाते। इसके अलावा जिन विकल्पों पर खाड़ी देशों ने विचार किया जैसे चीन, तुर्किये या ईरान, उनकी अपनी संरचनात्मक सीमाएं थीं। अब नतीजा यह है कि खाड़ी देश अमेरिका पर निर्भर हैं लेकिन उन्हें ईरान से खतरा है, वे इजरायल को लेकर सतर्क हैं जबकि चीन के प्रति इनका आकर्षण है और अब भी एक भरोसेमंद साझेदार की तलाश में हैं।
1960 के दशक के अंत में ब्रिटेन के पीछे हटने से सुरक्षा के मोर्चे पर एक शून्य पैदा हुआ और तब अमेरिका खाड़ी देशों का मुख्य रक्षक बन गया। यह भूमिका ईरानी क्रांति, ईरान-इराक युद्ध और कुवैत पर इराक के आक्रमण के बाद और गहरी हो गई। लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका का ध्यान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ा, खाड़ी देशों ने अस्थिरता से बचने के उपाय करने शुरू किए। आर्थिक समृद्धि और वैश्विक संपर्कों ने किसी एक संरक्षक पर पूरी तरह निर्भर रहना मुश्किल बना दिया।
पुराने मॉडल में सुरक्षा बाहरी ताकतों पर छोड़ी जाती थी लेकिन अब धीरे-धीरे इसमें बदलाव आ रहा है और रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश हो रही है। सऊदी अरब का ईरान से संपर्क, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के चीन के साथ रिश्ते, और ओमान तथा कतर की स्वतंत्र कूटनीति इस बदलाव को दर्शाती है। अक्टूबर 2025 के बाद सऊदी अरब ने इजरायल के साथ तालमेल नहीं बनाया, जिससे अब्राहम समझौते पर संदेह पैदा होने लगा। सऊदी अरब और यूएई, यमन को लेकर भी अलग दृष्टिकोण रखते हैं और हर देश अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रहा है। हालांकि वर्ष 2023 में चीन की मध्यस्थता में सऊदी-ईरान रिश्ते को सुधारने के प्रयास पूरी तरह विफल रहे जिसका उद्देश्य पारस्परिक आर्थिक निर्भरता के जरिये राजनीतिक दुश्मनी को कम करना था। व्यापार बढ़ने, नए राजनयिक संबंध बनाने और खाड़ी में तनाव से बचने के प्रयासों के बावजूद, ईरान ने सऊदी पर हमला किया। यहां तक कि कतर और ओमान भी ईरान की मिसाइलों की मार से प्रभावित हुए जो इस क्षेत्र के सबसे सक्रिय मध्यस्थ रहे हैं।
मौजूदा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के सुरक्षा संबंध उसकी घरेलू राजनीति और बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं पर निर्भर हैं। अमेरिका का किसी क्षेत्र में बल का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए, अपनी शर्तों पर और अपनी समय-सीमा के आधार पर होता है न कि खाड़ी देशों की प्राथमिकताओं के अनुसार। सबसे बुरी बात यह है कि किसी भी अमेरिकी कार्रवाई का परिणाम खाड़ी देशों को भुगतना पड़ता है।
चीन की पश्चिम एशिया में मुख्य दिलचस्पी क्षेत्रीय सुरक्षा में नहीं बल्कि ऊर्जा प्रवाह और बाजार तक पहुंच बनाने में है। चीन, दुनिया का सबसे बड़ा तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयातक है और कतर तथा यूएई उसकी कुल एलएनजी आयात के लगभग 30 फीसदी हिस्से की आपूर्ति करते हैं। लेकिन ईरान भी चीन का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदार है और 2021 के व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते के तहत ईरान बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा बन गया। ये गहरे रिश्ते किसी भी खाड़ी संकट में चीन के हितों को विभाजित कर देते हैं। तुर्किये अपने बंटे हुए समर्थन की वजह से भरोसेमंद नहीं है। यह अरब दुनिया में प्रभाव चाहता है, मुस्लिम ब्रदरहुड नेटवर्क से तार जोड़े हुए हैं, साथ ही यह ऑटोमन साम्राज्य के युग की याद दिलाता रहता है और पूर्वी भूमध्यसागर और पश्चिम एशिया में मह त्त्वाकांक्षी कदम उठाता है।
इस तरह के टूटे हुए गठबंधनों और अलग-अलग हितों की पृष्ठभूमि के बीच, भारत का पश्चिम एशिया के साथ रिश्ता बुनियादी रूप से अलग है। यह वास्तव में पांच हजार वर्षों की सभ्यता पर आधारित है। सिंधु घाटी के व्यापारी और कोझिकोड तथा मस्कट को जोड़ने वाले मार्ग इस क्षेत्र के हर आधुनिक राष्ट्र से भी पहले के हैं। भारत के 17 करोड़ से अधिक मुसलमानों में से कई के खाड़ी देशों के साथ गहरे सामाजिक और पारिवारिक संबंध हैं। पश्चिम एशिया में 95 लाख से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं, जिनमें 35 लाख लोग सिर्फ यूएई में हैं। लाखों भारतीय मुस्लिम परिवारों के लिए हिजाज़ की यात्रा जीवन भर का सपना होती है। खाड़ी में बॉलीवुड का भी एक बड़ा दर्शक समूह है। भारतीय भोजन, दुबई से लेकर मस्कट तक आम है। भारतीय भाषाएं खाड़ी देशों के बाजारों में उतनी ही सामान्य हैं जितनी अरबी भाषा। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक समूह है, जिसकी वित्त वर्ष 2025 में भारत के कुल व्यापार में 15.4 फीसदी हिस्सेदारी है। पश्चिम एशिया भारत के कच्चे तेल की जरूरत के 60 फीसदी से अधिक की आपूर्ति करता है जबकि भारत के बाहरी व्यापार का 80 फीसदी हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुजरता है। वर्ष 2022 में भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता सिर्फ 88 दिनों में पूरा हुआ जो साझा हित और ऐतिहासिक विश्वास को दर्शाता है। हालांकि, भारत ने अभी तक अपने रिश्ते में सुरक्षा के आयाम को पूरी तरह जोड़ने में तेजी नहीं दिखाई है। संयुक्त सैन्य अभ्यास होते हैं लेकिन इस क्षेत्र से भारत के सुरक्षा संबंध श्रीलंका, मालदीव, फिलीपींस या मॉरीशस जैसे सक्रिय नहीं है।
वर्तमान संकट से यह सवाल खड़े होते हैं कि क्या भारत और खाड़ी देशों को अपने रिश्ते को रणनीतिक स्तर पर ले जाना चाहिए। भारत की इस क्षेत्र में कोई क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा नहीं है। भारत ने कभी इस क्षेत्र का उपयोग अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष युद्धभूमि के रूप में नहीं किया। भारत के सभ्यता और जनसंख्या से जुड़े गहरे संबंध, स्थिरता को लेकर वास्तविक साझा हित पैदा करते हैं। इसका आर्थिक दायरा बढ़ रहा है और सबसे महत्त्वपूर्ण, भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता है कि वह सभी पक्षों, खाड़ी देशों, ईरान, इजरायल और वैश्विक ताकतों के साथ संबंध बनाए रख सकता है। भारत एकमात्र महत्त्वपूर्ण शक्ति है जिस पर सभी पक्ष भरोसा करते हैं या कम से कम अविश्वास नहीं करते हैं। भारत को इस क्षेत्र का सुरक्षा रक्षक बनने की आवश्यकता नहीं है। संभवतः कुछ और अधिक स्थायी और संतुलित विकल्प हो सकता है जैसे कि भारत-खाड़ी देशों के बीच एक गहरी रणनीतिक साझेदारी, जिसमें भारत खाड़ी देशों की सुरक्षा में हिस्सेदार हो और खाड़ी देश भारत की आर्थिक प्रगति में हिस्सेदार हों। इस साझेदारी का ढांचा कई आयामों में विकसित किया जा सकता है। इसमें भारत-खाड़ी सुरक्षा और समुद्री समझौता शामिल हो सकता है, जो नौ सेना समन्वय, समुद्री क्षेत्र की सतर्कता, ड्रोन-रोधी सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और क्षेत्र में समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर केंद्रित हो। इसके साथ ही भारत-खाड़ी रक्षा औद्योगिक साझेदारी भी संभव है, जिसमें ड्रोन, मिसाइल प्रणाली, साइबर और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस निगरानी, सुरक्षित संचार और रखरखाव केंद्रों के संयुक्त उद्यम शामिल हों। यह साझेदारी खाड़ी देशों की पूंजी और भारत के बढ़ते रक्षा नवाचार को जोड़ सकती है।
सरकारी समर्थन के साथ भारतीय स्टार्टअप के दायरे को बढ़ाया जा सकता है और ब्रह्मोस जैसी प्रणाली खाड़ी देशों की सुरक्षा को और मजबूत कर सकती हैं। एक ऊर्जा-प्रौद्योगिकी कॉरिडोर बनाया जा सकता है जो रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, एलएनजी, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और महत्त्वपूर्ण खनिजों को शामिल करे। इसके अलावा, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर के तेज क्रियान्वयन को बंदरगाहों, लॉजिस्टिक क्षेत्रों और रेल नेटवर्क के माध्यम से और मजबूत किया जा सकता है। निश्चित रूप से भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) को खाड़ी के वित्तीय नेटवर्क से जोड़कर आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को और प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि खाड़ी की टूटी हुई सुरक्षा व्यवस्था की दिशा को ईमानदारी से देखा जाए, तो रास्ता भारत की ओर जाता ही दिखता है।
जरूरी अदालती आदेश
संपादकीय
आवारा कुत्तों के मुद्दे पर अपने पुराने आदेश में किसी किस्म की रियायत देने से इनकार करके सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इंसानी जान के लिए खतरा पैदा करने वाली स्थितियों से वह आंखें नहीं फेर सकता। निस्संदेह, अदालत का यह रुख स्वागत योग्य है। न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने नवंबर में पारित आदेश को न सिर्फ बहाल रखा, बल्कि भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की मानक कार्य प्रणाली को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं को भी खारिज कर दिया। अदालत ने उचित ही कहा है कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह हक भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के भय के बिना जी सके। राज्य मूक तमाशाई नहीं बना रह सकता और अदालत इस कटु हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकती कि बच्चे, बुजुर्ग और विदेशी सैलानी आवारा कुत्तों के शिकार हुए हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उसने पागल, लाइलाज बीमारी वाले खूंखार कुत्तों के लिए जहरीले इंजेक्शन के इस्तेमाल की भी इजाजत दे दी है। जाहिर है, पशुप्रेमियों को इस फैसले से कुछ चोट पहुंची होगी, मगर जिस संख्या में आवारा कुत्ते महानगरों और कस्बों में लोगों को घायल करने लगे हैं, उसमें राज्य का हस्तक्षेप अब लाजिमी हो गया है।
नवंबर के अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों व केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन से कहा था कि आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए उनकी नसबंदी व टीकाकरण के काम बढ़ाए जाएं, इसके बाद बेशक उन्हें उन्हीं इलाकों में छोड़ा जा सकता है। आदेश में खूंखार व रेबीज संक्रमित कुत्तों के लिए शेल्टर होम बनाने की हिदायत भी शामिल थी। यही नहीं, स्थानीय प्रशासन से आवारा कुत्तों के लिए विशेष ‘फीडिंग जोन’ बनाने के साथ-साथ नागरिकों से भी यह अपेक्षा की गई थी कि वे सार्वजनिक जगहों पर आवारा कुत्तों को भोजन नहीं देंगे। इसी तरह, स्कूल-कॉलेजों, अस्पतालों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों व खेल परिसरों आदि से कुत्तों को हटाने के आदेश भी उसने दिए थे। अब मंगलवार को अदालत ने एक बार फिर साफ किया है कि जो भी संबंधित अधिकारी ताजा आदेश का पालन नहीं करेगा, उसके विरुद्ध अदालत की अवमानना और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
यह वाकई अफसोस की बात है कि जिस काम को नगर निगमों और स्थानीय प्रशासन को करना चाहिए था, उसके लिए सुप्रीम कोर्ट को न सिर्फ स्वतः संज्ञान लेना पड़ा, बल्कि लगातार सुनवाई करनी पड़ी। भारतीय समाज मवेशियों और पशुओं के प्रति हमेशा से सदाशयी रहा है, बल्कि उनकी पूजा भी करता रहा है। सुप्रीम कोर्ट में बेजुबानों की लड़ाई लड़ने वाली संस्थाओं और नागरिकों द्वारा दर्ज याचिकाएं इसी बात की तस्दीक करती हैं, मगर एक सुरक्षित, भयहीन जीवन स्थितियों की गारंटी राज्य का दायित्व है और इसमें यदि आवारा कुत्ते बाधक बन गए हैं, तो उनसे निपटने की जिम्मेदारी भी उसी की है। जंगल में सामंजस्य और संतुलन के अपने कुदरती कायदे हैं, इसलिए आवारा कुत्तों के प्रति कोरी भावुकता में मनुष्य के जीने के हक की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। इसी कोरी भावुकता के कारण नीलगायों के आतंक से कितने ही किसान तबाह हो गए हैं। इसलिए मसला आवारा कुत्तों का ही नहीं है, शौकिया तौर पर कुत्ते पालने वाले परिवारों को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उनके पशु प्रेम की वजह से किसी को कष्ट नहीं पहुंचे।