11-05-2026 (Important News Clippings)

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11 May 2026
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  Date: 11-05-26

One Gap Narrows, Another Widens

ET Editorials

Girls in India have outperformed boys in school assessments and board examinations. Today, they are steadily taking over classrooms across schools and universities. Women account for nearly three-fourths of MPhil registrations, reflecting how more girls are enrolling in schools, staying longer and progressing to higher education. Yet somewhere between the classroom and workplace, this momentum fades. Women make up 48% of university graduates but only 31% of entry-level employees. At every stage of the professional ladder, their numbers decline further.

The issue is not capability, but cultural norms and social expectations that have failed to keep pace with the aspirations of professionally qualified women. Women may dominate home kitchens, yet only 10% of India’s professional and executive chefs are women. They also shoulder a disproportionate burden of unpaid care and domestic work, spending 10x more time than men on unpaid caregiving and household work. Workplaces remain structured around assumptions designed largely with men in mind. If women continue to be primary caregivers, work systems and policies must reflect that reality.

Beyond the workplace, enablers such as personal safety, reliable infrastructure and quality support services are essential for women to sustain their careers and rise to leadership roles. Data from NSO’s Women and Men in India 2025 report points to a generational shift. Although the overall literacy gender gap remains wide, it has narrowed considerably among those below 24 years. This progress reflects years of sustained policy attention, implementation, accountability and interventions such as providing toilets in schools. The focus must now extend beyond the classroom and into the world of work.


Date: 11-05-26

Cost to access

The opportunity cost of accessing medical care remains high

Editorial

The Union Labour Ministry has announced that it will provide a free annual health check-up to workers aged 40 years or more, following an existing provision in the new Labour Codes. The programme will be implemented through the Employees’ State Insurance Corporation (ESIC). For workers in hazardous conditions, such as handling toxic chemicals or operating heavy machinery, check-ups are mandatory; if illness is detected, ESIC hospitals and dispensaries will provide free treatment. India already has a few workers’ health obligations on paper, including under the Factories Act 1948 (only within factories), the ESI Act 1948, and the Occupational Safety, Health and Working Conditions (OSH) Code 2020. The new programme will be financed through the well-endowed ESI fund, although the government is still shoring up the number of beds and doctors available via PMJAY-empanelled facilities. At this time, operational evidence suggests that insured workers will be the main beneficiaries.

Commendable though the initiative is, its success is not guaranteed. At present, only around 31 crore of 94 crore workers are on the e-Shram portal, whose integration with ESIC is still in its early stages in many States. Labour Minister Mansukh Mandaviya also failed to address how a woman working in a garment home unit or as a domestic worker could access the longer maternity leave if she has no ‘employer’. Annual check-ups for women also warrant specific medical staff needs whereas many ESIC camps are crowded and dominated by men. As with many of its predecessors, the programme does not address the opportunity costs of accessing health care, forcing workers to continue contending with lost wages. An ESIC facility may also refer a worker to another centre if it lacks the resources for specific tests, leading to repeat visits and added time and cost. The new programme focuses predominantly on non-communicable diseases such as diabetes and hypertension. Heat-related illnesses are not explicitly recognised as occupational diseases under the ESI Act whereas construction and agriculture workers are most at risk of them. Waste-pickers and sanitation workers on the other hand face greater risk of infectious diseases such as hepatitis and leptospirosis. The scheme offers screening but does not mandate proactive vaccination. The government must meet workers where they are, through mobile occupational health units and — as the OSH Code 2020 stipulates for organised workers — at their places of work, and provide tokens to compensate them for time spent on check-ups. Otherwise, any scheme of this nature will not improve upon the already deficient system.


Date: 11-05-26

विनिर्माण को चाहिए सुसंगत नीति

संपादकीय

केंद्र सरकार ने हाल ही में एक निर्णय लिया है, जिसके तहत चीन और भू-सीमा वाले अन्य पड़ोसी देशों से 40 निर्माण उपक्षेत्रों में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को 60 दिन के भीतर मंजूरी देने की बात कही गई है। इससे पता लगता है कि भारत मान रहा है कि उसकी औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं और वैश्विकताओं के बीच गहन एकीकरण की जरूरत है। 2020 में प्रेस नोट 5 लागू होने के बाद वर्षों तक कढ़ीनी के पश्चात अब भारत अधिक खुल रहा है और वैश्विक उत्पादन तंत्र में शामिल होने का इच्छुक नजर आ रहा है, जहाँ अब भी चीनी कंपनियों का दबदबा है। अहम बात यह है कि चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों का आपसी व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और 2025-26 में चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 डॉलर हो गया है। तर्क दिया जाता रहा है कि व्यापार घाटा और चीन पर निर्भरता कम करने का एक तरीका चीनी निवेश को आकर्षित करना भी है ताकि उत्पादन वहाँ से भारत आ सके।

जिन क्षेत्रों को तेज मंजूरी के लिए चुना गया है, उनमें दुर्लभ पातु प्रिंटेड सर्किट बोर्ड उन्नत बैटरी कलपुर्जे विश्ले मॉडल मशीन उपकरण और पॉलिसिलिकन वेपर शामिल है। इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और नवीकरणीय ऊर्जा पर भारत का जोर इन्हीं पर आधारित है। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे स्पष्टता आती है और समय के साथ वह देश के विनिर्माण उत्पादनको बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा भारता का दुर्भाग्य है कि सफल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण का हिस्सा लंबे समय से लगभग 15- 17 प्रतिशत पर अटका हुआ है, जो सरकार के 25 प्रतिशत लक्ष्य से काफी कम है और वाई पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है। हालिया विश्लेषण से पता चला कि सूचीबद्ध कंपनियों के सकल मूल्यवर्धन में विनिर्माण कंपनियों का हिस्सा 2024-25 में घटकर 33.4 प्रतिशत रह नवरी से पहले वह 40 प्रतिशत से अधिक था। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई कदम उठा है, जिनमें उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भी शामिल है, लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। उदाहरण के लिए पीएलआई योजना मोबाइल फोन क्षेत्र में सफल रही लेकिन अन्य क्षेत्रों में इसके प्रभाव निराशाजनक रहे।

ऐसे में यह समझना होगा कि चुनिंदा क्षेत्रों में चुनिंदा देशों से निवेश को तेज मंजूर ‘की विनिर्माण चुनौतियां हल नहीं हो जाएंगी। इस क्षेत्र में लॉजिस्टिक्स की ऊंची लाना, इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत विनिर्माण में कौशल की कम अनुपालन व्यवस्था और कमजोर अनुबंध प्रवर्तन जैसी कई सुनवाद दिक्क बरकरार हैं। इनसे कारोबार की लागत भी बड़ जाती है। यही वजह है कि भारत अपनी बढ़ती क्रम शक्ति के मुताबिक रोजगार नहीं तैयार कर पाया है।

तेजी से बदलते वैश्विक वातावरण में भारत को निवेश आकर्षित करने और विनिर्माण उत्पादन को सार्थक रूप से बढ़ाने के लिए एक सुसंगत रणनीति और सुधारों की आवश्यकता होगी। संसद द्वारा 2019 और 2020 में पारित श्रम संहिताओं का उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, अमलचीलापन सुधारना और रोजगार के औपचारिकीकरण को प्रोत्साहित करना था। मगर उनका क्रियान्न देर से हुआ क्यों की अधिसूचना पिछले सप्ताह ही जारी की गई। बड़ी औद्योगिक इकाइयों के लिए भूमि अब भी चुनौती है, जिसे दूर करना जरूरी है। सरकार को व्यापार नीति की भी समीक्षा करनी होगी। सलकि धरत ने हाल के वर्षों में मुक्त व्यापार समझौते किए हैं जिनमें यूरोपीय संघ के साथ समझौता भी शामिल है, लेकिन इसकी औसत शुल्क दरे अब भी दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक है। वह भी समझना होगा कि वैश्विक व्यापार का अधिकांश हिस्सा मध्यवर्ती वस्तुओं में होता है और ऊंचे टैरिफ अक्सर रो बनते हैं। निर्माण उत्पादन को आगे बढ़ाने के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ जुड़ना जरूनी है। एफडीआई की आवक भी अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि व्यापार कितना खुला है और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ कितना जुड़ा है। इसलिए भारत को एफडीआई के सिर के सुनिधा क्षेत्रों को खोलने के बजाय ढोल देनी होगी। अतास्त्रियों ने तर्क दिया है कि कम लाना वाले जिस विनिर्माण को चीन छोड़ रहा है, उसे हासिल करने में भारत नाकाम रहा है। भारतीय नीति-निर्माताओं को पूछना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है।


Date: 11-05-26

अग्नि की ताकत

संपादकीय

एक साथ कई लक्ष्यों को भेदने में सक्षम अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण भारत की प्रतिरोधक क्षमता के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि है। जिस ‘मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल’, यानी एमआईआरवी तकनीक से यह लैस है, उसमें मुख्य मिसाइल कई वॉरहेड्स दागती है। नतीजतन, दुश्मन की वायु सुरक्षा प्रणाली को चकमा देना आसान हो जाता है। भारत के अलावा अभी अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस के पास ही यह तकनीक हैै। हालांकि, परीक्षण की गई मिसाइल की मारक-क्षमता नहीं बताई गई है, लेकिन माना जा रहा है कि साल 2024 में ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत इसी तकनीक से लैस अग्नि 5 का सफल परीक्षण हो चुका है और उसकी रेंज करीब 5,000 किलोमीटर थी, इसलिए इस बार इससे अधिक ही होगी। इसे अग्नि 6 की पूर्वपीठिका भी कहा जा रहा है, जिसकी पुष्टि कम-से-कम दो तथ्य कर रहे हैं। पहला, परीक्षण की गई मिसाइल परमाणु-सक्षम इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक थी, जिसकी मारक क्षमता अमूमन 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है। दूसरा, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के अध्यक्ष समीर वी कामत ने अभी-अभी कहा है कि संगठन अग्नि 6 मिसाइल के निर्माण के लिए तैयार है, बस सरकार से हरी झंडी मिलने की देर है।

ताजा परीक्षण आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा तकनीक का अप्रतिम उदाहरण है। नई दिल्ली के पास निस्संदेह ब्रह्मोस, पृथ्वी, नाग, आकाश जैसी स्वेदशी मिसाइलों का जखीरा है, लेकिन इनमें ध्वजवाहक अग्नि ही है। गुजरे साढ़े तीन दशकों में इसने 700 किलोमीटर से लेकर 5,000 किलोमीटर तक की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की है। आज भारत के सुरक्षा बेड़े में इसकी पांचवीं पीढ़ी की मिसाइलें हैं, जो परमाणु हथियार तक ले जा सकती हैं। इस बीच ऐसी महारत भी हासिल की गई है कि ये मिसाइलें सड़क या रेल प्लेटफॉर्म से भी लॉन्च की जा सकती हैं। अभी जो परीक्षण हुआ है, उसका लक्ष्य विशेषकर पश्चिमी मोर्चे, उत्तरी सीमा और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की क्षमता को मजबूत करना है, जो सामरिक ताकत का नया केंद्र बनता जा रहा है। संभवत: इन्हीं वजहों से पाकिस्तान की तरफ से चिंता जताई गई है कि भारत दुनिया के किसी भी देश को निशाना बनाने की राह पर निकल चुका है। हालांकि, विश्व बिरादरी जानती है कि भारत के रक्षा कार्यक्रम आत्म-सुरक्षा के इस सिद्धांत पर आधारित हैं कि ‘शत्रु को आक्रमण से रोकने के लिए न्यूनतम संख्या में हथियार रखे जाएं’।

अग्नि की इस सफलता का प्रभाव भारत के रक्षा उद्योग पर भी पड़ेगा। देश का रक्षा-निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये हो चुका है। भारत अब दुनिया के 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण बेच रहा है, जिनमें मिसाइल, आर्टिलरी गन, रडार, ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम जैसे उन्नत साजो-सामान भी शामिल हैं। दूसरे देश भारतीय सुरक्षा प्रणाली पर लगातार भरोसा जताने लगेे हैं और घरेलू उत्पादन में भी अनवरत वृद्धि हो रही है। साल 2029 तक रक्षा-निर्यात 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को पाना कठिन नहीं लगता। खासकर, दो दिन पहले डीआरडीओ द्वारा किया गया ‘टीएआरए’ का सफल परीक्षण, जिसमें साधारण बम को भी लक्षित हमले के लिहाज से ‘गाइडेड बम’ बनाया जा सकता है, और अब एमआईआरवी की सफलता यह भरोसा जगाती ही है कि भारत समय से पहले ही अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है।


Date: 11-05-26

होर्मुज मार्ग पर ईरानी नाके के मायने

आलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )

ईरान पर अमेरिकी हमले और जवाबी कार्रवाई के कुछ ही समय बाद तेहरान ने कह दिया था कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब पहले जैसा कभी नहीं रहेगा। अब लग रहा है कि ऐसा ही है। एक तरफ अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर सरगर्मी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका ने बाकायदा युद्ध खत्म होने का एलान कर दिया है, ताकि डोनल्ड ट्रंप को इस मसले पर कांग्रेस (संसद) की मंजूरी के लिए न जाना पड़े। दूसरी तरफ, ईरान ने होर्मुज जलमार्ग पर ‘चेक नाका’ भी लगा दिया है।

यहां चेक नाका का इस्तेमाल सटीक नहीं हो सकता है, लेकिन इस्तेमाल किया इसलिए, ताकि बात साफ समझी जा सके। मामला कुछ-कुछ वैसा ही हो गया है, जैसा आपने अक्सर हाइवे किनारे या जंगल के रास्तों पर देखा होगा। ट्रकों को रोककर सरकारी कारकुन गाड़ी और ड्राइवर के कागजों के अलावा उनमें लदे माल की भी जांच-पड़ताल करते हुए मिलते हैं। कभी-कभी इस चक्कर में रास्ते जाम हो जाते हैं।

अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक होर्मुज भी कुछ इसी अंदाज में चलेगा। कम से कम ईरान ऐसा ही चाहता है। होर्मुज का महत्व तो अब सबको पता है। दुनिया का 20 फीसदी कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। भारत के लिए तो इस मार्ग को जीवनरेखा भी कहा जा सकता है, क्योंकि देश की जरूरत का आधे से ज्यादा कच्चा तेल और गैस इसी रास्ते से आता रहा है। अब ईरान का कहना है, इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को पहले से इजाजत लेनी होगी और उसके लिए उनको एक प्रश्नावली के जवाब देने पड़ेंगे। इस प्रश्नावली में पूरे चालीस सवाल हैं, जिनमें जहाज का नाम, मालिकाना अधिकार, पहचान संख्या, मूल देश, कहां से आ रहा है, कहां जा रहा है, जो माल लदा है, वह क्या है, उसका मालिक कौन है, जैसे तमाम सवाल शामिल हैं। यही नहीं, जहाज पर काम करने वाले सभी कर्मचारियों का ब्योरा भी देना होगा।

ईरान की इस नई ‘वेसल इन्फॉर्मेशन डिक्लेरेशन’ या जहाज सूचना घोषणा की व्यवस्था करने का काम ‘पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी’ के जरिये होगा। मतलब साफ है। ईरान अब फारस की खाड़ी और होर्मुज जलमार्ग के रास्ते ओमान की खाड़ी व अरब सागर तक के रास्ते एवं उससे गुजरने वाले जहाजों के आवागमन पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। वह एक तरह से बाकी दुनिया को याद दिला रहा है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था सिर्फ कारखानों, बाजारों, उपभोक्ताओं, बैंकों, टेक्नोलॉजी और एआई जैसी चीजों से ही नहीं चल सकती, उसे कुछ संकरे समुद्री रास्तों से गुजरने की इजाजत भी चाहिए होती है।

जाहिर है, पहला झटका तो इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों और उनके मालिकों को ही झेलना है। इसीलिए दुनिया की बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनियों ने इस पर गंभीर चिंता जताई है। ये कंपनियां पहले ही कह चुकी हैं कि इस युद्ध की वजह से उनके ईंधन खर्च और कामकाज की लागत में भारी बढ़ोतरी हो गई है। बहरहाल, ईरान के इस कदम को दो तरह से देखना चाहिए। एक तो यह कि वह इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी रखना चाहता है और संभवत: उनसे टोल भी वसूलना चाहता है। इसके बाद जहाज पर लदे सामान का ब्योरा मांगने का अर्थ यह हो सकता है कि अब वह यहां दोस्त-दुश्मन का हिसाब भी करना चाहता है, यानी कोई ऐसा देश, जिसे ईरान मित्र नहीं मानता, इस मार्ग से अपना सामान आसानी से या मुफ्त में न ले जा सके।

दोनों ही स्थितियों में भारत इस मसले से दूर नहीं रह सकता। इसका असर आपूर्ति शृंखला पर पड़ेगा। हो सकता है, पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें या दाम में उछाल कुछ देर से नजर आए, मगर रसोई गैस की आपूर्ति व गैस संचालित उद्योगों और खाद कारखानों के लिए मुश्किलें उतनी दूर नहीं हैं। रसोई गैस की परेशानी तो सबके सामने है। प्लास्टिक की पैकिंग में आने वाली तमाम चीजें बाजार में या तो कम आ रही हैं या उनके दाम बढ़ रहे हैं। संकट जारी रहा, तो आगे और लक्षण सामने आएंगे। सवाल है, इससे महंगाई कितनी बढ़ सकती है? इस सवाल का सीधा उत्तर देना मुश्किल है, क्योंकि महंगाई का बढ़ना इस पर निर्भर है कि यह संकट कितने दिन और चलेगा? सरकार टैक्स घटाएगी या नहीं? तेल कंपनियां कितना बोझ खुद उठाएंगी और कितना वे दाम बढ़ाकर उपभोक्ताओं तक पहुंचाएंगी? रुपये का दाम डॉलर के सामने कितना और गिरेगा?

अनेक एजेंसियां अनुमान लगा रही हैं। एक गणित यह है कि एक बैरल कच्चे तेल के दाम में हर दस डॉलर की बढ़त से भारत में महंगाई का आंकड़ा 0.55 से 0.6% तक बढ़ सकता है। लड़ाई छिड़ने के पहले ब्रेंट क्रूड (कच्चे तेल की कीमत तय करने वाला अहम वैश्विक बेंचमार्क) 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। वहां से यह 100 डॉलर के पार बना रहता है, तो 30 डॉलर की बढ़ोतरी है, यानी भारत की महंगाई दर में डेढ़ से पौने दो फीसदी तक वृद्धि देखी जा सकती है।

तेल व गैस का महंगाई से सीधा रिश्ता है और महंगाई के साथ-साथ यह डॉलर के मुकाबले रुपये को कमजोर करने में भी भूमिका निभाता है। रुपये की कीमत गिरने का मतलब है, आयात और महंगा होना। इसमें तेल और गैस के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल और खाने के तेल जैसी चीजें भी शामिल हैं। होर्मुज में नई ईरानी व्यवस्था जहाज कंपनियों के खर्च बढ़ाएगी और इसमें वक्त भी बर्बाद हो सकता है। ऐसा होने पर माल भाड़ा और बीमा भी बढ़ेगा। यह लागत भी आखिरकार कारोबारियों और खरीदारों तक पहुंचेगी, यानी आपूर्ति शृंखला की महंगाई अब सिर्फ ट्रक व रेल भाड़े से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय भाड़े से शुरू हो जाएगी।

बड़ी कंपनियां ऐसी स्थिति में या तो दाम बढ़ाती हैं या पैकिंग छोटी कर देती हैं, पर छोटे कारोबारी मुश्किल में आ जाते हैं। सिलेंडर महंगा होते ही ढाबे वाला दाम नहीं बढ़ा सकता। वह या तो कुछ चीजें बनाना बंद कर देता है या फिर अपने साथ लगे कुछ लोगों की छुट्टी कर देता है। जाहिर है, गरीबी के जाल में फंसा इंसान सबसे ज्यादा मुश्किल में पड़ता है।

उम्मीद की किरण इस बात में है कि ईरान भारत को अपना दुश्मन नहीं मानता। हो सकता है, वह भारतीय जहाजों और भारत जाने वाली सामग्री के रास्ते में ज्यादा अड़चनें न खड़ी करे। ऐसा हुआ, तो संकट जल्दी खत्म हो सकता है। ऐसी स्थिति में इसका असर भी कम होगा, लेकिन अगर यह संकट कई महीनों तक चलता रहा, तो शायद महंगाई 2026 में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।


Date: 11-05-26

क्या अनियोजित विकास की भेंट चढ़ते रहेंगे जंगल

सुरेश भाई, ( पर्यावरण कार्यकर्ता )

उत्तराखंड में बागेश्वर जिले के बाली घाट से कोटमन्या तक मौजूदा मोटर मार्ग की दूरी लगभग 54 किलोमीटर है। सघन वनों के बीच से गुजर रही इस सड़क के दोनों ओर हिमालय का अद्भुत नजारा है। यहीं पर महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन का आश्रम है, जो ‘हिम दर्शन कुटीर’ के नाम से जाना जाता है। इस वन में बड़ी संख्या में बांज, बुरांश, काफल, उतीस जैसी दुर्लभ प्रजातियों के वृक्ष मौजूद हैं। फिलहाल इस सड़क-मार्ग की चौड़ाई करीब छह मीटर है, जिसे 12 से 18 मीटर किए जाने की तैयारी है। जाहिर है, इससे दुर्लभ वन प्रजाति के अनेक पेड़ काटने पड़ेंगे, वे कट जाएंगे।

यह हाल सिर्फ उत्तराखंड का नहीं है। ‘द स्टेट ऑफ इंडियाज एन्वायर्नमेंट 2026’ रिपोर्ट बताती है कि साल 2023-24 में देश भर में 29,000 हेक्टेयर वन-भूमि का इस्तेमाल गैर-वन गतिविधियों में किया गया, जो 2022-23 की तुलना में 66 प्रतिशत अधिक था। साल 2014-15 से लेकर 2023-24 के बीच पूरे भारत में 1,73,397 हेक्टेयर जंगल सड़कों, बिजली लाइनों, खनन, सिंचाई, रेलवे व पनबिजली परियोजनाओं की भेंट चढ़ गए। इसी तरह, एनर्जी कंसल्टेंसी देने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी यूटिलिटी बिडर मानती है कि 1990 से 2020 तक भारत में जंगल कटने की घटनाओं में जबर्दस्त वृद्धि हुई है और 2015 से 2020 के बीच इसमें तेज उछाल दर्ज की गई। उसके आंकड़ों की मानें, तो बीते तीन दशक में देश में 6.68 लाख हेक्टेयर वन भूमि खाली कराए गए हैं। हालांकि, देश की आधिकारिक रिपोर्टें कुल हरित क्षेत्र में बढ़ोतरी के संकेत देती हैं, पर स्वतंत्र अध्ययन इसे सही नहीं मानते और प्राकृतिक वन क्षेत्र में भारी कमी की बात कह रहे हैं।

वनों की कटाई से पर्यावरण को होने वाले नुकसान जगजाहिर हैं। हिम दर्शन कुटीर के आसपास के इलाकों की ही बात करें, तो यहां दुर्लभ वन्य जीव प्रजाति कस्तूरी मृग का अनुसंधान केंद्र है, जिसका अस्तित्व यहां की जैव-विविधता पर टिका हुआ है। यहां से बरड़ और पुंगर नदियां निकलती हैं। वन संपदा से घिरी इस पर्वतमाला के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं, जहां के लोगों के जल का स्रोत ये नदियां हैं। उनकी खेती-बाड़ी भी इन्हीं से चलती है। यहां शीतकाल में भारी बर्फ भी पड़ती है, जिसे देखने के लिए मैदानी इलाकों से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। यह उत्तराखंड का एक मनमोहक पर्यटन केंद्र है। प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में सैलानी इस प्राकृतिक छटा का आनंद उठाने के लिए पहुंचते हैं। बावजूद इसके यहां पर करीब 13 हजार पेड़ों पर निशान लगाए गए हैं, जिनको सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटने की तैयारी चल रही है। गौरतलब है, सन् 1980 में भी यहां जब पेड़ों के कटाने की आशंका बढ़ी, तब सरला बहन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर इसका सख्त विरोध किया था, जिसके बाद यहां सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पेड़ों की कटाई की योजना रोक दी गई थी। क्या इस बार सरला बहन का बचाया यह वन अनियोजित विकास की भेंट चढ़ जाएगा?

विडंबना यह है कि अदालतों में भी विकास के नाम पर सरकार का पक्ष अधिक सुना जा रहा है, जबकि गर्मी से राहत पाने के लिए मैदानी क्षेत्र के लोगों का हिमालय की तरफ पहले से अधिक आना-जाना बढ़ गया है। उनकी सुविधा के लिए पर्वतों की शांत वादियों में पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ अधिक होने लगी है। क्षणिक सुविधाओं के लिए इंसान बड़ी बर्बादी की तरफ कदम बढ़ाता दिख रहा है। यही कारण है कि हिमालयी राज्यों में जहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ रहा है और बची-खुची दुर्लभ वन प्रजातियों को नुकसान पहुंच रहा है, वहीं आस-पास के गांवों के जल-स्रोतों और यहां से निकलने वाली नदियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस गंभीर विषयों पर लगातार चर्चा हो रही है, लेकिन लापरवाही का अंतहीन सिलसिला जारी है।

कहने की जरूरत नहीं, विकास ऐसा होना चाहिए, जो आफत खड़ी न करे। हिमालय के वनों को उजाड़ने से हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा। अच्छा यही होगा कि जलवायु संकट से बचने के लिए प्राकृतिक वनों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।