भारत की भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियां

Afeias
20 Apr 2026
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इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट एंड द पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एक नई रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में 2021-2051 तक के लिए भारत के डेमोग्राफिक भविष्य को केंद्र में रखा गया है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह जनसांख्यिकी के जिन जोखिमों को रेखांकित करती है, वे पूरे देश में सामने आने लगे हैं।

कुछ बिंदु –

स्कूलों के लिए समस्या –

  • अनुमान बताते हैं कि प्री-प्राइमरी स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 2021 में 11.35 करोड़ से घटकर 2051 तक 86 लाख रह जाएगी।
  • ज्यादातर क्षेत्रों में यूनिवर्सल प्राइमरी स्कूल नामांकन अच्छा हो रहा है। इसलिए मुख्यतः सरकारी क्षेत्र में स्कूली सुविधाओं की मांग कम हो सकती है।
  • प्रजनन में लगातार गिरावट से कम नामांकन वाले स्कूलों का चलना मुश्किल हो सकता है। यह एक ऐसा ट्रेंड है, जिसे केरल ने 30 वर्षों तक देखा है।
  • शिक्षा मंत्रालय के डेटा बताते हैं कि पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में काफी कमी आई है। 2014-15 में स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 2023-24 में 10.18 लाख हो गई। यानि देश भर में करीब 90,000 स्कूल कम हो गए हैं। लेकिन प्राइवेट स्कूलों की संख्या 43,000 बढ़ गई है।

बूढी होती आबादी –

  • जनसांख्यिकीय लाभांश अधिकांशतः 15-59 आयुवर्ग की आबादी पर निर्भर करता है। भारत में ऐसा वर्ग काफी बड़ा है। यह 2021 में 83.38 करोड़ (65.2%) के अनुमानित स्तर पर पहुंच जाएगा।
  • 2051 तक यही कार्यबल घटकर 99.81 करोड़ (62.8%) हो जाएगा। 2051 तक देश में हर 10 में से करीब छह लोग कार्य-बल का हिस्सा होंगे।
  • क्रमशः घटते कार्यबल से पता चलता है कि भारत की आबादी में वृद्धजनों की संख्या बढ़ती जाएगी। 2021 में 60 वर्ष से ऊपर की आबादी 13.05 करोड़ (9.62%) से बढ़कर 2051 में 32.53 करोड़ (20.5%) होने का अनुमान है।
  • मीडियन उम्र, 2021 में 28 साल से बढ़कर 2051 में 40 साल होने का अनुमान है। यह जनसांख्यिकी बदलाव के ज्यादा एडवांस स्तर की ओर बदलाव का संकेत है।
  • बुजुर्ग आबादी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव डालेगी। इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।

नीतिगत बदलाव की जरूरत –

  • बच्चों की घटती आबादी से टीचर-विद्यार्थी का अनुपात बेहतर होने की उम्मीद है।
  • स्कूलों का बुनियादी ढांचा और अच्छा हो सकेगा।
  • जन्मदर में गिरावट से मातृत्व स्वास्थ्य की मांग कम होगी। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र संसाधनों का सही उपयोग कर पाएगा।
  • समय की चुनौतियों से निपटने के लिए देश को शिक्षा और कौशल में बड़े बदलाव करने की जरूरत है।
  • युवा पीढ़ी की कमी को पाटने के लिए कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया जाना चाहिए।
  • बुजुर्ग आबादी की जरूरतों के अनुसार स्वास्थ्य सेवा को डिजाइन किया जाना चाहिए।

इन सबसे बढ़ी हुई सिल्वर अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत संभावना बनाई जा सकती है।

‘द हिंदू’ में प्रकाशित एस.इरूदया राजन और जे. रेटनाकुमार के लेख पर आधारित। 19 मार्च 2026