ऊर्जा क्षेत्र की कमियों को दूर करने की आवश्यकता
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पश्चिम एशिया में हो रहे सैन्य संघर्ष ने हमें भारत की ऊर्जा जरूरतों के बारे में फिर से सोचने पर विवश किया है। तेल की कीमतें 1970 के दशक से ही हमारी परेशानी का कारण बन रही है।
भारत में आयातित कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का हिस्सा काफी अधिक है। इसीलिए ऊर्जा के क्षेत्र में जोखिम बढ़ जाते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा में हम अच्छा प्रदर्शन कर पा रहे हैं, क्योंकि भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में होने के कारण पर्याप्त सौर ऊर्जा प्राप्त करता है। फिर भी आधुनिक नवीकरणीय ऊर्जा कुल ऊर्जा उत्पादन का 3.2% ही है।
बढ़ती जनसांख्यिकी शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जीडीपी के साथ ही ऊर्जा आपूर्ति भी बढ़नी चाहिए। पारंपरिक बायोमास कुल ऊर्जा आपूर्ति का 20% है, जिसे विस्थापित कर औद्योगिक प्रक्रियाओं, परिवहन लाजिस्टिक्स और घरेलु खपत का गहन विद्युतीकरण किया जाना चाहिए। पर इसके लिए हमारे पास पर्याप्त हरित ऊर्जा होनी चाहिए।
ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने में चुनौतियाँ तथा समाधान –
विद्युत क्षेत्र में परिवर्तन – वर्तमान विद्युत ढांचा केंद्रीय योजना पर आधारित है। इससे पूँजी आवंटन सही ढंग से नहीं होता। कोई जोखिम नहीं उठाता, इससे नवाचार भी हतोत्साहित होता है। अस्थिर नवीकरणीय स्रोतों के विकेंद्रीकृत ग्रिड की जटिलता को केंद्र सरकार नहीं समझती।
- विद्युत क्षेत्र का मूल्य निर्धारण बाजार में मांग व आपूर्ति के आधार पर हो, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, प्रसारण, अधोसंरचना और ऊर्जा भंडारण में निजी निवेश आकर्षित हो सके।
- ऐसा बाजार ढांचा बनाना चाहिए, जिसमें लाखों एजेंट बिना बाधा के मूल्य संकेतों के आधार पर ऊर्जा उत्पादन व खपत के निर्णयों का अनुकूलन कर सकें।
अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर कार्बन टैक्स – जीवाश्म ईंधनों के दहन से सार्वजनिक स्वास्थ्य व जलवायु को क्षति पहुँचती है। साथ ही तेल व गैस आयात देश के लिए रणनीतिक कमजोरी उत्पन्न करता है।
- हमें निजी कंपनियों के जीवाश्म ईंधन दहन पर कर लगाना चाहिए। इससे निजी कंपनियाँ दूसरे ऊर्जा स्रोत की ओर जाएंगी।
- वस्तु एवं कर प्रणाली संरचना का अनुपालन सरल करने के लिए कम और एकल दर वाले जीएसटी की ओर बढ़ना चाहिए। इससे मिला राजस्व विद्युत क्षेत्र के लंबित सुधारों को वित्तपोषित करेगा।
नवीकरणी ऊर्जा स्रोतों का वित्तपोषण – यह ऊर्जा स्रोत पूँजी गहन है। इसीलिए यह कम लागत वाली इक्विटी और दीर्घकालिक ऋण पहुँच पर निर्भर है। अधोसंरचना निर्माण में उत्पादन और भंडारण क्षमता तथा ग्रिड विस्तार शमिल है। केंद्र व घरेलु वित्तीय प्रणाली इसे वित्त पोषित करने में सक्षम नहीं हैं।
- हमें अधोसंरचना जरूरतों को वैश्विक पूंजी बाजारों से जोड़ना चाहिए।
- नियामकीय दिक्कतों को कम करके वित्तीय उदारीकरण किया जाना चाहिए।
आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता में बाधक हैं। इसलिए हमें उन तरीकों को छोड़ना होगा, जिनसे यह अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।