लोकसभा अध्यक्ष के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव
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हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इससे लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक स्थिति और जवाबदेही पर बहस फिर से शुरू हो गई है पिछले चार दशकों में ऐसा प्रस्ताव पहली बार लाया गया है। इसका महत्व प्रस्ताव में नहीं है, बल्कि संसदीय संस्थाओं के कामकाज और अध्यक्ष के कार्यालय से जुड़ी प्रथाओं के बारे में है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका –
अध्यक्ष का कार्यालय भारत के लोकतंत्र का एक महत्वूर्ण स्तंभ है। लोकसभा के पीठासीन अधिकारी के तौर पर अध्यक्ष यह सुनिश्चित करते हैं कि बहस सही तरीके से हो, प्रक्रिया के नियम लागू हों, सदस्यों के अधिकारों की रक्षा हो तथा सत्ताधारी और विपक्ष के बीच संतुलन बना रहे।
संविधान ने अध्यक्ष को एक निष्पक्ष मध्यस्थ बनाया है। इनसे उम्मीद की जाती है कि पदग्रहण करने के बाद वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करेंगे।
अध्यक्ष को सदस्यों की पहचान करने कार्यवाही के नियमों का पालन, अनुशासन बनाए रखने और धन बिल को मान्यता देने जैसे कई अधिकार दिए गए हैं। ये अधिकार संसदीय बहसों को काफी हद तक नियंत्रित करते हैं। इस प्रभाव से सांवैधानिक तंत्र को सुरक्षा मिलती है। यही कारण है कि अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया कठिन रखी गई है।
वर्तमान प्रस्ताव का आधार –
कांग्रेस ने जो अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, उससें अध्यक्ष पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार और विपक्ष की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने का आरोप था।
प्रस्ताव का व्यापक प्रभाव –
मौजूदा प्रस्ताव के नतीजों का अंदाजा विपक्ष को भी था कि यह सत्ता वर्ग के बहुमत होने के कारण गिर जाएगा। फिर भी इसे लाने का संस्थागत महत्व है। यह पीठासीन अधिकारियों को याद दिलाता है कि उनका अधिकार विधायिका के सामूहिक भरोसे से जुड़ा हुआ है। उनकी विश्वसनीयता काफी हद तक निष्पक्षता पर निर्भर करती है।
अध्यक्ष के कार्यालय पर कई चुनौतियां असर डालती हैं।
पहली, राजनीतिकरण की बढ़ती सोच – दलबदल कानून के तहत सांसद को अयोग्य ठहराने या धन विधेयक का दर्जा देने वाले मामलों में अक्सर भेदभाव हो रहा है।
दूसरी – सत्ता दल और विपक्ष के बीच अक्सर होने वाले टकरावों से संसदीय सत्र निरर्थक और छोटे होते जा रहे हैं। जब अध्यक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया जाता है, तो राजनीतिक दलों में भरोसा कम हो जाता है। इससे आम सहमति बनाना और मुश्किल हो जाता है।
तीसरी – संसदीय परंपराएं कमजोर हो गई हैं। ये वे प्रथाएं हैं, जो केवल मौखिक और व्यावहारिक स्तर पर चली आ रही हैं। जैसे-जैसे राजनीतिक दांव-पेंच बढ़ते जा रहे हैं, ऐसी परंपराएं भी कमजोर होती जा रही हैं।
आगे की राह –
- संसद की विश्वसनीयता बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए, सुधार और संसदीय नियमों के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता जरूरी है।
- संस्थागत परंपराओं के निर्वाह से संसद जैसी सर्वोच्च संस्था को मजबूत किया जाना चाहिए।
- अध्यक्ष से निष्पक्षता को बनाए रखने की उम्मीद रखता गलत नहीं है। इसके पालन से अगर बहस के लिए पर्याप्त समय दिया जाए और विधेयकों के लिए सही तरीके से स्वीकृति दी जाए, तो देश हित में बड़े निर्णय लिए जा सकते हैं।
- संसदीय प्रक्रिया में दिशा निर्देशों को स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि दलों के बीच होने वाले मतभेद क्रमशः कम हो।
‘द हिंदू‘ में प्रकाशित अहमद रजा के लेख पर आधारित। 11 मार्च 2026