शहरी निकायों को वित्तीय शक्ति देने का एक प्रयत्न

Afeias
23 Mar 2026
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  • शहरी निकायों की लगातार गिरती वित्तीय स्थिति को देखते हुए केंद्र ने अपडेटेड ‘अर्बन चैलेंज फंड’ की शुरूआत की है। इसमें अगर शहरी निकाय लोन, बॉन्ड और पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनशिप) के जरिए कम से कम 50% फंड जुटाते हैं, तो केंद्र सरकार परियोजना की लागत का 25% देगी। इसे अटल मिशन फॉर रिजवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफारर्मेशन 2.0 के तहत शुरु किया गया है।
  • यह एक ऐसे तंत्र में वित्तीय (फिस्कल) अनुशासन लाने की कोशिश है, जिसने शहरी निकायों को कभी भी वित्तीय शक्ति ठीक से नहीं दी है।
  • इस योजना से शहरी निकायों का वित्तीय ढांचा सार्वजनिक निधि पर चलने वाले अनुदान आधारित ढांचे से बदलकर मार्केट आधारित, सुधार की ओर ले जाने वाले विकास की ओर चला जाएगा। इससे ग्रोथ हब्स, पुर्नविकास स्वच्छ और सफाई धारणीय होगी।
  • छोटे शहरों के लिए बाजार तक पहुंच को सुगम बनाने हेतु 5,000 करोड़ रुपए का गारंटी कोष बनाया गया है। इससे जरूरत के आधार पर क्रेडिट रिपेमेंट किया जा सकता है।
  • सरकार का यह प्रयास बेकार नहीं कहा जा सकता है। निजी पूंजी का सार्वजनिक योजनाओं में उपयोग करना गैर कानूनी नहीं है। कभी-कभी सार्वजनिक तंत्र को राजस्व भी बढ़ाना चाहिए। मुख्य मुद्दा यह है कि केंद्र पहले मिनिमम सर्विस गांरटी पक्का करने के बजाय मार्केट एक्सेस पर सार्वजनिक सहयोगी की शर्तें लगा रहा है। निधि के तरीके सही होने पर भी अगर भूमि रिकॉर्डस में गड़बड़ी है, शहरी निकाय मास्टर प्लान में गड़बड़ी करते हैं, तो ऋण पात्रता और वित्तीय विश्वसनीयता का क्या होगा?

‘द हिंदूमें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 फरवरी 2026