दुर्लभ खनिज खनन से जुड़ा सुनहरा अवसर
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इस वर्ष के बजट में सरकार ने चार राज्यों में दुर्लभ खनिजों के खनन से जुड़ी घोषणा की है। सरकार ने तमिलनाडु, केरल, ओडिशा और आंध्रप्रदेश में इन खनिजों की माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित गलियारे की योजना बनाई है। इसके अनेक लाभ हैं –
- चीन पर निर्भरता कम होने की संभावना है।
- स्वच्छ विनिर्माण के जरिए आर्थिक प्रगति होगी।
- अर्थव्यवस्था का विकार्बनीकरण तेज होगा।
- नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे।
- इस नई पहल के साथ, ई-वेस्ट, माइन टेलिंग्स और औद्योगिक कचरे से दुर्लभ खनिजों और आवश्यक खनिजों की प्राप्ति और रिसायकलिंग से आपूर्ति बढ़ सकती है। (अनुमान बताते हैं कि अकेले ई-वेस्ट से 1300 टन दुर्लभ खनिज बन सकता है। गतवर्ष 1500 करोड़ रु. की योजना इस हेतु बनाई गई थी।)
चुनौतियां कहां हैं –
- विनियमन फ्रेमवर्क को उद्देश्य के हिसाब से फिट होना चाहिए। ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में जरूरी मिनरल्स को उच्च मूल्य वाली सामग्री की तरह वर्गीकृत किया जाना चाहिए।
- एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) नियमों में रिसायकलिंग और रिकवरी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- अनौपचारिक कबाड़ और रिसायकलिंग सेक्टर को क्षमता निर्माण, तकनीक सक्षम जानकारी और वित्तीय सहायता से औपचारिक बनाने पर काम किया जाना है।
- आपूर्ति और मांग का तालमेल बैठाना होगा। इससे घरेलू उपभोग को नियमित किया जा सकता है।
- रीसायकल किए गए जरूरी खनिजों के इस्तेमाल के लिए पारिस्थितिकी को मजबूत करना होगा।
दुर्लभ खनिजों के लिए बनाई गई योजना लाभ के साथ-साथ सुरक्षित और अच्छे रोजगार पैदा कर सकती है। इससे जुड़ी कमियों को सुधारा जाना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 4 फरवरी 2026
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