राज्यपालों को बेकार की औपचारिकता निभाना जरूरी क्यों

Afeias
16 Feb 2026
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हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल ने अभिभाषण पढ़ने से मना कर दिया। पिछले तीन वर्षों से वह ऐसा करते आ रहे हैं। केरल के राज्यपाल ने कैबिनेट से स्वीकृत भाषण में हेर-फेर कर दी थी, जिसे बाद में मुख्यमंत्री ने स्वयं सुधारा।

राज्यपालों का यह व्यवहार अनुचित क्यों है –

  • भारतीय संसद लोकतंत्र के वेस्टमिंस्टर मॉडल पर काम करती है। इसमें राज्यपाल को भाषण या विशेष संबोधन को वैसा ही पढ़ना चाहिए, जो राज्य की निर्वाचित सरकार की चुनी हुई नीति के बारे में बताता है। पूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण ने एक बार कहा था कि राज्यपाल के पास राज्य सरकारों के ‘माउथपीस‘ के तौर पर काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
  • संविधान के अनुच्छेद 87 और 176 के अनुसार, नए वर्ष में राष्ट्रपति और राज्यपालों को संसद और विधानसभाओं में खास भाषण देना होगा। अतः राज्यपाल को ऐसी शक्तियों का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिन्हें संविधान में नहीं बताया गया है। उन्हें संविधान की भावना का सम्मान करने का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

हल निकल सकता है –

  • लगभग 35 वर्ष पहले, राष्ट्रपति वेंकटरमण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से भाषण की प्रथा को खत्म करने के लिए संविधान संशोधन करने की सिफारिश की थी। उन्होंने इसे ‘ब्रिटिश कालभ्रम‘ और ‘बेकार की औपचारिकता‘ कहा था।
  • तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने भी इस संविधान संशोधन पर सहमति जताई है।

‘द हिंदू‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 जनवरी, 2026