हमारा डेटा, हमारा अधिकार
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नवंबर, 2025 को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्श्शन एक्ट, 2023 को आंशिक रूप से लागू करने के साथ ही भारतीयों के पास निजता की रक्षा का सीमित अधिकार आ गया है।
डीपीडीपीए से लाभ –
- उपभोक्ता अब सरकारी और निजी निकाय के विरूद्ध भी अपने डेटा अधिकारों का दावा कर सकते हैं।
- अब उपभोक्ता कानूनी तौर पर कंपनियों को अपना डेटा डिलीट करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
- यह कानून बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को कड़ी सुरक्षा देता है।
- इसमें डेटा सुरक्षा बोर्ड के गठन का प्रावधान है। यह प्राथमिक नियामक प्राधिकरण के रूप में काम करेगा।
- स्टार्टअप्स को कुछ डेटा प्रोसेसिंग गतिविधियों के लिए छूट दी गई है। यह उपयोगकर्ताओं और व्यापार में सुगमता के बीच कुछ संतुलन रखेगा।
चिंताएं –
- सरकार को व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग के लिए कई जगह छूट दी गई है। इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।
- यह कानून उपयोगकर्ता द्वारा सार्वजनिक किए गए व्यक्त्गित डेटा पर लागू नहीं होता है। इसका अर्थ है कि सार्वजनिक किया गया कोई भी व्यक्तिगत डेटा सुरक्षित नहीं होगा।
- कानून के सेक्शन 44(3) में आरटीआई के तहत अब व्यक्तिगत जानकारी नहीं दी जा सकती है। जबकि पहले आरटीआई में व्यक्तिगत जानकारी देने को जनहित में माना जाता था।
- बोर्ड के आदेशों के विरूद्ध सिर्फ टेलीकॉम डिस्प्यूट्स सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील की जा सकती है। इसके अधिकारी केंद्र ही नियुक्त करेगा।
अंततः कानून आदर्श नहीं कहा जा सकता है। लेकिन 2017 में पुट्टास्वामी मामले में निजता को मौलिक अधिकार मानने से लेकर व्यक्तिगत डेटा को डिलीट कराने के अधिकार को कानूनी मान्यता मिलना एक उपलब्धि कही जा सकती है। अब कंपनियां इन अधिकारों का कानूनी तौर पर सम्मान करने के लिए मजबूर हैं। यह कुछ नहीं से बेहतर कहा जा सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित कर्मण्य सिंह सरीन के लेख पर आधारित। 12 जनवरी, 2026
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