वायु गुणवत्ता में सुधार जरूरी
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दिल्ली और उसके आसपास के शहरों में प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ा हुआ है। यह जहरीले या प्राण घातक स्तर तक पहुंच चुका है। सरकारें मौन हैं। दिल्ली के प्रदूषण से जुड़े कुछ तथ्य –
- विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि पी एम 2.5 का स्तर हवा में 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। पी एम कण इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों के जरिए खून में जा सकते हैं। दिल्ली के कुछ हिस्सों में यह 700 माइक्रोग्राम/प्रति क्यूबिक मीटर रिकार्ड किया गया है।
- इस स्तर के पी एम कणों का कंसंट्रेशन दिन में 30 से ज्यादा सिगरेट पीने के बराबर है।
- आसपास के शहरों में 150-200 का कंसंट्रेशन सामान्य हो गया है। अब मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद वगैरह भी इस श्रेणी से ऊपर चले गए हैं।
- देश का एक भी जिला विश्व स्वास्थ्य संगठन के पीएम 2.5 मानक को पूरा नहीं करता है। राष्ट्रीय स्तर पर बनाए गए वायु गुणवत्ता सूचकांक में 60% जिले फेल हो जाते हैं।
बढ़ते प्रदूषण का कारण (दिल्ली में) –
- यहाँ की हवा बहुत शांत हो गई है। प्रदूषकों को अंदर ले जाने या बाहर निकालने के लिए हवा नहीं है। दिल्ली का प्रदूषण उसकी अपनी ही देन है। इसलिए जवाब भी अंदर ही ढूंढने होंगे। उपाय क्या हो सकते हैं –
- चीन में भारत से ज्यादा कारें और फैक्टरी हैं। फिर भी वहाँ हवा ज्यादा साफ है। इससे स्प्ष्ट है कि भारत की हवा को साफ किया जा सकता है।
- सार्वजनिक वाहन बढ़ाए जाने की जरूरत है।
- अभी हम विनिर्माण में जीडीपी के 16% पर हैं। 25% के लक्ष्य पर पहुँचने के लिए हमें पर्यावरण नियमों का पालन सख्ती से करना होगा। चीन विनिर्माण में 25% की ऊँचाई पर है, लेकिन उसका पी एम 2.5 औसतन 30 माइक्रोग्राम/प्रति क्यूबिक मीटर है।
- 2000-2001 में, जब सीएनजी भारत में आया था, तब तो हवा की गुणवत्ता काफी ठीक हुई थी। अब भी विदेशों से सीखकर कुछ नई तकनीकें लाई जा सकती हैं।
सरकारों को इस समस्या के प्रति सजग होने और नीतिगत बदलाव लाने की तुरंत जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 दिसंबर, 2025