अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता को थोड़ी और स्वतंत्रता दी जाए
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हमारे नए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मुक्त संभाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा और उसके दुरूपयोग को रोकने की चर्चा को एक बार फिर से जीवंत कर दिया है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ पाबंदियां हैं। इनमें से कौन सी कितनी उचित हैं, और कौन सी अनुचित, सही विवाद का बिंदु यही है।
कुछ सोशल मीडिया मंच हैं, जिनमें कुछ खास समुदायों को लक्ष्य बनाकर घसीटा जाता है। ये स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के अधिकार की सीमा पार कर जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ कार्टूनिस्ट और स्टैंडअप कमेडियन हैं, जो ताकतवर लोगों की मजाकिया अंदाज में आलोचना करते हैं। क्या इन्हें सत्ता में बैठे लोगों के लिए ‘खतरा’ मानकर दंड दिया जाता चाहिए? उच्चतम न्यायालय ने स्वयं इस प्रकार के मुक्त संभाषण को हल्के में लिए जाने का निर्देश दिया है। न्यायालय को तो यह भी कहना है कि जजों को अपनी आलोचना को हल्के में लेना चाहिए, और नेताओं को मोटी चमड़ी वाला होना चाहिए।
अच्छा तो यह है कि न्यायालय फ्री स्पीच या मुक्त संभाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को और अच्छी तरह से परिभाषित करे। समय-समय पर न्यायालय यह करती भी हैं। इन विवादों में उसका अमूल्य समय भी बर्बाद होता रहता है। पॉडकास्टर अल्लाहबादिया के केस में कुछ ऐसा ही हुआ था। उच्चतम न्यायालय को बड़े अफसोस के साथ ‘अश्लील’ को अलग परिभाषित करना पड़ा था। कुल मिलाकर, इन बेकार के मामलों से बचने के लिए न्यायालय फ्रीस्पीच को परिभाषित करने के साथ-साथ उसका दायरा भी बढ़ा दे, तो अच्छा होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 26 नवंबर, 2025