07-10-2025 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
Correct This Ongoing Himalayan Blunder
ET Editorial

Monsoon 2025 has unleashed destruction across several states, with West Bengal bearing the latest brunt. In the past few days, devastating landslides and raging floods have struck Darjeeling, Kalimpong and Jalpaiguri districts in north Bengal, claiming at least 28 lives and displacing thousands. Concerns are mounting as Bhutan’s Tala hydropower dam started overflowing on Oct 5, raising the risk of further flooding and putting additional pressure on already strained emergency services.
Floods in Bengal are a symptom of a broader Himalayan crisis. Heavy rains had already wreaked havoc in Himachal Pradesh, Uttarakhand and Assam. Climate change is a major driver of this rising destruction, but it’s not the whole story. Human greed — unchecked, unplanned and flimsy construction of homes, highways and hotels along rivers, streams and fragile hill slopes — has amplified the disaster. The solution is a complete overhaul of planning systems and building codes for the Himalayan region, strict limits on tourism, and a resilience plan for communities living in these ecologically-sensitive areas.
This is not just a local necessity but a national one — most of these regions are sensitive border areas. As former Indian Navy commander Kapil Narula noted in his 2016 CLAWS (Centre for Land Warfare Studies) Journal article, ‘Integrating Risks and Impact of Climate Change in India’s Military Strategy’, climate change disrupts infra indiscriminately, undermining defence preparedness, while inflicting heavy economic losses and threatening long-term social stability. This Himalayan crisis demands urgent, coordinated action before the next monsoon turns even more catastrophic. Without a unified resilience plan, India risks human and strategic disaster.
गाजा के लिए दीर्घकालीन समाधानों की दरकार है
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, ( कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर )
गाजा में 20-सूत्रीय युद्धविराम योजना को बड़े धूमधाम से पेश किया गया है और यह वहां के लोगों के लिए बेहतरी का वादा करती है। यह गाजा के पुनर्निर्माण, बंधकों की वापसी और उस युद्ध को समाप्त करने का भी आश्वासन देती है, जिसने गाजा को मलबे में बदल दिया है।
लेकिन इस योजना की आकर्षक भाषा के पीछे एक गहरी समस्या है। यह परस्पर भरोसे के बजाय हताशा पर आधारित है। अलबत्ता महीनों की बमबारी, भुखमरी और विस्थापन से तबाह हो चुके गाजा के लोगों को तो लगभग कोई भी युद्धविराम स्वीकार्य ही होगा।
इस योजना को ट्रम्प का समर्थन प्राप्त है, वहीं इजराइल ने इसका स्वागत किया है। यह पूर्ण युद्धविराम के बाद गाजा के विसैन्यीकरण और एक अंतरिम प्रशासन के तहत उसके पुनर्निर्माण का प्रयास करती है। निगरानी का कार्य एक शांति बोर्ड के हाथ में होगा, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय हस्तियां शामिल होंगी, लेकिन दिलचस्प यह है कि इसमें यूएन शामिल नहीं होगा।
संक्षेप में इसका मकसद गाजा के राजनीतिक परिदृश्य से हमास को मिटाकर उसकी जगह एक तटस्थ फिलिस्तीनी समिति को स्थापित करना और खाड़ी व पश्चिमी देशों के पैसों से इस क्षेत्र का पुनर्निर्माण करना है। यह शांति समझौते से ज्यादा एक बिजनेस मॉडल जैसा लगता है।
इस योजना की बड़ी खामी हमास को जानबूझकर बाहर रखना है। उसे एक ऐसी पराजित शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जो बस धुंधलके में गायब हो जाएगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि विचारधाराएं आदेश पर कभी नहीं मरतीं। हमास सिर्फ एक मिलिशिया नहीं है; यह एक गहरा सामाजिक-राजनीतिक नेटवर्क है, जिसका दायरा पीढ़ियों तक फैला हुआ है। इसमें कोई शक नहीं कि यह एक आतंकवादी संगठन भी है, लेकिन गाजा की राजनीति और समाज में इसकी जड़ें गहरी हैं।
यह कल्पना करना कि दशकों के संघर्ष के बाद यह स्वेच्छा से हथियार डालकर विलीन हो जाएगा- खामख्याली है। सच यह है कि हमास रणनीतिक रूप से तो युद्धविराम स्वीकार कर सकता है, लेकिन वह इस राहत का उपयोग फिर से संगठित होने और पुनर्निर्माण के लिए करेगा।
विचारधारा, आस्था और पहचान से प्रेरित आंदोलन थकान से फीके नहीं पड़ते; वे अपने लिए नई भूमिकाएं तलाशते हैं। जब तक गाजा को लेकर बनाई जाने वाली कोई भी योजना हमास को एक गैर-उग्रवादी शक्ति में बदलने के लिए राजनीतिक स्पेस मुहैया नहीं कराती, गाजा एक ज्वालामुखी बना रहेगा।
इस योजना का प्रस्ताव रखने वालों की विश्वसनीयता भी उतनी ही कमजोर है। ट्रम्प को तो लगता है जैसे शांति कोई लेन-देन की चीज हो। गाजा में निवेश और री-डेवलपमेंट पर उनका जोर एक मानवीय मिशन कम और एक कॉर्पोरेट परियोजना ज्यादा लगता है। क्या इतने जटिल संघर्ष को समझौतों और परिणामों की सरल भाषा से सुलझाया जा सकता है?
इसके अलावा, ट्रम्प का यूएन पर अचानक विश्वास भी हैरान करने वाला है। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान बार-बार यूएन की अवहेलना करने के बाद अब वे उसी संस्था से सहायता, सुरक्षा और निगरानी की उम्मीद करते हैं। फिर यूएन को ही शांति स्थापना के लिए नेतृत्व करने देने- जैसा कि उसने लेबनान और गोलान हाइट्स में प्रभावी ढंग से किया था- के बजाय एक नया शांति बोर्ड क्यों बनाया जाए?
यह योजना हमास से बहुत मांग भी करती है, जबकि इजराइल से इतना नहीं मांगती। गाजा से इजराइल की वापसी सुरक्षा मानकों से जुड़ी होगी, जिन्हें वह स्वयं परिभाषित और सत्यापित करेगा। इससे उसे इस प्रक्रिया पर वीटो का अधिकार मिल जाता है। कोई भी छोटी-सी घटना गाजा में फिर से इजराइली फौजों की घुसपैठ या युद्धविराम को स्थगित करने का औचित्य सिद्ध कर सकती है। वहीं इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इजराइल पहले हमला नहीं करेगा।
योजना के समर्थकों का तर्क है कि यह टू-स्टेट के विचार को पुनर्जीवित कर सकती है। जबकि हकीकत यह है कि यह उसे ठंडे बस्ते में डाल देगी। गाजा को एक टेक्नोक्रैटिक प्रशासन के अधीन करके और वेस्ट बैंक का कामकाज लड़खड़ाते फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सौंपकर यह फिलिस्तीन के बिखराव को संस्थागत रूप देती है।
पश्चिम एशिया में शांति अमेरिका, इजराइल और कुछ खाड़ी राजतंत्रों का सीमित-भागीदारों वाला क्लब नहीं हो सकती। भारत भी इजराइल के साथ अपने मजबूत संबंधों, खाड़ी में महत्वपूर्ण ऊर्जा निर्भरताओं और शांतिदूत के रूप में वार्ता में शामिल होने का हकदार है।
अगर इसे स्वीकार कर लिया जाए, तो भी 20-सूत्रीय योजना का जीवनकाल ट्रम्प प्रशासन से ज्यादा नहीं हो सकता। शांति के लिए संस्थाओं की जरूरत होती है, व्यक्तित्वों की नहीं। गाजा समस्या दीर्घकालिक समाधान की मांग करती है।
Date: 07-10-25
उद्योगों को बढ़ावा दें संरक्षणवाद को नहीं
लवीश भंडारी, ( लेखक सीएसईपी रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं )
सरकार ने हाल ही में यह घोषणा की है कि वह स्टील से लेकर मोबाइल कवर तक विभिन्न उत्पादों के विरुद्ध एंटी-डंपिंग जांच करेगी। भारत में एंटी-डंपिंग का इस्तेमाल संरक्षणवादी उपाय के रूप में व्यापक रूप से किया जाता है। इसके साथ-साथ उच्च शुल्क दरें, मात्रात्मक प्रतिबंध, नकारात्मक आयात सूची और अन्य उपाय भी अपनाए जाते हैं। इनमें से कुछ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुरूप हैं, कुछ को अनुपालन योग्य बनाया जा सकता है और दूसरों के लिए विश्व बैंक शायद ही मायने रखता है।
जो चीज मायने रखती है वह है भारत द्वारा निर्मित किया जा रहा विनिर्माण संबंधी माहौल। अगर स्टील से लेकर मोबाइल कवर, कांच, पीईटी और सोलर पैनल तक हर चीज को संरक्षण की आवश्यकता है, जबकि सैकड़ों अन्य उत्पादों को पहले ही किसी न किसी तरह का संरक्षण हासिल है तो ऐसे में हमें खुद से एक गहरा प्रश्न करना होगा और वह यह कि आखिर क्या हुआ? और हम इसे कैसे बदल सकते हैं?
इसका एक उत्तर, जो सबसे लोकप्रिय उत्तर भी है, वह यह है कि चीन ने अपना भारी सब्सिडी और उच्च संरक्षण वाला औद्योगिक उत्पादन भारत पर थोप दिया है। ये उत्पाद बहुत आसानी से घरेलू उत्पादन और उद्योग पर छा जाते हैं और रोजगार तथा दीर्घकालिक विनिर्माण वृद्धि को प्रभावित करते हैं। परंतु ये एंटी-डंपिंग जांच केवल चीनी उत्पादों को तो निशाने पर नहीं लेंगी। प्राप्त जानकारी से तो यही लगता है कि वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले व्यापार उपाय महानिदेशालय (डीजीटीआर) को थाईलैंड, रूस, ताइवान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और बांग्लादेश सहित अन्य देशों के उत्पादकों की भी जांच करनी होगी। उपरोक्त उपायों की तरह कई संरक्षणात्मक उपाय मौजूद हैं और अमेरिका, जापान तथा यूरोपीय संघ सहित कई विकसित देशों के उत्पादकों को इसमें शामिल किया गया है।
दूसरे शब्दों में, भारतीय विनिर्माता और उनके संघ मानते हैं कि उन्हें दुनिया भर के उत्पादों से संरक्षण की आवश्यकता है। कई बार तो यह कहा जाता है कि अन्य देशों के उत्पादकों को सस्ते चीनी कच्चे माल से लाभ मिल रहा है और इसके चलते अंतिम उत्पाद की लागत कम रहती है। ऐसे में भारत को खुद को इन सभी देशों के उत्पादकों से बचाने की आवश्यकता है जो सस्ते चीनी कच्चे माल पर निर्भर हैं। इस तर्क में दम हो सकता है, लेकिन यह भी सही है कि भारत खुद भी चीन से बहुत अधिक आयात करता है। गत वर्ष यह आंकड़ा 113 अरब डॉलर था जो इससे पिछले वर्ष से 11 फीसदी अधिक था। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी और उपकरण तथा प्लास्टिक आदि सभी शामिल थे।
अब सरकार के सामने एक गंभीर समस्या है: वह यह कैसे तय करे कि किन उत्पादों को बचाना है और किन्हें नहीं? अपना हित समझने वाला हर उत्पादक सरकार से चाहेगा कि वह उसे आयात से संरक्षण दिलाए। कोई भी सक्रिय सरकार या तो तत्काल संरक्षण वाले कदम उठाएगी या फिर शिकायत की जांच करेगी। परंतु दिक्कत यह है कि चीनी वस्तुओं की जांच कैसे होगी खासकर तब जबकि यह भी कहा जाता है कि हम चीन सरकार के आंकड़ों पर विश्वास नहीं कर सकते। इस समस्या को देखते हुए सरकार के लिए अगला बेहतर विकल्प यही है कि वह भारतीय आंकड़ों के आधार पर वैश्विक उत्पादनों की जांच करे। अगर हम ऐसा करते हैं तो हम उत्पादों का आकलन भारतीय लागत के आधार पर करेंगे। ऐसे में परिणाम उच्च लागत वाले भारतीय विनिर्माताओं के अनुकूल होंगे तथा संरक्षण की उनकी मांग के पक्ष में भी।
यह सवाल पूछना जरूरी है: ऐसे कौन से मानदंड हो सकते हैं जो सरकार को यह तय करने में मदद करें कि किन उत्पादों को किसी न किसी रूप में संरक्षण दिया जाना चाहिए, और किन्हें बिना रोक-टोक, शायद मामूली शुल्क के साथ, आयात की अनुमति दी जानी चाहिए? एक मुक्त बाजार समर्थक दृष्टिकोण यह तर्क देगा कि रुपये का अवमूल्यन किया जाए, टैरिफ हटा दिए जाएं, और भारतीय कंपनियों को यह निर्णय लेने दिया जाए कि वे वैश्विक कच्चे माल का उपयोग करें या घरेलू। वहीं एक वामपंथी-समाजवादी दृष्टिकोण यह मांग करेगा कि आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए, रुपये की विनिमय दर को नियंत्रित किया जाए, और सभी उत्पादन भारत में ही किया जाए। सरकार को बीच का रास्ता निकालना होगा।
पहले तो यह पता करना होगा कि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हर उत्पाद क्षेत्र में कैसे निपट रही हैं? हमें यह कार्य इस बात की परवाह किए बिना करना चाहिए कि संबंधित देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते हैं या वे किसी क्षेत्रीय समूह के सदस्य हैं या नहीं। चाहे वह चीन हो, वियतनाम हो या कोई अन्य देश। बात यह है कि यदि किसी कारणवश किसी देश के उत्पादक भारत में डंपिंग कर रहे हैं, तो वे वैश्विक बाजारों में भी ऐसा करने की प्रवृत्ति रखते होंगे। इसलिए भारत में कोई भी संरक्षणात्मक कदम उठाने से पहले उन उत्पाद श्रेणियों को आगे की जांच के लिए चिह्नित किया जाना चाहिए।
दूसरा, जब भी उद्योग जगत से संरक्षण की मांग उठती है, सरकार को पहले उत्पादों के उपयोगकर्ताओं से बात करनी चाहिए और ऐसा तब तक करते रहना चाहिए जब तक कि संरक्षणवादी कदम लागू नहीं हो जाते। संरक्षण एक तरह का आर्थिक न्याय है और निर्णय देने के पहले सरकार को सभी उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं को समुचित अवसर देना चाहिए।
तीसरा, सरकार को उपयोगकर्ताओं का भी वैसा ही बचाव करना चाहिए जैसे वह उत्पादकों का करती है। ऐसे में किसी भी संरक्षणवादी उपाय की सख्त निगरानी होनी चाहिए कि वह उत्पादकों और उपयोगकर्ताओं पर क्या असर डालता है।
चौथा, संरक्षणात्मक कदमों का विश्लेषण यह भी बताएगा कि कई मामलों में यह संरक्षण सरकार पर निर्भरता की ओर ले जाता है। यह निर्भरता भारत की दीर्घकालिक वृद्धि पर असर डालती है। ऐसे में फिर चाहे गुणवत्ता नियंत्रण आदेश हो, सामान्य से अधिक शुल्क दर या एंटी-डंपिंग उपाय, ऐसे सभी उपायों की एक समापन अवधि होनी चाहिए।
कुल मिलाकर, भारत के विनिर्माण क्षेत्र को सहारा देने और बढ़ावा देने के कई तरीके हैं। एक तरीका है कुछ लागतों को वहन करना, दूसरा है सब्सिडी प्रदान करना, तीसरा है व्यापार करने की प्रक्रिया को सरल बनाना, और एक अन्य तरीका है संरक्षणवाद अपनाना। इन सभी उपायों के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं।
उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना एक प्रकार की सब्सिडी है जिसका उद्देश्य उत्पादन के पैमाने में आने वाली समस्या को ठीक करना है, क्योंकि बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत कम होती है। यह एक विशिष्ट समस्या का विशिष्ट समाधान है। व्यवसाय करने में आसानी से जुड़े सुधारों का उद्देश्य व्यापार की प्रक्रिया को सरल बनाना था। ये भी विशिष्ट समस्याओं के लिए लक्षित समाधान हैं। लेकिन संरक्षणवाद ऐसा नहीं है। यह कुछ लोगों को दूसरों की कीमत पर लाभ पहुंचाता है, प्रतिस्पर्धी ताकतों को कम करता है, निर्भरता पैदा करता है, और उद्योग द्वारा लॉबिंग व राजनीतिक दबाव को बढ़ावा देता है। इसलिए, संरक्षणवादी उपायों का उपयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। चीन के उत्पादों के भारत में बाढ़ आने की आशंका उन लोगों के लिए एक शक्तिशाली साधन बन जाती है जो अपने स्वार्थी हितों के लिए संरक्षण चाहते हैं। सरकार को भारत को ऐसी घरेलू ताकतों से उतनी ही सतर्कता से बचाना चाहिए जितनी सतर्कता से वह चीनी उत्पादों के आधिक्य से बचाती है।
नमो सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला
संपादकीय

पूरे भारत में स्वदेशी चिप निर्माण और पैकेजिंग क्षमताओं के लिए प्रतिभा पूल विकसित करने में सहायता के लिए आईआईटी भुवनेश्वर में ‘नमो सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला’ की स्थापना को मंजूरी दी गईमो सेमीकंडक्टर लैब युवाओं को उद्योग – अनुकूल कौशल से लैस करके ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजाइन इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देगी यह लैब आईआईटी भुवनेश्वर को सेमीकंडक्टर अनुसंधान और कौशल विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करेगीकेंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में आईआईटी भुवनेश्वर में ‘नमो सेमीकंडक्टर प्रयोगशाला’ की स्थापना को मंजूरी दी है। इस परियोजना को एमपीएलएडी योजना के तहत धनराशि प्रदान की जाएगी। इस परियोजना की अनुमानित लागत 4.95 करोड़ रुपये है। नमो सेमीकंडक्टर लैब युवाओं को उद्योग-अनुकूल कौशल प्रदान करके भारत के विशाल प्रतिभा पूल में योगदान देगी।
यह लैब आईआईटी भुवनेश्वर को सेमीकंडक्टर अनुसंधान और कौशल विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करेगी। यह लैब पूरे भारत में स्थापित होने वाली चिप निर्माण और पैकेजिंग इकाइयों के लिए प्रतिभाओं को विकसित करने में सहायता करेगी। यह नई प्रयोगशाला ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजाइन इन इंडिया’ पहलों को और बढ़ावा देगी। यह भारत के तेजी से बढ़ते सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए उत्प्रेरक का काम करेगी। भारत वैश्विक चिप डिजाइन प्रतिभाओं का 20 प्रतिशत हिस्सा रखता है। देश भर के 295 विश्वविद्यालयों के छात्र उद्योग द्वारा उपलब्ध कराए गए नवीनतम ईडीए उपकरणों का उपयोग कर रहे है। 20 संस्थानों के 28 छात्रों द्वारा डिजाइन किए गए चिप एससीएल मोहाली में प्रदर्शित किए गए है।आईआईटी भुवनेश्वर ही क्यों? ओडिशा को हाल ही में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दो सेमीकंडक्टर परियोजनाओं के लिए मंजूरी मिली है। इनमें से एक सिलिकॉन कार्बाइड आधारित मिश्रित सेमीकंडक्टर के लिए एक एकीकृत केंद्र है। दूसरी उन्नत 3डी ग्लास पैकेजिंग केंद्र है। आईआईटी भुवनेश्वर में पहले से ही सिलिकॉन कार्बाइड अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र है। इस नई प्रयोगशाला से मौजूदा क्लीनरूम सुविधाओं में वृद्धि होगी। इससे भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग को सहयोग देने के लिए अनुसंधान एवं विकास सुविधाएं प्राप्त होगी |नमो सेमीकंडक्टर लैब के बारे मेंइस प्रस्तावित प्रयोगशाला में सेमीकंडक्टर प्रशिक्षण, डिजाइन और निर्माण के लिए आवश्यक उपकरण और सॉफ्टवेयर उपलब्ध होंगे। उपकरणों की अनुमानित लागत 4.6 करोड़ रुपये और सॉफ्टवेयर की लागत 35 लाख रुपये है
Date: 07-10-25
कनाडा में टेरर फंडिंग
संपादकीय
आतंकवाद के वित्त पोषण पर कनाडा में जारी एक रपट में खुलासा हुआ है कि कम से कम दो खालिस्तानी चरमपंथी गुटों को कनाडा से वित्तीय सहायता मिल रही है। ‘2025 असेसमेंट ऑफ मनीलॉन्ड्रिंग एंड टेररिस्ट फाइनेंसिंग रिस्क इन कनाडा’ नाम से जारी इस रपट में जिन चरमपंथी समूहों के नाम दिए गए हैं, उनमें दो संगठन – बब्बर खालसा इंटरनेशनल और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन-भी शामिल हैं। चिंता की बात यह है कि ये संगठन गैर- लाभकारी और धर्मार्थ गतिविधियों के लिए धन बता कर उसका अपने मंसूबे पूरे करने में इस्तेमाल करते हैं। इस रपट के सनसनीखेज खुलासे से नई दिल्ली के इन दावों की पुष्टि होती दिख रही है कि कनाडा में खालिस्तान समर्थक तत्व विना रोक-टोक के भारत विरोधी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। यह कोई पहली रपट नहीं है जिसने आंख खोल देने वाले खुलासे किए हैं। इससे पहले ओटावा की खुफिया एजेंसी ने भी 1980 के दशक में जारी अपनी एक रपट में खुलासा किया था कि कनाडा में राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक चरमपंथ का खतरा खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा भारत के पंजाब में खालिस्तान नाम से स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए हिंसक तरीकों का इस्तेमाल करने की कोशिश के तहत उत्पन्न हुआ था। इसके बाद कनाडा सरकार ने भी एक रपट जारी की जिसमें शंका जताई गई थी कि चरमपंथियों ने धार्मिकता का चोला ओढ़ लिया है। दरअसल, चरमपंथी संगठन, जिनमें हमास, हिज्बुल्ला जैसे मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं, अपनी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते हैं। बैंकिंग तंत्र के दुरुपयोग, क्रिप्टोकरंसी के इस्तेमाल के अलावा ये संगठन सरकारी वित्त पोषित नीतियों और कार्यक्रमों में भी सेंध लगा कर धन जुगाड़ने में पीछे नहीं रहते। धर्मार्थ और गैर-लाभकारी संगठनों का दुरुपयोग तो करते ही हैं, यहां तक कि आपराधिक गतिविधियों से भी धन जुटाते हैं। परेशानकुन यह कि ये संगठन कनाडा तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ब्रिटेन समेत कई देशों तक फैले हुए हैं। अलबत्ता, कनाडा में उग्रपंथी खालिस्तानी संगठनों के लिए मुफीद स्थिति इसलिए है कि वहां आबादी में काफी बड़ा हिस्सा सिखों का है, जो सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सरकार भी नरम रवैया अपनाती है। इतना कि भारत जैसे देशों से अपने संबंधों के विगाड़ तक की हद तक जा पहुंचती है।