अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर न्यायालय का विरोधी कदम
To Download Click Here.

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति को विनियमित करने के लिए केंद्र सरकार से दिशानिर्देश तैयार करने को कहा है।
मामले की पृष्ठभूमि –
कुछ हस्तियों ने सोशल मीडिया पर विकलांग व्यक्तियों पर अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। इसके विरोध में एक गैर-लाभकारी संस्था ने न्यायालय में याचिका दायर की थी।
न्यायालय का निर्देश कितना उचित –
- न्यायालय का यह कदम एक तरह से सरकार के उन वैधानिक प्रतिबंधों को बढ़ावा देता है, जिनसे वह नागरिकों के संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकारों को कमजोर करती है।
- अरूचिकर हास्य को न्यायालय और कार्यपालिका के नियमों के माध्यम से हल करने का प्रयास भी गलत है। प्रगतिशील लोकतंत्रों को ऐसे प्रयासों से बचना चाहिए।
- अभिव्यक्ति पर नियंत्रण की शक्तियों का विस्तार करने के परिणाम अच्छे नहीं होते हैं। इससे लोकतंत्र के लिए जरूरी सत्य और विचारों को दबा दिया जाता है।
- हाल के वर्षों में केंद्र ने सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स एण्ड डिजीटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में संशोधन किए हैं। इससे सरकार अगर चाहे, तो कुछ उपयोगकर्ताओं की पोस्ट पर सोशल मीडिया कंपनियों को कार्रवाई का अधिकार दे सकती है।
ज्ञातव्य हो कि न्यायालय के निर्देश उन मुद्दों को विस्तार ही देते हैं, जो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती के अधीन हैं। दूसरे, मीडिया और अभिव्यक्ति नियमों पर दुर्भावनापूर्ण प्रतिबंध लगाने वाली सरकार को अधिक शक्तियां सौपना अत्यंत खतरनाक हो सकता है। न्यायालय को अधिकारों के रक्षक की भूमिका निभानी चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 27 अगस्त, 2025
Related Articles
×