28-05-2022 (Important News Clippings)

28 May 2022
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The Aryan Lesson

Cops can’t defame, courts must follow evidence

TOI Editorials

Narcotics Control Bureau’s admission in its charge sheet in the drugs raid on a luxury cruise that no drugs were found on Aryan Khan calls for some rewinding to October last year when he was held in custody for nearly four weeks. Because going back will help us take note of two key issues. First, WhatsApp conversations of Aryan with an actress were leaked to the media to maliciously suggest that he was a drug trafficker. Before the purported “evidence” even reached court through a charge sheet, it was laundered in public.

The intent was clear: reputational damage and moulding public opinion against Aryan. This was utterly unconstitutional: it was a violation of the right to be deemed innocent before guilt is proven, right to a fair trial, right to reputation, and right to privacy. The buck stops with investigating officers for leaks and NCB’s ex-honcho Sameer Wankhede must be probed. It will also deter other cops from trying the same stunt.

The second aspect of Aryan’s case was the approach of courts. NCB’s candid admission now that Aryan wasn’t found with drugs was evident even then. Yet he was denied bail twice: by a magistrate’s court and a session’s court before the Bombay high court called the NCB’s bluff. In many cases custody isn’t necessary. Suspects can be questioned without the harsh optics of arresting them. What was done to Aryan Khan mustn’t happen again.


Sex as work

Laws should free consenting sex workers from stigma, and grant them rights


A long-standing demand of sex workers that their work be decriminalised has been partially fulfilled with the Supreme Court passing an order on May 19 that adult sex workers are entitled to dignity and equal protection under law. Directing the police to respect the rights of consenting sex workers, the Court observed that “… notwithstanding the profession, every individual … has a right to a dignified life under Article 21 of the Constitution”. It reiterated what the Court had ruled in Budhadev Karmaskar (2011), that sex workers are also entitled to a “life of dignity”. With the Trafficking of Persons (Prevention, Protection and Rehabilitation) Bill yet to see the light of day, the Court invoked powers under Article 142 to issue guidelines till the legislation is in force. In 2011, it had set up a panel to look at prevention of trafficking; rehabilitation; and conditions conducive for sex workers who wish to continue work. As the Court awaits the Government’s response to the panel’s recommendations that adult sex workers should not be “arrested or penalised or harassed or victimised,” a three-judge Bench led by Justice L. Nageswara Rao did well to direct the police to treat “all sex workers with dignity and should not abuse them, … verbally and physically, subject them to violence or coerce them into any sexual activity”. During the hearings, the Additional Solicitor General Jayant Sud had conveyed to the Court that the Government has “certain reservations” on some of the panel’s recommendations.

The Court has asked the Government to respond to the panel’s suggestions in six weeks. By holding that basic protection of human decency and dignity extends to sex workers and their children, the Court has struck a blow for the rights of an exploited, vulnerable section. Coming down heavily on the brutal and violent “attitude” of the police toward sex workers, the Court said “it is as if they are a class whose rights are not recognised”. It has asked State governments to do a survey of protective homes under the Immoral Traffic (Prevention) Act, the legislation governing sex work in India, to review the cases of “adult women” detained there and process their release in a time-bound manner. The ITP Act penalises acts such as running a brothel, soliciting in a public place, living off the earnings of a sex worker and living with or habitually being in the company of one. The Court’s general observations should help sensitise the police, media and society toward sex workers, who have generally been invisible and voiceless. The ball is in the Government’s court to draw up appropriate legislation to free consenting sex workers from stigma, and grant them workers’ rights. In that too, the Court suggested the Centre and States involve sex workers or their representatives to reform laws.


रूस के बाद अब चीन पर भी हमारी कूटनीति सटीक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )

टोक्यो में क्वाड (चौगुटे) की बैठक में अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के नेता शामिल क्या हुए, चीन के नेता बौखला उठे। उन्होंने कहा अमेरिका की कोशिश है कि चीन के विरुद्ध वैसा सैन्य-गठबंधन खड़ा कर ले, जैसा उसने रूस के विरुद्ध शीतयुद्ध के काल में किया था। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने यहां तक कह दिया कि यह संगठन समुद्री झाग की तरह शीघ्र ही गायब हो जाएगा। लेकिन ऐसा लग रहा है कि यह चौगुटा गायब होने के बजाय धीरे-धीरे मजबूत होता जा रहा है। यह ठीक है कि क्वाड के जो बीज डोनाल्ड ट्रंप ने डाले थे, वे अंकुरित होने के पहले ही झर गए थे लेकिन जो बाइडन ने अपनी इस टोक्यो-यात्रा के दौरान उन्हें पुष्पित-पल्लवित करने की पूरी तैयारी कर ली है।

इस बैठक में तय किया गया है कि ये चारों राष्ट्र मिलकर 50 अरब डॉलर खर्च करेंगे, ताकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जल-मार्गों की सुविधाएं जारी रह सकें और विभिन्न निर्माण-कार्यों को संपन्न किया जा सके। क्वाड के राष्ट्र संयुक्त वक्तव्य में चीन का नाम तो नहीं लेते हैं लेकिन वे यह कह देते हैं कि वे चीनी समुद्र में मुक्त आवागमन व परिवहन का समर्थन करेंगे। इस मामले में वे किसी की दादागीरी व अड़ंगेबाजी के खिलाफ हैं। यह चीन को दी गई चुनौती है। चारों राष्ट्रों के नेताओं ने यूएन घोषणा पत्र का हवाला देते हुए किसी भी राष्ट्र की सम्प्रभुता के उल्लंघन की निंदा की है। इशारा यूक्रेन और ताइवान की तरफ था। बाइडन ने ताइवान की रक्षा का जो बयान अलग से दिया था, वह चीन को खुली चेतावनी था लेकिन बाद में अमेरिकी प्रवक्ता ने उस पर लीपापोती कर दी। जैसे यूक्रेन को नाटो की सदस्यता के लिए पहले उकसाकर आज अकेला छोड़ दिया गया है, वैसे ही अमेरिका ताइवान पर भी कोरी गीदड़-भभकियां देता हुआ रह सकता है, हालांकि ताइवान दुनिया की 92 प्रतिशत सेमिकंडक्टर चिप्स बनाता है, जिसके रुकने पर सारे विश्व की अर्थव्यवस्था पर भारी कुप्रभाव हो सकता है।

अपने संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने रूस का नाम नहीं लिया, यह भारत की कूटनीतिक विजय है। इन तीनों देशों के नेता जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले तब क्या उन्होंने जोर नहीं दिया होगा कि यूक्रेन पर हमले के लिए भारत रूस की भर्त्सना करे? लेकिन यह भारत की सफलता है कि वह इन तीनों राष्ट्रों के रूस-विरोधी शाब्दिक-युद्ध में शामिल नहीं हुआ। सारे नाटो राष्ट्र यूक्रेन की रक्षा के लिए कुछ क्यों नहीं करते? अमेरिका समेत सभी नाटो राष्ट्र रूस पर शब्दबाण चला रहे हैं लेकिन भारत उनका पिछलग्गू नहीं बना है।

यह ठीक है कि पिछले 2-3 साल में भारत-चीन सीमा-विवाद ने छुटपुट सैन्य मुठभेड़ का रूप ले लिया लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। चीन के साथ भारत की हजारों मीलों की सीमा लगी हुई है जबकि क्वाड के तीनों देशों में से किसी की भी सीमा चीन को नहीं छूती है। इसके अलावा चीन के साथ भारत के जैसे संबंध हैं, उनकी तुलना में इन राष्ट्रों के संबंध कहीं अधिक घनिष्ठ हैं। चीन के साथ भारत का व्यापार इधर बढ़कर 120 अरब डॉलर का हो गया है लेकिन जापान का 317 अरब, ऑस्ट्रेलिया का 250 और अमेरिका का 151 अरब डॉलर का है। जब चीन से शेष तीनों राष्ट्र इतना फायदा उठा रहे हैं, तब भारत इनके उकसावे पर चीन से क्यों भिड़ने लगे?

इसीलिए भारत ने बार-बार कहा है कि वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सर्वसमावेशी संबंध चाहता है। वह किसी देश के विरुद्ध सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा है। उस क्षेत्र को हिंद-प्रशांत क्षेत्र कहकर उसमें ‘हिंद’ इसीलिए जोड़ा गया है कि भारत को चीन के प्रतिद्वंद्वी की तरह इस्तेमाल किया जा सके। वरना इस क्षेत्र को या तो सुदूर-पूर्व या पूर्व एशिया ही कहते थे। जिसे किसी जमाने में ‘इंडियन सब-कांटिनेंट’ कहा जाता था, उसे आजकल ‘दक्षिण एशिया’ क्यों कहा जाता है? इसीलिए कि अमेरिका ने शीतयुद्ध के दौरान यह नाम बदला, क्योंकि पाकिस्तान को यह पसंद नहीं था।

बाइडेन ने टोक्यो में नए आर्थिक संगठन की घोषणा की है, जो इस क्वाड को मजबूत कर सकता है। 13 राष्ट्रों के इस क्षेत्रीय संगठन में वे 11 राष्ट्र भी शामिल हैं, जो उस ‘विशाल क्षेत्रीय भागीदारी मंच’ (आरसीईपी) के सदस्य हैं, जिसका सबसे प्रमुख देश चीन है। भारत भी इसका सदस्य था लेकिन भारत ने सदस्यता छोड़ दी है। चीन के बिना बन रहे इस नए संगठन में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।


पर्यटन विकास की संभावना


उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार दीर्घकालिक योजनाओं की दिशा में काम करती दिख रही है। निश्चित तौर पर यह अच्छा सोच है, बशत्तें कि ईमानदारी के साथ इन प्रयासों को आगे बढ़ाया जाए। इस आशंका को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि पर्यटन को लेकर राज्य सरकारों का अभी तक का दृष्टिकोण रहा, उसमें यह सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। खैर, अब फिर से पर्यटन चर्चा का विषय बन रहा है। राज्य सरकार पर्यटन को लेकर न केवल उत्साहित है, बल्कि इस दिशा में गंभीरता के साथ आगे बढ़ते का इरादा जाहिर कर रही है। कोई शक नहीं कि पर्यटन के लिहाज से उत्तराखंड में संभावनाएं बहुत हैं। तीर्थाटन को देखें तो इसका अपने आप में बड़ा आकर्षण है। साहसिक पर्यटन के लिए देश-विदेश के लोग उत्तराखंड आना ज्यादा पसंद करते हैं। यहां की सुरम्य वादियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। स्थिति यह कि राज्य में अब परे साल पर्यटकों की आवाजाही रहने लगी है। सप्ताहांत पर्यटन (वीकेंड टूरिज्म) की नई अवधारणा तेजी से विकसित हो रही है। अच्छी बात यह कि राज्य सरकार इन स्थितियों को समझ रही है और पर्यटन विकास की योजनाओं का ताना-बाना इनके इर्द-गिर्द बुन रही है। देवभूमि में हेली सेवाओं के विस्तार को इससे जोड़कर देखा जा सकता है। प्रदेश में 31 नए हेलीपड बनाए जा रहे हैं। 51 हेलीपेंड पहले से मौजूद हैं| चूंकि अभी प्रदेश के भीतर हवाई सेवाएं सेवाएं सीमित हैं। उड़ान योजना के तहत ही छह शहरों के लिए हेली सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। तीर्थाटन के लिहाज से देखें तो केदारनाथ और हेमकुंड साहिब के लिए ही हेली सेवा संचालित हो रही हैं। नए हेलीपैड बनने के बाद हवाई सेवाओं को विस्तार मिलेगा। राज्य ज्य सरकार उच्च हिमालवयी क्षेत्रों में साहसिक खेलों को बढ़ावा देकर पर्यटन के नए द्वार खोलने की प्रतिबद्धता जाहिर कर रही है। सरकार की मंशा में कोई खोट नजर नहीं आता है, लेकिन किंतु-परंतु की गुंजाइश बनी हुई है। क्योंकि राज्य गठन के बाद से अब तक पर्यटन विकास को लेकर जितनी बातें सरकारों के स्तर पर हुईं, उनका क्रियान्वयन उस रूप में होता नहीं दिखा। उम्मीद है कि सरकार पिछले अनुभवों से सीख लेगी, विफलता के कारणों की तह में जाएगी और इसमें सुधार करते हुए भावी योजनाओं के लिए प्रभावी व्यवस्था करेगी।


चौटाला को सजा


आय से अधिक संपत्ति के मामले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को चार साल की कैद की सजा हुई है। साथ ही पचास लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। चौटाला को मिली सजा इस बात का कड़ा संदेश है कि भ्रष्टाचार के मामलों में चाहे कोई कितना ही बड़ा और ताकतवर क्यों न हो, कानून सबके लिए समान है। यह भी कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में नरमी के लिए कोई जगह नहीं है। गौरतलब है कि इससे पहले भी चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले में भी लंबी सजा काट चुके हैं। जैसा कि आरोपपत्र में सीबीआइ ने बताया, चौटाला ने अपनी आय से एक सौ नवासी गुना से भी ज्यादा ज्यादा संपत्ति हासिल कर ली थी। यह हैरानी पैदा करने वाली बात है। निश्चित ही ये संपत्तियां चौटाला ने अपने पद पर रहते हुए बनाई होंगी और इन्हें हासिल करने के लिए उन्होंने वह सब कुछ किया होगा जो सिर्फ नैतिक रूप से ही नहीं, कानूनी तौर पर भी गलत था। लेकिन तब वे सत्ता के मद में थे और यह भूल बैठे थे कि उनके ऊपर कानून का शासन है। हालांकि चौटाला अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में सजा मिली है। तमिलनाडु की पूर्व और दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा आदि भी भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट चुके हैं।

भारत में बड़े पदों पर भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। चाहे राजनीति हो या प्रशासन, ऐसे मामले उजागर होते ही रहते हैं। सीबाआइ, प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजंसियों से लेकर राज्यों के अपने भ्रष्टाचार निरोधक विभाग तक मामले दर्ज करते रहते हैं। लेकिन देखने में यह आता है कि भ्रष्टाचार के मामले तार्किक नतीजों तक कम ही पहुंच पाते हैं। ज्यादातर मामलों में नेताओं-अधिकारियों के रसूख की वजह से ऐसे मामले दबा दिए जाते हैं। कई मामलों में पर्याप्त सबूत नहीं होने की वजह से आरोपी दोषी साबित नहीं हो पाते। ऐसा भी देखने में आता रहा है कि जांच एजंसियां भी उतनी तत्परता के साथ आगे नहीं बढ़ पातीं, जितनी उनसे उम्मीद की जाती है। चौटाला का ही उदाहरण लें। सीबीआइ ने 2005 में मामला दर्ज किया था और आरोपपत्र दाखिल हुआ 2010 में। अगर किसी मामले में आरोपपत्र दाखिल होने में ही पांच साल लग जाएं तो यह व्यवस्था पर कम बड़ा सवाल नहीं है।

भ्रष्टाचार को लेकर पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य सरकारें कड़ा रुख अपनाने का दावा करती दिखी हैं। भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों में भी जागरूकता बढ़ी है। फिर भी ऐसे मामलों का बढ़ना गंभीर बात है। इससे तो लगता है कि हमारी व्यवस्था इस समस्या के आगे हाथ खड़े कर चुकी है। वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत की स्थिति हालात बताने के लिए काफी है। भ्रष्टाचार चाहे नौकरशाही में हो या राजनीति में, उसकी कीमत आम जनता को ही चुकानी पड़ती है। भ्रष्टाचार के मामले तो आए दिन सामने आते रहते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इनमें से ज्यादातर तो औपचारिक तौर पर दर्ज भी नहीं होते। फिर भ्रष्ट मानसिकता से ग्रस्त सेवकों के भीतर यह दंभ भी भरा होता है कि वे कानून से ऊपर हैं और चाहे जो कर सकते हैं। हाल में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भ्रष्टाचार के मामले में अपने स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त कर मिसाल पेश की है। दूसरे राज्यों में भी मुख्यमंत्री ऐसा ही साहस दिखाएं तो निश्चित तौर पर इस समस्या से पार पाया जा सकता है।


अमेरिका की बंदूक संस्कृति

अभिषेक कुमार सिंह

दुनिया का सबसे ताकतवर और विकसित राष्ट्र होने का दावा करने वाला अमेरिका इन दिनों घरेलू हिंसा से जूझ रहा है। वैसे तो इस मुल्क में नस्लीय हिंसा और स्कूलों व धार्मिक स्थलों से लेकर सार्वजनिक जगहों पर गोलीबारी की घटनाएं आम हैं, लेकिन पिछले कुछ समय में इनमें जिस तेजी से इजाफा होता जा रहा है, उसने अमेरिकी प्रशासन और समाज दोनों को हिला दिया है। हाल में टेक्सास प्रांत के एक स्कूल में अठारह वर्षीय किशोर ने गोलियां बरसा कर उन्नीस बच्चों और दो शिक्षकों को मार डाला। ऐसे में एक बार फिर यह सवाल सामने है कि आखिर यह हिंसा क्यों हो रही है? क्या इसीलिए कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत जनता को हथियार रखने की इजाजत मिली हुई है? अगर ऐसा है तो क्यों नहीं इस कानून को खत्म कर दिया जाए? आखिर कैसे मुक्ति पाई जाए इस बंदूक संस्कृति से?

अमेरिका में बंदूक संस्कृति की नींव सन 1791 में ही पड़ गई थी। उस वर्ष किए गए संविधान के दूसरे संशोधन में नागरिकों को छोटे हथियार खरीदने और रखने का अधिकार दिया गया था। तब अमेरिका ब्रिटिश शासन के अधीन था और वहां कोई स्थायी सुरक्षाबल नहीं था। इसलिए सरकार और प्रशासन ने तय किया कि आम लोगों को अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार रखने का अधिकार दिया जाए। लेकिन इस अधिकार ने वहां कितनी समस्याएं पैदा कर दी हैं, इसका अंदाजा पचपन साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बेंस जानसन के दौर में लग गया था। तब अमेरिका में करीब नौ करोड़ बंदूकें आम लोगों के पास थीं। हथियार के मामले में आत्मनिर्भर लोगों के कारण समाज में पैदा हो रही समस्याओं के मद्देनजर ही लिंडन बेंस को यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि अमेरिकी समाज में बंदूकों के कारण हो रही मौतों के पीछे विरासत और संस्कृति का लापरवाह रवैया है। बंदूकों, राइफलों और रिवाल्वर जैसे छोटे हथियारों की यह आत्मनिर्भरता कितना घातक रूप धारण कर चुकी है, इसका उदाहरण सिर्फ इसी वर्ष (2022) में अब तक ऐसी सत्ताईस घटनाओं का घटित होना है।

कानून के तहत छोटे हथियार रखने के इस अधिकार के तहत अमेरिका में प्रत्येक सौ नागरिकों के पास एक सौ बीस से ज्यादा हथियार हैं। स्विटजरलैंड की संस्था स्माल आर्म्स सर्वे ने चार साल पहले आकलन पेश किया था कि अमेरिका की तेंतीस करोड़ की आबादी में नागरिकों के पास मौजूद छोटे हथियारों की संख्या करीब चालीस करोड़ तक पहुंच चुकी है। इसी से जुड़ा एक आकलन यह भी है कि दुनिया की छियालिस फीसद बंदूकें तो अकेले अमेरिकियों के पास हैं, जबकि आबादी के मामले में अमेरिका का योगदान सिर्फ पांच फीसद है। उल्लेखनीय यह भी है कि अमेरिका के सिवाय ग्वाटेमाला और मैक्सिको दो और देश हैं जहां जनता को संवैधानिक अधिकार के तहत बंदूकें रखने का हक दिया गया था। हालांकि इन दोनों देशों में भी कम ही नागरिकों के पास हथियार हैं। ऐसा इसलिए है कि ग्वाटेमाला और मैक्सिको में छोटे हथियार खुलेआम नहीं बेचे जाते। मैक्सिको में तो बंदूक बेचने वाली ऐसी सिर्फ एक ही दुकान है और उस पर भी सेना का नियंत्रण है। जबकि अमेरिका में तो ऐसी सैकड़ों दुकानें हैं जहां से बंदूकें फल-सब्जी की तरह खरीदी जा सकती हैं। हथियार खरीदने के लिए वहां लोगों को अपने नाम, पते, जन्मतिथि और नागरिकता की जानकारी देनी होती है। ये हथियार किसने खरीदे, इस जानकारी को संघीय जांच ब्यूरो से साझा किया जाता है जो खरीदार की पृष्ठभूमि जांचने के अलावा सिर्फ यह सुनिश्चित करता है कि कोई खतरनाक अपराधी, नशेड़ी या भगोड़ा अथवा मानसिक रोगी व्यक्ति ऐसा हथियार न खरीद ले।

गौरतलब है कि कोरोना काल में समाज में पैदा हुए खौफ के कारण अमेरिकियों ने ऐसे हथियार और भी ज्यादा संख्या में खरीदे। एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2019 से अप्रैल 2021 के बीच वहां पचहत्तर लाख वयस्कों ने पहली बार बंदूक खरीदी। हाल के दो-ढाई वर्षों में अमेरिका में और एक करोड़ दस लाख लोगों के पास बंदूकें आ गईं, जिनमें करीब पचास लाख खरीदार तो नाबालिग ही थे। ऐसे हथियार खरीदारों में से आधी संख्या महिलाओं की भी रही, जो यह दर्शाता है कि महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए वहां की पुलिस और कानून पर ज्यादा भरोसा नहीं कर पा रही हैं।

लेकिन हथियारों की यह खरीदारी अमेरिकी समाज और सरकार के लिए कितनी गंभीर समस्या बन गई है, इसे 1968 से 2017 के बीच गोलीबारी में हुई पंद्रह लाख मौतों के संदर्भ से समझा जा सकता है। ये बंदूकें दूसरों की जान लेने के काम ही नहीं आ रहीं, बल्कि आत्महत्याओं के इजाफे का सबब भी बन रही हैं। यूएस सेंटर्स फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) का आकलन बताता है कि वर्ष 2020 में अमेरिका में जो पैंतालीस हजार मौतें बंदूकों से हुई गोलीबारी की वजह से हुईं, उनमें आधे से ज्यादा यानी चौवन फीसद मामले आत्महत्या के थे। इस चिंता को अमेरिका में वर्ष 2016 में कराए गए एक अध्ययन में पहले ही प्रकट कर दिया था कि वहां आत्महत्या की बढ़ती दर के पीछे अहम कारण हर घर में बंदूक की मौजूदगी है। स्पष्ट है, जब हथियारों का इतना बड़ा जखीरा किसी देश और समाज में खुलेआम मौजूद होगा, तो उससे जुड़े खतरे भी उतने ही बड़े होंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भले ही ऐसी घटनाओं पर चिंता जताई है और सवाल उठाए हैं, पर इसका एक सच यह है कि वहां मौजूद इस बंदूक संस्कृति को बड़े पैमाने पर राजनीतिक संरक्षण हासिल है। अमेरिकी राजनीति में ऐसे कुछ गुट सक्रिय हैं जो बंदूकों की खुलेआम खरीद-फरोख्त जारी रखने के लिए भारी राजनीतिक दबाव बनाए रखते हैं। नेशनल राइफल एसोसिएशन नामक यह समूह इतना ताकतवर है कि पैसे के बल पर अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को प्रभावित करने में कामयाब हो जाता है। कहा तो यह भी जाता है कि यह समूह अमेरिकी चुनावों तक में भारी पैसा झोंकता है। यही वजह है कि संबंधित कानून में फेरबदल की इच्छा और ऐसी कोशिशें सिरे नहीं चढ़ पाती हैं, जबकि खुद अमेरिकी जनता इससे जुड़े कानून में बदलाव की हिमायती है। गौरतलब है कि दो साल पहले वहां कराए गए एक सर्वे में बावन फीसद लोगों ने बंदूकों की खरीद-फरोख्त संबंधी कानून में सख्ती अपनाने के पक्ष में वोट किया था। राजनीतिक दल डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों में से इनक्यानवे फीसद ने भी ऐसी सख्ती की हिमायत की थी, जबकि रिपब्लिकन पार्टी की ओर से सिर्फ चौबीस फीसद ही ऐसी सख्ती के समर्थन में थे। कानून में कोई तब्दीली नहीं चाहने वालों का प्रतिशत सिर्फ पैंतीस था।

एक अहम प्रश्न यह है कि अमेरिका में आखिर लोग पुलिस-प्रशासन पर भरोसा क्यों नहीं करते? उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि किसी भी अपराध से खुद को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा उपाय खुद के पास हथियार रखना ही है? एक साल पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने इस सवाल का जवाब पाने के लिए जो सर्वेक्षण कराया था, उसमें सामने आया था कि यह समस्या खुद अमेरिकियों को भी काफी परेशान कर रही है। बंदूक से जुड़ी हिंसा देश के बजट घाटे (49 फीसदी), हिंसक अपराधों की दर (48 फीसदी) और कोरोना वायरस संकट (47 फीसदी) जितनी ही बड़ी है। चूंकि इन सभी समस्याओं से पार पाने में सरकारें निरंतर विफल हो रही हैं, इसलिए जनता का भरोसा प्रशासन और सरकार से उठता जा रहा है। इसी वजह से वे बंदूकों की शरण में जा रहे हैं।


हिंदी साहित्य की एक दमदार वैश्विक दस्तक

वीरेंद्र यादव, ( प्रसिद्ध आलोचक )

गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेजी अनुवाद टूम ऑफ सैंड को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिया जाना हिंदी सहित समूचे भारतीय साहित्य के लिए गौरव का क्षण है। यह पहली बार है कि मूल रूप से भारतीय भाषा में लिखे गए एक उपन्यास को यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। अपने कहन व कथन में गीतांजलि श्री मौलिक मुहावरे की कथाकार हैं। उनका विषय-विस्तार कस्बे की देशजता के साथ-साथ वैश्विक सरोकारों से युक्त है। देश में सांप्रदायिकता की विभाजक मनोदशा, स्त्री-नियति से लेकर विश्वस्तरीय आतंकवाद, सब कुछ उनकी रचनात्मक चिंता में शामिल रहा है।

पुरस्कृत उपन्यास रेत समाधि की कथा मां-बेटी के जिस स्त्री-युग्म के माध्यम से रची गई है, वह उत्तर भारतीय हिंदी समाज की पुरुष-सत्ता का विलोम है। स्त्री-युग्म का इस्तेमाल गीतांजलि ने पहले भी अपने उपन्यास माई और तिरोहित में किया है। रेत समाधि में वह अपनी कथायुक्ति के माध्यम से सहज रूप से स्वीकृत पुरुष आधिपत्य और स्त्री की अदृश्यता को दृश्यमान करती हैं। पति के न रहने पर जिस वृद्धा मां को परिवार की मुखिया होना था, उसकी ओर परिवार द्वारा पीठ दिखाने के विरुद्ध मां का दीवार की ओर मुंह कर लेना और फिर ‘नहीं उठूंगीं’ से लेकर ‘नई उठूंगीं’ तक का रूपांतरण यथार्थ और कला का खिलंदड़ा सहमेल है। मां का इस नई स्त्री में तब्दील होना और बेटी का इस प्रक्रिया में निमित्त होना पुरुषप्रधान समाज की सरहद का अतिक्रमण है। सरहद इस उपन्यास का बीजपद है। उपन्यास कथा में मां परिवार की सरहद ही नहीं, देश की सरहद के पार जाकर भी विभाजन पूर्व के दिनों को नाटकीय घटनाक्रम के रूप में जीती है।

दरअसल, यह उपन्यास कथावस्तु में कई सरहदों को तोड़ता है। ये सरहदें घर, परिवार, समाज, धर्म, परंपरा, लिंग से लेकर देश की सरहद के पार तक विस्तृत है। आधुनिक मध्यवर्गीय परिवार के मूल्यगत विघटन की कथा कहते हुए वह अपने वर्ग की रक्षक की भूमिका में न होकर उसकी निर्मम आलोचना करती हैं। वह औपनिवेशिक आधुनिकता की आलोचना के बरक्स देशज आधुनिकता का औपन्यासिक विमर्श न रचकर भारतीय सामंती समाज की आधुनिकता की फांक को उजागर करती हैं। वह अपनी कथा-प्रविधि में दीवार और दरवाजा सरीखी निर्जीव वस्तुओं को भी जिन कथा उपादानों में तब्दील कर देती हैं। इस कथा में किन्नर भी शामिल है और हाशिये का सामाज भी अपनी विविधता और बहुलता के साथ।

वह अपनी कथा का जो मौलिक मुहावरा रचती हैं, वह अभ्यस्त रुचि के पाठकों से किंचित मशक्कत की चाहत रखता है। दो राय नहीं कि गीतांजलि सरल मुहावरे की कथाकार नहीं हैं। उनकी कथा जितनी मुखर है, उसमें शब्दों के बीच उतने ही मौन और संकेत हैं। यह साहित्य का भिन्न आस्वाद है। इन्हें न ग्रहण कर पाना अभिव्यक्ति की दुरूहता न होकर पाठकीय अधैर्य अधिक है। दरअसल, अब वैश्विक स्तर पर उपन्यास जिन प्रविधियों को अपना रहा है, उसमें यथार्थ और कला का जो नया रूप उभर रहा है, वह गंभीर पाठ की चाहत रखता है।

बुकर पुरस्कार की ज्यूरी ने इसे उचित ही भारत का बेहतरीन उपन्यास बताते हुए देश-विभाजन से जोड़ा। इसकी बहुस्वरता और बहुस्तरीयता का स्वीकार हिंदी कथा संरचना के नवोन्मेष की स्वीकृति है। वर्तमान विभाजनकारी समय में रेत समाधि विघटन के विरुद्ध एक रचनात्मक हस्तक्षेप है। यह भी सुखद है कि सत्ता संरचना का यह प्रति-विमर्श जिस उल्लास और उम्मीद के मुहावरे में अभिव्यक्त हुआ है, वह हिंदी उपन्यास की नई सामर्थ्य का द्योतक है। गीतंजलि श्री द्वारा पुरस्कार स्वीकार करते हुए यह कहना कि इस पुरस्कार का मिलना ‘उदासी और अवसादयुक्त’ भी है, उपन्यास के निहितार्थ को उजागर करता है। रेत समाधि एक ऐसे शोकगीत सरीखा है, जहां अवसाद के बीच उम्मीद की किरण भी है। यह जिस समाज का उपन्यास है, वह एकरंगी न होकर बहुरंगी है। यहां हर्ष-विषाद, संपन्नता और विपन्नता का सहमेल है।

यह पुरस्कार हिंदी के साथ-साथ समूचे दक्षिण एशिया के साहित्य के लिए एक अच्छी शुरुआत इसलिए भी है कि इस समूचे भूभाग का जीवन, संस्कृति और उसका साहित्य अभी तक वृहत्तर दुनिया से ओझल रहा है। अपने इस उपन्यास के माध्यम से गीतांजलि श्री ने इस सरहद का भी विस्तार किया है।

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