17-02-2023 (Important News Clippings)

17 Feb 2023
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Scottish Lesson

Pull of regional identities needs to be managed by better federalism

TOI Editorials

Scottish First Minister Nicola Sturgeon stepping down from her post marks a pivotal moment in British politics. The development should subdue Scottish nationalism and the desire to separate from the British Union – at least for the time being. Recall that Sturgeon had become the leader of the Scottish Nationalist Party (SNP) in the wake of the 2014 independence referendum when Scotland narrowly voted 55-45% to remain part of the UK. That result had boosted Scottish nationalists. But the UK Supreme Court recently blocked her plans for a fresh referendum and the next SNP leader has to rethink the way forward.

The larger story is that despite significant devolution of powers to Scotland within the UK, large sections of the Scottish population still feel their aspirations haven’t been met and the Union remains very English. For example, during the Brexit referendum despite every council in Scotland voting to remain in EU, the region had no choice but to follow the rest of the Union in leaving the European bloc. At the same time, studies have shown that even if it were to join EU afterwards, independence would leave Scotland significantly poorer than staying in the UK.

This larger story is playing out in many countries where different ethnicities or regions or languages etc have different voices and the Centre has to simultaneously reach out to all parts of the Union to hold it together and keep it strong. An overwhelming hold over power by one section of the republic gives oxygen to regional grievances. Case in point in India is the language issue where states like Tamil Nadu protest the centralised promotion of Hindi. The key to addressing regional grievances is better federalism, not lesser.


How to Mainland The Periphery

ET Editorials

The Cabinet’s decision to allocate ₹48,000 crore for the Vibrant Villages Programme over the next three years will help improve the pace of development in areas near the border and have long been neglected. Its two pillars — infrastructure and economic opportunities — will create linkages between the so-called ‘periphery’ and the ‘mainland’. Engagement with local communities, ensuring their participation in all facets of the infrastructural as well as ‘nation-maintenance’ project will determine its success. This intervention is important from the strategic-security perspective and in ensuring an inclusive society.

The programme will be rolled out in villages beyond the 10 km border zone in 19 districts and 46 border blocks across four states and one Union territory. While there will be no overlaps with the Border Area Development Programme, the two programmes must be complementary. Neglect of these regions has pushed most of the local population out in search of jobs and opportunities. There should be focus on economic opportunities in the area, job creation and rooting out bad actors to reinvigorate the surrounding areas. Creating linkages through improved infra with the rest of the country will help improve access and exchanges. Earmarking half of the allocation for physical and social infrastructure is a step in the right direction. Working with local communities to help them actualise economic opportunities will improve engagement.

Implementation will require ensuring adequate trained as well as sensitised personnel who can create a long-term, sustainable pathway for the future. But, first, to be successful, the programme must be collaborative and participatory. Neglect must not be replaced with diktats.


क्या आर्थिक मॉडल को बदलने की जरूरत है?


यूयूएन सामाजिक विकास शोध संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया कि हाल के वैश्विक स्वास्थ्य संकट के कारण दुनिया के दस अमीरों की संपत्ति दूनी हो गई जबकि 12 करोड़ लोग अति-गरीबी वाले वर्ग की गर्त में समा गए। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना काल में हर 30 घंटे में एक नया डॉलर अरबपति (7 हजार करोड़ रुपए) पैदा हो रहा था। भारत में भी कोरोना के दौरान एक उद्योगपति की संपत्ति हर घंटे 90 करोड़ रुपए बढ़ रही थी। ऑक्सफैम की विगत माह प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत के एक प्रतिशत पूंजीपतियों के पास सन् 2021 में ( जब कोरोना का चरम था) देश की 40.5 प्रतिशत पूंजी थी। ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट’ (डार्विन ने फिटेस्ट शब्द का प्रयोग किया था) शीर्षक की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में सन् 2012 से 2021 तक जो पूंजी निर्मित हुई उसमें 40 प्रतिशत से ज्यादा केवल एक प्रतिशत लोगों के पास गई, जबकि केवल तीन फीसदी ही नीचे के 50 प्रतिशत के पास पहुंची। इसके ठीक उलट जीएसटी की आय का 64 प्रतिशत नीचे के इसी 50 प्रतिशत वाले लोग कर के रूप में देते हैं, जबकि ऊपर का 10 प्रतिशत वर्ग केवल चार प्रतिशत। शायद आर्थिक मॉडल का दोष है कि आज भी देश स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सोशल सेक्टर में अपेक्षित खर्च नहीं कर रहा है। इस आर्थिक मॉडल को बदलना अच्छे प्रजातंत्र की पहली शर्त है।


निर्यात को चाहिए नीतिगत मदद


केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को उचित ही कहा कि भारतीय निर्यातकों को वैश्विक घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए और अधिक ग्रहणशील होना होगा। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि 2021-22 में भारतीय निर्यातकों ने जो तेजी दर्ज की थी वह अब धीमी पड़ रही है। निर्यातकों को वैश्विक मांग में इजाफे से काफी मदद मिली क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था महामारी के कारण मची उथल-पुथल से निपट रही थी। अब जबकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सामान्य हो रही है, फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है। ऐसा आंशिक रूप से इसलिए हो रहा है कि बड़े केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक सख्ती अपना रहे हैं। हालांकि अब यह माना जा रहा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में बेहतर होगा लेकिन इसके बावजूद इसमें उल्लेखनीय कमी आने का खतरा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताजा अनुमानों के मुताबिक 2023 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 2.9 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल कर सकती है। यह आंकड़ा इससे पहले जताए गए अनुमानों से 20 आधार अंक अधिक है। माना जा रहा है की 2022 में विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.4 फीसदी रहेगी।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान यह भी है कि 2023 में वैश्विक व्यापार की वृद्धि महज 2.4 फीसदी रह जाएगी जबकि 2022 में यह 5.4 फीसदी थी। दुनिया की आर्थिक और व्यापारिक वृद्धि में आ रही कमी भारत के कारोबारी आंकड़ों में भी नजर आ रही है। बुधवार को जारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी माह में भारत का वाणिज्यिक निर्यात सालाना आधार पर 6.5 फीसदी कम हुआ जबकि मासिक आधार पर इसमें 4.5 फीसदी की कमी आई। अप्रैल से जनवरी तक की अवधि में निर्यात 8.5 फीसदी बढ़ा। ध्यान रहे 2021-22 में इसमें 40 फीसदी का इजाफा देखने को मिला था जिसके चलते वाणिज्यिक वस्तु निर्यात 422 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। चालू वर्ष में अब तक भारत ने 369.25 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया है। मौजूदा हालात में अनुमान तो यही है कि कुल निर्यात पिछले वर्ष से बहुत अलग नहीं होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि आयात में भी कमी आई है। ऐसा आंशिक तौर पर जिंस की कम कीमतों के कारण हुआ है। यही वजह है कि व्यापार घाटा भी एक वर्ष में सबसे निचले स्तर पर आ गया है।

चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 फीसदी के बराबर हो गया है और इस बात में भी चिंता बढ़ाई है। हालांकि इस में कमी आने की भी उम्मीद है। विश्लेषकों का मानना है कि पूरे वित्त वर्ष में यह सकल घरेलू उत्पाद के 3 फीसदी से कम रह सकता है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि भारत के सेवा निर्यात में लगातार मजबूती आ रही है और माना जा रहा है कि चालू वर्ष में अब तक है 30 फीसदी से अधिक बढ़ चुका है। बहरहाल सतर्क दृष्टिकोण और बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा कम लोगों को काम पर रखा जाना बताता है कि इस मोर्चे पर भी दबाव उत्पन्न हो सकता है। यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू खाते के घाटे की भरपाई को लेकर भरोसा जताया है लेकिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के विशुद्ध विक्रेता बन जाने से बाह्य खाते पर एक बार फिर दबाव उत्पन्न हो सकता है। इस पर नजर रखनी होगी।

नीतिगत स्तर पर जहां अनुमान यह है कि 2024 में वैश्विक व्यापार वापसी कर लेगा, वहीं भारत को निर्यात को गति देने के लिए एक मजबूत व्यापार नीति की आवश्यकता है। केंद्रीय बजट में टैरिफ में और इजाफा न करके अच्छा कदम उठाया गया लेकिन इसके साथ ही अनुमान यह भी था कि वह टैरिफ कम करके भारतीय कारोबारियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण में मदद करेगा। बहरहाल सरकार ने वह प्रक्रिया शुरू नहीं करने का निर्णय लिया। बल्कि व्यापार को लेकर ऐसा कुछ खास नहीं कहा गया जो समेकित मांग का बड़ा जरिया बने। व्यापार के मोर्चे पर संभावनाओं के दोहन के लिए यह आवश्यक है कि नीतियों को भी बदलती वैश्विक हकीकतों के अनुरूप बनाया जाए। ऐसा करके ही हम स्थायी रूप से उच्च वृद्धि और बेहतर निर्यात हासिल कर सकेंगे।


चैटजीटीपी पर दुनियाभर में मचा शोरशराबा

अजित बालकृष्णन, ( लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं )

चैटजीपीटी जैसे कृत्रिम मेधा आधारित उपायों के बारे में होने वाली तीखी बहसों को पढ़, देख और सुनकर मैं चिंतित हो जाता हूं लेकिन उन वजहों से नहीं जो आप सोच रहे होंगे। मैं इसलिए चिंतित हो जाता हूं कि मेरा देश यानी भारत हर उस मौके पर सामाजिक उथलपुथल का ​शिकार हो जाता है जब तकनीकी क्षेत्र में कोई बड़ी लहर आती है। हम एक ऐसे देश के बा​शिंदे हैं जहां लंदन में ​शि​​क्षित एक वकील को उस समय राजनीतिक अवसर नजर आया जब बिहार के सुदूर चंपारण जिले में नील की खेती बरबाद हुई। उसने इस बरबादी के लिए तत्कालीन ब्रि​टिश मालिकों द्वारा भारतीय श्रमिकों के शोषण को जिम्मेदार ठहराया जबकि हकीकत में इसकी वजह यह थी कि जर्मनी के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम नील तैयार कर ली थी। यह कृत्रिम नील चंपारण में उत्पादित होने वाली वास्तविक नील की तुलना में बेहद सस्ती थी। उसके बाद की कहानी हम सब जानते हैं: वह चतुर अ​धिवक्ता कौन था और कैसे उसने इस अवसर का इस्तेमाल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में किया।

जब भी मैं इस बात की चर्चा करता हूं तो मुझसे कहा जाता है कि मैं 1917 की बात कर रहा हूं और हम तब से बहुत आगे निकल आए हैं। तब मैं कहता हूं कि दशकों तक हमारी आजादी की लड़ाई के ध्वज के बीच में चरखा हुआ करता था जो दरअसल भारत के कपास बुनकरों और हथकरघों के लिए एक प्रोत्साहन और मशीन से होने वाली कताई-बुनाई के विरोध में था। यह ​स्थिति तब थी जब सबको पता था कि मशीनों से उत्पादित होने वाला कपड़ा भारतीयों के लिए काफी सस्ता था। यही कारण है कि मैं इन दिनों चिंतित रहता हूं।

इन दिनों जो बात क्रांति की तरह चर्चा में है वह है चैटजीपीटी। यह कंप्यूटर विज्ञान से जुड़ी क्रांति है जो किसी भी तरह के सवालों के ऐसे उत्तर तैयार करती है जैसे उन्हें किसी इंसान ने दिया हो। इस तकनीक को एनएलपी अर्थात नैचुरल लैंगुएज प्रोसेसिंग कहा जाता है। यह उसी प्रकार का काम करती है जिस प्रकार 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में रसायन विज्ञानियों ने प्राकृतिक नील के साथ किया था और कृत्रिम नील तैयार कर दी थी।

लेकिन हमें इस बात से चिंतित क्यों होना चाहिए? मुंबई में हर रोज जब मैं काम के लिए निकलता हूं तो मुझे भारतीय संस्कृति का एक और रुझान हमेशा याद आता है। ऐसा तब होता है जब मैं माहिम में शीतला देवी मंदिर के पास से गुजरता हूं।

भारत में सदियों तक स्मालपॉक्स यानी चेचक जैसी बीमारी के कारण हर साल 15 लाख लोगों तक की मौत होती रही। हम इससे बचने के लिए बस शीतला माता की पूजा करते रहे ताकि चेचक के खौफ से बच सकें। मुंबई के माहिम ​स्थित शीतला देवी मंदिर के अलावा उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में ऐसे अनेक मंदिर हैं। हालांकि देश में चेचक की रोकथाम इन मंदिरों में की गई प्रार्थनाओं की बदौलत नहीं हुई ब​ल्कि 20वीं सदी के आरंभ में मिली वैज्ञानिक सफलता की बदौलत शुरू हुए टीकाकरण ने इस बीमारी से निजात दिलाई।

बहरहाल देश में शीतला देवी के मंदिर निरंतर फल-फूल रहे हैं। हैजा, प्लेग और सैकड़ों अन्य बीमारियों के इलाज में सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने व्यव​स्थित तरीके से इन बीमारियों की वजह का पता लगाया और इलाज तलाश किया।

नैचुरल लैंगुएज प्रोसेसिंग में भी वैसे ही प्रयोग और नवाचार हो रहे हैं। प्रयोगों का यह सिलसिला अब उत्पादन स्तर पर पहुंच गया है जिसे जीपीटी नामक तकनीकों के समूह (पूरा नाम जेनेरेटिव प्री-ट्रेन्ड ट्रांसफॉमर्स) के रूप में जाना जाता है। यहां मूल बात प्री-ट्रेन्ड अर्थात पूर्व प्र​शि​क्षित है। एक समांतर उदाहरण भी है: जब आपके पास वाहन चलाने का लाइसेंस हो और आप एक नए मॉडल की कार चलाने जाएं तो आप पहले से सीखे गए कौशल का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वाहन चलाने का पहले लिया गया प्र​शिक्षण आपको बताता है कि कब ए​क्सिलरेटर दबाना है, कब ब्रेक लगाना है और कब गियर बदलना है।

कंप्यूटर विज्ञान की दुनिया ने बीते दो-तीन सालों में अपने अलगोरिद्म को पहले से प्र​शि​​क्षित करना सीख लिया है जिससे वह एक खास पैटर्न का अनुकरण कर लेती है और सहज बुद्धि लगाकर अंदाजा लगा लेती है कि इसके बाद कौन से शब्द आ सकते हैं। इन रुझानों को सीखने के लिए उन्होंने विकिपीडिया और इंटरनेट पर मौजूद वि​भिन्न सामग्री का गहराई से अध्ययन किया है। ऐसा करके उन्होंने अपने अलगोरिद्म को इस प्रकार प्र​शि​क्षित किया है ताकि वे उन पैटर्न के आधार पर नई सामग्री तैयार कर सकें। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे हम एक बार कार चलाना सीख लेने के बाद नए मॉडल की कार भी आसानी से चला लेते हैं। उस ​स्थिति में अगर आप विदेश में भी कार चला रहे हों तो आपका म​स्तिष्क उस हिसाब से सुझाव देने लगता है। जीपीटी में जेनेरेटिव शब्द यहीं से आया है। उदाहरण के लिए चैटजीपीटी, जिसे लेकर इस समय चर्चाओं का बाजार गर्म है, उसने भी इंसानी भाषा के पैटर्न इसी तरह सीखे हैं। ऐसे जीपीटी के लाभ और उनकी लागत वैसी ही होगी जैसी कि बुनाई और कताई करने वाली मशीनों के लाभ और लागत तथा टीकों और जीन चिकित्सा की। जिस तरह बुनाई-कताई मशीनों ने कपड़ों को भारत के आम लोगों के लिए सस्ता किया और टीकों ने देश के आम लोगों को बीमारियों से निजात दिलाई उसी प्रकार जीपीटी भी ​शिक्षा, कानूनी सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं तथा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सेवाओं को सस्ता बनाएंगे और देश के आम लोगों के लिए मददगार साबित होंगे। लेकिन इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि ​शिक्षकों, अ​धिवक्ताओं, चिकित्सकों और कंप्यूटर प्रोग्रामर्स के लिए रोजगार और आय के अवसर सीमित हो जाएं।

इस एनएलपी क्रांति के बीच अगर हमें किसी बात को लेकर चिंतित होने की जरूरत है तो वह यह कि चैटबॉट आदि जिस प्रकार तैयार किए जाते हैं वे कई तरह के पूर्वग्रह समेटे हुए हो सकते हैं। इनमें नस्ली पूर्वग्रह हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अपराधों का अनुमान लगाने में, भर्ती के समय लैंगिक भेदभाव करने में और भारत की बात करें तो जाति आधारित पूर्वग्रह भी हो सकते हैं। अगर इन पर नजर नहीं रखी गई तो इनसे सामाजिक स्तर पर अशांति उत्पन्न हो सकती है और ऐसे तकनीक विरोधी आंदोलन शुरू हो सकते हैं जैसे हम अतीत में देख चुके हैं।


सरहद की सुरक्षा


सुरक्षा मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने विशेष रूप से चीन से लगती सीमा की सुरक्षा के लिए गठित भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की सात नई बटालियन के गठन को मंजूरी दे दी है। सीमा पर चीन की लगातार सैन्य आक्रामकता के बावजूद पिछले एक दशक में पहली बार आइटीबीपी की बटालियनों की संख्या में इजाफे का फैसला किया गया है। अब 1,808 करोड़ की लागत और कम से कम नौ हजार नए जवानों के साथ आइटीबीपी चीन से लगती 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर 47 नई सुरक्षा चौकियां बनाएगा और ये सभी अरुणाचल प्रदेश में होंगी। साथ ही पूर्वी लद्दाख तक हर मौसम में पहुंच के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद अहम नीमू-पदम-दारचा सड़क मार्ग पर सिनकुन ला सुरंग के निर्माण को भी मंजूरी दी गई है। लगभग 16,580 फुट की ऊंचाई पर बनने वाली इस सुरंग के दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाने के बाद पूर्वी लद्दाख के लिए इस सबसे छोटे बारहमासी रास्ते से सैन्य साजोसामान और रसद की तेजी से आपूर्ति आसान हो जाएगी। खास बात यह कि यह मार्ग चीनी और पाकिस्तानी तोपों की पहुंच से दूर है। इसके अलावा, समिति ने सीमाई गांवों के विकास और वहां से पलायन को रोकने के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम’ (वीवीपी) का एलान किया है।

ये तीनों फैसले सीमा पर चीनी आक्रामकता से निपटने के लिए सरकार की रणनीति की ओर इशारा करते हैं। इसके तहत सीमाई इलाकों के गांवों में संपर्क सुविधाओं को बढ़ाया जाएगा, ताकि वे सुरक्षा बलों की आंख और कान का काम कर सकें। आइटीबीपी के जरिए निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता बढ़ाने के साथ सैन्य साजोसामान और रसद की आपूर्ति के लिए सुरक्षित मार्गों का निर्माण होगा। अरुणाचल सीमा पर आइटीबीपी की सुरक्षा चौकियों और शिविरों के निर्माण से सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण इलाकों की निगहबानी और घुसपैठ की किसी भी कोशिश के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की क्षमता में इजाफा होगा। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘वीवीपी’ से सीमाई इलाकों में चीनी गतिविधियों के बारे में सूचनाओं का प्रवाह बढ़ेगा और इन गांवों में विकास से स्थानीय लोगों में भारत के प्रति भरोसा मजबूत होगा। सीमा पर अग्रिम सैन्य अड्डों तक हर मौसम में रसद की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सुरंगों का निर्माण भारत की प्राथमिकता है। ये सुरंगें सिर्फ आवाजाही के लिए नहीं, बल्कि गोला-बारूद, मिसाइल, ईंधन और खाने-पीने की चीजों के भंडारण के लिए भी उपयोगी हैं।

इसी के साथ सरकार को अब बारह किलोमीटर लंबी सासेर ला सुरंग के प्रस्तावित निर्माण को भी मंजूरी देने में देर नहीं करनी चाहिए, ताकि दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी मार्ग पर चीनी हमले या बमबारी की जद में आने की स्थिति में उत्तर पूर्वी लद्दाख की सबसे अग्रिम हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने का एक वैकल्पिक मार्ग कायम हो सके। यह स्वागतयोग्य है कि चीन सीमा को लेकर भारत सरकार अपने परंपरागत रक्षात्मक रुख से किनारा कर रही है। दशकों से तक सीमा पर सड़कों और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण को लेकर सरकारें आशंकित रही हैं। उनका मानना था कि युद्ध की स्थिति में चीनी फौज इन सड़कों पर कब्जा कर आवाजाही के लिए इनका इस्तेमाल कर सकती है। निश्चित रूप से अब वह स्थिति नहीं है। भारत अब सीमा पर सड़क मार्गों और सैन्य तैयारी में काफी आक्रामक तरीके से इजाफा कर रहा है। अगर चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ यानी छोटे-छोटे टुकड़ों में कब्जा करके कुछ सालों में इलाके का नक्शा बदल देने की रणनीति को विफल करना है तो सीमा पर निगरानी, संपर्क और सैन्य तैयारियां बढ़ाने का कोई विकल्प नहीं है।


भ्रष्टाचार के बदलते स्वरूप

ज्योति सिडाना

एक अच्छा लोकतंत्र वह है, जिसमें राजनीतिक और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की व्यवस्था भी है। इसमें नागरिक सर्वोपरि होता है। पर वर्तमान में पूंजीवाद के विस्तार के कारण बाजार सर्वोपरि हुआ है, जिसने नवउदारवादी व्यवस्था को उत्पन्न किया जो हस्तक्षेप की नीति की समर्थक है और राज्य के कल्याणकारी चरित्र को देश के आर्थिक विकास में बाधक मानती है। नवउदारवादियों का तर्क है कि राज्य को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि मुक्त व्यापार या खुले बाजार का समर्थन करना चाहिए। जब बाजार स्वतंत्र होगा तो देश का विकास भी तीव्र गति से होगा। राज्य का कार्य केवल नीति निर्माण करना है, सेवा कार्य करना नहीं। यानी सड़क, रेल, पानी, बिजली, स्वास्थ्य जैसे सेवा कार्य राज्य के कार्य नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए वह समर्थ लोगों या पूंजीपतियों, व्यापारियों पर कर लगाते हैं और उससे एकत्र धन को असमर्थ या गरीब लोगों के कल्याण और उत्थान पर खर्च करते हैं। राज्य को इस कार्य के लिए अपने और जनता के बीच मध्यस्थ की जरूरत होती है, परिणामस्वरूप प्रशासन-तंत्र का उभार होता है। प्रशासन-तंत्र जैसी औपचारिक व्यवस्था के कारण लालफीताशाही उत्पन्न होती है, जो भ्रष्टाचार का एक स्वरूप है। इन सबके कारण देश का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसलिए नवउदारवादी व्यक्ति की स्वतंत्रता और कल्याणकरी राज्य की आलोचना करते हैं।

इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण वे पूरे विश्व को एक बाजार के रूप में देखते हैं। विशेष रूप से सोवियत संघ के विघटन के बाद या 1991 के बाद से उदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने बाजार केंद्रित विचारधारा को मजबूती प्रदान कर दी। वैश्विक गांव, वैश्विक बाजार, वैश्विक राजनीति की अवधारणाओं ने सभी देशों और सभी राज्यों के बीच की भौगोलिक सीमाओं को ही समाप्त कर दिया। अब जब बाजार स्वतंत्र है तो व्यक्ति और राज्य का नियंत्रण में होना स्वाभाविक है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बाजार के गैर-नियंत्रणकारी चरित्र ने आर्थिक असमानता में वृद्धि की है। हाल में आई आक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत की एक प्रतिशत जनसंख्या के पास अब देश की कुल संपत्ति का चालीस प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा है। जबकि नीचे की पचास फीसद आबादी के पास कुल संपत्ति का केवल तीन प्रतिशत हिस्सा है। या कहें कि 2022 तक भारत में अरबपतियों की संपत्ति में 121 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। यह दलील भी दी जाती है कि अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई और समाज में आर्थिक असमानता के लिए राज्य का कल्याणकारी चरित्र जिम्मेदार है। इसलिए राज्य को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अप्रत्यक्ष रूप से यह व्यवस्था निजीकरण का समर्थन करती नजर आती है। आज हर क्षेत्र में निजीकरण अपने पैर प्रसार भी रहा है, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण कार्य, बिजली आदि।

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था का यह कहना है कि प्रशासन-तंत्र के कारण भ्रष्टाचार पनपा, इसलिए अब प्रशासन-तंत्र की जरूरत नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है जब भ्रष्टाचार के अनेक स्वरूप उभर कर आए हैं। उदाहरण के लिए हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद की तस्वीर देखी जा सकती है। एक तरफ आर्थिक असमानता, गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है तो फिर कुछ लोगों की संपत्ति में इतना ज्यादा इजाफा कैसे हो रहा है? इसी तरह वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स मामला सामने आया था, जिसमें भारत समेत दुनिया भर के रईसों की करमुक्त देशों में मौजूद संपत्तियों की जानकारी दी गई थी। बड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों द्वारा विदेश में छद्म कंपनियां खोलने और कर बचाने का खेल भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। न जाने कितने और पूंजीपति अरबों-खरबों का घोटाला करके देश छोड़ कर भाग गए।

भारत जैसे एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य में अपने नागरिकों को आधारभूत सुविधाएं देना सरकार का दायित्व है, पर जो कुछ दिया उसके बदले में मौन की संस्कृति अपनाने की स्थितियां बनाने को क्या कहा सकता है? शिक्षण संस्थाओं का मुख्य दायित्व लोगों को शिक्षित करना, समाज का सक्रिय सदस्य बनाना, शोषण से मुक्त करने के लिए जागरूक करना और देश के विकास में सहयोग देना है, लेकिन आज के दौर में शिक्षा अपनी इस भूमिका का निर्वाह न करके कुछ और ही कर रही है। शिक्षकों और विद्यार्थियों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा देना, परीक्षा करवाना, आवेदन जमा करना, अनेक समितियों में काम करना, मतदाता पत्र बनाने के लिए शिविर लगवाना, कुछ दिवस मनाना आदि कार्य करवाए जाते हैं, जिनका ज्ञान व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष सरोकार नहीं है। अब शिक्षण संस्थानों में पढ़ने-पढ़ाने के अलावा बहुत कुछ होता है, बस अध्यापन और शोध कार्य बहुत कम होता है। नतीतन, जब शिक्षण कार्य ही नहीं होता तो प्रश्नपत्र बाहर आने जैसे मामले भ्रष्टाचार के एक स्वरूप में उभरते हैं।

इतना ही नहीं, बाल अपराध बढ़ रहा है, हिंसक अश्लीलता एक नए किस्म के अपराध को उत्पन्न कर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम दिखाई नहीं देता, क्योंकि इससे बाजार को लाभ मिलता है। बाजार सर्वोपरि हो गया है और समाज हाशिये पर आ गया है। अब वास्तव में राज्य का कल्याणकारी चरित्र हाशिये पर दिखाई देता है। सवाल है कि क्या लोकतंत्र की व्याख्या बिना भ्रष्टाचार होने की गुंजाइश बची है?

देश के विभिन्न राजनेताओं और अधिकारियों से क्या नियमित स्वरूप में पूछा या जांचा जाता है कि जब उन्होंने राजनीति या प्रशासन में प्रवेश किया था, तब उनकी संपत्ति कितनी थी और अब कितनी है? अगर उनकी संपत्ति में कम समय में अकूत वृद्धि दिखाई देती है तो कैसे? दरअसल, व्यवस्था के अंदर इतने छेद हो गए हैं कि हर जगह भ्रष्टाचार नजर आता है। उच्च पद पाने या सरकार का संरक्षण पाने के लिए संविधान की व्याख्या करने वाले ही अगर संविधान का उल्लंघन करने लगे और गलत निर्णय देने लगें तो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कैसे होगी, यह सोचने का विषय है।

जब जनतंत्र बाजार-तंत्र में बदल जाता है तो सरकार के स्वतंत्र रूप से नीति निर्माण करने के पक्ष पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। सरकार किसके हित में नीतियों का निर्माण करती है, जैसे सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि कुछ सवालों पर समय रहते चिंतन-मनन किया जाए, ताकि आर्थिक असमानता को सीमित किया जा सके और समग्र विकास आकार ले सके। क्या कारपोरेट भ्रष्टाचार को स्वीकृति दी जा सकती है? क्या आर्थिक विसंगतियों को दूर करने में समाज वैज्ञानिक एक माध्यम बन सकते हैं? क्या समाज विज्ञान जनमत निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन सकता है? आज जिस तरह से बाजार केंद्रित कौशल और तकनीकी ज्ञान को महत्त्व दिया जा रहा है, कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों को सामाजिक आंदोलनों से दूर करने के लिए सामाजिक विज्ञानों की उपेक्षा की जा रही है, ताकि बाजार शक्तियों को विरोध का सामना न करना पड़े।

शायद इसलिए समाज वैज्ञानिक भी गैर-राजनीतिक होते जा रहे हैं। करी नामक समाज वैज्ञानिक कहते हैं कि वर्तमान समाज बाजार समाज है, इसने स्थानीय समुदायों की दक्षताओं पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न कर अपराध और विचलन को अवसर प्रदान दिए हैं। इसलिए समाज वैज्ञानिकों को एक जन शिक्षक की भूमिका में आना होगा जो लोगों को यह बताएंगे कि बाजार की स्वतंत्रता के सम्मुख क्या खतरे हैं और उसे निजी जगह, सार्वजानिक जगह और राजनीतिक जगह में समान रूप से सक्रिय होना होगा। तभी प्रत्येक तरह के भ्रष्टाचार को रोका या कम किया जा सकता है।


जानकारी ही दिलाएगी सुरक्षा

रजनीश कपूर

साइबर अपराधों में लिप्त अपराधी हर दिन नये–नये ढंग से अपने शिकारों को फंसाने के तरीके खोजते रहते हैं। यदि आप जागरूक हैं तो आप इनके जाल में फंसने से बच सकते हैं। यदि आप घबराहट में कुछ ऐसा–वैसा कर बैठते हैं तो आप इनके जाल में आसानी फंस सकते हैं। आज इस कॉलम में एक ऐसे ही शिकार के बारे में बात करेंगे जो इन साइबर अपराधियों के जाल में फंसते–फंसते बचा।

पिछले सप्ताह मुझे मेरे मित्र विभव का घबराहट में फोन आया। उसकी घबराहट का कारण एक सीबीआई अधिकारी का उसे फोन पर धमकाना था। उसने मुझे फोन पर अपनी जो परेशानी बताई तो पहले तो मुझे हंसी आई फिर मैंने खुद को उसकी जगह में सोच कर उसे कानून के कुछ अहम पहलू बताए। मेरी सलाह सुन विभव शांत हुआ और अपने काम में जुट गया‚ परंतु जो कुछ उसके साथ दो दिनों में हुआ वो आपके साथ साझा करना आवश्यक है। उगाही के इस ढंग को यदि आप जान लेंगे तो शायद आप भी इन जालसाजों का शिकार होने से बच सकेंगे। कुछ दिन पहले विभव के पास व्हाट्सऐप पर एक वीडियो कॉल आई। उस कॉल में एक लड़की पहले तो काफी मित्रता भरे ढंग से बात करने लगी।

कुछ ही क्षण में वो महिला अश्लीलता पर उतर आई। विभव ने तुरंत अपने फोन की स्क्रीन का रुख अपनी पत्नी की और किया जो उस समय उसके साथ में बैठी थी। इसके बाद फोन को काट कर विभव ने उस नंबर को ब्लॉक कर दिया और इसे भूल गया‚ परंतु कुछ ही देर में उसके पास किसी दूसरे नंबर से कुछ संदेश आने लगे‚ जिसमें उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने का प्रयास किया गया। विभव ने इन नंबरों को भी ब्लॉक कर दिया। दो दिनों तक कुछ नहीं हुआ। दो दिन के बाद विभव के पास किसी विक्रम गोस्वामी नाम के व्यक्ति का फोन आया। गोस्वामी ने खुद को सीबीआई का अधिकारी बताया। सीबीआई का नाम सुनते ही विभव ने चौंक कर पूछा कि क्या बात हैॽ गोस्वामी ने विभव को दो दिन पहले आई व्हाट्सऐप कॉल के अश्लील वीडियो की बात की। विभव पर इस अश्लील वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड करने का आरोप लगा कर एक शिकायत का हवाला देते हुए गोस्वामी ने पहले तो सच्चाई पूछी। विभव ने उसे सब बात सच–सच बता डाली। जैसे ही गोस्वामी को लगा कि विभव थोड़ा घबराया हुआ है‚ उसने विभव को एक नंबर दिया और कहा कि यदि उसने ये वीडियो अपलोड नहीं किया तो इस नंबर पर यूट्यूब वालों को कह कर वीडियो को डिलीट करवाएं और उसकी पुष्टि का प्रमाण आधे घंटे में गोस्वामी को दे। ऐसा न करने पर शाम तक विभव को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। विभव के लाख समझाने पर भी वो अधिकारी उसकी किसी बात का यकीन नहीं कर रहा था। बल्कि परिवार और समाज का हवाला देकर उसे और धमकाने लग गया। विभव ने गोस्वामी का फोन रखते ही मुझे फोन किया और पूरा किस्सा बयान किया। मैंने विभव को समझाया कि यदि उसने कुछ नहीं किया तो उसे घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। कानून का थोड़ा–बहुत ज्ञान होने के चलते मैंने उसे जो–जो बताया वो आप सभी के लिए भी समझना जरूरी है। पहला‚ यदि आपने सोशल मीडिया पर कुछ भी आपत्तिजनक अपलोड नहीं किया है तो आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं। दूसरा‚ किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ भी अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट नहीं किया जा सकता। इस मामले में यूट्यूब की बात करें तो यूट्यूब के नियम इतने सख्त हैं कि अश्लील वीडियो उस पर नहीं डाले जा सकते। तीसरा‚ यूट्यूब या सोशल मीडिया पर होने वाले अपराध साइबर अपराध की श्रेणी में आते हैं और इनसे केवल पुलिस का साइबर सेल ही निपटता है। सीबीआई का हस्तक्षेप संगीन अपराधों में केवल राज्य सरकार के अनुरोध पर ही होता है। इसलिए यदि कोई भी अधिकारी खुद को सीबीआई का अधिकारी कहता है तो वो झूठ बोल रहा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए पहले उस व्यक्तित का पूरा परिचय मांग लें। इसके साथ ही अपने जानकार मित्रों की मदद से यदि संभव हो तो उस अधिकारी की पहचान की पुष्टि करें।

जैसे ही विभव ने ये सब बातें सुनी उसकी घबराहट कम होने लगी। विभव ने मेरे कहने पर सीबीआई अधिकारी‚ विक्रम गोस्वामी का नंबर ट्रू–कॉलर नाम की ऐप पर खोजा और उसका स्क्रीनशॉट मुझे भेजा। स्क्रीनशॉट देख वही हुआ जिसका अंदाजा था। गोस्वामी ने अपने नाम के साथ दिल्ली पुलिस के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना की फोटो लगाई हुई थी। मैंने विभव को कहा कि वो गूगल पर पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना को खोजे और इस अधिकारी की प्रोफाइल पिक्चर को मिला ले तो उसे इस नकली सीबीआई अधिकारी की असलियत पता चल जाएगी। इसी दौरान मैंने दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ यूनिट पूर्व डीसीपी‚ केपीएस मल्होत्रा से इस किस्से को साझा किया। उन्होंने ऐसे गोरखधंधों से सभी को सावधान रहने को कहा। ऐसे नंबरों को तुरंत ‘रिपोर्ट एंड ब्लॉक’ करें। आप जानकार रहेंगे तभी तो सुरक्षित रहेंगे।


डूब जाएंगे शहर, पर फिक्र किसे है?

अक्षित संगोमला, ( शोधकर्ता, सीएसई )

समुद्र का बढ़ता हुआ जलस्तर भारत समेत तटीय आबादी वाले तमाम देशों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। पिछले दिनों जारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट बता रही है कि 1901 से 1971 के बीच समुद्री जलस्तर में औसत वृद्धि दर सालाना 1.3 मिलीमीटर रही, जो 1971 से 2006 के बीच बढ़कर 1.9 मिलीमीटर प्रतिवर्ष हो गई। साल 2006 से 2018 के बीच तो यह वृद्धि दर हर साल 3.7 मिलीमीटर दर्ज की गई है। इसका अर्थ है कि 1901 से 2018 के बीच समुद्र जलस्तर में औसतन 0.20 मिलीमीटर की वृद्धि हुई है। इसीलिए इस रिपोर्ट की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने चिंता जाहिर की कि यदि हालात संभालने के प्रयास नहीं किए गए, तो बांग्लादेश, चीन, भारत, नीदरलैंड जैसे देशों के शहरों पर खतरा बढ़ने वाला है।

वाकई, समुद्री जलस्तर के बढ़ने से कई शहर खतरे में हैं। तटीय शहर या द्वीप ही नहीं, अब तो जोखिम का दायरा बढ़कर बडे़ शहरों तक पहुंच गया है। एशिया में बैंकॉक (थाईलैंड), मनीला (फिलीपींस), हो ची मिन्ह (वियतनाम), शेनजेन (चीन), दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) जैसे शहरों पर खतरा ज्यादा है। भारत में भी मुंबई और कोलकाता जैसे बडे़ शहरों के डूबने की आशंका जाहिर की गई है। यही हाल, यूरोप, उत्तर और दक्षिण अमेरिका के शहरों का भी है। विडंबना है कि अब छोटे-छोटे द्वीपीय देशों की उतनी चर्चा भी नहीं होती, लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि कैरेबियाई या प्रशांत के द्वीप डूबे, तो उनका अस्तित्व ही पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और लोगों को वहां से निकालकर दूसरे देशों में बसाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प दुनिया के पास नहीं होगा।

यह चिंता काफी बड़ी है। अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन यूं ही जारी रहता है, तो साल 2100 तक ही समुद्र के जलस्तर में दो मीटर तक की वृद्धि हो सकती है, और साल 2300 तक इसके 15 मीटर तक बढ़ने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का आकलन है कि अगर मौजूदा स्थिति में सुधार के उपाय नहीं किए गए और ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार यही बनी रही, तो समुद्र का जलस्तर 15 मिलीमीटर सालाना की दर से बढ़ेगा, यानी अगले 10 साल में यह बढ़कर 15 सेंटीमीटर हो जाएगा और आगामी 50 साल में जलस्तर में 75 सेंटीमीटर तक की वृद्धि हो सकती है। जाहिर है, तब दुनिया के कई शहर डूब जाएंगे।

हमारे लिए विशेष चिंता की बात इसलिए है, क्योंकि एक रिपोर्ट यह भी बता रही है कि हिमालय की नदी घाटियों में रहने वाले लाखों लोगों पर ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर होगा। बताया जा रहा है कि जैसे-जैसे आने वाले दशकों में ग्लेशियर सिकुड़ते जाएंगे, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में पानी का बहाव बढ़ जाएगा और ज्यादा पानी समुद्र में जाने लगेगा। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और उसका खारा पानी इन नदियों के डेल्टा में पसर सकता है, जिससे यहां पर इंसानों के लिए रहना करीब-करीब नामुमकिन हो जाएगा।

स्पष्ट है, शहरों का डूबना सिर्फ एक भौगोलिक ढांचे का खत्म होना नहीं होता, बल्कि अनगिन सपनों और उम्मीदों का टूटना भी होता है। शहर के डूब जाने से वहां की आबादी को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ता है। समुद्री जलस्तर में वृद्धि के कारण लोगों का पलायन होने भी लगा है, लेकिन इसको लेकर अभी तक कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन यह आशंका है कि तटीय इलाकों के समुद्र में समा जाने से दुनिया की करीब एक अरब आबादी प्रभावित होगी।

ऐसा नहीं है कि इसको रोकने के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। एक बड़ी कोशिश तो यही हो रही है कि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार थामी जाए। 19वीं सदी के अंत के बाद से पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इतना ही नहीं, कार्बन उत्सर्जन कम होने के बावजूद यह माना जा रहा है कि दुनिया 10 से 15 साल के भीतर 1.5 डिग्री सेल्सियस की ग्लोबल वार्मिंग की सीमा पार कर जाएगी। इसे रोकने के लिए तमाम देश लगे हुए हैं। अगर इसमें सफलता मिल सकी, तो निश्चित तौर पर ग्लेशियरों के पिघलने के खतरे से कुछ हद तक हम बच सकते हैं। मगर यदि किसी कारणवश ऐसा न हो सका, तो उस सूरत के उपाय भी अमल में लाए जा रहे हैं।

सबसे पहली कोशिश यह है कि जल-प्लावन के जोखिम वाले तटीय इलाकों को फिर से मानव बस्ती बसाने लायक बनाना। इसके लिए समुद्री तटों पर कृत्रिम बालू डाला जाता है। तटों पर दीवारें खड़ी करना, बांध बनाना और तूफान के असर को कम करने के उपाय करना भी सरकारों की प्राथमिकता में हैं। एम्स्टर्डम (नीदरलैंड) में ऐसा प्रयोग हो चुका है, जो सफल साबित हुआ है। इससे समुद्र में समा चुकी भूमि को फिर से रहने लायक बनाया गया।

पारिस्थितिकी तंत्र को सुधारकर भी समुद्री जलस्तर के बढ़ने के खतरे को कम किया जा सकता है। इसके लिए मैंग्रोव (दलदल या नदियों के छोर पर उगने वाले उष्णकटिबंधीय वृक्ष) और प्रवालभित्तियों का संरक्षण या पुनर्जनन करने की कोशिश हो रही है। इसके अलावा, तटीय इलाकों में निर्माण कार्यों को रोककर और जोखिम वाली आबादी का नियोजित पुनर्वास करके भी इस खतरे से निपटने के प्रयास तमाम देशों द्वारा किए जा रहे हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। अच्छी बात यह भी है कि अपने यहां तटीय इलाकों को लेकर एक विशेष नीति भी बनाई जा रही है, जिसे आने वाले समय में जारी किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि हालात प्रतिकूल जरूर हैं, लेकिन बेहतर भविष्य का दामन छोड़ा नहीं गया है। सरकारें अपने तईं प्रयास कर रही हैं, लेकिन उनको अभी और संजीदगी व तत्परता दिखानी होगी। निस्संदेह, यह एक क्रूर मजाक है कि ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने की एक बड़ी वजह विकसित देश हैं, लेकिन वे इसकी रफ्तार को घटाने को लेकर उतनी तत्परता से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र महसचिव का कहना सही जान पड़ता है कि हमें जलवायु संकट का समाधान करना ही होगा, तभी हम अपने डूबते शहरों को बचा पाएंगे।

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