14-02-2026 (Important News Clippings)
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A decisive mandate
India and Bangladesh have an opportunity to reset ties with the defeat of Jamaat
Editorial
With a landslide verdict in its favour, the Bangladesh Nationalist Party (BNP) is set to form the government in Dhaka, with its leader, Tarique Rahman, becoming the country’s first male Prime Minister elected to the post in decades. Mr. Rahman’s road to the post, two decades after being barred from elections (due to cases) and going into exile under the previous Awami League government, is dramatic, with his return to Bangladesh just days before the death of his mother and former Prime Minister, Khaleda Zia. The interim government led by Muhammad Yunus is expected to hand over the reins to Mr. Rahman. Despite its more than two-thirds of the elected seats in the Jatiya Sangsad, the BNP has many challenges ahead. As the first elected government since Sheikh Hasina’s ouster in August 2024, the first order of business will be to restore old political institutions and effect a political reconciliation. This could mean releasing political prisoners and an outreach to the banned Awami League, many of whose supporters did not vote. The next will be to prepare for the challenge from the Jamaat-e-Islami, whose coalition won about 75 seats in Parliament, its best performance yet. As a more vocal opposition now, the Jamaat, whose leaders have pitched a regressive line on women’s rights and for religious politics, will try and push the new centrist government to the right. Voters have also emphatically supported the ‘July Charter’ referendum, that calls for a caretaker government, reforms that could shift the powers of the Prime Minister, and an upper house in Parliament with proportional representation. Meanwhile, Mr. Rahman must hit the ground running on reviving the economy and restoring trade links with India.
For New Delhi, keen to reset ties after they hit a nadir under Mr. Yunus, the outreach to the new government is important. The Modi government has had tensions with the BNP as it reduced engagement with the opposition in Bangladesh during Ms. Hasina’s tenure. It must also take back the space ceded to Pakistan, the U.S. and China, which have each forged new relations with Bangladesh since Ms. Hasina’s ouster. Perhaps more than bilateral relations, ruptured trade and connectivity, security and sporting ties, New Delhi and Dhaka must repair the frayed ties between their peoples. In Bangladesh, securing India’s missions and ensuring the safety of minorities will be essential. For India, it is necessary to dial down the domestic rhetoric against Bangladesh, that is allowing political groups (many are affiliated to the ruling party), to threaten Bangladeshis in India. The Modi and Rahman governments will have to move most delicately, however, in managing the issue of Ms. Hasina, who remains a wanted fugitive in Dhaka and an honoured guest in Delhi, if they are intent on a fresh start in ties.
Date: 14-02-26
Overdue upgrade
The new CPI series will aid policymaking and bolster data stability
Editorial

The new series of the Consumer Price Index (CPI), released on Thursday, has addressed the many shortcomings of the previous series. The new series has a base year of 2024, and is pegged to consumption patterns from the Household Consumption Expenditure Survey 2023-24. The previous series had a base year of 2012 and was based on consumption patterns of 2011-12. As Chief Economic Adviser V. Anantha Nageswaran noted, India has changed markedly over the last decade or so, including consumption behaviour and the composition of household expenditure. For example, 80 crore households receive free foodgrain now, which naturally reduces how much they need to spend on food.
Simultaneously, several new service offerings have emerged, such as over-the-top (OTT) video streaming, and online marketplaces. The new series commendably tries to address these changes. The weightage of food and beverages in the overall CPI has been reduced to 36.75% from the earlier 45.86%. This is significant since food inflation was having an outsized influence on the overall CPI, despite forming a shrinking part of households’ monthly expenditures. The index also covers more items, increasing its granularity and representativeness. Notably, this increase includes a larger number of goods and services. India’s service economy is growing faster than the economy’s average growth rate, and so price levels here are an increasingly important factor. The new index also collects data from more marketplaces across the country, and, for the first time, includes 12 online marketplaces.
More accurate inflation data have several implications for macroeconomic stability and monetary and fiscal policy. Food inflation in India is notoriously volatile, quickly reflecting supply bottlenecks as well as the vagaries of the weather. A more realistic weightage for food in the CPI stands to make the overall index more stable. This, in turn, can increase predictability in Budget-making, since some aspects are linked to the CPI, such as inflation-indexed dearness allowance and dearness relief. As far as monetary policy is concerned, an updated CPI gives the Reserve Bank of India’s Monetary Policy Committee a more accurate picture of inflation as it decides the various policy interest rates. At the moment, MoSPI provides a ‘linking factor’ and leaves it to the public to calculate how earlier inflation data would have looked like under the new methodology. It should, instead, provide the back data itself, to ease comparative analysis. It should also stick to its plan to revise the CPI every five years, and not wait another 11 years to update it.
बांग्लादेश में बदलाव
संपादकीय
लंबे समय तक अस्थिरता-अराजकता से जूझते रहे बांग्लादेश के चुनाव परिणाम इस देश को स्थिरता प्रदान करते दिख रहे हैं। इसका कारण यह है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी सरकार बनाने के लिए आवश्यक सीटों से कहीं अधिक सीटें जीतने में सफल रही और उसके नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया।
बांग्लादेश के चुनाव आम तौर पर शांतिपूर्ण रहे, लेकिन उन्हें निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को प्रतिबंधित कर चुनाव लड़ने से रोक दिया गया। तथ्य यह भी है कि मुख्य विपक्षी दल के रूप उभरी जमात-ए-इस्लामी चुनाव नतीजों को स्वीकार करने में आनाकानी करती दिख रही है। बांग्लादेश में हमेशा चुनावों की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
चूंकि कट्टरपंथी और पाकिस्तानपरस्त जमात-ए-इस्लामी परास्त हो गई, इसलिए भारत राहत की सांस ले सकता है, लेकिन यह ध्यान रहे कि उसे उम्मीद से कहीं अधिक सीटें मिलीं। जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी छात्रों की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी को कोई खास सफलता न मिलना भी भारत के लिए राहतकारी है।
इन्हीं छात्रों ने जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था, जिसके नतीजे में उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी थी। भारत विरोधी तेवर अपनाए नेशनल सिटीजन पार्टी का हश्र यही बताता है कि उसका आंदोलन न तो किसी क्रांति का परिचायक था और न ही किसी सकारात्मक बदलाव का।
चूंकि बांग्लादेश में चुनाव के साथ संवैधानिक बदलावों पर जनमत संग्रह भी हुआ, इसलिए वहां नई सरकार के गठन के साथ ही राजनीतिक ढांचे में परिवर्तन होना तय है। यह स्वाभाविक है कि बांग्लादेश की नई सरकार के रवैये पर भारत की गहरी निगाह होगी।
भारत को न केवल यह देखना होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार उसके हितों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देती है या नहीं, बल्कि यह भी कि वह कट्टरपंथियों समेत अन्य भारत विरोधी तत्वों पर लगाम लगाती है या नहीं? भारत को यह तो खास तौर पर देखना होगा कि इस पड़ोसी देश में हिंदुओं का दमन रुकता है या नहीं? बांग्लादेश की नई सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके यहां पूर्वोत्तर भारत के विद्रोही गुटों को शरण न मिले।
भारत की चिंता का विषय यह भी रहा है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के समय बांग्लादेश की पाकिस्तान से निकटता अप्रत्याशित तरीके से बढ़ी। यदि यह निकटता कम नहीं हुई तो भारत के साथ खुद बांग्लादेश के लिए खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश को यह भूलना नहीं चाहिए कि उसे पाकिस्तान की बर्बरता से मुक्ति और आजादी भारत के सहयोग से ही मिली थी।
Date: 14-02-26
नए युग की ओर बांग्लादेश
आनंद कुमार, ( लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में सीनियर फेलो हैं )
बांग्लादेश का आम चुनाव उसके राजनीतिक इतिहास के सबसे निर्णायक मोड़ में से एक माना जाएगा। जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़ने पर मजबूर कर दिया और लंबे समय से प्रभावी रही उनकी पार्टी अवामी लीग के प्रभुत्व का अंत किया, के बाद यह पहला आम चुनाव था। इस चुनाव ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को स्पष्ट जनादेश दिया।
पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना के साथ बांग्लादेश एक नए राजनीतिक युग की ओर बढ़ रहा है, जो पीढ़ीगत परिवर्तन, वैचारिक पुनर्संतुलन और क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों से प्रभावित होगा। यह चुनाव केवल अंतरिम सरकार को बदलने की प्रक्रिया नहीं था, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनूस कर रहे थे। यह उस गहरे राजनीतिक संकट के बाद देश की दिशा तय करने का प्रयास था, जिसने 2024 में पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया।
जुलाई 2024 का आंदोलन शुरुआत में सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति के विरोध से शुरू हुआ था, पर जल्द ही यह व्यापक असंतोष का रूप ले बैठा। सैकड़ों लोगों की मौत ने सरकार की वैधता को गंभीर रूप से प्रभावित किया और अंततः सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। अंतरिम सरकार ने लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना और संस्थागत सुधारों का वादा किया और इसी क्रम में 13वां संसदीय चुनाव और संवैधानिक सुधारों पर जनमत संग्रह आयोजित किया गया। इसका परिणाम न केवल सत्ता परिवर्तन है, बल्कि राजनीतिक संरचना में व्यापक बदलाव का संकेत भी है।
इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता अवामी लीग की अनुपस्थिति रही। विरोध प्रदर्शनों के दौरान कथित अपराधों के आधार पर उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, लेकिन उसकी अनुपस्थिति ने दशकों से चली आ रही द्विदलीय प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर दिया और चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल भी खड़े किए। 1990 के बाद से बांग्लादेश की राजनीति अवामी लीग और बीएनपी के बीच घूमती रही। बीएनपी की जीत उसके लिए पुनरुत्थान और परीक्षा, दोनों है। वर्षों तक विपक्ष में रहने और आंतरिक चुनौतियों से जूझने के बाद पार्टी ने नई ऊर्जा के साथ वापसी की है।
तारिक रहमान का नेतृत्व एक पीढ़ीगत बदलाव का प्रतीक है। यह परिवर्तन केवल अंतरिम प्रशासन से सत्ता हस्तांतरण नहीं है, बल्कि उनकी मां एवं पूर्व पीएम खालिदा जिया और शेख हसीना के युग से आगे बढ़ने का संकेत भी है। हालांकि बांग्लादेश में वंशवादी राजनीति का प्रभाव बना हुआ है, फिर भी रहमान ने अपने चुनाव अभियान में अपेक्षाकृत संयमित और व्यावहारिक रुख अपनाया। उन्होंने कानून-व्यवस्था, आर्थिक सुधार और युवाओं के लिए रोजगार पर जोर दिया। भारत के प्रति उनका रुख नरम रहा, जो भविष्य की कूटनीतिक संभावनाओं का संकेत देता है।
अपनी मां के निधन के कारण विजय उत्सव स्थगित करने का उनका निर्णय राजनीतिक परिपक्वता का संदेश देता है। चुनाव का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू जमात-ए-इस्लामी का उभार है। वह मुख्य विपक्षी शक्ति के रूप में उभरी है। उसका प्रदर्शन यह दर्शाता है कि बांग्लादेश की राजनीति में राजनीतिक इस्लाम की उपस्थिति अब भी प्रभावशाली है। हालांकि वह सत्ता में नहीं पहुंची, लेकिन उसकी सीटों में वृद्धि महत्व रखती है। उसका उभार देश के पंथनिरपेक्ष तबकों और पड़ोसी देशों में चिंता का विषय रहेगा।
2024 के आंदोलन से उभरी छात्रों की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। क्रांतिकारी ऊर्जा को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलना आसान नहीं होता और यही उसके साथ हुआ। जमात-ए-इस्लामी के साथ उसका गठबंधन उसके समर्थकों के बीच असमंजस का कारण बना। यह अनुभव दर्शाता है कि जनांदोलन से निकली ताकतों को संस्थागत राजनीति में टिके रहने के लिए मजबूत संगठन और संसाधनों की आवश्यकता होती है।
इस चुनाव ने सामाजिक चुनौतियों को भी उजागर किया। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी सीमित रही, जबकि 2024 के आंदोलन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी। आर्थिक मोर्चे पर नई सरकार के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था निर्यात, विशेषकर परिधान उद्योग पर निर्भर है। राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया है। जुलाई राष्ट्रीय चार्टर के तहत प्रस्तावित संवैधानिक सुधार यह तय करेंगे कि कार्यपालिका की शक्ति सीमित होगी या नहीं?
भारत के लिए बांग्लादेश केवल पड़ोसी नहीं, रणनीतिक साझेदार है। करीब 4,000 किमी लंबी साझा सीमा, पूर्वोत्तर भारत के लिए संपर्क मार्ग और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे दोनों देशों को जोड़ते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देकर यह संकेत दिया है कि भारत व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएगा। हालांकि शेख हसीना की भारत में मौजूदगी कूटनीतिक जटिलता पैदा कर सकती है। चीन भी इस बदलाव पर नजर रखेगा, क्योंकि उसके निवेश और सामरिक हित जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान से हालिया संपर्क भी क्षेत्रीय समीकरणों में नया तत्व जोड़ता है, हालांकि ऐतिहासिक संदर्भ गहरे रणनीतिक बदलाव की संभावना को सीमित करता है।
चुनाव नतीजे यह भी दिखाते हैं कि बांग्लादेश वैचारिक ध्रुवीकरण से थक चुका है और स्थिरता तथा आर्थिक प्रगति चाहता है। राजनीतिक इस्लाम की उपस्थिति बढ़ी है, पर उसने मुख्यधारा की सत्ता को प्रतिस्थापित नहीं किया। बीएनपी के सामने अवसर है कि वह अपने जनादेश का उपयोग लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और समावेशी शासन देने के लिए करे। यदि सत्ता का प्रयोग प्रतिशोध के बजाय सुधार के लिए किया जाता है, तो बांग्लादेश अधिक संतुलित और स्थिर भविष्य की ओर जा सकता है। बांग्लादेश की जनता ने परिवर्तन को चुना है, उथल-पुथल को नहीं। इस राजनीतिक संक्रमण की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि नई सरकार लोकतांत्रिक गरिमा, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक सद्भाव को किस हद तक सुनिश्चित कर पाती है।
अरावली की फिक्र
संपादकीय

यह छिपी बात नहीं है कि जितने बड़े इलाके में अरावली की पहाड़ियां फैली हैं, वहां और उसके आसपास उसकी क्या अहमियत है। इसे सिर्फ इतने से समझा जा सकता है कि समूची पर्वत श्रृंखला को एक जीवन रेखा की तरह देखा जाता है। विडंबना यह है कि वहां खनन और अन्य गतिविधियों की वजह से पूरे क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभाव और उसके नुकसानों को देखते हुए जब अरावली के संरक्षण के लिए स्वर तेज हो रहे हैं, वैसे में भी सरकार को नई परियोजनाओं के असर पर विचार करना जरूरी नहीं लग रहा है। गौरतलब है कि हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट में गुरुग्राम और नूंह जिले में प्रस्तावित जंगल सफारी पर विस्तृत योजना जमा करना चाहती थी। हरियाणा सरकार की ओर से अदालत में यह दलील भी दी गई कि सफारी परियोजना की विस्तृत रपट में जरूरत की भूमि को दस हजार एकड़ से बदल कर तीन हजार तीन सौ एकड़ कर दिया गया है। मगर शीर्ष अदालत ने इस पर सख्त रख अख्तियार किया और कहा कि जब तक विशेषज्ञ अरावली क्षेत्र की परिभाषा को बिल्कुल रमष्ट नहीं कर देते, तब तक किसी को भी अरावली को छूने नहीं दिया जाएगा और कोई भी विकास या निर्माण कार्य को अनुमति नहीं दी जाएगी।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष अक्टूबर में हरियाणा सरकार की प्रस्तावित ‘अरावली जू सफारी’ परियोजना पर नीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। हालांकि सरकार का कहना था कि इस परियोजना के तहत विश्व की सबसे बड़ी सफारी तैयार की जाएगी, जिसमें बाघ, पक्षी, सरीसृप और तितलियों के लिए अलग-अलग क्षेत्र बनाए जाने थे मगर भारतीय वन सेवा के पांच सेवानिवृत्त अधिकारियों और एक संगठन की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि पहले ही संकट का सामना कर रही अरावली पर्वत श्रृंखला के लिए यह परियोजना विनाशकारी साबित होगी। यह समझना मुश्किल है कि ‘जू सफारी’ बनाने या ऐसी अतिरिक्त गतिविधियों को जहां समूचे अरावली क्षेत्र के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है, पर्यावरणविद् इसके लिए चेताते रहे हैं, उस इलाके में अरावली के परिभाषित होने तक रुकना क्यों जरूरी नहीं समझा जा रहा है। जिस पहलू को सरकार को खुद समझना चाहिए, उसके लिए शीर्ष अदालत को बताने की जरूरत क्यों पड़ रही है। दरअसल, इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक जैसी परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। हालांकि बाद में विशेषज्ञों की रपट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले इसके इलाकों में खनन के नए पट्टे देने पर रोक लगा दी थी। चार राज्यों और कई सौ किलोमीटर के क्षेत्र में फैली अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में एक है और यह धार मरुस्थल को पूर्व वानी दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में फैलने से रोकने वाली एक प्राकृतिक ढाल के रूप में काम करती है। इसे समूचे उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक बेहद अहम पारिस्थिति तंत्र के रूप में देखा जाता है और भूजल के पुनर्भरण, मानसून को प्रभावित करने तथा जैव विविधता के संरक्षण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में अरावली की पहाड़ियों के जीवन तत्त्व की अनदेखी कर अगर खनन या फिर किसी भी तरह की परियोजना पर काम किया जाता है, तो उसका व्यापक असर पड़ेगा बेहतर हो कि किसी भी तरह की गतिविधि से पहले हर हाल में यह सुनिश्चित किया जाए कि अरावली के अस्तित्व को कोई भी नुकसान न पहुंचे।
पड़ोस में बदलाव
संपादकीय
बांग्लादेश के राष्ट्रीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को मिली भारी चुनावी जीत के गहरे मायने हैं। समग्रता में देखें, तो यह लंबे समय से जारी इस विपक्षी पार्टी के संघर्ष और अनुभव की जीत है। करीब दो दशक बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी अर्थात बीएनपी की सत्ता में वापसी हो रही है और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान शनिवार को बांग्लादेश की कमान संभालने वाले हैं। बेशक, भारत के इस पूर्वी पड़ोसी देश में नए युग का आगाज होने वाला है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के विरोध में जुलाई 2024 में हुई छात्र क्रांति के बाद से ही इस देश में नीतिगत संकट देखा जा रहा है। अनेक फैसले हुए हैं, जो जनशक्ति या छात्रों के हिंसक या आक्रामक दबाव में हुए हैं। यहां तक कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी सलाहकार सरकार भी छात्रों के दबाव में ही गठित हुई थी। हालांकि, चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि छात्र शक्ति पर लोगों ने भरोसा नहीं किया है। नाममात्र की सीटें ही छात्रों की नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) की झोली में गई हैं। अपेक्षाकृत ज्यादा कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 सहयोगी दलों को भी सौ से कम सीटें हासिल हुई हैं। इसका पहला मतलब है कि बांग्लादेश में लोगों ने सरकार चलाने के अनुभव को तरजीह दी है।
बीएनपी की जीत बांग्लादेश में तुलनात्मक रूप से सबसे बेहतर पार्टी की सफलता है। यहां यह ध्यान रखने की जरूरत है कि शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग इस चुनाव में भाग नहीं ले रही थी। अवामी लीग के खिलाफ जो नाराजगी है, उसकी वजह से उसे चुनाव से दूर रखा गया। आगे यह देखने वाली बात होगी कि सत्ता संभालने के बाद 60 वर्षीय तारिक रहमान और उनकी पार्टी बीएनपी का रवैया विपक्षी दलों के प्रति क्या रहता है ? इसमें कोई संदेह नहीं कि बांग्लादेश में विपक्षी दलों के प्रति सत्तारूढ़ दल का रवैया दुखद रहा है। एक बेहतर राजनीति के लिए संतुलन जरूरी है। हां, अगर बीएनपी यह ठान लेती है कि वह अवामी लीग को देश में फिर पैर नहीं जमाने देगी, तो बांग्लादेश की राजनीति का स्वरूप हमेशा के लिए बदल जाएगा। बीएनपी का रुख अवामी लीग और बंगबंधु मुजीबुर्रहमान के प्रति क्या रहता है, यह भी देखने वाली बात होगी। बीएनपी की खालिदा जिया जब प्रधानमंत्री थीं, तब भी बंगबंधु की विरासत पर हमले नहीं हुए थे, लेकिन सलाहकार सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस के दौर में बंगबंधु की बेरहम बेकद्री से बांग्लादेश ने अपना नया इतिहास लिखना शुरू किया है। क्या बेकद्री की इस परिपाटी को तारिक रहमान आगे बढ़ाएँगे? तारिक रहमान का रुख भारत में निर्वासन झेल रहीं शेख हसीना के प्रति कितना तल्ख रहेगा? आज ऐसे अनेक सवाल चर्चा में हैं।
बहरहाल, यह जो चुनी हुई सरकार सत्ता में आ रही है, उसका इंतजार बांग्लादेश में बेसब्री से था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार करीब 18 महीने सत्ता में रही और अब वह इतिहास हो जाएगी । बांग्लादेश में हुए 13 वें संसदीय चुनाव के बाद पहली उम्मीद यही करनी चाहिए कि बढ़ती कट्टरता पर लगाम लगेगी। फैसले ऐसे लिए जाएंगे, जो दक्षिण एशिया को तरक्की की ओर ले जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी पार्टी की ओर से उन्हें बधाई दी है। जाहिर सी बात है, भारत को नई सरकार का इंतजार था। उम्मीद करनी चाहिए, पड़ोस में चुनी हुई नई सरकार से वार्ता में ज्यादा सुविधा और स्पष्टता होगी, जिससे दोनों देशों के संबंधों में जरूरी ऊर्जा का संचार होगा।
Date: 14-02-26
बांग्लादेश में साफ जनादेश के मायने
पिनाक रंजन चक्रवर्ती, ( पूर्व उच्चायुक्त, बांग्लादेश )
बीते 36 साल में बांग्लादेश में पहली बार कोई पुरुष प्रधानमंत्री बन सकता है। 13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को दो-तिहाई से अधिक सीटें मिलने के बाद यह बात करीब-करीब साफ हो गई है कितारिक रहमान अब इस पड़ोसी मुल्क की कमान संभालने जा रहे हैं।
यह चुनावी नतीजा अपेक्षित ही था, क्योंकि अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद बीएनपी के लिए मैदान खाली हो गया था। जमात-ए-इस्लामी जरूर कड़ी टक्कर देने का दावा कर रही थी, मगर उसके दावे की बुनियाद कमजोर थी। हां, उसे अपने अब तक के इतिहास में सबसे अधिक सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन इसका कारण भी अवामी लीग का प्रतिबंधित होना ही है।
इस चुनाव के साथ मतदाताओं के बीच ‘जनमत- संग्रह’ भी करवाया गया था। हर वोटर को दो-दो मतपत्र दिए गए थे, जिनमें से एक सांसद के निर्वाचन का था और दूसरा ‘जुलाई चार्टर’ को लेकर। इस चार्टर को भी मंजूरी मिल गई है। कार्यवाहक सरकार के मुताबिक, यह चार्टर लोकतांत्रिक सुधारों को स्थायी बनाने की कवायद है । इसमें कुल 84 प्रस्ताव दिए गए हैं, जिनमें प्रधानमंत्री के लिए अधिकतम दो कार्यकाल (दस साल), हमारी राज्यसभा जैसे ऊपर सदन के गठन, राष्ट्रपति के अधिकार बढ़ाने, अदालत को राजनीतिक प्रभाव से बचाने जैसी सिफारिशें खासा महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, बीएनपीकी बंपर जीत और जनमत-संग्रह पर मंजूरी के बाद भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि बांग्लादेश की समस्याओं का समाधान निकल जाएगा। कई सवाल अब भी कायम हैं, जिनके जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं।
सबसे पहला सवाल तो मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस से ही जुड़ा है। अब उनका क्या होगा? पिछले डेढ़ साल से वह जमात-ए-इस्लामी के इशारे पर सरकार चला रहे थे। यह वह सरकार थी, जिसे परदे के पीछे अमेरिका का समर्थन हासिल था। यहां तक कि उनके कई सलाहकार बांग्लादेशी मूल के होने के बावजूद अमेरिकी नागरिक थे। इतना ही नहीं, मोहम्मद यूनुस ने भारत के साथ दूरी बरतने व पाकिस्तान के करीब जाने का दांव खेला था, जिसकेकारण नई दिल्ली और ढाका के रिश्ते अपने निम्नतर स्तर पर पहुंच गए थे।
मोहम्मद यूनुस जरूर नोबेल विजेता हैं, लेकिन बतौर मुख्य सलाहकार वह बहुत सफल नहीं रहे। खुद को ताकतवर बनाने के लिए उन्होंने तमाम अहम संस्थानों में जमात के लोगों को भर दिया। यहां तक कि विश्वविद्यालय, न्यायपालिका, चुनाव आयोग में भी जमात समर्थित लोग नियुक्त कर दिए गए। ऐसे में, माना यही जा रहा है कि सत्ता में बने रहने का अघोषित समझौता करने के बाद ही उन्होंने आम चुनाव की ओर कदम बढ़ाए थे। कयास है कि वह अब राष्ट्रपति का पद संभाल सकते हैं।
दूसरा बड़ा सवाल जनमत संग्रह से संबंधित है। बेशक संसदीय चुनाव के साथ यह कवायद भी की गई, लेकिन इसका कोई कानूनी आधार नहीं है। संविधान में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। अब जब ‘जुलाई चार्टर’ को लेकर लोगों में सहमति बन गई है, तब सवाल यही है कि इसे किस तरह लागू किया जाएगा? बीएनपी को दो-तिहाई सीटें मिली हैं, तो क्या आने वाले दिनों में यहां का संविधान बदला जाएगा? यहां के ढांचागत बदलावों पर भी नजर बनी रहेगी।
भारत के साथ नई सरकार के रिश्ते को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बीएनपी का मूल चरित्र है, जो कट्टरपंथियों से जुड़ा दिखता है। हालांकि, भारत सरकार ने उसकी तरफ दोस्ती का हाथ पहले ही बढ़ा दिया है। पिछले दिनों जब खालिदा जिया का देहांत हुआ, तो हमारे विदेश मंत्री वहां गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक संदेश भी भेजा था। आज भी चुनाव नतीजों की घोषणा होने के साथ ही प्रधानमंत्री ने शुभकामनाएं दी हैं और उम्मीद जताई है कि आपसी रिश्ते आगे बढ़ेंगे।
यह सही है कि किसी जमाने में खालिदा जिया भारत विरोधी मानी जाती थीं। वह कुछ संकीर्णतावादी सोच की थीं। पाकिस्तान को पसंद करती थीं। 2001- 06 के दौरान जब वह सत्ता में थीं, तब आईएसआई की शह पर भारतीय सीमा पर उग्रवादियों के कैंप बनाए गए थे। उनको हथियार भी मुहैया कराए गए थे। नतीजतन, भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आ गई थी। हालांकि, खालिदा को इसका नुकसान हुआ था, इसलिए माना जा रहा है कि इस बार उनके बेटे तारिक शायद ही वह गलती दोहराएंगे।
मेरा आकलन है कि बीएनपी सरकार के साथ हमारे रिश्ते और बेहतर होंगे। यूनुस और जमात ने मिलकर पाकिस्तान को जिस तरह से शह दी, वैसा शायद ही तारिक के कार्यकाल में देखने को मिलेगा। अच्छी बात यह है कि उनको अमेरिका का साथ मिलता हुआ दिख रहा है। स्थानीय अमेरिकी दूतावास ने जिस तरह से उनको जीत की शुभकामनाएं दी हैं, उनसे लगता है कि दोनों के बीच कुछ-न-कुछ समझौता जरूर हुआ है। वैसे भी, 17 वर्षों का उनका निर्वासन यूं ही खत्म नहीं किया गया होगा । उन पर जितने मुकदमे थे, सभी वापस ले लिए गए हैं। यहां तक कि उनको मृत्युदंड तक मिला हुआ था।
भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप उनपर थे। ऐसे मैं, अमेरिका के साथ परदे के पीछे कोई समझौता होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। मुमकिन है, तारिक रहमानने यह मान लिया हो कि मोहम्मद यूनुस के समय अमेरिका ने जो समझौते किए हैं, वे बने रहेंगे। इसका एक अर्थ यह भी है कि वहां फिलहाल अमेरिका की दखलंदाजी बनी रह सकती है।
तारिक की जीत में वंशवादी राजनीति की मजबूती देखी जा रही है, तो गलत नहीं हैं। हालांकि, यह दक्षिण एशिया का ही राजनीतिक चरित्र है, इसलिए तारिक की चुनावी जीत को सिर्फ वंशवादी राजनीति में बांधना उचित नहीं होगा। उन्होंने चुनाव प्रचार में अपना उदार रवैया दिखाया था, खासकर अवामी लीग की वापसी का संकेत देकर। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वह चाहते हैं, अवामी लीग भी चुनाव में भाग ले, क्योंकि बिना उसके उनकी जीत बेमानी मानी जाएगी। अवामी लीग को हराने का सुख वह महसूस करना चाहते थे। ऐसे में, मुमकिन है कि आने वाले दिनों में अवामी लीग पर से प्रतिबंध हट जाए। वैसे भी, जिस तरह से महज अवामी लीग समर्थक या कार्यकर्ता होने के आरोप में वहां हजारों लोग जेलों में ठूंस दिए गए हैं, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए धब्बा ही है।