13-12-2016 (Important News Clippings)

13 Dec 2016
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toi-logoDate: 13-12-16

Check cyber crime

As India goes digital fast, its vulnerabilities also grow at a worrying pace

security_lock-622x466The hacking of the social media accounts of Rahul Gandhi, Vijay Mallya, Barkha Dutt and Ravish Kumar within just a few days draws attention to larger cyber vulnerability in India. With demonetisation pushing Indians to adopt e-platforms at great pace, this vulnerability is also growing fast. Government must show that it takes cybercrimes as seriously as digitising India, which means not just passing tough laws but also implementing them strictly. Pursue and punish the criminals whether it is the hacking of a Twitter account or digital fraud of a few hundred rupees. Don’t be complacent about the ‘minor’ infractions because that will embolden ‘major’ security breaches.

This October as many as 3.2 million Indian debit cards were reported to have been compromised in a big breach of financial data. Even as that investigation continues, demonetisation has sent e-banking and e-wallets on the up and up with inadequate digital literacy to cope with this shift. When even long-time email users still keep clicking away at links from unknown and dangerous sources, it’s certain that many of the small vendors signing up for Paytm or FreeCharge or MobiKwik today don’t really know how to safeguard themselves against data fraud. Government has to do a bigger and better job of educating them about how to stay safe in this brave new world.

These are attractive conditions for cyber criminals. The country’s nodal agency to deal with cyber security threats CERT-In has warned that at present micro ATMs and point of sale terminals are particularly vulnerable to hackers. All this is on top of pre-existing laxity in basic safeguards like strong unique passwords, being careful about using public WiFi and securing home WiFi, encrypting important data, and downloading only authorised software.

Besides how demonetisation has now put digital and e-transactions on steroids, the security of the enormous amount of citizen information collected by government is a worry. Huge databases like Aadhaar must be kept hugely safe. Yet the right to privacy still hasn’t been enacted into a distinct law. In the long run expanding and securing the country’s digital infrastructure should deliver smarter e-governance and a better business environment. But the only way India will get there is if it’s tough on cybercrimes and steadfast in building digital literacy.

TheEconomicTimeslogoDate: 13-12-16

Reform institutions only then can we modernise payments systems

The government reportedly plans to amend the Payment of Wages Act, 1936, to mandate wage disbursal for industrial workers via transfers to bank accounts or by cheque. The idea has appeal. For example, it will be easier to discover if workers are getting minimum wages due to them on time. However, as the recent experience with demonetisation shows, this ‘cashless’ payment scheme will require systemic changes that need to be in place, before the new law comes into effect. First, 80% of India’s non-farm workforce falls into the unorganised or contract labour category. Their employment terms are often not fixed and many are hired through labour contractors.

This is as true of the car manufacturing hubs around Delhi and Chennai, as of small garment and textile exporters across India. Many small and mid-size companies pay little tax, some do not possess tax identity numbers (TINs), for a variety of reasons. Given that, the bulk of payments are in cash. We need to fix tax administration, stop harassment, and strengthen banking and payment services networks before implementing cashless payments in industry But the biggest systemic flaw, which forces companies — big or small — to store cash is graft in the system: policemen, inspectors, bureaucrats and netas demand it, so businesses have to find ways to keep it. The largest source of this is mis-invoicing of transactions, but there are other ways too. So, if this government is serious about going cashless, it must find ways to reform political funding. Like charity, reform begins at home: the BJP should start this itself. Changing the graft-taking mindset at all levels of administration should follow. Only then can we modernise payments systems, change how India works and produces.

business-standard-hindiDate: 13-12-16

आईटी की अमेरिकी चिंता

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यह धमकी कि एच1-बी वीजा व्यवस्था की खुली समीक्षा की जाएगी, असल में उनके मतदाताओं की भावना के अनुरूप ही है। उन्होंने चुनाव प्रचार में वादा किया था कि वे ऐसे रोजगार वापस अमेरिकियों को दिलाएंगे। उपरोक्त वीजा व्यवस्था के तहत अमेरिकी कंपनियां सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के भारतीय कर्मियों को नियुक्त करती हैं। बहरहाल, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को भी इस अमेरिकी चिंता से निपटने के नए तरीके तलाशने होंगे जो बीते एक दशक से अधिक वक्त से लगातार सुर्खियों में है। औसत भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कर्मी और मध्य अमेरिका में ट्रंप के समर्थक रहे श्वेत अमेरिकी कामगार वर्ग के कौशल के बीच विसंगति जैसी बातें करना आसान है। या फिर जैसा कि नैस्कॉम के चेयरमैन आर चंद्रशेखर ने ट्रंप की प्रतिक्रिया के जवाब में कहा कि भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी ही अमेरिकी कारोबार को लागत में प्रतिस्पर्धी बनाता है।

ये बातें कमोबेश सभी जानते हैं। नैस्कॉम ने अमेरिका में जिन लॉबीइंग फर्म की सेवाएं ली हैं, उन्होंने इस बात को अच्छी तरह प्रचारित और प्रसारित किया है। यह सिलसिला जॉर्ज डब्ल्यू बुश के पहले कार्यकाल के वक्त से ही चला आ रहा है। दरअसल इसमें समस्या यह है कि यह दलील इस समस्या की जड़ यानी वेतन भत्तों को लेकर उठने वाले इस विवाद के मूल को ही संबोधित नहीं करती। इसे कोई मामूली चिंता समझना ठीक नहीं है। आउटसोर्सिंग के कारण होने वाली रोजगार की हानि फिल्मों और किताबों के जरिए मुख्यधारा की बहस का हिस्सा बन चुकी हैं और बतौर राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में यह नीतियों को प्रभावित कर सकती है। वेतनभत्तों में मनमाने अंतर को लेकर लगने वाले आरोप भी गलत नहीं हैं। यह हकीकत है कि अमेरिकी और भारतीय कर्मियों के वेतन का अंतर भी इस बहस में काफी अहमियत रखता है। काम की प्रकृति और अनुबंध की प्रकृति के आधार पर भारतीय और अमेरिकी आईटी पेशेवरों के वेतन में तीन गुना से लेकर आठ गुना तक का अंतर हो सकता है। विदेशों से नियुक्त किए जाने वाले पेशेवरों की चयन प्रक्रिया का लचीलापन भी प्रभावित करता है क्योंकि इसका संबंध कर्मचारियों की संख्या घटाने और बढ़ाने से है।
इन्फोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति ने इस वर्ष अपने एक भाषण में इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय आईटी कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए आव्रजन एजेंट की तरह काम कर रही हैं। वे उनको वीजा और ग्रीन कार्ड सुनिश्चित कराने का काम कर रही हैं। उन्होंने आगे कहा था कि वैश्विक आकांक्षाओं वाली कंपनियों को अपने वैश्विक कर्मचारियों के साथ भी बेहतर व्यवहार करना चाहिए।
इस बात की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि देश के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के सबसे बड़े बाजार में रोजगार निर्माण पर और अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों ने इस बात को समझा। विप्रो, इन्फोसिस और टीसीएस जैसी कंपनियों ने अमेरिका में नियुक्तियां बढ़ा दी हैं और उन्होंने अपने कर्मचारियों का कौशल सुधारने के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं में भी इजाफा किया है। अंतर को स्पष्टï करने के लिए अधिक से अधिक कंपनियों को चाहिए कि वे ऐसा करें। इसी तरह यह भी सच है कि घरेलू कंपनियों को सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कौशल में सुधार करने की आवश्यकता है। जिस तरह जर्मनी ने इंजीनियरिंंग के मामले में वैश्विक प्रतिष्ठïा अर्जित की है, उसी तरह भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपने मूल्यवर्धन पर काम करना चाहिए ताकि लागत आदि से जुड़ी दलीलें बेमानी हो जाएं। शुरुआत हो चुकी है लेकिन इसे गति प्रदान करने की आवश्यकता है। इससे शुरुआत में लागत बढ़ सकती है लेकिन यह बाद में फायदेमंद साबित होगा।

Date: 13-12-16

बदलते परिदृश्य में जीन संसाधनों के आदान-प्रदान की जरूरत

प्राकृतिक जैव विविधता पर धीरे-धीरे ग्रहण लगता जा रहा है। इस बात की पुष्टि आंकड़ों से भी हो जाती है। जरा आंकड़ों पर गौर करिए। सदियों पहले 7,000 से अधिक वनस्पति प्रजातियां उगाई जाती थीं। अब 150 से अधिक नहीं बची हैं। वर्तमान में इन्हें उगाया जाता है और कुछ हद तक इनका व्यवसाय भी होता है। गंभीर स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि विश्व में कुल खाद्यान्न उत्पादन में करीब 90 प्रतिशत योगदान इनमें से दो-तिहाई प्रजातियां उपलब्ध कराती हैं। इनमें भी तीन प्रमुख प्रजातियां-धान, गेहूं और मक्का- ऐसी हैं जो प्रमुख रुप से दुनिया भर में उपजाई जाती हैं। भोजन ग्रहण करने से मिलने वाली ऊर्जा की बात करेंतो दुनिया के लोग करीब 50 प्रतिशत कैलोरी इन्हीं तीन किस्मों से प्राप्त करते हैं।

जीव विविधता की हालत भी इससे कतई अलग नहीं है। दुनिया भर से वन्य जीव प्रजाति सालाना 2 प्रतिशत की रफ्तार से घटती जा रही है। 1970 और 2012 के बीच मछली, स्तनधारी, पक्षी और सरीसृप प्रजातियों की तादाद में 58 प्रतिशत की जबरदस्त कमी आई है। इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा बढ़कर 67 प्रतिशत पहुंच सकता है। वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड के अद्र्धवार्षिक ‘लीविंग प्लैनेट इंडेक्स के अनुसार 2020 तक करीब दो तिहाई वन्य प्राणी दुनिया से विलुप्त हो जाएंगे।कृषि कार्यों में मददगार माने जाने वाले कीट-पतंगे और सूक्ष्म जीव भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। इन कीटों को पादप, जीव-जंतु और मानव के स्वास्थ्य तथा कृषि पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि इनमें कितने विलुप्त हो गए हैं, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह निर्विवाद है कि इनकी विविधता अच्छी-खासी कम हो गई है। कीटों और सूक्ष्म जीवों की कई महत्त्वपूर्ण प्रजातियां अब विलुप्त होने के कगार पर हैं और लगता नहीं कि ऐसे हालात में इनका लंबे समय तक अस्तित्व बरकरार रह पाएगा।इतना ही नहीं, धरती की आधी से अधिक सतह पर संपूर्ण जैव विविधता का ताना-बाना भंग हो गया है और क्षेत्रीय जैव विविधता के 14 प्रमुख अंचल में से  9 में यह विविधता सुरक्षित स्तर से नीचे चली गई है। इन सभी आंकड़ों से बस एक ही निष्कर्ष निकलता है कि इस समय संपूर्ण मानव जाति के लिए फायदेमंद जैव विविधता निर्मम रफ्तार से खत्म हो रही है। यह बात अवश्य याद रहनी चाहिए कि प्राकृतिक जैव विविधता कोई अक्षय प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, यानी इनका दोबारा सृजन नहीं हो सकता है।
जैव विविधता को होने वाला किसी भी तरह का नुकसान चिंता की बात है, खासकर कृषि क्षेत्र में इसका समाप्त होना या कम होना अच्छी बात नहीं है क्योंकि इसका लोगों की आजीविका सुरक्षा और खाद्यान्न पर सीधा असर होगा। भारत के संदर्भ में यह बात इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि क्योंकि यह कृषि जैव विविधता का एक प्रमुख केंद्र है। विश्व में उपलब्ध भूमि क्षेत्र का करीब 2.4 प्रतिशत हिस्सा ही भारत में है, लेकिन यहां अब तक ज्ञात सभी प्रजातियों की 7 से 8 प्रतिशत किस्म ही पाई जाती हैं। इनमें पादप की करीब 45,000 और जीवों की लगभग 91,000 प्रजातियां शामिल हैं। लिहाजा, इस विषय पर विचार करने के लिए पिछले महीने प्रथम अंतरराष्ट्रीय कृषि जैव विविधता सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली में होना एक उचित ही फैसला था।अच्छी बात यह है कि भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जिनने समय रहते कृषि-जैव विविधता के महत्त्व को समझा है और पर्याप्त पहले ही उपचार उपायों की शुरुआत की है। कृषि-जैव विविधता के संरक्षण के काम में लगे संस्थानों के अलावा भारतीय किसानों ने भी खाद्यान्न और अन्य फसलों की परंपरा संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाई है। उदाहरण के तौर पर दक्षिण भारत का कोनामणि चावल, असम का अग्निबोरा धान और गुजरात का भेलिया गेहूं कुछ ऐसी ही अनगिनत परंपरागत फसलें हैं, जिनका अस्तित्व किसान समुदायों ने बचाए रखा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अगुआई में देश की राष्ट्रीय कृषि शोध प्रणाली ने करीब 50 साल से अधिक पहले कृषि जैव-विविधता संरक्षित करने के लिए अनूठी मुहिम शुरू कर दी थी। भारत का नैशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेस एक ऐसा अनूठा संस्थान है जो भविष्य की पीढिय़ों के लिए पादपों का जीव द्रव्य संरक्षित करता है। संस्थान पादपों के लिए राष्ट्रीय जीन बैंक चलाता है। उसके पास इस समय दीर्घ अवधि तक संरक्षित रखने के लिए 4,29,000 पादप जीव द्रव्य के नमूने हैं। पशुओं, मछली, कीट-पतंगों और सूक्ष्म जीवों के जीन संसाधन संरक्षित करने के लिए इसी तरह की सुविधाएं विकसित की गई हैं। इन संस्थानों की एक खूबी यह है कि बीज भंडार बढ़ाने के लिए ये हमेशा काम करते रहते हैं। इसके लिए वे जंगलों से लेकर दूरदराज के इलाकों में जाते हैं और अभियान चलाते हैं।
इंडियन सोसाइटी ऑफ प्लांट जेनेटिक रिर्सोसेस के अध्यक्ष आर एस परोदा के अनुसार दुनिया के देश फसलों की नई और संकर किस्में विकसित करते रहे हैं और इसके लिए वे ऐतिहासिक रुप से एक दूसरे पर निर्भर रहते आए हैं। जलवायु परिवर्तन के खतरे, खाद्य विविधता के विस्तार की जरूरत और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद पूरी करने के मद्देनजर देशों के बीच इस तरह की निर्भरता दिनोदिन बढ़ती जाएगी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जैव विविधता सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणा को अंगीकार किया गया। इसमें हर देश की खाद्य और पोषण की सदैव बढ़ती जरूरत पूरी करने के लिए खाद्य और कृषि से जुड़े पादपों, जंतुओं, जलीय प्राणियों, सूक्ष्म जीवों और कीटों के जीन संसाधनों के आदान-प्रदान पर जोर दिया गया।

450x100-paperDate: 13-12-16

अब चीन को घेरने की बारी

उम्मीद के मुताबिक भारत एक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर ( इस बार अमृतसर में हॉर्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में ) पाकिस्तान को अलग-थलग करने में कामयाब रहा। इस दो दिवसीय सम्मेलन में एक संयुक्त घोषणापत्र भी जारी हुआ जिसमें आतंकवाद के खात्मे, क्षेत्र में आतंकवादी संगठनों और इनके सुरक्षित ठिकानों को नेस्तनाबूद करने और आतंकी जमातों को मिलने वाले वित्तीय, रणनीतिक और साजोसामान संबंधी सहायता को छिन्न-भिन्न करने के लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपील की गई।

अमृतसर घोषणापत्र में कहा गया कि तालिबान, इस्लामिक स्टेट और इसके सहयोगी, हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और दूसरे विदेशी आतंकी लड़ाके अफगानिस्तान में हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि इसमें पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इशारा उसी की ओर था। सम्मेलन में भारत और अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ आतंकवादियों, बल्कि उनको समर्थन, प्रशिक्षण और धन मुहैया कराने वालों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की मांग की। साथ ही यह भी रेखांकित किया कि आतंकवाद और बाहरी ताकतें अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी, जिन्होंने कभी पाकिस्तान को घनिष्ठ सहयोगी के तौर पर देखा था, ने भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने यह कहकर पाकिस्तान को सीधे-सीधे घेरने की कोशिश की कि उसने उनके देश के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है। पाकिस्तान के लिए उस समय बड़ी शर्मिंदगी खड़ी हो गई जब उन्होंने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए पाकिस्तान की 50 करोड़ डॉलर की मदद को लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि इसका बेहतर इस्तेमाल पाकिस्तान

अपने यहां के आतंकवादियों को खत्म करने पर कर सकता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि जो 50 करोड़ डॉलर आप हमें दे रहे हैं वह पाकिस्तान में अतिवाद के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। इन हमलों को झेलने के बाद अजीज के लिए पाकिस्तान का पक्ष रखना मुश्किल काम था। फिर भी उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए किसी एक देश की निंदा करना सबसे आसान है। अजीज ने कहा कि सम्मेलन में उनका भाग लेना इस बात का द्योतक है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में स्थायी शांति का हिमायती है। अब यह साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की अफगानिस्तान नीति में आ रहे गंभीर बदलाव की शुरुआत कर दी है। सम्मेलन में उन्होंने कहा भी कि अफगानिस्तान दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच संपर्क की एक मजबूत कड़ी बन सकता है। उन्होंने अफगानिस्तान को एक हब के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया।

जाहिर है, यह पाकिस्तान के लिए एक और बड़े कूटनीतिक झटके की तरह है। अब यह भी पूरी तरह स्पष्ट है कि पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए क्षेत्रीय शक्तियां पहले से ज्यादा एकजुट हैं, लेकिन इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान के सामने इससे बहुत बड़ी बाधा खड़ी होगी। दरअसल चीन अभी पाकिस्तान के पीछे मजबूती के साथ खड़ा है। चीन 46 अरब डॉलर लागत वाले अपने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर (सीपीइसी) के तहत निर्मित ग्वादर बंदरगाह और कारोबारी मार्ग की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान की नौसेना के साथ मिलकर अरब सागर में नौसैनिक जहाज को उतारने की तैयारी कर रहा है। यदि यह कार्यक्रम तय योजना के तहत आगे बढ़ा तो पाकिस्तान में चीन की दीर्घकालिक उपस्थिति सुनिश्चित हो जाएगी। इससे चीनी नौसेना को पहली बार्र ंहद महासागर और अरब सागर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौका मिल जाएगा। हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। चीन एक सोची-समझी रणनीति के तहत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। वहीं पाकिस्तान भी भारत की बढ़ती नौसैनिक ताकत को संतुलित करने के लिए प्रयासरत है।

चीन की हमेशा से यह मंशा थी कि वह अरब सागर में एक सामरिक धुरी कायम करे और ग्वादर ने उसे यह आकर्षक विकल्प मुहैया कराया है। हालांकि कहा जा रहा है कि बलूचिस्तान में बढ़ती मुश्किलों और नई दिल्ली तथा वाशिंगटन के संभावित विरोध के चलते ग्वादर में चीन की भूमिका हमेशा सीमित रहेगी। इसके बावजूद चीन ग्वादर में अपनी धमक दर्ज कराने को तैयार है। ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान की अक्षमता के कारण सालों से बंद पड़ा था। यह उसकी वाणिज्यिक विफलता का जीता जागता सुबूत था, लेकिन चीन की मदद से इसे 2007 में खोला गया था। इसके लिए चीन ने शुरू में 20 करोड़ डॉलर फंड मुहैया कराया था। हालांकि पूर्व में चीन ने ग्वादर बंदरगाह में अपनी भूमिका के बारे में खुलकर बात नहीं की, लेकिन पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के कई लोगों ने चीन को वहां सैन्य अड्डा बनाने के लिए खुला आमंत्रण दिया। चीन अपनी तेल संबंधी जरूरतों के लिए भी निश्चिंत होना चाहता है। उसके 80 प्रतिशत तेल का आयात होर्मुज जलडमरू के रास्ते से होता है। वह नहीं चाहता है कि ऊर्जा तक अबाधित पहुंच के लिए उसे अमेरिकी नौसैनिक ताकत पर निर्भर रहना पड़े। इसी वजह से चीन फारस की खाड़ी से लेकर दक्षिण चीन सागर तक समुद्री रास्ते के मुख्य बिंदु पर नौसैनिक अड्डा बनाना चाह रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्वादर बंदरगाह उसके लिए सबसे मुफीद है।

अरब सागर के शीर्ष पर होर्मुज के जलडमरू से 400 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह बंदरगाह चीन के लिए बड़ी ताकत बन सकता है। वहीं चीन और पाकिस्तान ग्वादर बंदरगाह से चीन के शिनजियांग प्रांत तक 3000 किलोमीटर लंबा आर्थिक गलियारा बनाने में व्यस्त हैं। इसके बन जाने के बाद चीन की सामरिक स्थिति और मजबूत हो जाएगी। भारतीय कूटनीति के लिए पाकिस्तान को चीन से अलग करना एक चुनौतीपूर्ण काम होगा, क्योंकि दोनों की मंशा भारत को कई मोर्चों पर असफल करना है। आतंकवाद और अतिवाद एक ऐसा ही क्षेत्र है जहां चीन और भारत एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं। 40 देशों वाले हॉर्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में पाकिस्तान को पूरी तरह अलग-थलग करने के बाद मोदी सरकार को अब अपनी ऊर्जा चीन को यह बात समझाने में खर्च करनी चाहिए कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद के संबंध में अपनी नीति यूं ही जारी रखता है तो दीर्घकाल में चीन के हित भी प्रभावित होंगे।

[ लेखक हर्ष वी. पंत, लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर हैं ] 

ie-logoDate: 12-12-16

Put House In Order

Parliamentary procedures require a thorough revamp.

parliament-480The president has made repeated pleas for the proper functioning of Parliament. In 2012, at the platinum jubilee celebrations of the Tamil Nadu Vidhan Sabha, he highlighted the need for collective thinking to avoid disruption. On multiple occasions, he has referred to debate, dissent, and decision being the three Ds of democracy and called the disruption of parliamentary proceedings unacceptable. His comments, over the years, critique the decline in debate in Parliament.

Washout of parliament sessions has resulted in the weakening of government accountability and ineffective legislative scrutiny. The situation has reached a stage where, on a few occasions, presiding officers have used the word anarchy to describe proceedings in their house of parliament.

In 2009, a committee was set up to suggest structural reforms to the House of Commons in England. The first paragraph of the report of this committee reads, “We have been set up at a time when the House of Commons is going through a crisis of confidence not experienced in our lifetimes… Public confidence in the House and in Members as a whole has been low for some time, but not as low as now.” The situation is no different in India. There is an urgent need to overhaul parliamentary functioning. It will require changes to the Constitution and the rules of procedures of Parliament.

Disruptions in Parliament are symptoms of a fractured political environment where bipartisanship is hard to come. Individual MPs have a greater role to play in such situations. But in our constitutional framework, individual lawmakers have limited involvement in Parliament’s functioning. They neither control the convening of Parliament nor have the freedom to vote on issues. It means that government has no incentive to engage with individual MPs.

The first constitutional change that we need is to empower our legislators to call for a session of Parliament. In many democracies (the US and UK) legislatures meet for an entire year with prefixed calendars. Our Parliament meets for a limited number of days decided by the government. Empowering MPs to call for a session of Parliament will ensure that they can summon Parliament and hold government accountable on their terms. In some countries, the president can convene a session of parliament on a request of a specified number of MPs.

Another change that is needed urgently is the repeal of the anti-defection provisions specified in the Constitution. Over the last three decades, these provisions have gagged the individual voting voices of our parliamentarians. Leaders of political parties do not have to convince MPs either from their party or other parties about the merits of a discussion on a policy issue or legislation. They only negotiate with leaders of other parties who have the power to regulate the vote and voices of their MPs. It defeats the purpose of ideas and debate in a legislature. The events in Uttarakhand and Arunachal Pradesh this year have highlighted that anti-defection law will not guarantee political stability. Its removal will bring the vibrancy of debate back to our legislatures.

Over the years, we have only undertaken minor tweaking of the rules of procedure of Parliament. We have now reached a stage where these rules require significant structural changes to keep up with the changing political environment. The government exploits the discretion available in these rules to complete its legislative business at the cost of debate and parliamentary scrutiny. They need to be changed to ring fence the legislative process so that passing of bills without parliamentary scrutiny becomes impossible. The rules are also designed to focus on government business and do not give opposition parties the opportunity to set the agenda for discussion in Parliament. The rules require changes to prevent Parliament from becoming a forum for debating issues agreeable to, and on terms of, the government.

At the beginning of this century, a commission was appointed to review the working of our Constitution. Now is the time to examine our parliamentary system. If we fail to do so, the world’s largest democracy will be left with a hollow institution.

Chakshu Roy The writer is head of outreach, PRS Legislative Research.

logo-hindustanDate: 12-12-16

प्रदूषण का प्रबंधन

हम अपने यहां के प्रदूषण से परेशान हैं। दिल्ली और आस-पास के इलाकों में जब भी वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचता है, हम चौंकन्ना हो जाते हैं। जमाने से लेकर अपने तौर-तरीके तक, सबको कोसने लगते हैं। लेकिन जहां तक प्रदूषण का मामला है, चीन इस मामले में भी हमसे कहीं आगे है। ऐसे हालात वहां सिर्फ राजधानी के आस-पास नहीं, बल्कि देश के कई शहरों के हैं। फर्क सिर्फ एक है कि चीन अब कोसने से आगे निकल चुका है। वहां अब हर बार जब कोहरे के साथ वायु प्रदूषण गहराता है, तो उससे निपटने के नए-नए तरीके खोजे जाने लगते हैं। कई बार हम चीन की तर्ज पर प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम वर्षा की बात करते हैं, जबकि चीन का सच यह है कि उसने प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम वर्षा का इस्तेमाल करना अब लगभग बंद कर दिया है। अब वह कुछ नए तरीके आजमा रहा है, जिसमें इन दिनों लगभग पूरी दुनिया दिलचस्पी ले रही है।

एक तो इन दिनों चीन की राजधानी बीजिंग में हवा को प्रदूषण मुक्त करने का सबसे बड़ा संयंत्र लगाया जा रहा है। यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसा कि आजकल लोग अपने घर के भीतर की हवा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। फर्क इतना है कि बीजिंग में जो संयंत्र लगाया जा रहा है, वह बहुत विशाल है। ऐसे संयंत्र आजकल काफी चलन में हैं, हालांकि इन्हें लेकर अभी तक वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं कि इनसे वाकई कोई फायदा मिलता भी है या नहीं। लेकिन चीन ने इस विशाल संयंत्र से यह तो बता दिया है कि वह प्रदूषण की समस्या को कितनी गंभीरता से ले रहा है और इसके लिए वह बड़े पैमाने पर निवेश करने को भी तैयार है। यह संयंत्र तो हर मौसम में प्रदूषण से लड़ता रहेगा, लेकिन एक बड़ी समस्या उस प्रदूषण से है, जो हर साल सर्दी आते ही तकरीबन रोज बीच हवा में ठहर जाता है।

यही वह प्रदूषण है, जिससे मुक्त होने के लिए हम कृत्रिम बारिश की बात सोच रहे हैं। चीन ने अब इसके लिए बादलों की खेती (क्लाउड सीडिंग) करना छोड़ दिया है। अब इससे लड़ने का चीन का तरीका है विशाल पिचकारी का इस्तेमाल। अब जब भी वहां प्रदूषण कोहरे में घुलता है, ट्रकों पर लदी ये विशाल पिचकारियां सड़कों पर निकल पड़ती हैं। इनसे पानी की तेज धार निकलती है, जो कोहरे और प्रदूषण के कणों पर गिरती है, तो वे बैठ जाते हैं। कई मामलों में तो यह काम दिन में पांच से सात बार तक किया जाने लगा है। वैसे घने कोहरे से निपटने का एक तरीका भारतीय रेलवे में भी ईजाद किया है। इसमें रेल के इंजन से आगे कुछ दूरी पर भारी धमाके वाले पटाखे दागे जाते हैं। तेज धमाके से कुछ देर तक वहां कोहरा कुछ छंट सा जाता है, और टे्रन आगे बढ़ जाती है। लेकिन इसमें मेहनत ज्यादा है और असर सीमित, फिर यह तरीका प्रदूषण को बढ़ाने वाला भी है।

इन सारे तरीकों की सबसे बड़ी सीमा यह है कि इनसे हम बस प्रदूषण का प्रबंधन करते हैं। हवा को थोड़ा साफ कर देने या प्रदूषण के कणों को पानी में घोल देने वगैरह तरीके हमें तत्काल राहत भले ही दे देते हों, लेकिन ये प्रदूषण से मुुक्ति का स्थायी हल नहीं हैं। जबकि जरूरत हमें ऐसे तरीके खोजने की है, जिससे प्रदूषण पैदा ही कम हो। बेशक इस तरह की तत्काल राहत भी जरूरी चीज है, इसी राहत से हम आगे का रास्ता बना सकेंगे। लेकिन यही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। दिक्कत यह है कि हम राहत के उपायों पर तो काम कर रहे हैं, लेकिन प्रदूषण पैदा ही न हो, इसके लिए कोशिश बहुत कम कर रहे हैं, जबकि धरती को बचाने की पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिए।

Date: 12-12-16

क्या कृत्रिम वर्षा कराने से प्रदूषण कम होगा

वह कोहरा फिर से दिल्ली, एनसीआर ही नहीं उत्तर भारत के कई हिस्सों में छाता जा रहा है, जो धुएं से मिलकर एक खतरनाक मिश्रण बनता है, जिसे स्मॉग कहते हैं। यह स्मॉग ट्रेनों, वायुयानों और सामान्य ट्रैफिक के आवागमन में बाधा तो पैदा करता ही है, साथ ही प्रदूषण को एक खतरनाक स्तर तक ले जाता है। सर्दी आते ही इन तमाम शहरों के बच्चे-बूढ़े सब इसी स्मॉग के चलते खांसते नजर आते हैं। पिछले कुछ साल से हम इस स्मॉग से मुक्ति का तरीका ढूंढ़ रहे हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। आमतौर पर ऐसे हालात पैदा होते ही तेज हवा या बारिश का इंतजार किया जाता है, ताकि कोहरा हवा और पानी में घुल जाए। इन दिनों यह चर्चा भी चल पड़ी है कि अगर स्मॉग बनने लगे, तो इससे निपटने के लिए सरकार को कृत्रिम वर्षा का सहारा लेना चाहिए। हालांकि इसकी सफलता पर अभी कई संदेह भी हैं।

बादलों पर सिल्वर आयोडाइड का छिड़काव कर कृत्रिम वर्षा करवाने के प्रयास कई देशों में हो चुके हैं, लेकिन आमतौर पर ये प्रयास सूखे के संकट को दूर करने के लिए हुए हैं। इसलिए इस प्रस्ताव पर पैसा खर्च करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि अब तक के इन प्रयासों का अनुभव क्या रहा? चीन, ऑस्टे्रलिया, फ्रांस जैसे देशों में ऐसे प्रयास हुए तो बहुत हैं, पर इन्हें विशेष सफलता नहीं मिली है। यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि जिस समय चाहे, कृत्रिम वर्षा करवाई जा सकती है। कृत्रिम वर्षा की संभावना बढ़ाने के लिए कुछ परिस्थितियों की मौजूदगी जरूरी है। फिर इससे कई दूसरी समस्याएं पैदा होने का खतरा भी रहता है।

चीन में कृत्रिम वर्षा के अधिक प्रयास इस कारण हो सके, क्योंकि वहां लोकतांत्रिक विरोध की संभावना कम है। अन्यथा एक स्थान पर बादलों से कृत्रिम वर्षा करवाने का विरोध आसपास के अन्य स्थानों पर इस आधार पर हो सकता है कि इससे उनके यहां वर्षा की संभावना कम हो गई है। वहां कृत्रिम वर्षा के कुछ प्रयासों को सफल कहा गया, पर विरोधियों ने यह सवाल उठाया कि कोई गारंटी नहीं है कि वह वर्षा सिल्वर आयोडाइड के छिड़काव से ही हुई। हो सकता है कि वह प्राकृतिक वर्षा हुई हो। वैसे यह कोई नई तकनीक नहीं है, लगभग 50 वर्षों से इस तरह के छिटपुट प्रयास होते रहे हैं। अमेरिका में इसके लिए विशेष तरह का ड्रोन विमान भी बनाया गया है।

भारत में कृत्रिम वर्षा के प्रयास तमिलनाडु, कर्नाटक व महाराष्ट्र में छिटपुट तौर पर हो चुके हैं। सूखे से राहत दिलाने के लिए की गई ऐसी कोशिशों से बड़ी राहत अभी तक तो नहीं मिल सकी है। जिस तरह हाल के समय में देश के अनेक क्षेत्रों में सूखे की समस्या बहुत गंभीर रूप में उपस्थित हुई, ऐसी स्थिति में कृत्रिम वर्षा की बात करते ही यह बहुत लोकप्रिय हो जाती है। कृत्रिम वर्षा के कुछ प्रयोग युद्ध में भी किए गए हैं। कहा जाता है कि वियतनाम युद्ध में वियतनाम के गुरिल्ला सैनिकों को परेशान करने करने के लिए अमेरिका ने उनके क्षेत्रों में अत्यधिक कृत्रिम वर्षा करवाने के प्रयास किए। इसे रासायनिक युद्ध की श्रेणी में भी गिना जाता है। इस जल्दबाजी में कई बार यह मुख्य बात भुला दी जाती है कि किन स्थितियों की मौजूदगी में कृत्रिम वर्षा को करवाने की संभावना बढ़ती है। ऐसा नहीं कि कहीं भी व जब चाहा कृत्रिम वर्षा करा ली। प्रतिकूल स्थितियों की तो बात रहने दें, कई बार अनुकूल स्थितियों में भी कृत्रिम वर्षा हो पाएगी या नहीं, यह निश्चित नहीं होता।

दिल्ली में जिस मौसम में कोहरा होता है, उस मौसम में आमतौर पर बारिश के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं होती और जब अनुकूल होती हैं, तब कोहरा बिल्कुल भी नहीं होता। इसलिए यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि प्रदूषण से निपटने का काम कृत्रिम बारिश के जरिये हो सकता है या नहीं। कृत्रिम वर्षा की तकनीक भले ही काफी समय से उपलब्ध है, लेकिन यह अभी अपने प्रारंभिक दौर में है। यह लगातार विकसित हो रही है, पर अभी इतनी विकसित नहीं हुई कि पूरे भरोसे से इसके बारे में कुछ भी कहा जा सके। इसके बारे में अभी न तो बड़े दावे करने का समय आया है, न ही इस पर बहुत भरोसा करने का। अब भी सबसे बेहतर यही है कि हम सीधे प्रदूषण से लड़ाई लड़ें, उसे छिपाने के तरीकों पर ज्यादा भरोसा न करें।

भारत डोगरा, सामाजिक कार्यकर्ता (ये लेखक के अपने विचार हैं)

rastriyasaharalogoDate: 12-12-16

हाउस वाइफ भी वर्कर है

2015-10-09t022642z_1_lynxnpeb9802d_rtroptp_3_commodities-lpg-growth_originalहाउस वाइफ यानी घरेलू महिलाओं के श्रम का हमारे देश में क्या मोल है, इसका आकलन हाल में गोवा के कला-संस्कृति मंत्री दयानंद मंडरेकर के बयान से हो जाता है। मंत्री महोदय ने फरमाया था कि आजकल गृहिणियां टीवी में इतनी ज्यादा व्यस्त हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि पति घर आ गए हैं और उनसे चाय-नाश्ते के बारे में पूछना चाहिए। यह सोच अकेले इन मंत्री महोदय की नहीं है। देश का अधिसंख्य तबका इसी सोच का पक्षधर है और अक्सर कहीं-न-कहीं से यह सवाल उठ ही जाता है कि आखिर घरेलू महिलाएं घर में बैठकर टीवी देखने के सिवा करती क्या हैं? यह असल में हाउस वाइफ की हैसियत पर टिप्पणी है, जिसका जवाब तलाशने का वक्त आ गया है। असल में इस सोच के पीछे असली धारणा यह है कि घर तो पुरु षों के वेतन से चलता है, जिसमें शारीरिक-मानसिक, दोनों तरह का श्रम शामिल है। जबकि महिलाओं का घरेलू कामकाज ऐसा होता है कि जो महरी या किसी से भी बेहद कम मूल्य पर कराया जा सकता है। इसलिए उसकी कोई खास कीमत नहीं है।

पुरु षों से पैसा कमाने का यह अधिकार कहीं छिन न जाए, इसे लेकर भी हमारा पितृसत्तात्मक समाज बेहद सक्रिय और चिंतित रहता है। इस संदर्भ में कुछ साल पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि गृहिणियों का काम घर संभालना है और घर से बाहर काम करके धन लाने का कार्य पुरु षों का है। उनके इस बयान का स्पष्ट आशय यह था कि हाउस वाइफ को न तो घर से बाहर काम करने के लिए निकलना चाहिए और न ही घरेलू कामकाज के लिए किसी मानदेय या वेतन की अपेक्षा करनी चाहिए, क्योंकि घर के काम करना ही तो उनके जीवन का लक्ष्य या कर्तव्य है। यह सच है कि हाउस वाइफ नौकरीशुदा महिलाओं की तरह कोई कमाई भले ही नहीं करती, लेकिन खाना बनाने, बच्चों को पढ़ाने से लेकर घर के अनगिनत काम करके पाई-पाई बचाती जरूर है। वह बाहर जाकर नौकरी नहीं करती, लेकिन घर में अपने योगदान से जितनी पूंजी वह बचाती है-उसका एक मूल्य तो होगा ही। अफसोस यह है कि न तो घरेलू महिलाओं के श्रम का महत्त्व समझा जाता है और न उनके हाथ में कुछ पूंजी टिकाने का जतन किया जाता है। इसका एक खुलासा 2010 की जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से भी हुआ था। इससे संबंधित विश्लेषण में बताया गया था कि देश में 15-59 के बीच की कामकाजी उम्र की 16 करोड़ महिलाएं चूंकि सिर्फ घरेलू कार्य करती हैं, इसलिए वे बेरोजगार (नॉन वर्कर) हैं । इनके अलावा, करोड़ों अन्य महिलाएं ऐसी हैं, जो घर-दफ्तर, दोनों मोर्चो पर काम करती हैं। ऐसी महिलाओं की संख्या भी 20 करोड़ के आसपास है। पर जहां तक सिर्फ घरेलू काम करने वाली

16 करोड़ महिलाओं का प्रश्न है, तो इन महिलाओं के मुकाबले महज 58 लाख पुरु ष ऐसे हैं, जो घरेलू कार्य करते हैं और बेरोजगार हैं। सवाल यह है कि जनगणना की मार्फत सरकार ने जिन करोड़ों महिलाओं को अनुत्पादक श्रेणी में डालते हुए बेरोजगार माना, क्या वे सिर्फ इसलिए किसी काम की नहीं हैं; क्योंकि वे घरेलू काम करती हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षो में सरकारों का ध्यान इस समस्या की ओर गया है। जैसे, पिछली यूपीए सरकार ने महिला और बाल कल्याण मंत्री रहीं कृष्णा तीरथ ने हाउस वाइफ की आर्थिक हैसियत सुधारने के मकसद से यह सुझाव दिया था कि घरेलू महिलाओं को पति की आमदनी का कुछ हिस्सा मिलना चाहिए। उनका सुझाव सामने आने के बाद उन मांओं (दादी या नानी) को भी ऐसी कुछ राशि देने की मांग भी उठी थी, जो वर्किंग कपल के नौकरी पर चले जाने के बाद घर और बच्चों की देखभाल करती हैं। घरेलू महिलाओं के हाथ में पैसा पहुंचाने वाले इन सुझावों के जो पहलू हैं उन्हें शायद हमारा पोंगापंथी पुरु ष-प्रधान समाज देखना गवारा न करे। काम के पैमाने को आधार मानते हुए एक नियंतण्र सव्रे में यह तय सामने आया है कि भारत में करोड़ों घरेलू महिलाओं के श्रम की कीमत 613 अरब डॉलर है। ध्यान रखना होगा कि परिवार और समाज की नींव महिलाओं के उन कायरे पर टिकी है, जो कहीं दर्ज नहीं होते। इसलिए जरूरी है कि रोजमर्रा के ग्रामीण और शहरी जीवन को बेहतर बनाने के लिए घरेलू महिलाएं जो योगदान दे रही हैं उसके महत्त्व को समझा जाए और उसकी आर्थिक-मानसिक भरपाई की जाए।

मनीषा सिंह

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