13-11-2023 (Important News Clippings)

13 Nov 2023
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IIT-Zanzibar Today, IIT-World Tomorrow

ET Editorials

The IIT brand needs no introduction. Over the decades, its star list of alumni has made IITs and India proud. Like all big and aspirational brands, IITs are now breaking into newer geograp- hies. This week, IIT-Madras became the first from the prestigio- us stable to open an international campus, inaugurating its campus in Zanzibar, a Tanzanian archipelago off the coast of East Africa. However, the decision to open a campus in this self- governing state is not just about securing a piece of the lucrati- ve higher education market. It also marks a new chapter in Indi- a’s foreign policy, which recognises and leverages higher tech- nical education as an essential arrow in its quiver of soft power. India’s education and skill-related ventures, particularly in Africa, have always been demand-driven and focused on country-level needs and priorities. The India Technical and Eco- nomic Cooperation (ITEC) programme, launched in 1964, the Pan African e-Net- work project and e-Vidyabharti, laun- ched in the 2000s, focused on capacity bu- ilding. The IIT campus takes this engage- ment to a different level and is rooted in India’s ‘partnership’ approach in its foreign policy engagement. The academic pro- grammes, curricula, student selection aspects and pedagogi- cal details will be finalised by IIT-Madras, while the capital and operating expenditure will be met by the Zanzibar Tanza- nian government. With the opening of the campus, India is helping meet the needs of Africa’s rising aspirational curve. The new campus will not only be a chance for students of the region to access high-quality education, and for India to dee- pen its engagement with the continent, but it is also a golden chance for IIT to focus on R&D and innovation on issues rele- vant to the developing world.


Over the top

The decision to expel Mahua Moitra smacks of political vendetta


The alacrity with which the Lok Sabha Ethics Committee went about recommending the expulsion of Trinamool Congress Member of Parliament (MP) Mahua Moitra from the lower House is certainly not a sign of any fidelity to ethics, or fairness. The recommendation is a brazenly partisan attempt to silence a critic of the government. It is also a warning shot meant to intimidate MPs from doing their job of holding the executive accountable. Neither the process nor the conclusions of the committee are grounded in any decipherable principle. The committee, with the help of the Ministry of Electronics and Information Technology found that the MP’s credentials were used online from Dubai 47 times to access the Parliament portal. Parliamentary questions were submitted from abroad. As Opposition members in the committee have pointed out, the drafting and the submission of questions are routinely done by aides of MPs. And MPs raise questions in Parliament based on representations from various constituents. To assume without solid evidence that any question is in exchange of material favours and then to expel an elected MP, is an assault on parliamentary democracy itself. The committee is calling upon the government to investigate the allegation of ‘quid pro quo’ raised by one of its members against Ms. Moitra, after holding her guilty, turning the principle of natural justice on its head.

If MPs are barred from sharing their login credentials with others, the rule must equally apply to one and all. Now that the committee has taken this extreme step of calling for the expulsion of an elected member from the House, thereby depriving the voters of her constituency representation, it should also investigate how other MPs prepare and submit parliamentary questions. The selective investigation of one MP, based on insinuations and conjectures, clearly comes out as what it is — intimidation. It is also in stark contrast with the tardy response of the Lok Sabha Committee of Privileges to a serious complaint against Bharatiya Janata Party MP Ramesh Bidhuri who used derogatory communal slurs against a fellow member in the Lok Sabha. That a member can abuse and threaten another member on the floor of the House is a matter of serious concern. That said, Ms. Moitra’s act of allowing a person who is not employed by her to execute official work on her behalf betrays a lack of discretion and judgement. This should act as a lesson for all those who seek to hold the government accountable: to keep themselves beyond reproach.


रोकना होगा तकनीक का दुरुपयोग

शशांक द्विवेदी, ( लेखक मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टुडे पत्रिका के संपादक हैं )

अभिनेत्री रश्मिका मंदाना का बीते दिनों एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें किसी और के चेहरे पर उनका चेहरा लगा दिया गया। वायरल वीडियो इंटरनेट मीडिया से जुड़ी एक हस्ती जारा पटेल का था, जिसे एडिट करके उनके चेहरे को रश्मिका मंदाना के चेहरे से बदल दिया गया। ऐसा डीपफेक तकनीक के जरिये किया गया। ऐसी तकनीकी छेड़छाड़ की शिकार अभिनेत्री कैटरीना कैफ भी हुई हैं। अन्य देशों में भी ऐसे मामले आ चुके हैं। ये मामले यही बताते हैं कि तकनीक का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। रश्मिका मंदाना का वीडियो सामने आने के बाद केंद्र सरकार हरकत में आई और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि डीपफेक वीडियो गलत सूचना का सबसे खतरनाक रूप हैं। प्रभावित लोगों को तुरंत एफआइआर दर्ज कराने को कहा गया, वहीं एक्स, इंस्टाग्राम और फेसबुक समेत सभी इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्मों से सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत शिकायत मिलने के 36 घंटे के भीतर छेड़छाड़ कर बनाई गई तस्वीरों-वीडियो हटाने के निर्देश दिए गए।

डीपफेक तकनीक के तहत किसी फोटो या वीडियो में दूसरे का चेहरा लगा दिया जाता है। इसमें मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ का सहारा लिया जाता है। इसमें वीडियो और आडियो को साफ्टवेयर की मदद से ऐसे तैयार किया जाता है कि फेक भी रियल दिखने लगे। वायस क्लोनिंग की वजह से अब आवाज भी हुबहू कापी की जा सकती है। इसके चलते लोगों को गलत संदेश जाता है और भ्रम फैलता है। डीपफेक शब्द पहली बार 2017 में इस्तेमाल हुआ। तब अमेरिका के सोशल न्यूज एग्रीगेटर रेडिट पर कई सेलिब्रिटीज के वीडियो पोस्ट किए गए। इनमें अभिनेत्री एमा वाटसन, गैल गैडोट, स्कारलेट आदि के कई वीडियो थे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से तकनीक जिस तेजी से बदल रही है और दुनिया को जिस तरह प्रभावित कर रही है, वह समस्याएं पैदा करने वाला है। ऐसी कई चीजें, जिनके बारे में हम कभी सोच भी नहीं सकते थे, वे भी तकनीक के माध्यम से सामने आ रही हैं। डीपफेक में वीडियो कुछ इस तरह से तैयार किए जाते हैं कि आवाज और हावभाव बिल्कुल वास्तविक लगते हैं। पहली नजर में पहचानना मुश्किल हो जाता है कि वीडियो असली है या नकली? ऐसे एआइ टूल और साफ्टवेयर आ गए हैं, जिनकी मदद से वीडियो से फेस को मार्फ कर दिया जाता है। इसे रोकना आसान नहीं। हालांकि तकनीकी कंपनियों द्वारा कुछ कदम उठाए गए हैं, लेकिन अभी वे पर्याप्त नहीं हैं। फेसबुक ने फेक कंटेट को रोकने के लिए सख्त कदम उठाया है। यूट्यूब भी डीपफेक की शिकायत मिलने पर उसे हटा देता है, लेकिन इंटरनेट के इस युग में इसे पूरी तरह रोकना मुश्किल है।

फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसी कंपनियों को कानून की भाषा में इंटरमिडिएरी कहते हैं। भारत में आइटी एक्ट की धारा 79 के तहत उन्हें कानूनी छूट प्राप्त है। इलेक्ट्रानिक्स और इन्फार्मेशन टेक्नोलाजी मंत्रालय ने इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स को डीपफेक्स का दुरुपयोग होने पर अपनी एडवाइजरी में इन्फो टेक्नोलाजी एक्ट, 2000 की धारा 66डी का जिक्र करते हुए तत्काल कार्रवाई करने की बात कही है। डीपफेक तकनीक का पिछले कुछ वर्षों में काफी गलत इस्तेमाल हुआ है। साइबर अपराधी इसका धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं। इसका सबसे अधिक दुरुपयोग अश्लील वीडियो या तस्वीरें बनाने में हो रहा है। जानी-मानी हस्तियों के साथ भी इस तकनीक के जरिये खिलवाड़ हो रहा है। प्रारंभ में इसका उपयोग मनोरंजन के लिए हो रहा था, लेकिन अब उसका दुरुपयोग दुष्प्रचार करने और भ्रम फैलाने के लिए किया जा रहा है। इसके अलावा पोर्न वीडियो बनाने में भी किया जा रहा है।

लोग अपनी तरफ से सावधानी बरतकर ही इस तकनीक के दुरुपयोग से बच सकते हैं। डीपफेक बनाने वाले लोग सबसे पहले लक्षित शख्स के बारे में पर्याप्त सूचनाओं का संग्रह करते हैं। इसलिए सार्वजनिक तौर पर अपनी तस्वीरें और वीडियो साझा करने से बचें, क्योंकि डीपफेक के लिए अधिक तस्वीरें और वीडियो जमा की जाती हैं, ताकि शख्स का हाव-भाव उकेरा जा सके। डीपफेक वीडियो बनाने और साझा करने पर आइपीसी की धारा के तहत कार्रवाई हो सकती है। यदि किसी की छवि खराब होती है तो मानहानि का दावा भी किया जा सकता है। इस मामले में इंटरनेट मीडिया कंपनियों के खिलाफ भी आइटी नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती है। आइटी मंत्रालय की एडवाइजरी के अनुसार यूजर्स की शिकायत मिलने के बाद डीपफेक कंटेंट को तुरंत हटाना होगा। हाल में यूरोपियन यूनियन ने डीपफेक तकनीक के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए एआइ एक्ट के तहत ‘कोड आफ प्रैक्टिस आन डिसइन्फार्मेशन’ लागू किया है। इसके तहत गूगल, मेटा, एक्स सहित कई कंपनियों को अपने प्लेटफार्म पर डीपफेक और फेक अकाउंट्स रोकने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे। इन्हें लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। कानून तोड़ने पर कंपनी को वार्षिक राजस्व का छह प्रतिशत जुर्माना देना पड़ेगा।

तकनीक के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी चिंता जता चुके हैं। छेड़छाड़ कर किसी की भी तैयार की गई फोटो या वीडियो सार्वजानिक करने को गंभीर अपराध माना जाना चाहिए, क्योंकि यह किसी की निजता को सीधे प्रभावित करता है और उससे उसकी जिंदगी या करियर तबाह हो सकता है। भारत को डीपफेक और इस जैसी अन्य तकनीक के दुरुपयोग से निपटने के लिए एक प्रभावी कानूनी और नियामकीय ढांचे की जरुरत है, क्योंकि फोटो और वीडियो से छेड़छाड़ कर गलत एवं भ्रामक सूचनाएं फैलती रहती हैं। इसके चलते कई बार कानून एवं व्यवस्था के समक्ष भी संकट खड़ा हो जाता है।


नाकाम नगर निकाय


एक समय था, जब सर्दियों में वायु प्रदूषण केवल दिल्ली और उसके आसपास के शहरों की ही समस्या हुआ करता था, लेकिन अब उसका दायरा बढ़ गया है वायु प्रदूषण पूरे उत्तर भारत की समस्या बन गया है। सच तो यह है कि धीरे-धीरे वह उत्तर भारत के साथ मध्य और पूर्वी भारत के भी कुछ इलाकों को अपनी चपेट में लेता दिख रहा है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस बार मुंबई से लेकर कोलकाता सरीखे शहर भी प्रदूषण की चपेट में हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर जैसे शहरों में भी वायु की गुणवत्ता खराब होती दिखी। यही हाल बिहार के कई शहरों में भी दिखा। कुछ दिन पहले तो पटना में वायु प्रदूषण दिल्ली जैसा पाया गया। ऐसा नहीं है कि उत्तर-मध्य भारत के केवल बड़े शहर ही वायु प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं। छोटे शहरों में भी प्रदूषण बढ़ रहा है, लेकिन वहां की जहरीली होती हवा के बारे में वैसी चीख-पुकार नहीं मचती, जैसी देश के बड़े शहरों को लेकर मचती है। चिंता की बात यह है कि कई ऐसे छोटे शहरों में वायु की गुणवत्ता का स्तर कहीं अधिक खराब पाया गया, जहां आबादी अपेक्षाकृत कम है। स्पष्ट है कि वह दिन दूर नहीं, जब उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके भी वायु प्रदूषण की चपेट में होंगे। ऐसा न होने पाए इसके लिए तत्काल प्रभाव से चेतना होगा-न केवल सरकारों को, बल्कि उनके नगर निकाय के साथ आम जनता को भी।

जब दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण गंभीर रूप ले लेता है, तब तो केंद्र सरकार के साथ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और सुप्रीम कोर्ट भी सक्रिय हो जाता है, लेकिन देश के अन्य शहरों में वायु प्रदूषण कितना भी गंभीर रूप ले ले, कहीं कोई चेतता हुआ नहीं दिखता। इसका प्रमुख कारण यह है कि राज्य सरकारें और उनके नगर निकाय तथा प्रदूषण की रोकथाम के लिए जवाबदेह एजेंसियाँ वायु प्रदूषण को लेकर गंभीर नहीं जब तक राज्य सरकारें नगर निकायों और प्रदूषण की रोकथाम करने वाली एजेंसियों को जवाबदेह नहीं बनातीं, तब तक बात बनने वाली नहीं है। चूंकि नगर निकाय प्रदूषण की रोकथाम के लिए कुछ नहीं करते, इसलिए औसत लोग भी इससे अनजान हैं कि उन्हें वायुमंडल को जहरीला होने से बचाने के लिए अपने स्तर पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं? जब यह स्पष्ट हो चुका है कि वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट पैदा करता है, तब फिर राज्य सरकारों को उसकी रोकथाम के लिए सक्रिय होना ही होगा। उन्हें यह समझना होगा कि वायु प्रदूषण की रोकथाम में नगर निकाय नाकाम साबित हो रहे हैं। यदि वायु प्रदूषण से निपटने के मामले में सजगता नहीं बरती गई तो हमारे शहर रहने लायक नहीं रहेंगे। यह समय की मांग है कि राज्य सरकारें नगर निकायों को वायु प्रदूषण के लिए जवाबदेह बनाएं।


लोकतंत्र के जातितंत्र में बदलने का खतरा

डा. सुशील पांडेय, ( लेखक बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ में प्राध्यापक हैं। )

आजादी के बाद भारत में लोकतंत्र को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा गया, जो न केवल औपनिवेशिक शोषण को समाप्त कर सकती है, अपितु अपने नागरिकों को सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त बनाकर एक महान राष्ट्र के स्वप्न को साकार कर सकती है। भारत का राष्ट्रीय आंदोलन ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं था, अपितु इसमें अपने नागरिकों के लिए एक आदर्श समाज स्थापित करने की कल्पना भी शामिल थी। स्वतंत्रता आंदोलन में अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान देने वाले महापुरुषों ने अपनी जाति और संकीर्ण हितों के लिए बलिदान नहीं दिया था। आज भारत एक विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। और अपने अमृतकाल में कई महत्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक लक्ष्य को प्राप्त कर चुका है। ऐसे अवसर पर कुछ नेता राजनीतिक स्वार्थ के लिए स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को भूलकर जाति की पहचान पर जोर दे रहे हैं। इससे लोकतंत्र के उद्देश्य धूमिल हो सकते हैं।

लोकतंत्र और जाति को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है, क्योंकि जाति असमानता और लोकतंत्र समानता के मूल्यों पर आधारित है। लोकतंत्र का उद्देश्य किसी व्यक्ति, जाति अथवा वर्ग का विकास नहीं है, अपितु समाज के कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में शामिल करके समाज का सर्वांगीण विकास करना है। डा. आंबेडकर का मानना था कि लोकतंत्र और आधुनिक शिक्षा जातीय असमानता को समाप्त कर देंगे। भगत सिंह ने इंट्रोडक्शन टू ड्रीमलैंड में लिखा था, “स्वतंत्र भारत का दृष्टिकोण केवल ब्रिटिश राज से मुक्ति प्राप्त करना नहीं, अपितु जाति, पंथ और आर्थिक स्थिति के नाम पर मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से मुक्त समाज बनाना भी है।”

भारत में बढ़ते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव को कम करने के लिए अंग्रेजों ने 1909 में सबसे पहले मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मंडल प्रदान किया। 1919 और 1935 के अधिनियम में कई अन्य जातियों को भी पृथक निर्वाचन मंडल प्रदान किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत निश्चित जाति और संप्रदाय के समूह राजनीतिक संस्थाओं के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते थे। 1932 में सांप्रदायिक अधिनिर्णय के अंतर्गत दलित वर्ग को भी हिंदुओं से अलग माना गया और उन्हें पृथक निर्वाचन मंडल प्रदान किया गया। महात्मा गांधी ने इस निर्णय के विरुद्ध आमरण अनशन किया और अंततः प्रसिद्ध पूना समझौता हुआ। आजादी के बाद भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किया और जाति और मजहब की विभाजनकारी पहचान को अस्वीकार कर दिया।

देश की आजादी के बाद जाति जनगणना की मांग की गई, लेकिन देसी रियासतों के एकीकरण द्वारा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसे अस्वीकार कर दिया और इसे राष्ट्र की एकता में बाधा पहुंचने वाली प्रक्रिया माना । भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में जाति व्यवस्था पर आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण आंदोलन हुए और जाति पहचान को समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्न किए गए। केरल में श्री नारायण गुरु ने एक जाति, एक मानव का नारा दिया, वहीं डा. आंबेडकर ने जाति के उन्मूलन और समानता पर आधारित समाज का सपना देखा। आज भारत में जाति व्यवस्था के संदर्भ में दोहरी प्रवृत्ति सामने आ रही है। आधुनिक राजनीतिक, न्यायिक परिवर्तनों, सामाजिक-आर्थिक सुधार, आधुनिक शिक्षा, आधुनिक व्यवसायों के विकास, शहरीकरण और बाजार अर्थव्यवस्था के विकास के कारण जाति व्यवस्था के स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव आया है। जाति के बंधन कमजोर हुए हैं, लेकिन राजनीतिक लाभ और अवसर प्राप्त करने के लिए विभिन्न जाति समूह तेजी से गोलबंद हो रहे हैं। जातियाँ राष्ट्रीय स्तर पर अपने संगठन बना रही हैं। और आर्थिक, राजनीतिक लाभ के लिए सरकारों पर निरंतर दबाव बना रही हैं। राजनीति को लोक कल्याण का माध्यम न मानकर सत्ता प्राप्त करने का अवसर समझने वाले नेताओं ने जातियों को संगठित करना प्रारंभ कर दिया। जाति आधारित राजनीतिक दल बनने लगे और संकीर्ण हितों के लिए अन्य जातियों पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास प्रारंभ किया गया, इससे अन्य जातियों के लोग सक्रिय हुए। इससे लोकतंत्र के जाति तंत्र में बदलने का खतरा सामने आ गया।

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के आधार पर नए भारत का निर्माण किया गया और उसमें सभी क्रांतिकारियों और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले महापुरुषों के सपनों को शामिल किया गया। आजादी के 75 वर्षों में भारत ने अपने नागरिकों के त्याग और अथक परिश्रम के बल पर अपनी वैश्विक पहचान बनाई है। आज भारत अपनी युवा शक्ति के बल पर विज्ञान, तकनीक, खेल, शिक्षा और अर्थव्यवस्था में नए कीर्तिमान बना रहा है। आज भारत की युवा पीढ़ी आधुनिक और वैश्विक दृष्टिकोण से प्रेरित है और राष्ट्रवाद उसके रंग-रग में है।

लोकतंत्र में एक परिवार की तरह सभी का विकास और समान अवसर अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। राष्ट्र को आगे बढ़ाने के लिए सभी के सहयोग और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। समाज के वंचित वर्ग की उचित पहचान और उन्हें मुख्यधारा में लाने के उपाय को लागू करने की आवश्यकता है। समाज में वंचित वर्ग की पहचान जाति या मजहब के आधार पर न करके उनकी आवश्यकताओं और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका के आधार पर की जानी चाहिए। जाति के आधार पर पहचान स्पष्ट करने से राष्ट्र निर्माण के सामने कई संकट सामने आएंगे। जातियों में आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सभी जातियां अपनी संख्या बढ़ाने का निरंतर प्रयास प्रारंभ कर देगी। एक राष्ट्र के रूप में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां पहले से ही मौजूद हैं, जाति पहचान पर जोर देने से संकट और गहरा हो जाएगा। जातीय पहचान पर जोर देने की मांग न सिर्फ राष्ट्र की प्रगति में बाधा है, अपितु स्वतंत्रता आंदोलन के सपनों और आदर्शों को चुनौती देने वाला कदम भी है। स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को श्रद्धांजलि राष्ट्रीय मूल्यों और विरासत के आधार पर नए भारत के निर्माण द्वारा दिया जाना चाहिए। जनतंत्र में जाति नहीं, जन महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र जाति तंत्र में न बदलने पाए।


मोइत्रा की बढ़ीं मुश्किलें


तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की सांसदी जाना लगभग तय है। पैसों के बदले सवालों के आरोपों से घिरी इस सांसद पर आचार समिति की रपट को बहुमत से स्वीकार किया गया। अब इस पर लोक सभा की सहमति से निर्णय लिया जाएगा। समिति के छह सदस्यों ने इसका समर्थन किया, जबकि चार विरोध किया है। आचार समिति द्वारा दो बार सुनवाई की गई। हालांकि ड्रॉफ्ट रिपोर्ट तैयार करने के बाद बुलाई गई बैठक में पंद्रह में से दस सदस्य ही मौजूद थे। इसलिए बहुमत के आधार पर पांच सौ पन्नों की रपट बनाई गई, जिसमें मामले से जुड़े तथ्यों के तौर पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे व वकील जय अनंत देहाद्राई से किए गए तमाम सवालों के जवाब शामिल होने की उम्मीद है। उन्होंने मोइत्रा के आचरण को आपत्तिजनक व अनैतिक बताते हुए सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की। मोइत्रा ने किसी भी तरह के आर्थिक लाभ का इनकार करते हुए, पहले बीआई को अडानी समूह पर कथित कोयला घोटाले पर एफआरआई दर्ज करने को कहा। यह दावा भी किया कि यदि उनकी सांसदी जाती है तो वह अगले लोक सभा चुनाव में बड़े अंतर के साथ जीत कर आएंगी। यह मामला ऐसे समय उछला है, जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी चालू है। मोइत्रा तेजतर्रार छवि वाली पढ़ी-लिखीं संसद सदस्य हैं। हालांकि वे कई दफा विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहती हैं, परंतु उनकी जैसी प्रबुद्ध व युवा स्त्रियों के संसद तक पहुंचने के सार्थक संदेश समाज भर में जाते हैं। बड़ा वर्ग यह भी तोहमत लगाता है कि विपक्षी दल की सदस्य होने के नाते उन्हें निशाने पर रखा गया। अलबत्ता उनकी खुद की पार्टी इस पर मुंह मोड़ती नजर आई। कुछ दिनों पहले टीएमसी के राज्य सभा सदस्य डेरिक ब्रायन ने कहा था कि इस विवाद पर समिति के अंतिम निर्णय के उपरांत ही दल अपना मत रखेगा। दूसरे, समिति के सभी सदस्यों की अनुपस्थिति संदेह उपजाती है। जिन पर राय रखने की अनिवार्यता जारी की जा सकती थी । संसद की गरिमा व प्रतिष्ठा को लेकर किसी तरह का समझौता किया जाना उचित तो नहीं कहा जा सकता मगर आने वाले चुनाव मोइत्रा का भविष्य तय करने की जिम्मेदारी निभाने वाले साबित होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।


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