10-04-2026 (Important News Clippings)
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Date: 10-04-26
Atomnirbhar Bharat
Fast breeder reactor at Kalpakkam is a tech milestone. Next step: learn to use abundant thorium deposits.
TOI Editorials

India joined a high-tech club of two this week. It is now the only other country, besides Russia, to have an operational fast breeder reactor (FBR) – a nuclear reactor that makes more fuel than it consumes. Best part is, the prototype FBR at Kalpakkam, Tamil Nadu, has been designed and built indigenously. FBRs have been part of India’s nuclear energy plans for decades. They are crucial because India has little uranium of its own to fuel conventional nuclear plants. What it does have is roughly a quarter of world’s thorium, which can potentially be turned into nuclear fuel in FBRs. We aren’t there yet, but it’s a leap we need to make, for energy security. By some estimates, India’s thorium reserves can generate 500GW electricity – twice the peak power demand of 2024-25 – every year, for the next 400 years.
As world’s fastest growing major economy, India will need a lot more energy than it generates now. For a rough idea, China’s peak demand last July was six times India’s. That’s why we need every energy type – coal, gas, solar, wind, nuclear – in the mix. Although nuclear plants produce hazardous waste, they have a negligible carbon footprint. And by using waste from conventional nuclear plants as fuel, FBRs make nuclear energy even cleaner. India’s goal of increasing nuclear power capacity, from 9GW in 2025 to 100GW by 2047, shows will. And last year’s Shanti Act, which makes the nuclear power sector attractive to private firms, leaves no doubt about intent.
Other nations are also scaling up nuclear energy plans. Over 60 new reactors are under construction around the world. Where net nuclear capacity shrank last decade, it has expanded in the 2020s, and will continue doing so through the 2030s. Amid this boom, attacks on Iran’s Bushehr nuclear plant, and before that on Ukraine’s Zaporizhzhia plant, raise concerns about safety. Although nuclear plants have many built-in safeguards against accidents, they can’t withstand deliberate ballistic strikes. And 40 years ago, Chernobyl showed that a damaged nuclear plant, is as bad as a bomb. Even now, a 30km zone around the damaged plant remains uninhabitable. So, while we go about adding nuclear capacity, we must demand strict enforcement of the old red lines of nuclear safety.
देश के परमाणु- वैज्ञानिक धन्यवाद के पात्र हैं….
संपादकीय
भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु ऊर्जा शोध में एक क्रांति की है, जो दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण और अक्षय ऊर्जा का नया पैगाम है। ताजा खबर के अनुसार कलपक्कम स्थिति प्रोटो-टाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने दशकों के शोध के बाद क्रिटिकैलिटी स्टेज हासिल कर ली है। इस स्टेज में रिएक्टर में स्वस्फूर्त रिएक्शन श्रृंखला से ब्रीडर में ऊर्जा पैदा करने से न्यूट्रॉन्स का क्षरण नहीं होता । भारत में ऊर्जा कार्यक्रम को तीन स्टेज में बांटा गया है- प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर, एफबीआर और थोरियम – बेस्ड रिएक्टर | दूसरे स्टेज के प्रोटोटाइप (50 किलोवॉट) की सफलता के बाद अब कॉमर्शियल उत्पादन शुरू किया जा सकेगा। इससे भी खुशी की बात यह है कि यह पहले और तीसरे स्टेज के बीच का सोपान है। चूंकि तीसरे स्टेज पर शोध भी परवान चढ़ चुका है लिहाजा इस सफलता से थोरियम को परमाणु संयंत्र का मुख्य ईंधन बनाने की प्रक्रिया बेहद तेज होगी। तीसरे स्टेज में आने का मतलब होगा सदियों तक ऊर्जा सुरक्षा, क्योंकि भारत में दुनिया का एक-चौथाई थोरियम भंडार है। याद होगा कि भारत द्वारा एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने से परमाणु फ्यूल यूरेनियम हासिल करने में बड़ी ताकतों ने 34 साल तक रुकावट डाली थी और अंततः अमेरिका ने कुछ शर्तों के साथ 2008 में सिविल न्यूक्लियर की थी। देश के परमाणु वैज्ञानिकों को धन्यवाद !
Date: 10-04-26
तेल-संकट ने दुनिया की नई कमजोरियों को उजागर किया
रुचिर शर्मा, ( ग्लोबल इन्वेस्टर व बेस्टसेलिंग राइटर )

ईरान युद्ध से उपजे तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई कमजोरी को उजागर किया है। इससे पहले दुनिया ने कभी भी इतने ऊंचे राजकोषीय घाटे और कर्ज के स्तरों के साथ किसी संकट में प्रवेश नहीं किया था। यह बोझ एनर्जी की ऊंची कीमतों के प्रभाव को कम करने की सरकारों की क्षमता घटाएगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पहले तेल-झटके 1970 के दशक में लगे थे और एक नए युग की शुरुआत के साथ जुड़े थे, जब सरकारों ने बजट-घाटे को कभी-कभार के बजाय नियमित रूप से चलाना शुरू किया। लेकिन उस समय अमेरिका और अन्य प्रमुख देशों में सामान्य घाटा जीडीपी का लगभग 2% था।
आज औसत घाटा इसके दोगुने से अधिक हो चुका है और इसके परिणामस्वरूप जी-7 देशों का औसत सरकारी कर्ज-स्तर जीडीपी के 20% से बढ़कर 100% से अधिक हो गया है। सरकारें अतीत की तरह ही इन झटकों का सामना करने की कोशिश कर रही हैं।
यूके और फ्रांस से लेकर ब्राजील और भारत तक- सरकारें परिवहन से लेकर खाना पकाने तक विभिन्न प्रकार के ईंधनों पर मूल्य नियंत्रण, राशनिंग योजनाएं और सब्सिडी लागू कर रही हैं। लेकिन इस बार वे इन राहत उपायों को वहन करने की स्थिति में नहीं हैं और वैश्विक बांड-बाजार खर्चों में बढ़ोतरी को लेकर चेता रहे हैं।
आम तौर पर संकट के समय दीर्घकालिक ब्याज दरें घटती हैं, क्योंकि बाजार धीमी ग्रोथ और आसान मौद्रिक नीति की अपेक्षा करते हैं। आज दीर्घकालिक मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन बाजार को आशंका है कि ईरान से जुड़े तेल-झटके के कारण पहले से तेजी से बढ़ रहे घाटों और कर्ज के ऊपर अतिरिक्त सरकारी खर्च बढ़ेगा, जिसके चलते बांड पर उच्च टर्म प्रीमियम की मांग हो रही है।
पिछले वर्ष, कुल वैश्विक कर्ज रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो वैश्विक जीडीपी के तीन गुना से भी अधिक है। इससे बहुत कम सरकारें ऐसी स्थिति में बची हैं, जो नए प्रोत्साहन पैकेज लागू कर सकें।
केंद्रीय बैंक भी इसी तरह की दुविधा में हैं। हाल के दशकों में वे सरकारों के साथ मिलकर संकट के पहले संकेत पर प्रोत्साहन उपायों का विस्तार करते रहे हैं, लेकिन अब ऐसा करना आसान नहीं रह गया है। फेडरल रिजर्व अपने 2% मुद्रास्फीति लक्ष्य को 60 महीनों से हासिल नहीं कर पाया है।
हाल के समय में विकसित देशों के चार में से तीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हर दो में से एक केंद्रीय बैंक अपने लक्ष्य से चूक रहे हैं। अगर तेल-संकट अर्थव्यवस्थाओं की गति धीमी कर दे, तब भी केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करने में सक्षम नहीं होंगे, क्योंकि यही संकट मुद्रास्फीति को भी बढ़ाता है।
सबसे ज्यादा मुश्किल में वे देश हैं, जहां सरकारी कर्ज और राजकोषीय घाटा ऊंचा है और जिनके केंद्रीय बैंक अपने मुद्रास्फीति लक्ष्य को हासिल नहीं कर पा रहे हैं। विकसित दुनिया में इनमें अमेरिका और यूके शामिल हैं; जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक जोखिम ब्राजील, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों को है।
भारत भी कोई बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसका सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय घाटा ऊंचा है। सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि बढ़ती तेल कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर न पड़े, विशेषकर विधानसभा चुनावों के मद्देनजर।
जहां अन्य सभी प्रमुख तेल-उपभोक्ता देशों में फरवरी के बाद से कीमतें 25% या उससे अधिक बढ़ चुकी हैं, वहीं भारत ऐसा एकमात्र देश है जहां अभी तक कोई वृद्धि नहीं हुई है। लेकिन यह मूल्य-नियंत्रण टिकाऊ नहीं है और इससे युद्ध से निर्मित हुई अनिश्चितता के प्रभावों को भी रोका नहीं जा सका है।
हालांकि अमेरिका एनर्जी पर अपनी आत्मनिर्भरता के कारण तेल-संकट से अपेक्षाकृत सुरक्षित है, फिर भी वह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि पिछले वर्ष उसका राजकोषीय घाटा विकसित दुनिया में सबसे अधिक, लगभग 6% जीडीपी के बराबर था।
अमेरिका अब इस तरह से खर्च करने का आदी हो चुका है, मानो कोई सीमा ही न हो। पिछले वर्ष ट्रम्प ने रक्षा व्यय में 150 अरब डॉलर की बढ़ोतरी की, और अब इसे तीन गुना और बढ़ा दिया। इससे राजकोषीय घाटा जीडीपी के 7% तक पहुंच सकता है।
पिछले वर्ष, कुल वैश्विक कर्ज रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो कि वैश्विक जीडीपी का तीन गुना से भी अधिक है। इससे आज बहुत कम सरकारें ऐसी स्थिति में बची हैं, जो नए प्रोत्साहन पैकेज लागू कर सकें।
खतरे में युद्धविराम
संपादकीय
यह निराशाजनक है और चिंताजनक भी कि 40 दिनों के घमासान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच जिस युद्धविराम पर सहमति बनी, वह लागू होने के पहले ही खटाई में पड़ता दिख रहा है। इसका कारण यह है कि लेबनान में इजरायल के हमले थमे नहीं। इजरायल का कहना है कि लेबनान पर हमले रोकना युद्धविराम समझौते का हिस्सा नहीं था। अमेरिका भी यही कह रहा है, लेकिन ईरान इससे सहमत नहीं और वह होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने से पीछे हट गया है।
स्पष्ट है कि यदि इजरायल के लेबनान पर हमले जारी रहते हैं तो पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता से जिस युद्धविराम पर सहमति बनी और जिसके कारण विश्व ने राहत की सांस ली, वह लागू ही नहीं हो सकेगा। इसके लागू होने के आसार इसलिए भी कम होते दिख रहे हैं, क्योंकि इजरायल के लेबनान पर हमलों के जवाब में ईरान खाड़ी देशों को निशाना बना रहा है और उधर अमेरिका धमकी भरे स्वर में कह रहा है कि युद्धविराम लागू न होने पर उसकी सेनाएं ईरान पर हमले के लिए तैयार हैं।
युद्धविराम कितनी नाजुक स्थिति में है, इसका पता इससे भी चलता है कि वार्ता के लिए ईरान का जो प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचने वाला था, उसका फिलहाल वहां जाना तय नहीं। इस सबके बीच जिन शर्तों पर युद्धविराम पर सहमति बनी थी, उन्हें लेकर अमेरिका और ईरान अलग-अलग दावे कर रहे हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वे उनकी मंशा सही तरह समझे नहीं। ऐसा तभी होता है, जब अविश्वास चरम पर होता है और विरोधी पक्ष एक-दूसरे के प्रति संशय से भरे होते हैं। इस संशय का एक कारण पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता भी है।
अब यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान मध्यस्थता का नहीं, संदेश वाहक का काम रहा रहा था। लगता है वह यह काम भी ढंग से नहीं कर सका या फिर शांति का वाहक बनने की हड़बड़ी में उसने एक-दूसरे को संदेश देने में गफलत की या जानबूझकर ऐसे संदेशों का आदान-प्रदान किया, जो भ्रम पैदा करने वाले रहे। यह समझना कठिन है कि अमेरिका ने क्या सोचकर पाकिस्तान को अपना हरकारा बनाया, क्योंकि उसका इजरायल से कोई संपर्क-संवाद ही नहीं और ईरान भी उस पर बहुत भरोसा नहीं करता।
यदि अमेरिका और ईरान वास्तव में युद्धविराम कर बातचीत के माध्यम से विवादों का हल करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसे किसी भरोसेमंद मध्यस्थ का चयन करना होगा, जिसकी कुछ साख हो। दोनों ही पक्षों को यह समझना होगा कि युद्धविराम केवल उनके या फिर पश्चिम एशिया के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए आवश्यक है, क्योंकि होर्मुज समुद्री मार्ग बाधित होने से विश्व अर्थव्यवस्था गहरे संकट का सामना कर रही है। इस मार्ग के बंद होने से उपजे ऊर्जा संकट से पूरी दुनिया में उद्योग-धंधे प्रभावित हो रहे हैं।
Date: 10-04-26
अस्थिर युद्धविराम
संपादकीय
अमेरिका और ईरान के बीच रूप से स्वागत किया गया लेकिन इस घोषणा के दो दिन बाद भी तनाव बना हुआ है जो स्थायी शांति की संभावनाओं को क्षति पहुंचा सकता है। यहां तक कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैस के इस सप्ताहांत बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचने के ऐन पहले इजरायल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रखने को लेकर विवाद बना हुआ है। इजरायल ईरान समर्थित हिजबुल्लाह को नष्ट करना चाहता है। ईरान ने इन हमलों को युद्ध विराम का गंभीर उल्लंघन बताया है। वहीं इजरायल का दावा है कि लेबनान युद्धविराम समझौते के दायरे में नहीं था । वेस ने भी इस बात की पुष्टि की है। जाहिर है कि यह ईरान के गहन विश्वास को दूर करने वाला घटनाक्रम तो नहीं है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सिनेमाई भाषा में धमकियां देना और तीव्र कर दिया है। यह वातावरण संघर्षविराम के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। संघर्षविराम की आवश्यकता अमेरिका और उसके सहयोगियों को भी उतनी ही है जितनी कि ईरान को ।
इसमें दो राय नहीं कि 41 दिनों की हिंसा, विनाश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उथलपुथल के बावजूद न तो अमेरिका और न ही इजरायल अपने तय लक्ष्यों को हासिल कर सके। ऐसे में संवाद की प्रक्रिया बहुत अधिक स्वागतयोग्य है। चूंकि अमेरिका ने वार्ता का नेतृत्व करने के लिए बैंस को शामिल करने के ईरान के अनुरोध को स्वीकार किया, इसे एक निकासी योजना भी माना जा सकता है। हालांकि, ईरानी पक्ष के लिए जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ का इसमें शामिल होना शायद ही कोई राहत की बात हो, क्योंकि इससे पहले हुई विफल वार्ता की अगुआई इन्हीं दोनों ने की थी। अमेरिकाने जिन 10 बिंदुओं को वार्ता के आधार के रूप में स्वीकार किया है उनके विवरण अस्पष्ट हैं लेकिन होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की शर्त के तौर पर दोनों पक्षों द्वारा कथित तौर पर अपनाए गए अतिवादी रुख से यह संकेत मिलता है कि किसी साझा सहमति तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
अमेरिका की शर्तों में ईरान द्वारा अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का परित्याग और परमाणु हथियार न रखने की प्रतिबद्धता, अमेरिकी निगरानी में होमुंज स्ट्रेट को दोबारा शुरू करना, ईरान- समर्थित क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों का विघटन और अनुपालन की निगरानी के लिए अमेरिकी सैनिकों की निरंतर उपस्थिति शामिल हैं। मीडिया में रिपोर्ट की गई ईरान की शर्तें अमेरिका की मांगों का प्रतिबिंब प्रतीत होती हैं, जिनमें अमेरिका से आक्रामकता न करने की मौलिक प्रतिबद्धता, होमुंज स्ट्रेट से नियंत्रित आवाजाही, सभी प्रतिबंधों का हटाया जाना, युद्ध क्षति का पूर्ण मुआवजा, और इन मुद्दों की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव में पुष्टि शामिल है। संयुक्त राष्ट्र से अनुमोदन पर जोर उल्लेखनीय है। यह संकेत देता है कि ईरान बहुपक्षीय नियम-आधारित संस्थानों के साथ तालमेल में रहने के लिए उत्सुक है, इसके विपरीत अमेरिका ने ईरान पर हमलों में संयुक्त राष्ट्र नियमों का खुला उल्लंघन किया है।
यातां का परिणाम चाहे जो भी हो, स्थायी शांति वास्तव में इस पर निर्भर करेगी कि क्या अमेरिका परमाणु हथियारों से लैस इजरायल की ‘ग्रेटर इजरायल’ की चाह में बसे हुए लोगों के खिलाफ हिंसा को रोकने का विकल्प चुनता है। वास्तव में, यदि इस नवीनतम युद्ध ने किसी बात को रेखांकित किया है, तो वह क्षेत्र की सुरक्षा संरचना का मौलिक पुनर्संयोजन है, जो अमेरिका या इजरायल के लिए लाभकारी होने की संभावना नहीं है। ईरान के इजरायल और पश्चिम एशियाई सहयोगी देशों में स्थित अमेरिकी परिसंपत्तियों पर लगातार हमलों ने अमेरिका की सुरक्षा छतरी में खामियों को उजागर कर दिया, जिससे 2020 के अब्राहम समझौते का महत्त्व कमजोर हो गया। क्षेत्रीय नेताओं ने समझ लिया है कि वे अब सुरक्षा के लिए दुनिया की एकमात्र महाशक्ति पर भरोसा नहीं कर सकते। वे संयुक्त कूटनीतिक प्रयासों पर आपस में चर्चा कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 8-9 अप्रैल को ईरान और सऊदी अरब के निदेश मंत्रियों ने कथित तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा करने के लिए फोन पर बातचीत की, जो युद्ध शुरू होने के बाद पहला आधिकारिक संपर्क था। वार्ता का परिणाम चाहे जो भी हो, पश्चिम एशिया के हालात दिलचस्प मोड़ ले रहे हैं।
Date: 10-04-26
दरों में बढ़ोतरी पर लंबे समय तक रोक
तमल बंदोपाध्याय, ( लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं )
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली मौद्रिक नीति में कोई आश्चर्य का तत्त्व नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की छह सदस्यीय दर निर्धारण संस्था, मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत दर को 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा। यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। एमपीसी ने ‘तटस्थ’ रुख बनाए रखने का भी निर्णय लिया।
नीति का रुख भले ही सख्त न हो, लेकिन आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा भविष्य में दरों में बढ़ोतरी से पहले बाजार को लंबे ठहराव के लिए तैयार करते नजर आ रहे हैं। फिलहाल, भविष्य में दरों के रुझान को दर्शाने वाला ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (ओआईएस) मार्केट इस साल तीन बार दरों में बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहा है। हालांकि ऐसा होने की संभावना कम है, लेकिन भविष्य में बढ़ोतरी हो सकती है। कब ? जल्द नहीं अमेरिका इजरायल- ईरान युद्ध में दो सप्ताह के संघर्ष विराम ने स्थिति को कुछ हद तक बदल दिया है, हालांकि यह बदलाव अस्थायी है।
बुधवार को 10 साल की बॉन्ड की बील्ड गिरकर 6.90 फीसदी हो गई, जो मंगलवार के बंद भाव से 14 आधार अंक कम है। रुपया 42 पैसे मजबूत होकर 92.58 डॉलर प्रति डॉलर पर बंद हुआ। शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल आई। हालांकि नीति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ, लेकिन बुधवार को घोषित युद्धविराम से बाजारों में उत्साह का माहौल बन गया। एमपीसी ने यह स्वीकार किया है कि पश्चिम एशिया संघर्ष की तीव्रता और अवधि तथा ऊर्जा एवं अन्य अवसंरचना पर इसका प्रभाव मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि दोनों के दृष्टिकोणों के लिए जोखिम बढ़ा रहा है। इस समय बदलते हालात और वृद्धि मुद्रास्फीति के बदलते दृष्टिकोण पर नजर रखने का निर्णय लिया गया है। आरबीआई सतर्क रहेगा, प्राप्त सूचनाओं पर बारीकी से नजर रखेगा और जोखिमों के संतुलन का आकलन करेगा।
संकेत स्पष्ट है यदि अनिश्चितताएं जारी रहती हैं और आपूर्ति पक्ष का झटका तेज होता है, तो दरों में वृद्धि होगी।
नीतिगत वक्तव्य जारी करने के बाद गवर्नर ने मीडिया से बातचीत में दरों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, ‘जैसा कि मैंने पहले भी बताया, यह पूरी तरह संभव है कि कम दरें लंबे समय तक जारी रहेंगी। संरचनात्मक रूप से, भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत, बहुत लचीली और बहुत सुदृढ़ है… सरकार, आरबीआई और विभिन्न संस्थाओं द्वारा उठाए गए विभिन्न उपायों के कारण संरचनात्मक रूप से दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक बुनियादी तत्त्व बहुत मजबूत हैं और वृद्धि को गति प्रदान कर रहे हैं, साथ ही साथ कीमतों पर दबाव को भी नियंत्रित रख रहे हैं। इसलिए, यह संभव है कि अल्पावधि से मध्यम अवधि में भी दरें कम बनी रहेंगी। ‘
गवर्नर ने अपने वक्तव्य में पांच महत्त्वपूर्ण चिंताओं को उजागर किया। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से आयातित मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, वहीं ऊर्जा बाजारों, उर्वरकों और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति में व्यवधान से उद्योग, कृषि और सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन में कमी आ सकती है।
बात यहीं खत्म नहीं होती। बढ़ती अनिश्चितता, जोखिम से बचने की प्रवृत्ति में वृद्धि और सुरक्षित निवेश की मांग घरेलू तरलता की स्थिति, आर्थिक गतिविधि, उपभोग और निवेश को प्रभावित कर सकती है, जबकि कमजोर वैश्विक विकास संभावनाओं से बाहरी मांग कम हो सकती है और धन प्रेषण प्रवाह घट सकता है।
अंततः, वैश्विक वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले प्रतिकूल प्रभावों से घरेलू वित्तीय स्थितियां और भी कठिन हो सकती हैं और उधार लेने की लागत बढ़ सकती है। आरबीआई ने तरलता प्रबंधन में सक्रिय और पूर्व नियोजित बने रहने और अर्थव्यवस्था की उत्पादक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।
ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ आपूर्ति में आने वाली बाधाओं से विकास प्रभावित होगा। यह मानते हुए कि पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रतिकूल प्रभाव लंबे समय तक नहीं रहेगा, आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि का अनुमान 6.9 फीसदी लगाया है जो पहली तिमाही में 6.8 फीसदी, दूसरी तिमाही में 6.7 फीसदी, तीसरी तिमाही में 7 फीसदी और चौथी तिमाही में 7.2 फीसदी होगी । हालांकि, एक दशा यह है कि अगर युद्ध जारी रहता है तो घरेलू वृद्धि दर में गिरावट का खतरा हो सकता है। इन्हीं कारणों से, वित्त वर्ष 2027 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6 फीसदी लगाया गया है।
संभवतः पहली बार, आरबीआई ने गैर-खाद्य, गैर- ऊर्जा मुद्रास्फीति (कोर यानी मुख्य मुद्रास्फीति) का अनुमान 4.4 फीसदी लगाया है। फिर भी, यहां भी एक चेतावनी यह है कि जोखिम बढ़ने की आशंका कायम है। वैसे 4.6 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल मानकर लगाया गया है। नीतिगत वक्तव्य के साथ ही जारी की गई मौद्रिक नीति रिपोर्ट-अप्रैल 2026 में औसत मुद्रास्फीति इससे अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है। कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल मानें तो, वित्त वर्ष 2027 में मुद्रास्फीति 5 फीसदी और इसके अगले वर्ष 5.1 फीसदी होगी।
अंततः सिद्धांतों और मान्यताओं से परे जाकर, गहन अध्ययन से पता चलता है कि यह नीति हमें अनिश्चित समय के बारे में सब कुछ बताती है:
■ गवर्नर के बयान में ‘अनिश्चितता’ शब्द का प्रयोग सात बार किया गया है। चार बार भू-राजनीति के संदर्भ में, और दो बार विशेषण ‘बढ़ी हुई’ के बाद।
■ ‘घाटा’ शब्द का प्रयोग पांच बार किया गया है- तीन बार ‘चालू खाता’ के संदर्भ में और दो बार ‘व्यापार’ के संदर्भ में।
■ भूराजनीति’ का प्रयोग चार बार हुआ है
■ ‘जोखिम’ शब्द का प्रयोग 13 बार किया गया है (हालांकि एक बार, एक अलग संदर्भ में बैंकों की पूंजी और जोखिम भारित परिसंपत्तियों के अनुपात के संदर्भ में) । तीन बार इससे पहले विशेषण ‘सकारात्मक पहलू’ का प्रयोग हुआ है और दो बार ‘नकारात्मक पहलू’ का।
■ ‘बाधा’ शब्द छह बार आया है जिनमें से तीन बार ‘आपूर्ति श्रृंखला’ का जिक्र है।
■ ‘दबाव’ शब्द का प्रयोग पांच बार और ‘अस्थिरता’ शब्द का प्रयोग तीन बार किया गया है।
■ वक्तव्य में ‘बढ़ी हुई’ शब्द पांच बार, ‘व्यवधान’ छह बार और ‘बाधाकारी’ दो बार आया है।
हालांकि वक्तव्य में ‘लचीलापन’ शब्द का तीन बार और ‘मजबूत’ शब्द का आठ बार प्रयोग करके संतुलन बनाए रखा गया है, जो आर्थिक गतिविधियों की गति, व्यापक आर्थिक बुनियादी बातों, ऋण वृद्धि और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की उपलब्धता आदि को संदर्भित करता है। नीति की भाषा स्पष्ट रूप से बताती है कि आरबीआई क्या देख रहा है और अनिश्चित समय के लिए खुद को कैसे तैयार कर रहा है।
सराहनीय मतदान
संपादकीय
असम, केरलम और पुडुचेरी में मतदान की सफलता सुखद व अनुकरणीय है। कुल मतदान के आंकड़े बाद में आएंगे, लेकिन गुरुवार शाम पांच बजे तक असम में 84.42 और केरलम में 75.01 प्रतिशत मतदान हो चुका था। पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश में मतदान दोपहर एक बजे ही 72.40 प्रतिशत पर पहुंच गया था। सराहनीय मतदान का श्रेय वास्तव में चुनाव आयोग और उसकी तैयारियों को देना चाहिए। चूंकि मतदाताओं की सुविधाओं का ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखा जा रहा है, इसलिए मतदान मैं सफलता मिल रही है। यहां यह दोहरा दिया जाए कि असम की 126, केरलम की 140 और पुडुचेरी की 30 सीटों पर एक साथ ही मतदान हुआ है। सबसे बड़ी बात कि तीनों राज्यों या केंद्रशासित प्रदेश में मतदान के दौरान किसी बड़ी गड़बड़ी या हिंसा की सूचना नहीं है। इससे पता चलता है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने भी अपने काम को मुस्तैदी से अंजाम दिया है। ध्यान रहे, असम में पिछली बार तीन चरणों में मतदान हुआ था, इस बार केवल एक चरण में हुआ मतदान इस राज्य की तरक्की का ही एक पहलू है।
असम में बीते दस वर्ष से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है और इस बार भी भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की स्थिति कमजोर नहीं है। असम में भाजपा के साथ स्थानीय पार्टियां एजीपी और बीपीएफ भी हैं, जिससे उसे लाभ की उम्मीद है। यहां भाजपा के गठबंधन से मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से है। यहां राजनीति के ध्रुवीकरण कोई इनकार नहीं कर सकता। पिछले चुनाव के बाद यहां परिसीमन हुआ है, 15 नए निर्वाचन क्षेत्र बने हैं। माना जा रहा है कि निर्णायक मुस्लिम बोट वाले क्षेत्रों की संख्या 35 से घटकर 23 हो गई है। इसी से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि पिछली बार भाजपा ने नौ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, केवल एक को जीत मिली थी और उस एक को भी इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया है। असम भारतीय राजनीति की एक प्रयोगशाला है। वहां अगर घोषित ध्रुवीकरण और सबके समान विकास की राजनीति कामयाब होती है, तो असर अन्य राज्यों पर पड़ सकता है। पिछले चुनावों के मुकाबले कांग्रेस मजबूत है, लेकिन क्या उसे बहुमत लायक वोट मिले हैं? इस सवाल का जवाब उन वोटिंग मशीनों में दर्ज हो गया है, जो 4 मई को खोली जाएंगी।
असम की तरह ही केरलम में भी कांग्रेस की साख दांव पर है। यहां वाम मोर्चा लगातार तीसरी बार जीतने के लिए जोर लगा रहा है। देश में वामपंथियों के लिए केरलम एकमात्र गढ़ है। अगर यहां वामपंथी हारे, तो देश में वामपंथ के एक युग का पटाक्षेप हो जाएगा। बंगाल में वामपंथी बहुत कमजोर हो गए हैं, तो केवल केरलम बचा है। एक बार वाम, तो अगली बार कांग्रेस के जीतने का सिलसिला पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में ही टूट गया था। तब मुख्यमंत्री कॉमरेड पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ को 99 सीटें हासिल हुई थीं, इस बार सीटें घटने की संभावना है, पर क्या एलडीएफ की सीटें इतनी घटेंगी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में आ जाए? भाजपा यहां ठीकठाक शुरुआत भी कर ले, तो संतोष कर सकती है। बेशक, केरलम में भाजपा ठीक उसी तरह मजबूत हो रही है, जैसे तमिलनाडु में, पर हकीकत यही है कि इन अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में भाजपा मंजिल से काफी दूर है। रही बात पुडुचेरी की, तो यहां भाजपा सत्तारूढ़ गठजोड़ का हिस्सा है, जिसे द्रमुक व कांग्रेस के गठजोड़ से टक्कर मिल रही है। खैर, जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा, यह पूरा देश जानना चाहेगा।
Date: 10-04-26
क्या काम करना जरूरी न होगा
अतनु बिस्वास, ( प्रोफेसर, भारतीय सांख्यिकी संस्थान )
दुनिया के सबसे बड़े अमीर एलन मस्क ने भविष्यवाणी की है कि अगले 10-20 वर्षों में आजीविका के लिए काम करना अनिवार्य नहीं होगा, बल्कि वैकल्पिक हो जाएगा। उन्होंने यह बात बार-बार दोहराई है- अमेजन पर प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख के जवाब में, अमेरिका – सऊदी निवेश फोरम में, निखिल कामथ के साथ बातचीत में, पेरिस में आयोजित बीवा टेक्नोलॉजी 2024 के मंच पर और 2023 की एआई सेफ्टी समिट में। उन्होंने नौकरी की तुलना सब्जियों की बागवानी करने जैसे ज्यादा समय लेने वाले काम से की।
मस्क का मानना है कि रोबोट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आपकी हर मनचाही वस्तु व सेवा उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। उनके मुताबिक, इंसानी रोबोट (जैसे टेस्ला के ऑप्टिमस) सबसे बड़ा उद्योग बन सकते हैं। वह एआई और रोबोटिक्स को एक ऐसे युग का प्रवर्तक मानते हैं, जिसमें सभी लोग ‘धरती के सबसे धनी व्यक्ति से भी कहीं अधिक अमीर’ होंगे। इतना ही नहीं, ‘हमारे पास शायद पैसा नहीं होगा, संभवतः ऊर्जा व बिजली उत्पादन ही हमारी वास्तविक मुद्रा होगी। हालांकि, वह यह भी मानते हैं कि हमें एआई में सत्य और सौंदर्य के प्रति गहरी रुचि पैदा करनी चाहिए।
ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने 1930 के अपने लेख ‘हमारे पोते-पोतियों के लिए आर्थिक संभावनाएं’ में कुछ दिलचस्प भविष्यवाणियां की थीं। कीन्स ने आने वाली सदी में कमाई में भारी वृद्धि के साथ-साथ जीवन स्तर में सुधार के कारण लोगों के पास खाली वक्त होने की बात कही थी। उनके मुताबिक, उस बेमिसाल दौर में लोग ‘ अपने लिए ज्यादा काम करेंगे… सिर्फ छोटी-मोटी जिम्मेदारियों और दिनचर्या से वे बेहद खुश हो जाएंगे’।
कीन्स ने लिखा था, ‘हम में से अधिकांश लोगों में मौजूद स्वार्थी प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लिए दिन में तीन घंटे का काम ही काफी है!’ मगर मस्क बेरोजगारी जैसी निष्क्रियता की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जबकि, नौकरियों के बिना भविष्य आदर्शवादी से कहीं अधिक निराशावादी बन जाएगा। इसे कोई भी आसानी से समझ सकता है, क्योंकि समाज भी खुद को बचाए रखने के लिए श्रम करता है।
पहियों के आविष्कार से लेकर नॉटिंघम के कपड़ा उद्योग में मशीनों के आने तक, और भाप इंजनों से लेकर बिजली तक, मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि तकनीकी क्रांतियां सिर्फ उत्पादकता नहीं बढ़ातीं, बल्कि कुछ मानवीय श्रम को उन मशीनों को भी सौंप देती हैं, जिनको इंसान ने खुद बनाया है। इससे कामगारों के काम का बोझ कम हो जाता है। क्या एआई भी महज ऐसी ही तकनीक नहीं है, जो कुछ अर्थों में मानवीय श्रम की जरूरत को कम कर देगी? साल 2019 में चीनी अरबपति जैक मा ने भी तो यही कहा था कि तकनीकी प्रगति और शिक्षा तंत्र में बदलाव के कारण अगले एक- दो दशक में लोग सप्ताह में केवल तीन दिन, और वह भी प्रतिदिन चार घंटे ही काम करेंगे।
औद्योगिक क्रांति के बाद से, जब कामगार हर रोज 10 से 16 घंटे काम करते थे, कार्य घंटों में निस्संदेह महत्वपूर्ण बदलाव आया है। एक सदी पहले, 1926 में हेनरी फोर्ड ने छह दिवसीय कार्य सप्ताह को पांच दिनों में बदला था। लिहाजा अभी का सवाल यही है कि क्या एआई के आने से कार्यस्थल की संस्कृति में वह व्यापक बदलाव आएगा, जिसकी भविष्यवाणी अर्थशास्त्री कीन्स ने अपने चर्चित लेख में की थी? या, क्या कामकाज का मूल स्वरूप ही उस हद तक बदल जाएगा, जिसकी तरफ मस्क इशारा कर रहे हैं ?
स्कॉटिश लेखक इयान एम बैंक्स की साइंस- फिक्शन उपन्यासों वाली ‘कल्चर’ सीरीज (1987 से 2012 के बीच प्रकाशित ) मस्क के उस स्वचालित और स्वैच्छिक रोजगार वाले भविष्य के लिए प्रेरणा का काम करती दिख रही है। खुद को समाजवादी बताने वाले इस लेखक ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसमें इंसान अपनी मर्जी से काम करता है, एआई हर चीज की प्रचुरता सुनिश्चित करती है और इंसानी शक्ल वाले एलियंस के साथ-साथ बेहद बुद्धिमान एआई बॉट्स पूरी आकाशगंगा में फैले हुए हैं। मुमकिन है कि एलन मस्क जब छात्र रहे हों, तब उन्हें बैंक्स की इस अवधारणा से प्रेरणा मिली हो । शायद मस्क भी यह मान रहे होंगे कि एआई तकनीक ही हमें बैंक्स की ‘स्पेस सोशलिज्म’ की ओर ले जाएगी। मस्क कहते हैं, ‘उन किताबों में पैसे का कोई अस्तित्व नहीं है, जो काफी दिलचस्प है। वैसे, कल्चर सीरीज में जिस ब्रह्मांड की परिकल्पना की गई है, वह आकर्षक और विश्वसनीय जान पड़ता है, भले एआई में अपेक्षित प्रगति होने में सदियां या सहस्राब्दियां लग जाएं।
मस्क मानते हैं कि चूंकि हर किसी की एआई रूपी जादुई शक्ति तक पहुंच होगी, इसलिए यह एक तरह से समानता लाने का काम करेगी। मगर क्या यह सच नहीं कि उन्होंने नवंबर 2022 में ट्विटर (अब एक्स) के कर्मचारियों से सप्ताह में 80 घंटे काम करने के लिए तैयार रहने को कहा था, वह भी तब, जब उन्होंने इस कंपनी का अधिग्रहण किया ही था? यही नहीं, हाल- फिलहाल, टेस्ला ने मस्क के लिए करीब एक ट्रिलियन डॉलर के वेतन पैकेज की घोषणा की है। और फिर, ‘अधिक से अधिक सत्य के करीब’ रहने वाली एआई को विकसित करना क्या चुनौतीपूर्ण काम नहीं है? पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी का एक शोध पत्र बताता है कि रोबोट अब तक महंगे ही साबित हुए हैं, जिस कारण उनका विस्तार मुश्किल हो गया है, फिर चाहे एआई की लागत क्यों न घट रही हो। यह शोध पत्र ‘एआई और कार्य के भविष्य’ का आकलन करने में मददगार है। इसके लेखकों का तर्क है कि ‘एआई से महत्वपूर्ण बदलाव होगा, लेकिन वह सीमित होगा, असीमित नहीं’। कई विशेषज्ञ भी मस्क की इस भविष्यवाणी से सहमत नहीं हैं कि एआई कार्यस्थल को पूरी तरह से बदल देगी। एआई सेफ्टी समिट में ही डीपमाइंड के सह-संस्थापक मुस्तफा सुलेमान ने कहा था, ‘अगले 50 वर्षों की हमें चिंता करनी चाहिए’।
भले ही पूरी तरह ऑटोमेशन की मस्क की सोच कुछ हद तक सही हो जाए, पर टेक कंपनियों में हालिया छंटनियों के बावजूद कार्यस्थल पर एआई का उपयोग उतनी तेजी से नहीं हो रहा है, जितनी उम्मीद थी। यही कारण है कि मस्क के बजाय कीन्स का नजरिया सच के करीब जान पड़ता है कीन्स ने जिस भविष्य की कल्पना की थी, वह लगभग 2030 के आसपास का था। क्या वह कल्पना अब सच लगने लगी है ?
Date: 10-04-26
सिक्क्म की इस सफलता से सबक सीखें दूसरे राज्य
गिरीश चंद्र गुरुवानी
हिमालयी राज्यों में कभी हिमाचल प्रदेश को आदर्श माना जाता था, मगर आज सिक्किम पर्वतीय प्रदेशों के लिए ही नहीं, देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन चुका है। आबादी के लिहाज से देश का सबसे छोटा राज्य सिक्किम विकास की होड़ में सबसे आगे कैसे निकल गया ? प्रतिव्यक्ति आय के लिहाज से इसके शिखर पर पहुंचने की कहानी संघर्षपूर्ण और सीखने लायक है।
भौगोलिक कठिनाइयों के कारण कश्मीर से अरुणाचल तक सुदूर गांवों में विकास का उजाला पहुंचाना पहाड़ी राज्यों के सामने एक बड़ी चुनौती होती है। समतल भूमि का अभाव, खड़े पहाड़ों पर भूस्खलन व पर्यावरणीय प्रभाव और निर्माण, उद्योग, परिवहन पर अत्यधिक लागत के चलते विकास योजनाओं को जमीन पर उतारना कठिन एवं महंगा होता है। ज्यादातर पर्वतीय राज्य आज भी दुर्गम भूगोल का रोना रोते हुए पिछड़े बने हुए हैं, लेकिन सिक्किम ने इन विपरीत परिस्थितियों से लड़कर बड़ी अर्थव्यवस्था वाले प्रदेशों को खुशहाली के मानकों पर पछाड़ दिया है। सिक्किम की 5.50 लाख रुपये से अधिक की प्रतिव्यक्ति आयके मुकाबले उसके पड़ोसी राज्यों की हालत देखिए । सतबहनी राज्यों में उभरता अरुणाचल प्रदेश 2.35 लाख रुपये और अशांत मणिपुर 0.95 लाख प्रतिव्यक्ति आय के साथ सबसे निचले पायदान पर है।
हिमाचल के मैदानी इलाके बद्दी- बरोटीवाला-नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र के कारण प्रतिव्यक्ति आय के मामले में सोलन देश के शीर्ष जिलों में भले शुमार हो चुका है, पर उद्योग और बागवानी – विहीन पर्वतीय जिलों का आर्थिक विकास धीमा है। उत्तराखंड 2.74 लाख रुपये प्रतिव्यक्ति आय के साथ तेजी से बढ़ता पहाड़ी प्रदेश है, पर अंदरूनी तौर पर इसमें भारी असंतुलन है। हरिद्वार, उधमसिंहनगर और देहरादून के मैदानी हिस्से विकास की धारा में आगे हैं, पर इसके पहाड़ी जिले पिछड़ गए हैं। संपूर्ण पर्वतीय राज्य होने के बावजूद सिक्किम ने नवाचार से खुद को साबित कर दिखाया है। प्रगति का उसका मॉडल, अनुशासन, कानून-व्यवस्था और सामाजिक भाईचारा बाकी राज्यों के लिए, खासकर पहाड़ी राज्यों के लिए अनुकरणीय है।
सिक्किम ने साल 2003 में केंद्र सरकार की ओर से पर्वतीय राज्यों के लिए घोषित विशेष पैकेज का बेहतरीन उपयोग किया। उस वक्त कई पहाड़ी राज्यों के मैदानी इलाके में उद्योग आए और सब्सिडी लेने के बाद चले गए। सिक्किम में जो उद्योग उस समय गया, वह आज भी वहीं जमा है। देश के कुल दवा उत्पादन में इस छोटे से राज्य का योगदान करीब 15 प्रतिशत है।
पर्यटन को लेकर भी सिक्किम की नीति स्पष्ट है। भूटान की तरह उसे भीड़ नहीं, बल्कि अधिक खर्च करने वाले जागरूक और जिम्मेदार पर्यटक चाहिए। इससे वहां कारोबारियों और सरकार दोनों को अधिक आय होती है और रखरखाव की लागत कम आती है। पर्यटक स्थलों पर गंदगी नहीं दिखती। सार्वजनिक स्थलों पर गंदगी फैलाने के लिए भारी जुर्माना और ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों पर सख्ती का असर यहां साफ दिखता है। गंगटोक में ओवरटेकिंग पर रोक है। टैक्सी वालों को भी दो समूह में बांटा गया है। छोटी टैक्सी वाले गंगटोक से छांगू झील के पास तक जाएंगे। उससे आगे नाथुला तक बड़ी टायर वाली टैक्सियां चलती हैं। इस व्यवस्था से हर तरह के टैक्सी वालों को कारोबार में हिस्सा भी मिल जाता है। इससे टैक्सी वालों को अच्छी आमदनी होती है। इसी तरह, ‘होम स्टे’ को महत्व दिए जाने से पर्यटन की आय का बड़ा हिस्सा सीधे स्थानीय लोगों और गांव वालों की जेब में जाता है।
सिक्किम ने 13 वर्ष की मेहनत के बाद आधिकारिक तौर पर पहले जैविक राज्य का दर्जा हासिल किया। अपनी खास ब्रांड वैल्यू बनाई और अब इसका सीधा लाभ उसे मिल रहा है। सामान्य दालें जहां बाजार में 200 रुपये किलोग्राम तक मिल जाती हैं, वहीं सिक्किम की जैविक दालें 300 रुपये किलोग्राम तक आसानी से बिक रही हैं।
संपूर्ण पहाड़ी प्रदेश होते हुए भी उद्योग, पर्यटन और कृषि क्षेत्र में किए गए नवाचार सिक्किम को नंबर वन बनाते हैं। आजादी के 28 साल बाद 1975 में भारत में शामिल हुए इस राज्य से सीख लेकर दूसरे राज्य भी उसके जैसे या फिर उससे अधिक खुशहाल हो सकते हैं। बस ! सोच और संकल्प की जरूरत है।