09-03-2026 (Important News Clippings)
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Generational shift
Nepal’s voters upend old political order as RSP faces governance test
Editorial
In a country that has seen political instability following every election since multiparty democracy was restored in 1990, Nepali voters have finally delivered a decisive mandate and in favour of a relatively new party. In the March 5 elections, Rastriya Swatantra Party (RSP), founded barely four years ago, won a commanding majority in the 165 directly elected seats to the House of Representatives and roughly 50% of proportional votes, decimating parties that dominated Nepali politics for decades. The RSP is not the first to secure a decisive majority under the new Constitution of 2015. In the 2017 elections, the first elections held under the federal framework, the Left Alliance of the Communist Party of Nepal (Unified Marxist-Leninist) led by K.P. Sharma Oli and the Communist Party of Nepal (Maoist Centre), helmed by Pushpa Kamal Dahal won close to a two-thirds majority. The two parties merged to form the Nepal Communist Party, but the union was voided in 2021. What followed was the familiar rigmarole of shifting alliances and a carousel of Prime Ministers — Mr. Oli, Mr. Dahal, and the Nepali Congress’s Sher Bahadur Deuba — with none able to anchor a stable government.
It was this “dance of the status quoists” that provoked the 2025 youth-led Gen Z uprising against entrenched corruption and patronage politics, eventually leading to Mr. Oli’s resignation and a Sushila Karki-led caretaker government. Ms. Karki creditably oversaw a largely peaceful election within a compressed timeframe. The results show that the Gen Z protests were no flash in the pan. Balendra Shah’s entry transformed the RSP’s fortunes. A former rapper who stormed into politics by winning the 2022 Kathmandu mayoral election as an independent, Mr. Shah joined the RSP in January and became its prime ministerial candidate. The 35-year-old politician defeated 74-year-old Mr. Oli by nearly 50,000 votes in his stronghold Jhapa. Mr. Shah was the choice of the Gen Z protesters when they demanded a generational shift in political leadership and a decisive break from the Oli-Dahal-Deuba troika. The scale of the RSP’s victory, including a clean sweep of all 15 seats in the Kathmandu Valley, is a powerful expression of a young electorate’s frustrations. This is a verdict against incestuous patronage politics, endemic corruption, and the dire economic conditions that have driven Nepalis to work abroad. Whether the RSP, and Mr. Shah, can translate this sweeping mandate into the institutional reform and economic revival that Nepal desperately needs remains to be seen. Considering that Mr. Shah’s tenure as mayor drew criticism for an anti-poor and technocratic approach to urban governance, the mandate must be greeted with caution.
नए नेपाल के निर्माण का जनादेश
डॉ. ऋषि गुप्ता, ( लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं )
नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा चुका है। आम चुनावों के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) देश की पहली लगभग पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने जा रही है। इस जीत के नायक 35 वर्षीय बालेंद्र शाह उर्फ बालेन हैं, जिनका प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है।
नेपाल में इस राजनीतिक बदलाव की नींव सितंबर 2025 में जेन-जी युवा आंदोलन ने रखी थी। नेपाल के राजनीतिक इतिहास में, जहां हर वर्ष दर्जनों नए दल बनते और मिटते हैं, जहां नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-एमाले और माओवादी केंद्र जैसे दशकों पुराने पारंपरिक दलों का एकछत्र वर्चस्व रहा है, जहां शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली और गगन थापा जैसे दिग्गजों ने लंबे समय तक सत्ता की धुरी को नियंत्रण में रखा, जहां राजनीति सदैव पहाड़ बनाम मधेश, धार्मिक ध्रुवीकरण और नृजातीय समीकरणों के तराजू में तौली जाती रही है। ऐसे जटिल परिवेश में जिस दल की स्थापना महज चार वर्ष पूर्व हुई हो, उसकी ऐसी अभूतपूर्व चुनावी जीत कल्पना से परे थी।
इस चुनावी सुनामी के पीछे दो प्रमुख कारण दिखते हैं। पहला, नए नेपाल की परिकल्पना का मूल आधार एक ऐसे राष्ट्र की स्थापना था, जो भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से मुक्त हो। इस यात्रा की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2008 में राजशाही के अंत और लोकतंत्र की स्थापना के साथ हुई। माना गया था कि सैकड़ों वर्षों के राजतंत्र, जिसमें सत्ता दरबार के वफादारों तक सीमित थी और जनता का एक बड़ा वर्ग हाशिये पर था, उसका अंत लोकतांत्रिक व्यवस्था से होगा।
विडंबना यह रही कि 2008 के बाद जो भी राजनीतिक दल उभरे, उनकी कार्यशैली और जड़ें पुरानी व्यवस्था से ही प्रभावित थीं। यद्यपि माओवादी दलों पर भी सत्ता की लोलुपता हावी रही। परिणामस्वरूप लोकतंत्र आने के बावजूद आम जनता को कोई वास्तविक राहत नहीं मिल सकी। नेपाल के पिछले 18 वर्षों के लोकतांत्रिक यात्रा में चार आम चुनावों के दौरान देश ने एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्री और दर्जनों उप-प्रधानमंत्री बदलते देखे हैं।
राजनीतिक उठापटक के कारण कोई भी सरकार अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। इस अनिश्चितता के बीच जनता ने आरएसपी को पूर्ण बहुमत देकर न केवल राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त किया है, बल्कि गठबंधन की मजबूरियों वाली राजनीति का भी अंत कर दिया है। चूंकि आरएसपी का कोई विवादास्पद पुराना इतिहास नहीं था, इसलिए जनता ने बालेन शाह के नेतृत्व पर अटूट भरोसा जताया।
दूसरा, आरएसपी की जीत का श्रेय नेपाल के युवाओं को भी जाता है, जिन्होंने बालेन शाह को एक नए नेपाल के उद्भव का महत्वपूर्ण कारक माना। बालेन पेशे से इंजीनियर रहे हैं और बाद में रैप संगीत की दुनिया में उतरे। अपने संगीत के माध्यम से उन्होंने ऐसे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उठाया, जिनसे न केवल युवा, बल्कि आम जनता भी जुड़ पाई। यही कारण था कि जब उन्होंने 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा तो उन्हें भारी जीत मिली। देश को बालेन के रूप में एक नया नेता तो मिल गया था, लेकिन किसी राजनीतिक दल के समर्थन के बिना राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुंचना आसान नहीं था।
पुराने दलों को कमजोर किए बिना यह संभव भी नहीं था और यही काम जेन जी आंदोलन ने किया। हालांकि युवाओं ने बालेन को अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने का न्योता दिया था, लेकिन उसकी अवधि केवल छह महीने की थी, जबकि बालेन का सपना पांच वर्षों और उससे आगे की राजनीति का था। ऐसे में उन्होंने अंतरिम नेतृत्व स्वीकार करने के बजाय चुनावी रास्ता चुना और उसमें विजयी हुए। आरएसपी पत्रकार से राजनेता बने रबी लामिछाने के नेतृत्व में तेजी से आगे बढ़ी, जो अपने पहले ही चुनाव में 2022 में 20 सीटों के साथ एक वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी थी। आरएसपी के पास युवाओं की मजबूत अपील है, लेकिन बालेन जैसे लोकप्रिय नेता के जुड़ जाने से पार्टी को और अधिक मजबूती मिली और अब उसके परिणाम भी सामने हैं।
अब जब आरएसपी के पास जनमत है और बालेन शाह जैसे लोकप्रिय युवा नेता तो सवाल उठता है कि क्या वे देश चलाने में मजबूत साबित होंगे? क्योंकि लोकप्रिय होना एक बात है, लेकिन देश के विकास और हितों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण करना, मजबूत विदेश नीति बनाना और सत्ता की शक्ति से परे देश का शांतिपूर्ण संचालन करना बिल्कुल अलग बात है। बालेन शाह लोकप्रिय नेता हैं। काठमांडू के मेयर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उन पर कई बार नियमों की अनदेखी के आरोप भी लगते रहे हैं।
ऐसे में यदि प्रधानमंत्री के पद पर भी उनकी कार्यशैली वैसी ही रही तो इससे देश में नीतिगत स्थिरता प्रभावित हो सकती है और जनता की शिकायतों का कारण भी बन सकती है। आने वाले सौ दिनों में सरकार की कार्यप्रणाली काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी। हालांकि संभावनाओं और आशंकाओं से परे नेपाली जनादेश प्रशंसनीय है। अपने मताधिकार का प्रयोग कर जनता ने लोकतंत्र को नया आयाम दिया है। लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की खींचतान की समाप्ति के संकेत दिए हैं। देश में समय-समय पर उठने वाले राजशाही की वापसी जैसे मुद्दों को भी यह जनादेश काफी हद तक विराम देता दिखाई देता है।
Date: 09-03-26
रहने लायक शहरों के नए मॉडल की जरूरत
सुनीता नारायण, ( लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं )

मुझे अपनी दिल्ली के लिए रोना आ रहा है। यह मेरा शहर है जहां मेरे परिवार की कई पीढ़ियां रह चुकी हैं। मैंने यहां अपने पेशेवर जीवन का अधिकांश समय स्वच्छ हवा, पानी और बुनियादी जीवनयापन के लिए आवश्यक हर चीज की वकालत करते हुए बिताया है।
आज हर जगह कूड़ा-कचरा है, सड़कों पर गड्ढे हैं, यातायात व्यवस्था बिल्कुल नहीं है, जाम लगता है, अवैध इमारतें बनी हुई हैं और पार्किंग की समस्या है, जिससे सड़क प्रबंधन की व्यवस्था और भी खराब हो जाती है। पानी की आपूर्ति मांग के हिसाब से कम पड़ रही है, यमुना नदी उपेक्षित हो गई है और उसमें बड़ी मात्रा में सीवेज का पानी मिल रहा है। और हां, दिल्ली अब तो सांस लेने लायक भी नहीं रही । मैं और भी बहुत कुछ बता सकती हूं, लेकिन दिल्ली के सभी निवासी तो जानते ही हैं कि हम किस स्थिति से गुजर रहे हैं।
इसलिए, हमें यह सवाल पूछना होगा कि क्या शहरी सेवाओं की खामियों को सुधारा जा सकता है, या क्या यह समस्या बहुत बढ़ चुकी है ? मैं यह सवाल बुनियादी ढांचे के पतन पर शिकायत के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए पूछ रही हूं कि हम इस अनुभव से सीखें और भारत में एक और दिल्ली जैसी स्थिति न पैदा करें। दूसरे शब्दों में, हम यह सुनिश्चित करें कि मध्य भारत के शहर बढ़ते-बढ़ते बड़े पैमाने पर अव्यवस्था का शिकार न बन जाएं, यहां तक कि चरमरा न जाएं।
यह महत्त्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि शहरीकरण से उच्च पदों की नौकरियों को बढ़ावा मिलेगा। पश्चिमी देशों में आप्रवासन के दबाव के कारण भारत में युवा, कुशल कामगारों के लिए फलने-फूलने के अपार अवसर हैं। लेकिन उन्हें केवल धन से कहीं अधिक की आवश्यकता है। उन्हें अपने और अपने बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण जीवन की आवश्यकता है। यह केवल मॉल, रेस्तरां और नाइटलाइफ की बात नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतों की बात है जैसे स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, शिक्षा और आवास जिनकी बदौलत प्रतिभा को आकर्षित किया और उन्हें बनाए रखा जा सकता है। यह रहने लायक शहरों की बात है।
इस योजना को सफल बनाने के लिए हमें यह समझना होगा कि क्या नहीं करना चाहिए। शहरों के जनसंख्या आंकड़े पुराने हो चुके हैं, और योजना अभी भी 2011 की जनगणना पर आधारित है। फिर भी, हम शहरों के अपने बाहरी क्षेत्रों में विस्तार के कारण होने वाले पतन को देख सकते हैं। वर्ष 1990 के दशक में दिल्ली के बाहरी इलाके में गुरुग्राम विकसित होना शुरू हुआ। आज, शहरी विस्तार मीलों तक अगल- बगल फैल रहा है और हर दिन बढ़ता जा रहा है। छोटे कस्बे बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन बिना योजना या सुविधाओं के। यही असली चुनौती है।
क्या किया जाना चाहिए? सबसे पहले शहरों को केवल सड़कों की ही नहीं, बल्कि आवागमन की भी योजना बनानी चाहिए। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लोगों का आवागमन किफायती आवास और आजीविका से जुड़ा हुआ है । जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं और जमीन की कीमतें बढ़ती हैं, कई लोग मकान खरीदने में असमर्थ हो जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि गरीब लोग, जो शहर के सेवा क्षेत्र के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, उन क्षेत्रों में रहने की तलाश करते हैं जिन्हें अवैध क्षेत्र या झुग्गी-झोपड़ी कहा जाता है। त्रासदी यह है कि कई मामलों में ये जमीन शहर के पर्यावरण के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं, जैसे कि हरित क्षेत्र या जल निकायों के संग्रहण क्षेत्र। शहर के बाहरी इलाकों से, जहां आवास सस्ता हो सकता है, आवागमन या तो संभव नहीं होता या पहुंच से बाहर होता है। मध्यम वर्ग भी निजी परिवहन पर निर्भर होकर शहर से बाहर की ओर पलायन करता है, जिससे भीड़भाड़ और बढ़ जाती है। शहर को हर तरह से नुकसान होता है। जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं, नियोजन का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक, उसकी रीढ़ माने जाने वाला परिवहन होना चाहिए ताकि बाहरी क्षेत्रों को जोड़ा जा सके और शहर के भीतर आवागमन सुगम हो सके। लोग पैदल चल सकें, साइकल चला सकें, बसों या मेट्रो का उपयोग कर सकें और केवल आवश्यकता पड़ने पर ही कार का इस्तेमाल करें। एक आधुनिक शहर दिल्ली या बेंगलूरु जैसे जाम से ग्रस्त शहरों जैसा नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छ जल तक अन्य बुनियादी सेवाओं की भी आवश्यकता है। ये सभी चीजें शहर के जीवन स्तर को बेहतर बनाएंगी।
लेकिन मास्टर प्लान का क्रियान्वयन सबसे महत्त्वपूर्ण है। दिल्ली का मास्टर प्लान पुराना हो चुका है और उससे भी बुरी बात यह है कि इसका उल्लंघन ही हो रहा है। भारत के अधिकांश शहरों में, और विशेष रूप से विकासशील शहरों में भूमि उपयोग योजना का कोई नामोनिशान भी नहीं है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध
हो ताकि लोगों को पता चले कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। पारदर्शिता रोकथाम का पहला कदम है। इस भ्रम से जानबूझकर पैदा हुई अराजकता दिल्ली में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहां अवैध अतिक्रमण सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं और बुनियादी ढांचे में किया गया सार्वजनिक निवेश व्यर्थ हो जाता है।
नई पीढ़ी के शहर को प्रबंधन की आवश्यकता है, न कि लोकलुभावन वाद की, जो अराजकता की ओर ले जाता है। असली चुनौती यहीं है। हमें शहरीकरण के किफायती मॉडल चाहिए, लेकिन आजीविका की रक्षा के नाम पर हर अवैध चीज की अनुमति देने से ये मॉडल नहीं उभरेंगे। इससे केवल अराजकता और घटिया सेवाएं ही सुनिश्चित होंगी।
असल मुद्दा शहरी प्रशासन की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करना है । हमारे यहां पूरी तरह से असंगत शहरी शासन प्रणालियां हैं, जहां प्रतिनिधियों को चुना तो जाता है, लेकिन फिर उन्हें निष्क्रिय कर दिया जाता है। वे फिर हर लाभप्रद चीज से खिलवाड़ करते हैं, जिससे अव्यवस्था बढ़ती है। विडंबना यह है कि नई दिल्ली ने, जहां सत्ताधारी अभिजात वर्ग रहता है, यह मान लिया है कि लोकतंत्र उसके लिए कारगर नहीं है, अब अधिकारियों का एक समूह शहर चलाता है। यह तेजी से अन्य नए विकसित शहरों के लिए एक आदर्श बनता जा रहा है। तो फिर, सबसे अच्छा विकल्प क्या है ?
यही वह प्रश्न है जिससे हमारा आर्थिक भविष्य तय होगा। शहरीकरण का स्वरूप संसाधन – कुशल, समावेशी और आजीविका सुरक्षा तथा जीवन को सार्थक बनाने वाली हर चीज को सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए – स्वच्छ जल और स्वच्छ वायु से लेकर खेल के मैदानों और स्कूलों तक आइए, अतीत की दिल्ली जैसी शहरी कल्पनाओं को त्याग दें और भविष्य को अपनाएं।
अशोभनीय विवाद
संपादकीय

भारतीय राजनीति नए-नए विद्रूप रचने की अभ्यस्त हो चली है। शनिवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यक्रम से जुड़ी टिप्पणी की, उसमें उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति देखने के बजाय राजनीति के बिंदु खोजने की चेष्टा हो रही है और इसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। देश में अब कुछ ही सांविधानिक पद ऐसे हैं, जिनका सम्मान बचा हुआ है और इसे हर हाल में अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए। हाशिये के समाज से आने वाली राष्ट्रपति जब पश्चिम बंगाल के बागडोगरा में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलनको संबोधित करने पहुंचीं, तब वहां की अव्यवस्था देखकर उनका निराशा व्यक्त करना लाजिमी था। राज्य की ममता बनर्जी सरकार को इसका तत्काल संज्ञान लेते हुए शालीन व्यवहार का परिचय देना चाहिए था, मगर दोषियों की पहचान और कार्रवाई करने के बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महामहिम के उद्गार पर ही प्रश्न खड़े कर दिए ? अपनी सोशल मीडिया के पोस्ट में उन्होंने लिखा कि कार्यक्रम की आयोजक एक निजी संस्था थी और जिला सुरक्षा अधिकारियों ने मौके का मुआयना करने के बाद राज्य सरकार को जो सूचना दी थी, उसके बिना पर उनकी सरकार ने राष्ट्रपति सचिवालय को बाकायदा पत्र और टेलीफोन के जरिये अपर्याप्त तैयारी की सूचना दी थी, इसके बावजूद नियत समय पर कार्यक्रम किया गया । ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया है कि चूंकि मुख्यमंत्री उस
कार्यक्रम की मंच योजना का हिस्सा नहीं थीं, इसलिए महामहिम के स्वागत के लिए उनका हैलीपैड पर उपस्थित न रहना प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं है। मुख्यमंत्री के अपने तर्क हो सकते हैं, मगर राष्ट्रपतिदेश की प्रथम नागरिक हैं, किसी सियासी पार्टी से अब उनका कोई ताल्लुकात नहीं है, तो क्या यह शिष्टाचार का तकाजा नहीं था कि उनकी अगवानी के लिए प्रदेश के किसी वरिष्ठ मंत्री को अधिकृत किया जाता ? ममता मंत्रिमंडल में 50 से भी अधिक मंत्री हैं। बहरहाल, यह अफसोसनाक बात है कि राष्ट्रपतिकी नाखुशी को अपने- अपने हक में भुनाने में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने कोई वक्त नहीं गंवाया। भाजपा जहां इसे महामहिम के साथ-साथ देश-प्रदेश के आदिवासियों के अपमानका मुद्दा बनाने में जुट गई, तो वहीं तृणमूल ने उस पर पश्चिम बंगाल को बदनाम करने के लिए देश के सर्वोच्च पद को भी न बख्शने का आरोप जड़ दिया। जाहिर है, ममता अब इसे पश्चिम बंगाल की अस्मिता पर हमले से जोड़ने की कोशिश करेंगी।
बंगाल में आगामी दो महीने के भीतर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह चुनाव ममता बनर्जी के लिए तो ‘करो या मरो’ वाला है ही, भाजपा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके नतीजे का असर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा । इसलिए पार्टी की पूरी कोशिश है कि वह अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर नतीजे लेकर आए। इधर देश के राजनीतिक दलों में जिस तरह से कटुता बढ़ी है, उसमें मर्यादित बयानों व शिष्ट व्यवहार की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है और यह बेहद चिंता की बात है। ऐसे में, शीर्ष सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों से भी अपेक्षा की जाएगी कि उन्हें सार्वजनिक टिप्पणी करते हुए विशेष सावधानी बरतने की दरकार है, क्योंकि उसका राजनीतिक इस्तेमालन सिर्फ उनकी छवि को प्रभावित करता है, बल्कि इससे पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचती है। राष्ट्रपति, न्यायाधीशों और सैन्य अधिकारियों की प्रतिष्ठा हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी थाती है। कम से कम इनको हमें बचाकर रखना होगा। यह जिम्मेदारी पदधारकों पर भी आयद है।