07-12-2023 (Important News Clippings)

Afeias
07 Dec 2023
A+ A-

To Download Click Here.


Date:07-12-23

Funding the Loss And Damage Fund

ET Editorials

COP28 in Dubai began with an historic move — the operationalisation of the Loss and Damage Fund (LDF) that was established last year at COP27 in Sharm el-Sheikh. Now comes the part of filling that jar with requisite funds. Right now, it’s around 30% of what the most-affected developing countries have lost due to impacts of climate change. This won’t do. With $100 million each, the UAE and Germany top the LDF pledge list. The EU has added roughly $150 million, Britain $76 million, and Japan $10 million. The US has offered a paltry $17.5 million.

The fund recognises that irreversible damages have been caused by the failure to cap emissions. While the setting up of LDF is welcome, rich industrialised countries are still avoiding taking any direct responsibility for the climate mayhem caused overwhelmingly by them. Contributions being voluntary hasn’t helped. To make LDF effective, COP28 has to deliver solutions that make financing additional, predictable, adequate, fair and debt-free. Accessing the funds should also be made easy for those who need it.

It would make ample sense for India to consider not accessing funds from LDF, despite all developing countries being able to draw from the fund. As part of that arrangement, it should not be made to make any contribution either, since it is a developing country with limited (4%) historical emissions accountability, and per-capita emissions that are one-third of the global average. Yet, as India seeks to cement its position as a global leader, New Delhi must continue to provide material and capacity support to vulnerable and poorer developing countries for recovery and reconstruction, and improve their climate resilience. Responsibility, after all, is different from accountability.


Date:07-12-23

भारत अमेरिका के मातहत की तरह बर्ताव नहीं करता

मिन्हाज मर्चेंट, ( लेखक, प्रकाशक और सम्पादक )

अमेरिका के न्याय विभाग (डीओजे) को यह खुलासा करने में पांच महीने क्यों लग गए कि निखिल गुप्ता नाम के एक भारतीय को ‘हत्या के बदले में हत्या’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया था? गुप्ता पर खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को मारने के लिए एक हिटमैन की भर्ती करने का आरोप लगाया गया था। हिटमैन एक गुप्त अमेरिकी एजेंट था। साजिश विफल रही और गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया- अमेरिका में नहीं बल्कि सुदूर चेक गणराज्य में, हालांकि अमेरिकी अधिकार-क्षेत्र के तहत। अब वह अमेरिका में अपने प्रत्यर्पण का इंतजार कर रहा है। तो फिर गिरफ्तारी की घोषणा में इतना समय क्यों लगा?

इन्हीं पांच महीनों के दौरान जो बाइडन ने सितम्बर में जी20 शिखर सम्मेलन के लिए भारत का दौरा किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की भारत-अमेरिका 2+2 रणनीतिक वार्ता नवम्बर में अपने अमेरिकी समकक्ष एंटनी ब्लिंकेन और लॉयड ऑस्टिन के साथ हुई। इस बीच, सीआईए निदेशक विलियम बर्न्स ने निखिल गुप्ता-पन्नू मामले पर भारत के एनएसए अजीत डोभाल के साथ चर्चा के लिए अगस्त में भारत का दौरा किया था। जी20 और 2+2 वार्ता- दोनों में ही इस मुद्दे पर निजी तौर पर बात की गई और इसे सार्वजनिक डोमेन से बाहर रखा गया। डीओजे के अभियोग में दावा किया गया है कि गुप्ता एक भारतीय सुरक्षा अधिकारी के निर्देशों के तहत काम कर रहा था, जिसे उसने सीसी-1 नाम दिया है। इस मामले में अमेरिकी अधिकारियों की सहभागिता थी, जिन्होंने गुप्ता को एक ऐसे व्यक्ति को कथित हत्या की सुपारी देने के लिए फांस लिया, जो एक गुप्त अमेरिकी एजेंट निकला। पन्नू की हत्या की नाकाम साजिश के अमेरिकी अभियोग में सबूत के तौर पर इंटरसेप्ट की गई फोन बातचीत की प्रतिलिपियां रखी गई हैं। पन्नू- जो कि एक प्रतिबंधित आतंकवादी है- ने अमेरिकी धरती पर भारतीयों पर खुलेआम हिंसा की धमकी दी है। उसे अमेरिकी कानून प्रवर्तन द्वारा गिरफ्तार नहीं किया गया।

कई सवाल उठते हैं। लेकिन इसमें अहम है, रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध के बीच में इस घटनाक्रम की टाइमिंग। जबकि भारत ने यूएन के प्रस्तावों में इजराइल पर हमास के हमले की निंदा करते हुए अमेरिकी रुख का समर्थन किया था। साथ ही उसने गाजा में इजराइल की बेरोकटोक बमबारी की भी आलोचना की थी। लेकिन अमेरिका में एक लॉबी है, जो लंबे समय से रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के तटस्थ रुख से नाराज है। जहां ब्लिंकेन के नेतृत्व वाला अमेरिकी विदेश विभाग आम तौर पर रूस के आक्रमण की निंदा करने से भारत के इनकार को समझ रहा है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान इस बात पर गुस्साया हुआ है कि बाइडन ने जिस भारत-अमेरिका विशेष साझेदारी को ‘सदी की सबसे महत्वपूर्ण’ बताया था, वहीं भारत ने उससे ‘विश्वासघात’ किया है।

उस विशेष साझेदारी में क्या शामिल है? अमेरिका को उम्मीद है कि भारत उसके उस भू-राजनीतिक सिद्धांत का समर्थन करेगा, जिसका मकसद रूस को कमजोर करना और चीन के उदय को रोकना है। रूसी कच्चे तेल को छूट पर खरीदकर, इसे भारत में रिफाइन करके और यूरोप में डीजल के रूप में बेचकर भारत वास्तव में रूस की पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रहा है। चूंकि यूरोप को डीजल और अन्य रिफाइंड पेट्रोकेमिकल की सख्त दरकार है, इसलिए अमेरिका को यह व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी है। लेकिन यह अमेरिका के उन लोगों को खटक गया है, जो अपने रणनीतिक साझेदारों से जी-हुजूरी की उम्मीद करते हैं।

नाटो में ऐसा ही होता है। जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य की अर्थव्यवस्थाएं भी इसी का पालन करती हैं। अरब के शेख भी। यही कारण है कि खाड़ी के किसी सुन्नी देश ने गाजा को सैन्य या वित्तीय सहायता देने का वादा नहीं किया। लेकिन भारत अलग है। वह ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करता है। उसका बाजार इतना बड़ा है कि अमेरिकी कंपनियां उसकी अनदेखी कर ही नहीं सकतीं। हां, अपने अंग्रेजीभाषी भाई-भतीजों ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड से उसका रिश्ता थोड़ा अलग है। ब्रिटेन के साथ अमेरिका के विशेष सम्बंध हैं। यह विशेष साझेदारी से अलग है। लेकिन भारत अमेरिका के मातहत की तरह व्यवहार नहीं करता। इसलिए समय-समय पर अमेरिका छड़ी दिखाने से बाज नहीं आता है। लेकिन जैसा कि निक्सन-किसिंजर आर्काइव्ज़ से पता चलता है, यह रणनीति अतीत में भारत पर कारगर नहीं थी, और आज भी नहीं होगी। भारत अमेरिका के दूसरे सहयोगियों से अलग है। समय-समय पर वह हमें छड़ी दिखाने से बाज नहीं आता है। लेकिन जैसा कि निक्सन-किसिंजर आर्काइव्ज़ से पता चलता है, यह नीति अतीत में कारगर नहीं थी, और आज भी नहीं होगी।


Date:07-12-23

पूर्वी सीमा को लेकर सतर्क रहे भारत 

दिव्य कुमार सोती, ( लेखक काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )

भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा से होने वाली घुसपैठ सदा से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती रही है, लेकिन चीन की आक्रामक नीतियों के चलते हमारी उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर भी एक बड़ा खतरा बना हुआ है। यह खतरा समय-समय पर सिर उठाता रहा है। वर्ष 2020 के दौरान गलवन में भारत और चीन के बीच सैन्य झड़पों के बाद अब तिब्बत से लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी भी भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा की तरह ही सैन्य दृष्टिकोण से संवेदनशील हो उठी है। पिछले तीन साल से वहां निरंतर युद्धस्तरीय सैन्य तैनाती बनाए रखनी पड़ रही है। ऐसी स्थिति में अब भारत की पूर्वी सीमाओं पर भी संकट के बादल छाते दिख रहे हैं। भारत की पूर्वी सीमाओं से लगने वाले म्यांमार के इलाकों में आजकल गृह युद्ध जैसे हालात हैं। इससे पूर्वोत्तर भारत में शरणार्थी संकट उत्पन्न हो रहा है। इस कारण सीमा प्रबंधन का काम जटिल हो गया है, जिससे केंद्र और राज्यों के संबंध भी प्रभावित हो रहे हैं। शरणार्थियों की आड़ में अवांछित तत्व भी घुसे चले आ रहे हैं, जो इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं। 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद से वहां के विभिन्न जनजातीय उग्रवादियों ने एक गठजोड़ बनाकर म्यांमार की सैन्य सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। इनमें से अधिकतर भारत की पूर्वी सीमा से लगने वाले म्यांमार के प्रदेशों में सक्रिय हैं।

चूंकि ये गुट तथाकथित रूप से सैन्य शासन के खिलाफ लड़ रहे हैं तो विश्व भर में लोकतंत्र के प्रसार के नाम पर दुकान चलाने वाले पश्चिमी देशों के एनजीओ नेटवर्क का इन उग्रवादियों को पूरा समर्थन मिला हुआ है। इन जनजातियों का कई दशकों से ईसाई मिशनरियों ने भी पूरा जोर लगाकर मतांतरण कराया है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी लाबी का भी उन्हें साथ मिला हुआ है। वे पश्चिमी देशों के इन गुटों के समर्थन से पैसा और सहानुभूति दोनों जुटा रहे हैं। इसके दम पर वे म्यांमार की सेना के विरुद्ध अत्याधुनिक हथियार और ड्रोन तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये उग्रवादी भारत की सीमा के निकट म्यांमार के कई सैन्य ठिकानों पर कब्जा करने में सफल हुए हैं। म्यांमार की वायुसेना भी भारतीय सीमा के निकट इन उग्रवादियों पर बमबारी कर रही है। ये उग्रवादी गुट इतने बेलगाम हो चुके हैं कि भारत-म्यांमार सीमा के कई क्षेत्रों पर कब्जा करना अब इनका घोषित लक्ष्य है, जिसका अर्थ होगा कि एक तरह से हमारे पड़ोसी बदल जाएंगे। यह क्षेत्र उस ‘गोल्डन ट्राइएंगल’ का हिस्सा है जो पूरी दुनिया में ड्रग्स के अवैध उत्पादन एवं व्यापार के लिए कुख्यात है। ये उग्रवादी संगठन पैसा जुटाने के लिए ड्रग्स की अवैध तस्करी में सक्रिय हैं। इनकी मिजोरम और मणिपुर के पहाड़ी हिस्सों में बसे कुकी-चिन समुदायों में गहरी पैठ है। सीमा पार भी इस समुदाय की आबादी फैली हुई है। इससे उपजी राजनीति और हिंसा के चलते ही मणिपुर महीनों से हिंसाग्रस्त है। मिजोरम में इस समुदाय का बाहुल्य है और वहां की पिछली जोरमथांगा सरकार भी म्यांमार से आने वाले कुकी-चिन उग्रवादियों और अन्य शरणार्थियों को भी केंद्र सरकार के निर्देशों के विरुद्ध जाकर भी शरण देती रही। इन प्रदेशों के अन्य समुदायों का आरोप है कि म्यांमार से आने वाले ये लोग शरणार्थी शिविरों में न रह कर अलग बस्तियां और गांव बसा लेते हैं या भीड़ में गुम हो जाते हैं। इससे इन राज्यों का जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ रहा है। असल में भारत-म्यांमार सीमा की परिस्थितियां भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के हालात से मेल खाती हैं। वहां भी सीमा के दोनों ओर पश्तून हैं। हथियारबंद उग्रवादी संगठन हैं। हिंसा का बोलबाला, ड्रग्स तस्करी, अवैध शरणार्थी, स्थानीय सरकार की आतंकियों से सहानुभूति और विदेशी खुफिया एजेंसियों की सक्रियता जैसे पहलू प्रभावी हैं। ऐसे में म्यांमार सीमा पर यह स्थिति ज्यादा लंबी खिंची तो भारत की सुरक्षा के लिए चुनौतियां बढ़ाएगी।

पूर्वी सीमा से सटे दूसरे देश बांग्लादेश में भी हालात कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। वहां चुनाव निकट हैं और पश्चिमी देश शेख हसीना सरकार को वापस आता नहीं देखना चाहते। शेख हसीना का आरोप है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश उनकी सरकार का तख्तापलट कर विपक्ष को सत्ता में लाना चाहते हैं। बांग्लादेश में विपक्ष की नेता खालिदा जिया हैं, जिन्हें कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों और सेना में चरमपंथी इस्लामिक तत्वों का समर्थन हासिल है। वैसे बांग्लादेश में चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं का उत्पीड़न ही होता रहा है। इसके बावजूद तुलनात्मक रूप से शेख हसीना भारत के लिए बेहतर विकल्प रही हैं, क्योंकि उन्होंने जहां तक संभव हो सका, इस्लामिक कट्टरपंथियों और पाकिस्तानपरस्त तत्वों पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। उन्होंने 1971 के युद्ध-अपराधियों को फांसी के तख्ते तक भी पहुंचाया है। इसके उलट अगर खालिदा जिया सत्ता में आती हैं तो इस्लामिक चरमपंथियों और पाकिस्तान की बांग्लादेशी सत्ता पर पकड़ मजबूत होगी। अमेरिका शेख हसीना सरकार पर मानवाधिकारों के उल्लंघन और निष्पक्ष चुनावों को रोकने के लिए विपक्षी दलों के दमन के आरोप लगा रहा है।

यह सही है कि शेख हसीना सरकार ने लगभग 10,000 विपक्षी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है, लेकिन इनमें से अधिकांश वही हैं जो जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनल पार्टी के सदस्य हैं। ये लोग 1971 से तमाम नरसंहारों, हत्याकांडों और उपद्रवों में शामिल रहे हैं। इसलिए उनके स्वतंत्र रहते भी निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। अगर पिछली बार की तरह खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी इस बार भी चुनावों का बहिष्कार करती है तो वह भी गुस्से और कट्टरपंथ को ही हवा देगा। सीधे शब्दों में कहें तो अगले पांच वर्षों में बांग्लादेश को लेकर भी भारत की चुनौतियां बढ़ने वाली हैं। ऐसे में आवश्यक है कि भारत म्यांमार और बांग्लादेश में कायम इन संकटों का दीर्घकालिक समाधान तलाशने का प्रयास करे। अन्यथा पूर्वी मोर्चे पर भी उसके लिए बड़ी समस्याएं उत्पन्न होंगी।


Date:07-12-23

कश्मीर में बदलाव

संपादकीय

जम्मू-कश्मीर के शासन-प्रशासन में सुधार का क्रम जारी है और इसी कड़ी में लोकसभा में दो संशोधन विधेयकों का पारित होना सुखद व स्वागतयोग्य है। देश के अनुरूप इस केंद्रशासित प्रदेश को मुख्यधारा में लाने के तमाम प्रयास जरूरी हैं। जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक के पारित होने से इस क्षेत्र के प्रतिनिधित्व में विस्तार होगा। कश्मीरी प्रवासी समुदाय के दो प्रतिनिधि और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से विस्थापित लोगों का भी एक प्रतिनिधि केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभा में नामित किया जाएगा। यह बात छिपी नहीं है कि विगत वर्षों में बड़ी संख्या में लोग जम्मू-कश्मीर से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। यह संख्या एक से तीन लाख तक बताई जाती है। पलायन करने वालों में पंडितों की संख्या सबसे ज्यादा है। जो एक बार घाटी से निकले, तो फिर लौट न पाए। बड़ी संख्या में ऐसे कश्मीरी पंडित हैं, जो कभी कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं कर सके। ऐसे लोगों के बीच से जब प्रतिनिधि विधानसभा के लिए नामित होंगे, तो जाहिर है, वंचितों-शोषितों को एक आधिकारिक आवाज मिलेगी, अपनी विधानसभा में उनका दर्द भी दर्ज होगा। अत यह एक बड़ी जरूरी राजनीतिक-सामाजिक पहल है, इससे अलगाववादियों को भी मुंहतोड़ जवाब मिल सकेगा।

इसके अलावा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का भी एक प्रतिनिधि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नामित होगा। जाहिर है, इसमें ऐसे कश्मीरी नेताओं को आवाज मिलेगी, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हैं और कहीं बाहर रहने को मजबूर हैं। पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने के संकल्प के मद्देनजर यह पहल महत्वपूर्ण है। वास्तव में, विधानसभा में कश्मीरी पंडितों और पाक अधिकृत क्षेत्र के कश्मीरियों की आवाज के बिना जम्मू-कश्मीर की बात पूरी नहीं होती थी। देखने में ये कदम छोटे लग सकते हैं, लेकिन इनका प्रभाव विशेष रूप से घाटी की राजनीति पर पड़ना तय है। अब यह सरकारों पर निर्भर करेगा कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में योग्यतम प्रतिनिधित्व पहुंचे और शांति-समाधान की दिशा में काम करे। कोरी राजनीति से अलग कश्मीर के व्यापक हित के बारे में सोचने का समय है। वहां धीरे-धीरे सामान्य हो रही स्थितियों को हर प्रकार से सकारात्मक बल देना होगा। आंकड़े गवाह हैं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूरे तथ्यों के साथ लोकसभा में बताया है कि पहले और आज के कश्मीर की जमीनी हकीकत में बहुत बदलाव आया है। कश्मीर में जनजीवन जैसे-जैसे सामान्य हो रहा है, उससे सरकार की भी उम्मीदें बढ़ रही हैं।

साथ ही, जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक के जरिये कश्मीर में आरक्षण का वही स्वरूप हो जाएगा, जो बाकी देश में है। देश में एक विधान, एक निशान, एक प्रधान के अनुरूप ही आरक्षण में एकरूपता जरूरी है। पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ देना जरूरी है, ताकि चंद लोगों का परंपरागत वर्चस्व टूट जाए। कश्मीर में ही बड़ी संख्या में ऐसी जातियां रही हैं, जो आरक्षण या किसी भी प्रकार की विशेष सहूलियतों से वंचित हैं, ऐसी तमाम जातियों को विधिवत आरक्षण देकर आगे बढ़ाना कश्मीर के लिए लाभप्रद है। अब पिछड़े गांवों में रहने वाले सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित लोगों व नियंत्रण रेखा के करीब रहने वालों को भी आरक्षण मिल सकेगा। जाहिर है, हम नए विकासशील कश्मीर की ओर बढ़ रहे हैं।


Date:07-12-23

तटीय इलाकों को फिर रुला गया एक चक्रवाती तूफान

के जे रमेश, ( पूर्व महानिदेशक, भारतीय मौसम विभाग )

मिचौंग चक्रवात जब तमिलनाडु के तट से 80-100 किलोमीटर दूर केंद्रित था और व्यापक असर डाल रहा था, तभी करीब 400 किलोमीटर दूर मेरे शहर बेंगलुरु में भी ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी थी। 3 दिसंबर को चेन्नई में सबसे ज्यादा बारिश हुई, तो 3 और 4 दिसंबर को यहां भी रुक-रुककर बारिश होती रही, जबकि बेंगलुरु कर्नाटक का हिस्सा है। फिर जैसे-जैसे तूफान उत्तर की ओर बढ़ा, चित्तूर, कडपा, अन्नतपुरामु, अमरावती, नेल्लोर, रायलसीमा जैसे तमाम इलाकों में बारिश होने लगी। जिस तरह शुरुआत में तिरुवल्लूर, कांचीपुरम, पुडुचेरी जैसे तटीय इलाकों में मिचौंग का असर रहा, और बाद में यह सुदूर इलाकों में पहुंचा, वैसे ही अब कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के सुदूर इलाकों में बारिश हो रही है।

वास्तव में, मानसून के बाद के मौसम, यानी ‘पोस्ट-मानसून’ में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात आते रहे हैं। हालांकि, यह अक्तूबर व नवंबर महीने में ज्यादा दिखता था, जबकि दिसंबर में काफी कम। मगर अब दिसंबर में भी इनकी निरंतरता बढ़ सकती है, जिसकी एक बड़ी वजह है, सागर का गरम होना। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्रों में गरमी अवशोषित करने की क्षमता बढ़ गई है, ठीक हमारी आबोहवा की तरह, जो अब ज्यादा गरमी अवशोषित करने लगी है। इस कारण जब कभी चक्रवात या दबाव का क्षेत्र बनता है, तो समुद्री ऊर्जा उसे ज्यादा मारक बना देती है। इस बार पिछले एक महीने से बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र लगातार बन रहा था। अल-नीनो वर्ष में उत्तर-पूर्व मानसून के असामान्य होने की बात भी कही जा रही थी। इन सबका ही एक नतीजा मिचौंग चक्रवात है। तमिलनाडु में सिर्फ चेन्नई के इलाकों में 1 से 4 दिसंबर के बीच कई जगहों पर 50 से 60 सेंटीमीटर तक बारिश हुई, जो काफी ज्यादा है।

इस तूफान ने मछुआरों के अलावा दक्षिण के किसानों को भी काफी नुकसान पहुंचाया है। यह खरीफ की कटाई का मौसम है। खेतों में धान की फसल अंत में हफ्ते-डेढ़ हफ्ते सूखने के लिए छोड़ दी जाती है। मगर इस तूफान ने धान की बालियों को जमीन पर गिरा दिया है। गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, नेल्लोर जैसे आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु के तटवर्ती इलाकों के डेल्टा क्षेत्र धान के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। मगा यहां के किसानों के हाथ सिवाय मायूसी के कुछ भी नहीं है। इसी तरह, यहां नारियल, पपीता, केले, सब्जी और फूलों की भी काफी खेती होती है। विशेषकर कृष्णा, गोदावरी जिलों में इन फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है। अब तो तेलंगाना में भी किसानों को चक्रवाती बारिश चोट पहुंचा रही है।

क्या ऐसे तूफानों से बचा जा सकता है? जाहिर है, सबसे पहले हमें जलवायु परिवर्तन से निपटना होगा और ऐसे उपाय करने होंगे कि ग्लोबल वार्मिंग कम से कम असरंदाज हो सके। कार्बन-उत्सर्जन का हरसंभव प्रबंधन करना होगा। मगर कुछ प्रयास तत्काल किए जा सकते हैं। मिसाल के तौर पर, चक्रवात के बनने का पूर्वानुमान, यानी साइक्लोजेनेसिस न सिर्फ समय पर प्रसारित हो, बल्कि निचले स्तर तक यह सूचना जाए। अभी आमतौर पर हफ्ते में एक बार यह सूचना जारी की जाती है, पर यदि अक्तूबर से दिसंबर तक के महीने में करीब दस दिन पहले यह सूचना आ जाए, तो किसानों को अपनी खड़ी फसल को काटने या उसके प्रबंधन का कुछ वक्त मिल जाएगा। इसके लिए, कृषि विभाग और मौसम विभाग के समन्वय से एक तंत्र बनाना चाहिए, जो ठीक उसी तरह का तंत्र हो सकता है, जैसे अभी आपदा प्रबंधन का है। आपदा प्रबंधन के तहत जैसे ही किसी आपदा की सूचना आती है, तो जिन-जिन इलाकों में जान-माल के प्रभावित होने की आशंका होती है, वहां के लोगों व मवेशियों को तुरंत सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाता है।

प्रभावित इलाकों में आश्रय गृह भी बनाए जाने चाहिए। दरअसल, तटवर्ती इलाकों में मछुआरों का रहना मजबूरी भी है, इसलिए गांव में पक्का मकान होने के बावजूद यहां वे कच्चे मकानों में रहते हैं। अगर चक्रवात की सूचना मिलते ही उनको ‘शेल्टर हाउस’ भेज दिया जाए, जो विशेष तौर पर चक्रवात के खिलाफ बनाए गए हों, तो इंसानी जान का नुकसान हम काफी कम कर सकते हैं। इसके लिए भी समग्र प्रयास की दरकार होगी।


Subscribe Our Newsletter