07-04-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
देश के युवा पढ़ाई छोड़ें तो यह सिस्टम की खामी है
संपादकीय

युवाओं का पढ़ाई से मोहभंग हो रहा है। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट 2026 के अनुसार घर का खर्चा चलाने के लिए जहां 2017 में 58% युवाओं (15-24 ) ने पढ़ाई छोड़ी, वहीं छह साल बाद यह प्रतिशत लगभग सवा गुना (72) हो गया। इसका मुख्य कारण है। पढ़ाई से नौकरी का रिश्ता न होना। पिछले 43 वर्षों में लगातार हर पांच में से दो ग्रेजुएट बेरोजगार रहे और जिनको काम मिला भी तो अधिकांशतः निजी क्षेत्र में गुजरा चलाने वाला। ग्रेजुएट्स में केवल 7% को स्थायी नौकरियां मिलीं। उधर देश में इसी काल में डॉलर अरबपतियों की संख्या 2017 में 101 से बढ़कर इस वर्ष 308 हो गई है। आज दुनिया में भारत अरबपतियों की संख्या के मामले में तीसरे स्थान पर है। इसी बीच ताजा एनएसओ सर्वे ने बताया कि अनौपचारिक क्षेत्र में लगे लोगों की संख्या वर्ष 2025 में पिछले साल के मुकाबले 75 लाख ज्यादा बढ़ कर 12.80 करोड़ हो गई है। संस्था ने इसे मजबूत श्रम बाजार मानते हुए बेहद सकारात्मक बताया है। अगर घर का खर्च चलाने के लिए बीच में ही पढ़ाई छोड़ने वाले येनकेन प्रकारेण दो जून की रोटी जुटा रहे हैं तो उनके रोजगार पर खुशी का सरकारी संस्था द्वारा इजहार चिंतित करने वाला है। किसी देश के युवा अगर पढ़ाई छोड़ें तो यह उस सिस्टम की खामी दर्शाता है, जिसमें अरबपति भी बढ़ रहे हैं और शिक्षाहीन भी।
केंद्रीय बलों में आईपीएस की तैनाती का सवाल
आरके विज, ( लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी हैं )
इन दिनों संसद की ओर से पारित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक चर्चा में है। इस विधेयक का उद्देश्य आईपीएस अधिकारियों की केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में प्रतिनियुक्ति पर तैनाती का नियमितीकरण करना है।
इसमें यह प्रविधान है कि पुलिस महानिरीक्षक स्तर के 50 प्रतिशत पद आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। इसी प्रकार अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के न्यूनतम 67 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। जहां तक विशेष महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों का प्रश्न है, समस्त अर्थात सौ प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रतिनियुक्ति हेतु आरक्षित रहेंगे।
चूंकि उप-महानिरीक्षक एवं कनिष्ठ स्तर के पदों के संबंध में विधेयक मौन है, इसलिए यही लगता है कि इन पदों के संबंध में नियम पूर्व अनुसार ही लागू रहेंगे। प्रस्तावित नियम पांच प्रकार के केंद्रीय बलों क्रमशः सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी, सीआइएसएफ और सशस्त्र सीमा बल पर लागू होंगे।
दशकों से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहकर अपना योगदान देते आ रहे हैं। केंद्रीय बलों की मुख्य भूमिका आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा है। ये बल राज्य पुलिस बलों की सहायता के लिए तैनात किए जाते हैं। केंद्र और राज्यों के बलों में बेहतर समन्वय के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बलों में आईपीएस अधिकारी तैनात रहें।
भारत में संघीय प्रणाली लागू है। संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं का प्रविधान इसी उद्देश्य से किया गया था ताकि केंद्र और राज्यों में वे अपनी जिम्मेदारियों का निष्पादन कर सकें। केंद्रीय सशस्त्र बल माओवाद प्रभावित इलाकों, जम्मू कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद से निपटने के लिए राज्यों की सहायता के लिए तैनात हैं।
उक्त विधेयक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के संबंध में मई 2025 में दिए गए निर्णय के खिलाफ समझा जा रहा है। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विसेज मानते हुए कुछ वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए थे और केंद्रीय बलों के अधिकारियों की पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाने के लिए पुलिस महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को आगामी दो साल में धीरे-धीरे कम करने का कहा था।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के आधार पर केंद्रीय बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने यह मांग रख दी कि उनकी सर्विसेज संगठित प्रकार की होने से प्रतिनियुक्ति को समाप्त किया जाए और उन्हीं के अधिकारी उनके बलों को नेतृत्व प्रदान करें। केंद्रीय बलों के कुछ अधिकारियों ने भी प्रतिनियुक्ति के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया। यह किसी भी अनुशासित बल को शोभा नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के अपने आदेश में कहा था कि केंद्रीय बलों के काडर की समीक्षा की जाए और उनके भर्ती नियमों और सेवा शर्तों में आवश्यक बदलाव किया जाए। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय बलों को एक संगठित ग्रुप मानते हुए यह नहीं कहा था कि आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति न की जाए। इसके बजाय सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि केंद्र एवं राज्यों में बेहतर तालमेल के लिए आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर इन बलों में तैनात करना एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार को लेना है।
केंद्रीय बलों को आईपीएस अफसरों द्वारा नेतृत्व प्रदान करने और वरिष्ठ पदों पर तैनात होने पर न तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा और न ही यह विवाद का मुद्दा था। इसलिए महानिदेशक सहित वरिष्ठ पदों पर तैनाती के मुद्दे पर किसी बहस का प्रश्न नहीं उठता। वैसे भी राज्यों में आपरेशन संबंधी गतिविधियों के समन्वय के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या विशेष पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी तैनात रहते हैं।
आईपीएस अधिकारी अति कठिन राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सर्विस में दाखिल होते हैं। उनके विशिष्ट प्रशिक्षण और मैदानी अनुभव के कारण उनकी केंद्रीय सशस्त्र बलों में तैनाती एक उचित निर्णय है। अखिल भारतीय सेवाओं के जनक और स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा भारतीय पुलिस सेवा का गठन इस उद्देश्य से किया गया था, ताकि संघीय प्रणाली सुचारु रूप से चल सके।
आईपीएस अफसरों ने बीते दशकों में सरदार पटेल के सपनों को साकार किया है। उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन अफसरों ने केंद्रीय बलों को सींचा है और उन्हें सक्षम नेतृत्व प्रदान किया है। जहां तक महानिरीक्षक स्तर तक प्रतिनियुक्ति को कम करने का प्रश्न है, यह सरकार का एक नीतिगत निर्णय है और सुप्रीम कोर्ट का इसमें दखल देना उचित प्रतीत नहीं होता।
न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार कानून की व्याख्या करना है, न की नीति बनाना या उसमें हस्तक्षेप करना, जब तक कि वह संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करे या वह मनमानी हो। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि कोर्ट को नीतिगत निर्णय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है और न ही वह अपने को अपीलीय प्राधिकार के रूप में रख सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंडियन एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट बनाम यूनियन आफ इंडिया’ (2022) मामले में भारत सरकार की ‘वन रैंक-वन पेंशन’ सिद्धांत को नीतिगत निर्णय कहते हुए उसमें दखल देने से मना किया था। अतः केंद्र का केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आईपीएस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर आपरेशनल और फंक्शनल आवश्यकता के अनुसार तैनात करने का अधिकार एक नीतिगत निर्णय है।
संसद में केंद्रीय मंत्री द्वारा बताया गया कि केंद्रीय पुलिस बलों के अफसरों के पदोन्नति के चार अवसर लगभग सुनिश्चित हैं। इसके अलावा उनकी बड़ी संख्या में एक साथ भर्ती करने के बजाय प्रत्येक वर्ष भर्ती कर पदोन्नति के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा उपरोक्त विधेयक द्वारा आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के संबंध में समस्त पुराने विवादों को समाप्त करने के उद्देश्य से यह एक स्वागतयोग्य कदम है।
Date: 07-04-26
संबंध सुधारने को तैयार बांग्लादेश
ऋषि गुप्ता, ( लेखक विदेश एवं सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं )
विश्व राजनीति के भौगोलिक पक्ष को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि पड़ोसी देशों से संबंधों में लगातार मधुरता और समन्वय बनाए रखना मुश्किल होता है, वह चाहे अमेरिकी महाद्वीप में अमेरिका और उसके पड़ोसी देशों के बीच हो या फिर दक्षिण एशिया में भारत और उसके पड़ोसियों के बीच। मुश्किल तब आती है, जब तनाव ऐसे पड़ोसियों के साथ हो, जिनकी साझा संस्कृति, इतिहास, बोली-बानी और अन्य समानताएं होती हैं।
पिछले दस वर्षों में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव या फिर बांग्लादेश के साथ संबंध लगातार भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति की परीक्षा लेते रहे हैं। कई अवसरों पर ऐसा लगा कि किसी तीसरे देश ने खटास-तनाव का फायदा उठा लिया। भारत की विदेश नीति पड़ोसियों के साथ व्यापार करने और आर्थिक संबंधों की तरह ही आत्मीय संबंधों को बराबर महत्व देने की रही है। इससे पड़ोसी देशों से तनाव कम करने में मदद मिली है। इन दिनों भारत-बांग्लादेश संबंधों में भी तनाव की कमी आती दिख रही है।
ज्ञात हो कि अगस्त 2024 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके भारत में शरण लेने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली वहां की अंतरिम सरकार ने भारत के साथ संबंध बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बांग्लादेश में भड़का छात्र आंदोलन अवामी लीग नेता और प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासन के खिलाफ था। इस हिंसक आंदोलन के चलते उनका भारत आना एक संयोग मात्र था, लेकिन यूनुस सरकार ने भारत पर जिस तरह तंज कसे, उसे चिढ़ाने का काम किया और शेख हसीना के प्रत्यर्पण को अपनी भारत नीति का मुख्य केंद्र बना दिया, उससे संबंध बिगड़े।
अपने लगभग डेढ़ साल के कार्यकाल में यूनुस ने बांग्लादेश और भारत के संबंधों को न केवल द्वेष से भरा, बल्कि बांग्लादेश की आजादी और बांग्लादेशी जनता पर अत्याचार करने वाले पाकिस्तान को मित्र देशों में गिना, लेकिन चुनाव होते ही समय ने करवट ली और भारत-बांग्लादेश संबंधों में फिर एक नई ऊर्जा का प्रवाह देखा जा सकता है। इसमें बड़ा कारण है बांग्लादेश में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत प्रथम की नीति।
बांग्लादेश में फरवरी में हुए चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की भारी जीत ने भारत में मिश्रित भाव पैदा किए, क्योंकि बीएनपी ऐतिहासिक तौर पर भारत के खिलाफ मुखर रहने वाला दल रहा है। इसका कारण भारत का शेख हसीना के प्रति लगाव माना जाता था, पर अवामी लीग की अनुपस्थिति में यह पहली बार है कि बीएनपी का नया नेतृत्व भारत के साथ मधुर संबंधों की वकालत कर रहा है।
इसकी शुरुआत बीएनपी प्रमुख एवं प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को ढाका आने का न्योता भेजकर की। हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री का ढाका दौरा नहीं हो पाया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारत की अगुआई की। यह पहल महत्वपूर्ण रही। इसके साथ ही तारिक रहमान जिस आत्मीयता से विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ओम बिरला से मिले, उससे भी बिगड़े संबंध पटरी पर आते दिखे।
यह उल्लेखनीय है कि गत 25 मार्च को प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपने राष्ट्रीय संदेश में बांग्लादेश की आजादी के दौरान पाकिस्तान की ओर से किए गए अत्याचारों की कड़ी आलोचना की। भारत ने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई उसकी मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर लड़ी थी और पाकिस्तान को बुरी तरह हराया था। बांग्लादेश की आजादी की कहानी इस देश के साथ भारत का एक मजबूत साझा इतिहास है।
बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर उसके दिल्ली स्थित उच्चायोग में भारतीय विदेश राज्य मंत्री, विदेश सचिव और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की मौजूदगी खास रही। इस दौरान बांग्लादेशी उच्चायुक्त रियाज हमीदुल्ला ने बांग्लादेश की आजादी में भारत का महत्व स्वीकारा। इसके बाद 2 अप्रैल को उन्होंने भारतीय सेना प्रमुख से भेंट की। संबंध सुधार की इसी कड़ी में अब बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान दिल्ली आ रहे हैं। यह दौरा निश्चित ही दोनों देशों के संबंधों में नई ऊर्जा भरने का काम करेगा।
उनके भारत दौरे पर गंगा जल संधि के नवीनीकरण, व्यापार, निवेश, सुरक्षा और सीमा से संबंधित विषयों पर बात होने की संभावना है। हालांकि बांग्लादेश का विपक्ष, खासकर जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगी दल शेख हसीना के प्रत्यर्पण को मुद्दा बनाते रहेंगे, लेकिन तारिक रहमान सरकार को इस पर ध्यान दिए बिना संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर देना होगा, क्योंकि शेख हसीना मामले को द्विपक्षीय संबंधों को मधुर बनाने में आड़े आने देना समझदारी नहीं हो सकती।
जहां बांग्लादेश की नई सरकार अंतरिम सरकार द्वारा खोदी गई खाई को पाटने के प्रयास कर रही है, वहीं यह उम्मीद भी कर रही है कि भारत बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा देने में ढील दे। इस सबके बीच हम इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि यूनुस सरकार के कृत्यों का भारतीय जनमानस पर एक नकारात्मक प्रभाव हुआ है, जिसकी झलक भारतीय मीडिया में लगातार दिखती रही। स्पष्ट है कि एक-दूसरे के प्रति विश्वास पैदा करने हेतु नए सिरे से प्रयास करने होंगे, लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि सभी मुद्दे रातोंरात सुलझ जाएंगे, क्योंकि मोहम्मद यूनुस ने जो नुकसान किया, उसकी भरपाई में समय लगेगा।
Date: 07-04-26
सही दिशा में कदम
संपादकीय

हाल ही में पारित जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 से कारोबारी सुगमता में सुधार की उम्मीद है। विधेयक के जरिये 79 केंद्रीय कानूनों के 784 प्रावधानों में संशोधन किया गया। इनमें से 717 प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त की गई है जबकि 67 में संशोधन का लक्ष्य जीवन को सहज बनाना है।
ये संशोधन विभिन्न क्षेत्रों के तमाम कानूनों में किए गए हैं जिनमें औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940, फार्मेसी अधिनियम 1948 , खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006, नैदानिक प्रतिष्ठान (पंजीयन एवं विनियमन) अधिनियम 2010, राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय आयोग अधिनियम 2021 तथा वाणिज्य, उद्योग, पर्यावरण और कराधान से संबंधित कई कानून शामिल हैं। विस्तृत उद्देश्य यह है कि छोटे प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के लिए कारावास जैसी आपराधिक सजाओं को हटाकर क्रमबद्ध मौद्रिक दंड और अपील प्रावधानों के साथ एक ढांचागत न्याय निर्णय तंत्र स्थापित किया जाए।
सरकार जिस समस्या को हल करना चाहती है वह बहुत व्यापक है। जैसा कि केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि करीब पांच करोड़ लंबित अदालती मामले मामूली अपराधों के हैं। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिनमें अदालती हस्तक्षेप की जरूरत भी नहीं पड़नी चाहिए थी। सरकार ने संकेत दिया है कि इन संशोधनों की मदद से बड़ी संख्या में ऐसे मामले कम करने में मदद मिलेगी और उन्हें अदालतों से बाहर प्रशासनिक प्रणाली के जरिये सुधारा जा सकेगा। इससे वाद कम होंगे, अनुपालन लागत में कमी आएगी और कुल मिलाकर कारोबारी माहौल में सुधार होगा।
विधेयक की एक अन्य अहम विशेषता है तुरंत कदम उठाने के बजाय चरणबद्ध प्रवर्तन की शुरुआत। उदाहरण के लिए मशविरा नोटिस, चेतावनी और मौद्रिक जुर्माना आदि। यह सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों के लिए खासतौर पर उपयुक्त है जिन्हें अक्सर जटिल अनुपालन जरूरतों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है और जो मामूली अपराधों के लिए बने आपराधिक प्रावधानों के कारण परेशानी का सामना करते हैं।
ध्यान देने वाली बात है कि जन विश्वास विधेयक कोई अलग-थलग सुधार नहीं है। यह गत एक दशक के उस व्यापक और निरंतर नीतिगत हस्तक्षेप का परिणाम है जिसके तहत देश में कारोबारी सुगमता के माहौल में सुधार किया जा सके। जन विश्वास अधिनियम 2023 के जरिये 42 केंद्रीय कानूनों के 183 प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त की गई थी। मौजूदा विधेयक का इरादा ऐसे सैकड़ों और प्रावधानों की आपराधिकता समाप्त करने का है। इसी प्रकार कॉरपोरेट कानून (संशोधन विधेयक)2026, कंपनी अधिनियम 2013 में प्रस्तावित संशोधन और एलएलपी अधिनियम 2008 आदि अनुपालन को सहज बनाते हैं और संचालन मानकों को मजबूत बनाते हैं।
ऋणशोधन कानून में संशोधन, माल एवं सेवा कर को युक्तिसंगत बनाना और श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करने जैसे पूरक सुधार यह संकेत देते हैं कि नियमन को सरल बनाने और अनुपालन के बोझ को कम करने का एक सतत प्रयास जारी है। सरकार सचेत रूप से नियामक अनिश्चितता को कम करने और व्यापारिक वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही है।
यद्यपि केवल अपराधमुक्त करना कारोबारी सुगमता की गारंटी नहीं दे सकता। भारत में वास्तविक समस्या केवल आपराधिक प्रावधान नहीं हैं, बल्कि अनुपालन, अनुमोदन और केंद्र तथा राज्यों के बीच नियामक ओवरलैप की भारी संख्या है। यदि इन्हें पर्याप्त रूप से कम नहीं किया गया, तो व्यवसाय, विशेषकर छोटे व्यवसाय, बाधाओं का सामना करते रहेंगे।
अनुपालन संबंधी मुद्दों के चलते भी भारत में व्यवसाय अपने संचालन को बढ़ाने से हिचकते हैं। इसलिए, सुधार का अगला चरण अनुपालन की संख्या कम करने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने, राज्यों में नियमों को सामंजस्यपूर्ण बनाने और बिना आमने-सामने यानी फेसलेस तथा डिजिटल शासन प्रणालियों के दायरे का विस्तार करने पर केंद्रित होना चाहिए।
जन विश्वास सुधार की सफलता अंततः क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। निर्णय अधिकारी पारदर्शी रूप से कार्य करें, दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में हों, और शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत अपील तंत्र मौजूद हो। नियामक सुधार का उद्देश्य सरलीकरण होना चाहिए। इससे स्वतः ही कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
सत्ताधीशों की मर्यादा
संपादकीय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुख से निकले अपशब्दों की भर्त्सना होनी ही चाहिए। ऐसे शब्दों को नजरंदाज करना मुश्किल है। उन्होंने सत्ता नायक की मर्यादा का उल्लंघन किया है। दुनिया में अनेक नेता हैं, जो निजी तौर पर बहुत अपशब्द कहते हैं, किंतु जब वे सार्वजनिक बयान देते हैं, तब शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर करते हैं। अच्छे शब्द खुशी और आशा से भर देते हैं, जबकि बुरे शब्द घाव करते हैं। ट्रंप ने जो अपशब्द कहे हैं, उनसे न केवल ईरान, बल्कि अन्य तमाम संवेदनशील लोगों को दुख पहुंचा है। उनके अपशब्दों से ईरान के सम्मान को ठेस लगी है और इसका असर युद्ध विराम के लिए होने वाली किसी भी वार्ता पर अवश्य पड़ेगा। फौरी नतीजा देखिए, ईरान के एक आला अधिकारी ने तल्खी से जवाब दिया है- ईरान अस्थायी युद्ध- -विराम के लिए होगुंज मार्ग को नहीं खोलेगा। क्या किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को यह कहना शोभा देता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य खोलो, पागलो, वरना तुम नरक में पहुंच जाओगे ?
ईरान के अनेक नेताओं को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर मारा है। ईरान के खुफिया प्रमुख भी मारे गए हैं, ऐसे में, तेहरान को न सिर्फ अपमानित किया जा रहा है, धमकाया भी जा रहा है। हालांकि, ट्रंप के गलत या हल्के बोल का असर यह हुआ है कि ईरान निडर होता जा रहा है। अमेरिका को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जिस तरह से ईरान को
नुकसान पहुंचा रहा है, उसकी वजह से दोनों देशों के बीच लंबे समय तक दुश्मनी का माहौल बना रहेगा। डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर खुद अमेरिका में ही रहने वाले ईरानियों या ईरानी मूल के लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। इससे ईरान के उदारवादी लोगों में भी नाराजगी बढ़ रही है। कोई संदेह नहीं, नाराजगी की इस धधकती आग में ट्रंप के अपशब्द घी का काम करेंगे। आज दुनिया को आग बुझाने वाले नेता चाहिए, आग लगाने या उसमें घी डालने वाले नेताओं की हर हाल में मजम्मत होनी चाहिए। आश्चर्य नहीं, ट्रंप के अपशब्दों और दुव्र्व्यवहार की खुद अमेरिका में निंदा हो रही है। अमेरिकी नेता माजरी टेलर ग्रीन ने, जो कभी ट्रंप की कट्टर समर्थक थीं, दोटूक कहा है वह पागल हो गए हैं और आप सभी इसमें भागीदार हैं।
बेशक, ट्रंप अब अमेरिका को महान नहीं बना रहे हैं, उसकी स्थापित छवि को बर्बाद कर रहे हैं। वह अपने वादे के खिलाफ जा रहे हैं। शायद इस कुंठा की वजह से भी उनकी भाषा बिगड़ रही है। स्वतंत्र अमेरिकी सीनेटर बन सैंडर्स ने ट्रंप के अपशब्दों पर कहा है कि यह एक खतरनाक और मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति की बकवास है। लोग याद कर रहे हैं कि लगभग छह दशक पहले अमेरिका में एक राष्ट्रपति लिंडन बेंस जॉनसन हुए थे, जो अक्सर अपशब्दों का इस्तेमाल करते थे। वैसे, आज के समय में अनेक देशों के राजनीतिज्ञों की भाषा चिंताजनक है। निजी तौर पर ही नहीं, सार्वजनिक रूप से भी एक-दूसरे के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। यहां संभलकर रहना होगा, सत्ता नायकों के बुरे बोल केवल बर्बादी लाएंगे। अपशब्दों से खटास बढ़ेगी और मेल-जोल की उम्मीदों पर पानी फिरेगा। अपशब्द कहने में यूरोप, रूस और अरब दुनिया के नेता कम नहीं हैं, लेकिन युद्ध के अंत के लिए, विश्व में शांति के लिए, दुनिया में समावेशी विकास के लिए शब्दों या जुबान पर अंकुश रखना जरूरी है। दुनिया के विकास के लिए राजनेताओं को अपनी भाषा पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। सत्ताधीशों में मर्यादा रहेगी, तो ही अमन-चैन का माहौल रहेगा।