06-02-2023 (Important News Clippings)

06 Feb 2023
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Spy In The Sky

China’s espionage balloons or espionage ships are part of an aggressive strategy that can target India too.

TOI Editorials

The American shooting down of a Chinese spy balloon off the US coast has unsurprisingly further strained superpower relations. China’s response may be limited to angry words, but it’s unlikely to change its course. This wasn’t the first Chinese surveillance balloon to be detected but was the most sophisticated one. And reports are coming in of a second spy balloon flying over Central and South America. Therefore, there are important lessons here for countries like India that share a land border with China and have serious differences with Beijing.

First, it is quite clear from the balloon incident that Chinese spy tech is getting increasingly sophisticated. Last year’s docking of a Chinese spy ship masquerading as a research vessel at Sri Lanka’s Hambantota port was another example of Beijing’s growing espionage capabilities. This time too Beijing insisted that the balloon flying over sensitive US military sites was a wayward weather-monitoring device. But its angry reaction after a US fighter jet shot down the balloon shows the craft wasn’t just studying wind patterns.

Second, it is also increasingly clear that given China’s autocratic communist regime, distinctions between government and civilian assets are superficial. In fact, under Xi Jinping’s tenure at the helm of the party-state system, such civil-government and civil-military distinctions have further eroded. This puts vast civilian resources at Beijing’s disposal to carry out espionage, data collection and grey-zone tactics. Thus, all cooperation with Chinese civilian agencies and businesses needs to be seen in this light and appropriate safeguard worked out.

China is using an all-of-government and civil-society approach to spy on other countries. Another example of this was the 2020 investigation that revealed a Shenzhen-based technology firm was harvesting data on more than 10,000 influential individuals in India. Given this scenario, India needs to upgrade its hi-tech counterespionage measures. Available information suggests India is quite behind in this game. Balloons, incidentally, have multiple uses outside espionage and weather, and therefore the incentives for becoming at manirbhar in them is large. There is also an urgent need to step up counter-intelligence cooperation with the US and other likeminded democracies to counter China’s plans.


Bajra Boosters

Policies promoting millets will not work unless governments address farmer’s incentives.

TOI Editorials

Last week’s budget highlighted millets as a focus area for GoI, with the aim of making India a global hub for it. It’s a smart idea because increasing the production and domestic consumption of millets makes sense from the perspectives of nutrition and environment – and more exports are always welcome. But as a report in this paper showed, in the 2022-23 rabi crop season, millet acreage had declined by 5% in relation to a five-year average even though the overall farm acreage increased by 14% to 72. 1 million hectares. This disconnect is no surprise.

In 2013, GoI launched a crop diversification programme to shift acreage away from paddy in the original Green Revolution regions, Punjab, Haryana and western UP. Later, the Haryana government even offered a cash subsidy of Rs 7,000/acre to shift cultivation to alternate crops. None of these policies worked. If anything, the dominance of rice and wheat in India’s cereal basket is even more pronounced now. For example, between 2010-11 and 2020-21, acreage under coarse cereals declined by about 15% to 24. 12 million hectares. In terms of output, coarse cereals made up 18% of the overall cereal output of 285. 28 million tonnes in 2020-21. Further, in GoI’s gigantic, subsidised food distribution system, coarse cereals are barely present. Therefore, in what’s the world’s largest food security scheme covering about 800 million people, rice and wheat are an overwhelming presence.

These numbers feed back into the economic incentives influencing farmers. The procurement system that supports the food distribution programme caters mainly to rice and wheat. As the procurement guarantees a floor price, an increasing number of farmers have an economic incentive to stick to these two cereals regardless of the long-term consequences. Unless this challenge is addressed, there will be a huge mismatch between the intent to transition towards millets. Therefore, to realise the goal of popularising millets, GoI has to start with providing the right economic incentives to farmers. The procurement system is the best location to begin the shift away from rice and wheat to the more nutrient-dense millets. Farmers, like other economic agents, respond to incentives.


हिंडनबर्ग के निशाने पर अदाणी

शिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )

जानी-मानी अमेरिकी सट्टेबाज कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के नाटकीय हमले ने भारत के सबसे तेज रफ्तार से बढ़ते अदाणी समूह के कदमों को रोक दिया है। हिंडनबर्ग कंपनी की रिपोर्ट के एक हफ्ते के भीतर अदाणी समूह का बाजार मूल्य गिरकर लगभग आधा रह गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से अदाणी समूह को दिए गए कर्जों का हिसाब मांगा है ताकि यह तय किया जा सके कि कर्जे क्या गिरवी रखकर दिए गए हैं। जेफरीज और सोसियते जनराल जैसी ब्रोकरेज कंपनियों की रिपोर्ट के अनुसार अदाणी समूह की कंपनियों को दिया गया कर्ज भारतीय बैंकों द्वारा दिए गए कुल कर्ज के केवल आधे प्रतिशत के ही बराबर है। फिर भी रिजर्व बैंक शायद यह देखना चाहता है कि कर्जे यदि शेयर गिरवी रखकर दिए गए हैं तो क्या वे शेयरों के गिरते दामों को देखते हुए सुरक्षित हैं? इस बीच नेशनल स्टाक एक्सचेंज ने अदाणी एंटरप्राइजेज, अदाणी पोर्ट्स और अंबुजा सीमेंट के शेयरों के सौदों पर पूरी रकम अदायगी का नियम लगा दिया है ताकि सट्टे पर रोक लग सके। बांड बाजार में अदाणी समूह की कई कंपनियों के बांड के दाम 40 प्रतिशत तक गिर गए हैं। इसके बाद क्रेडिट सुइस और सिटीबैंक जैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने इन बांडों को गिरवी रखकर पैसा देना बंद कर दिया है। हालात को देखते हुए समूह को 20 हजार करोड़ के एफपीओ को रद करते हुए निवेशकों को उनका पैसा लौटाना पड़ा है। अदाणी समूह का कहना है कि शेयरों की मांग जारी किए जा रहे शेयरों से ज्यादा थी, लेकिन यह मांग धनी निवेशकों, उद्योगपतियों और संस्थागत निवेशकों की तरफ से आई। आम निवेशकों ने उनके लिए निर्धारित शेयरों में से केवल 11 प्रतिशत खरीदने की ही हिम्मत दिखाई। यहां तक कि अदाणी समूह के कर्मचारी भी उनके लिए रखे शेयरों का केवल 53 प्रतिशत ही लेने को तैयार हुए। अदाणी समूह ने अगले पांच वर्षों में अदाणी न्यू इंडस्ट्रीज, अदाणी एयरपोर्ट और अदाणी रोड ट्रांसपोर्ट जैसे पांच आइपीओ लाने की योजना भी बना रखी थी। हिंडनबर्ग हमले ने इन सब पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

नए उद्यमों के अधिग्रहण, विकास और उन्हें मुनाफा कमाने लायक बनाने के लिए अदाणी को निरंतर नई पूंजी की जरूरत पड़ती रही है, जो बंदरगाहों, सीमेंट कारखानों, खदानों और बिजलीघरों के मुनाफे से पूरी नहीं की जा सकती थी। इसलिए समूह ने बैंकों से कर्ज लेकर, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बांड बेचकर और बड़े विदेशी निवेशकों को हिस्सेदारी बेचकर पूंजी बटोरी। कारोबार फैलाने के लिए पूंजी बटोरने की प्रक्रिया का परिणाम यह हुआ कि समूह का कर्ज उसकी करीब दो लाख करोड़ की आय से भी ऊपर चला गया, पर मुनाफा केवल 475 करोड़ रुपये ही रहा। इतने कम मुनाफे के बावजूद अदाणी समूह के दाम इतनी तेजी से बढ़ने का एक कारण इन कंपनियों के 72.6 प्रतिशत से अधिक शेयरों का प्रमोटर या मालिकों के हाथों में होना है। केवल 15.39 प्रतिशत शेयर विदेशी निवेशकों और मात्र 6.53 प्रतिशत शेयर आम लोगों के पास हैं। इतने कम शेयर लेनदेन में रहने के कारण उनके दामों में उतार-चढ़ाव का जोखिम ज्यादा रहता है।

एक सूचीबद्ध कंपनी के मालिक 75 प्रतिशत से ज्यादा शेयर अपने पास नहीं रख सकते। हिंडनबर्ग रिसर्च की आलोचना का एक बिंदु यह भी है कि अदाणी समूह अधिकतम सीमा के पास शेयर अपने पास रखकर कंपनी को कुनबाशाही की तरह चलाता है जिसमें अपेक्षित पारदर्शिता नहीं। अदाणी की निजी संपत्ति के तेजी से बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कोविड की मंदी के बावजूद उनकी कंपनी के शेयरों में आश्चर्यजनक तेजी आना और कंपनियों के 72.6 प्रतिशत शेयरों का उनके पास होना था। यूरोपीय और अमेरिकी कारोबारी जगत में कुनबाशाही और साठगांठ को अच्छा नहीं माना जाता। जबकि यह भारतीय समाज और राजनीति के स्वभाव में है जिसका कारोबार में झलकना स्वाभाविक है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के कई सवाल अदाणी समूह के कामकाज में दिखती इसी गड़बड़ी की बात करते हैं। जो भी हो, देश की कारोबारी साख को बनाए रखने के लिए ऐसे सवालों का संतोषजनक उत्तर देना बहुत जरूरी है। उससे भी जरूरी उन सवालों की पारदर्शी तरीके से निष्पक्ष छानबीन कराना है जो हिंडनबर्ग ने विदेश में स्थित फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर सौदों में और खातों में हेराफेरी को लेकर उठाए हैं। ये आरोप 15 साल पुराने सत्यम कंप्यूटर घोटाले और उससे भी पुराने एनरान घोटाले की याद भी दिलाते हैं। देश की कारोबारी व्यवस्था की साख बनाए रखने के लिए इनकी गहन पड़ताल जरूरी है। इसमें कोई दोराय नहीं कि हिंडनबर्ग कोई भारत-मित्र नहीं है। वह एक सट्टेबाज कंपनी है जो तेज तरक्की की रफ्तार पर सवार कंपनियों की आसमान छूती कीमतों और प्रबंधकीय गडबड़ियों का भय फैलाकर पैसे बनाती है। उसकी रिपोर्ट से भारत के निवेशकों को लगभग दस लाख करोड़ की चपत लग चुकी है। बहुत संभव है कि उसकी आड़ में तीर कोई और चला रहा हो, परंतु उसने सवाल वही उठाए हैं जिन्हें भारत में बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था।

अदाणी समूह पर हिंडनबर्ग के हमले ने जो सबसे चिंताजनक बात उजागर की है वह है समाज में कारोबारियों और उद्यमियों के विरुद्ध फैली संदेह, ईर्ष्या और द्रोह की भावना जो देश की उन्नति में सहायक नहीं है। यूरोप और अमेरिका में भी कारोबारी घोटालों का लंबा इतिहास है। फिर भी वहां उद्यम-कारोबार को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई दूसरों को काम देकर उनकी भी उन्नति का जरिया बनते हैं। लोग उद्यमी-कारोबारी को उन्नति करता देख खुद भी वैसी सफलता हासिल करने की सोचते हैं। उन्हें लुटेरा और शोषक मानकर उनसे ईर्ष्या नहीं करते। भारतीय समाज में भी उद्यम-कारोबार का वैसा ही आदर होता था, लेकिन अब नहीं। इसका एक कारण आर्थिक विषमता हो सकती है, परंतु वह तो यूरोप और अमेरिका में भी है। पिछली सदी के छठे और सातवें दशक की फिल्मों का भी उद्यमियों की नकारात्मक छवि बनाने में योगदान रहा है। आजकल राजनीतिक नारेबाजी उसकी भूमिका निभा रही है। वस्तुत:, अपनी उन्नति के लिए हमें उद्यमों-कारोबारों के लिए वैसी भावना बहाल करने की जरूरत है जिसकी पैरवी गांधीजी ने ‘मेरा समाजवाद’ में की थी।


देरी से लिया गया निर्णय


आ​खिरकार केंद्र सरकार ने वोडाफोन आइडिया में 33 फीसदी हिस्सेदारी लेने का निर्णय ले ही लिया है। इसके साथ ही वह वित्तीय संकट से जूझ रही इस दूरसंचार कंपनी में 33 फीसदी की हिस्सेदार बन जाएगी। प्रथमदृष्टया यह सकारात्मक घटना लगती है। बहरहाल, सरकार ने इस निर्णय को लेने में जो देरी की उसने दूरसंचार कंपनियों और इस क्षेत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ब्याज को शेयर में बदलने के पीछे विचार यही है कि दूरसंचार उद्योग को दो कंपनियों के बीच रह जाने से बचाया जा सके क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उपभोक्ताओं के लिए अच्छे परिणाम नहीं होंगे। परंतु सरकार के निर्णय में देरी के कारण दूरसंचार उद्योग के मन में दो कंपनियों के दबदबे का डर घर कर गया। ऐसा मोटे तौर पर इसलिए हुआ कि बीते कुछ महीनों में इस दूरसंचार कंपनी के ग्राहक काफी बड़ी तादाद में दूसरी कंपनियों के पास चले गए। कंपनी 5जी सेवाओं की दिशा में भी कोई प्रगति नहीं कर सकी है जबकि अन्य कंपनियां तेजी से 5जी में प्रवेश कर रही हैं। इसके अलावा इसके नेटवर्क में निवेश भी नाममात्र का ही रहा है और उसकी नकदी की ​स्थिति भी खराब हुई है तथा कंपनी अपने वेंडर्स का भुगतान करने में भी अक्षम रही है।

प्रवर्तक भी अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने नया निवेश करने से इनकार कर दिया। फंड जुटाने की कंपनी की को​शिशें भी निष्फल रहीं क्योंकि सरकार द्वारा हिस्सेदारी नहीं लेने के कारण बाहरी निवेशक भी कंपनी पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। अत्य​धिक उलझन की ​स्थिति तब बन गई जब दूरसंचार विभाग ने यह शर्त रख दी कि वोडाफोन आइडिया के प्रवर्तकों को पहले रकम जुटानी होगी उसके बाद ही 16,133 करोड़ रुपये मूल्य के ब्याज को सरकारी हिस्सेदारी में बदला जाएगा। चूंकि प्रवर्तकों ने फंड डालने से मना कर दिया तो सरकार ने भी हिस्सेदारी लेने का अपना निर्णय स्थगित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप बाहरी फं​डिंग अत्य​धिक चुनौतीपूर्ण हो गई। शुक्रवार को शेयर बाजार की एक अ​धिसूचना में वोडाफोन आइडिया ने कहा कि केंद्र सरकार ने एक आदेश पारित करके कंपनी से कहा है कि वह स्पेक्ट्रम से संबं​धित ब्याज के विशुद्ध वर्तमान मूल्य तथा समायोजित सकल राजस्व को सरकार के लिए हिस्सेदारी में बदले।

कंपनी को निर्देश दिया गया कि वह 10 रुपये प्रति शेयर के मूल्य से शेयर जारी करे। संचार मंत्री अ​श्विनी वैष्णव ने इसकी पु​ष्टि करते हुए कहा कि ब्याज को शेयर में बदलने का निर्णय वोडाफोन आइडिया के संयुक्त साझेदारों में से एक बिड़ला द्वारा यह स्वीकार करने के बाद लिया गया कि कंपनी में नई पूंजी डाली जाएगी। परंतु किसी प्रवर्तक द्वारा इस पूंजी की मात्रा या निवेश के समय के बारे में किसी जानकारी के बिना वोडाफोन आइडिया के भविष्य के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है। बाहरी निवेशकों से फंड जुटाना अभी भी चुनौती बनी रहेगी, बशर्ते कि प्रवर्तक नुकसान की भरपाई के लिए तेजी से कदम उठाएं। ब्रिटेन की कंपनी वोडाफोन पीएलसी लागत कटौती में लगी है और वह अपने कारोबार को युक्तिसंगत बनाने का प्रयास कर रही है लेकिन वह भारतीय दूरसंचार कारोबार में निवेश करेगी या नहीं यह देखना होगा। बिड़ला परिवार ने भी अभी निवेश की योजना के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कहा है। ध्यान रहे 2021 के अंत में सरकार द्वारा शेयर परिवर्तन की पेशकश के बाद हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

सरकार का ताजा निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा दूरसंचार कंपनियों के स्पेक्ट्रम और एजीआर बकाये को सरकारी हिस्सेदारी में बदलने को मंजूरी देने के 16 महीने बाद आया है। हालांकि यह पेशकश सभी कंपनियों को की गई थी लेकिन वोडाफोन आइडिया के बोर्ड ने 2022 के आरंभ में इसका चयन किया। सरकार ने इन तमाम महीनों में कोई कदम नहीं उठाया। शुरुआत में तो इसकी कोई वजह भी नहीं बताई गई और बाद में इस पेशकश को सशर्त बनाते हुए कहा गया कि पहले प्रवर्तक निवेश करें। निवेश के सतर्क माहौल को देखते हुए इस दूरसंचार कंपनी का उबरना कठिन चुनौती है क्योंकि सितंबर 2022 तक इस पर 2.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। इस मामले में समय कीमती रहा है और सरकार को समय बचाना चाहिए था।


विवाह की उम्र


बरसों से जागरूकता अभियानों, विज्ञापनों, लेखों आदि के जरिए बाल विवाह की वजह से जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है। सरकारों ने इसके खिलाफ कड़े कानून बना रखे हैं। प्रशासन ऐसी शादियों पर नजर रखने का प्रयास करता है ताकि निर्धारित उम्र से पहले बच्चों का गठबंधन न होने पाए। मगर इन तमाम कोशिशों के बावजूद बहुत कम उम्र में बच्चों की शादी कर देने का चलन बंद नहीं हुआ है। अब ऐसी शादियों के खिलाफ असम सरकार ने व्यापक अभियान शुरू किया है। असम पुलिस का कहना है कि उसने ऐसे आठ हजार लोगों को चिह्नित किया है, जिन्होंने कम उम्र में शादी की या कराई। उनमें विवाह कराने वाले पंडित और मौलवी भी शामिल हैं। वहां की पुलिस ने इस मामले में दो हजार चौवालीस लोगों को गिरफ्तार भी किया है। राज्य सरकार का कहना है कि ऐसे विवाहों को अवैध करार दिया जाएगा। चौदह साल से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह करने वालों के खिलाफ पाक्सो अधिनियम के तहत और चौदह से अठारह बरस के बीच की लड़कियों से विवाह करने वालों के खिलाफ बाल विवाह रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होगा। हालांकि असम सरकार की इस सख्ती से वहां के प्रभावित लोगों में नाराजगी देखी जा रही है, मगर सामाजिक बदलाव के लिए उठाए गए सरकारों के ऐसे कदम को अनुचित नहीं कहा जा सकता।

बेशक देश में साक्षरता दर बढ़ी है, लड़कियों को पढ़ा-लिखा कर सशक्त बनाने पर जोर है, इसका असर भी काफी देखा जा रहा है, मगर हकीकत यह भी है कि बहुत सारे वर्गों, खासकर निम्न वर्ग में विवाह की उम्र आदि को लेकर जागरूकता का अभाव है। कई समुदायों में आज भी यह मान्यता बनी हुई है कि कन्या के रजस्वला होते ही उसका विवाह कर देना चाहिए। कई समाजों में तो लड़के और लड़कियों का बचपन में ही विवाह कर दिया जाता है, फिर उनके योग्य होने के बाद गौना किया जाता यानी उन्हें साथ रहने दिया जाता है। कई समुदायों में लड़कियों की सुरक्षा के लिहाज से भी जल्दी विवाह कर दिया जाता है। वहां माना जाता है कि विवाह के बाद लड़की की अस्मिता पर प्रहार बंद हो जाता है। इन्हीं सब मान्यताओं और धारणाओं के चलते आज भी कम उम्र में विवाह का सिलसिला नहीं रुक पा रहा है। मध्यप्रदेश में तमाम कड़ाई के बावजूद हर साल अखा तीज के दिन बहुत सारे नाबालिगों की शादियां कर दी जाती हैं।

मगर वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर देने और फिर उनके मां बन जाने का सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। वे जीवन भर शारीरिक रूप से कमजोर और बीमारियों से घिरी रहती हैं। वे स्वस्थ बच्चों को जन्म नहीं दे पातीं। कम उम्र में ही उनकी मौत हो जाती है। शिशु और मातृ मृत्यु दर पर काबू पाना इसी वजह से चुनौती बना हुआ है। ऐसे में असम सरकार का बाल विवाह के विरुद्ध अभियान उचित ही है। मगर इस कड़ाई में उसे यह देखने की जरूरत होगी कि जिन परिवारों के एकमात्र कमाऊ सदस्य इस अभियान में गिरफ्तार होंगे, उनके परिवार का भरण-पोषण कैसे चलेगा। राज्य सरकार को विरोध भी इसी वजह से झेलना पड़ रहा है। पर इससे न सिर्फ वहां, बल्कि दूसरे राज्यों के लोगों को भी एक सबक तो मिलेगा कि कम उम्र में विवाह करने या कराने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।


मोटे अनाजों की ओर


जब दुनिया की एक सबसे अमीर हस्ती अपने हाथों से रोटियां बनाएगी, तो जाहिर है, उन रोटियों को पूरी दुनिया देखेगी। यह रोटी के पक्ष में सोने पर सुहागा जैसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का रोटी बनाते हुए वीडियो साझा किया और लगे हाथ, मोटे अनाजों की पैरोकारी भी कर दी। रोटी का भारत से जुड़ाव इसलिए भी सार्थक बन पड़ा कि बिल गेट्स से रोटियां बनवाने वाले सेलिब्रिटी शेफ ईटन बर्नाथ ने अपनी ताजा बिहार यात्रा का जिक्र कर दिया, जो विभिन्न प्रकार की रोटियों का एक समृद्ध क्षेत्र है। खैर, इसमें कोई दोराय है ही नहीं कि दुनिया में किसी भी प्रकार की ब्रेडरोटी या पावरोटी से रोटी का कोई मुकाबला नहीं है। ब्रेड अव्वल तो मैदा, फिर न जाने कब-कैसे-किससे गूंथा हुआ। न जाने कब का बना हुआ ठंडा, पैकेट में बंद और दूसरी ओर, ताजा गूंथे गए आटे की तत्काल पकी सोंधी रोटी। रोटी को हर तरह से स्वास्थ्य के अनुकूल माना गया है। दुनिया के लगभग सभी सेफ, रसोइये, भोजन विशेषज्ञ, डॉक्टर रोटी का लोहा मानने लगे हैं। ऐसे में, बिल गेट्स का अपने हाथों से रोटी पकाना खास मायने रखता है। जो लोग रोटी से ब्रेड की ओर भाग चुके हैं या भाग रहे हैं, उन्हें इससे जरूर प्रेरणा मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने मोटे अनाजों को याद किया है, तब यह ध्यान रखना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को मोटे अनाज का वर्ष घोषित कर रखा है। भारत में 2018 को मोटे अनाज का वर्ष कहा गया था और भारत के प्रयासों से ही साल 2021 में तय हुआ था कि दुनिया में 2023 में मोटे अनाज का वर्ष मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने प्रेरित किया है कि भारत में नवीनतम चलन मोटे अनाज हैं, जो सेहतमंद बनाने के लिए जाने जाते हैं। मोटे अनाज के अनेक व्यंजन हैं, जिन्हें आप बना सकते हैं। यह पश्चिम के आम लोगों के लिए बहुत चकित करने वाली बात है कि गेहूं के कणों, जिन्हें आटा कहा जाता है, उन्हें समेटकर रोटी बनाई जा सकती है। आटा भी केवल गेहूं का नहीं होता, अन्य अनेक मोटे अनाजों का भी होता है। वैसे तो दुनिया में कम से कम 12 प्रकार के मोटे अनाज ज्यादा प्रचलित हैं। उनमें से सबसे पोषक अनाज हैं ज्वार, बाजरा, रागी (मंडुआ), कांगनी/काकुन, चीना, कोदो, सावा/सांवा/झंगोरा, कुटकी), कुट्टू और चौलाई। इन सभी अनाजों को भारत ही नहीं, दुनिया भर में बढ़ावा दिया जा रहा है। गेहूं, चावल जैसे विकसित अनाजों की ओर से लोग मोटे अनाजों की ओर लौटने लगे हैं। जिस अफ्रीका महादेश को पिछड़ा कहा जाता है, वहां मोटे अनाज की खपत सर्वाधिक है।

यह गौर करने की बात है कि साल 1970 तक अपने देश में मोटे अनाजों का सेवन 20 प्रतिशत था, पर अब 6 प्रतिशत रह गया है। विगत पचास वर्षों में पेट की बीमारियों पर ही अगर हम गौर कर लें, तो पता चलेगा कि मोटे अनाजों से किनारा करके हमने क्या गंवाया है। अब हमें वापस मोटे अनाजों की ओर लौटना ही होगा और अपने देश की आटा चक्कियों पर मोटे अनाजों की वापसी हो गई है, बीच में केवल गेहूं का कब्जा दिखने लगा था। साल 2021-2026 के बीच मोटे अनाज के वैश्विक बाजार में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि मुमकिन है। भारत में खेतों से लेकर स्टार्ट अप तक अभियान जारी है। मोटे अनाज इंसानी पेट के मुफीद हैं और हमें कम से कम आधा दर्जन घातक बीमारियों से बचा सकते हैं। खैर, जब बिल गेट्स रोटी बनाते देखे गए हैं, तो यकीन मानिए, दुनिया सेहत के प्रति जागरूक होने लगी है।


डिजिटल मीडिया का गहराता असर और घटती जवाबदेही

संजय द्विवेदी, ( महानिदेशक, भा संचार संस्थान )

पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ की ओर से ‘फ्यूचर ऑफ डिजिटल मीडिया’ विषय पर एक सम्मेलन का आयोजन हुआ। उसमें भाग लेने आए ऑस्ट्रेलिया के पूर्व संचार मंत्री और सांसद, पॉल फ्लेचर ने एक समाचारपत्र को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा कि आने वाले दिनों में भारत डिजिटल दुनिया में सबसे आगे होगा। अगले दस सालों में डिजिटल क्षेत्र में सबसे बड़ी संचार क्रांति होने वाली है। बस इस दौरान सबसे ज्यादा ध्यान फेक न्यूज को रोकने के साथ-साथ क्वालिटी कंटेंट या गुणवत्तापूर्ण सामग्री और बिजनेस मॉडल को अपग्रेड करने की जरूरत पर ही होगा।

पिछले एक दशक में देश में डिजिटल मीडिया और डिजिटल सहूलियतों का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस सबके बीच दो चीजों की अनुपस्थिति साफ देखी जा सकती है। एक, विश्वसनीयता और दूसरी, जवाबदेही। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। यदि जवाबदेही तय होगी, तो डिजिटल मीडिया की विश्वसनीयता खुद बढ़ जाएगी।

जहां तक जवाबदेही के अभाव का प्रश्न है, तो इसकी कई वजह हैं। पहली वजह है, वर्तमान समय में उपलब्ध बेहद सस्ती और सर्वसुलभ तकनीकी सुविधाएं। तेज इंटरनेट स्पीड जैसी चीजों ने हर किसी के लिए यह बहुत आसान बना दिया है कि वह जब चाहे, नाममात्र के खर्च में अपना खुद का समाचार पोर्टल, यूट्यूब चैनल और पॉडकास्ट शुरू कर सकता है। इसके माध्यम से लोगों को शिक्षा, सूचना, समाचार व मनोरंजन देते समय इस तरह के उपक्रम शुरू करने वाले लोग भूल जाते हैं कि इस सबकी भी कुछ सांविधानिक, सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक सीमाएं भी हो सकती हैं। गैर-जिम्मेदारना रवैये की शुरुआत यहीं से होने लगती है और फिर अपने दायित्व की उपेक्षा एक आदत बन जाती है। दूसरी वजह है, डिजिटल साक्षरता पर ध्यान न दिया जाना। वैसे जवाबदेही से बचने में बड़ी कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। फेसबुक और ट्विटर जैसे कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल वर्षों से फेक न्यूज और हेट कंटेंट के प्रसार के लिए किया जाता रहा है। इन्हें रोकने के पुख्ता उपाय नहीं किए जा सके हैं। चूंकि, अभी तक हमारे यहां सब कुछ स्व-नियमन के भरोसे चल रहा है, इसलिए जवाबदेही को लेकर ये किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से आसानी से बच जाती हैं। उनका देश की अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। उनका एक ही मंत्र है, जितना बड़ा यूजर बेस, उतना ही बड़ा कारोबार। ट्विटर के छह करोड़, फेसबुक के एक अरब, इंस्टाग्राम के डेढ़ अरब, ये सब मिलकर दुनिया की करीब चालीस प्रतिशत आबादी के बराबर हो जाते हैं। इन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए हर प्रकार के समझौते करने को तैयार ये बिग टेक कंपनियां बाकी साठ फीसदी लोगों के बारे में शायद ही सोचती होंगी।

भारत की समस्या यह नहीं है कि वह डिजिटल मीडिया या दूसरी डिजिटल विधाओं-सेवाओं की उपलब्धता और उपयोग के मामले में सबसे बड़ा यूजर बेस वाला देश बनने जा रहा है। समस्या यह है कि इसकी भाषायी, सांस्कृतिक विविधता के बीच, कोई भी चीज या बात, एक जगह के लोगों के लिए सही हो सकती है, तो वही चीज दूसरी जगह समाज पर हानिकारक असर पैदा करने वाली हो सकती है। भौगौलिक सीमाओं से परे रहने वाला और खुद को सभी बंदिशों से ऊपर मानने वाला डिजिटल मीडिया, आवश्यक नियमन के अभाव में स्वतंत्र से ज्यादा उच्छृंखल नजर आता है। लोग बार-बार किसी झूठ को देखने के बाद उस पर विश्वास करने लगते हैं। वर्ष 2016 में ‘स्टेनफोर्ड हिस्ट्री एजुकेशन ग्रुप’ की एक रिसर्च के दौरान यह चौंकाने वाला नतीजा सामने आया कि विभिन्न सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले 80 प्रतिशत छात्र विज्ञापन और खबरों के बीच फर्क नहीं कर पाते हैं।

इसे गंभीरता से लेते हुए पिछले साल सरकार ने ‘सूचना तकनीक कानून 2021’ लाकर कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। यहां स्वीकार करना चाहिए कि सब कुछ डिजिटल मीडिया पर छोड़ देने से समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। कुछ नियामक और निवारक व्यवस्था होना आवश्यक है। तभी डिजिटल मीडिया की भी प्रिंट मीडिया जैसी जवाबदेही सुनिश्चित होगी।


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