03-04-2026 (Important News Clippings)
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Date: 03-04-26
ट्रम्प के सम्बोधन ने दुनिया में भ्रम को और बढ़ाया है
संपादकीय
राष्ट्र के नाम सम्बोधन किसी बेहद अहम संदेश के लिए दिया जाता है, लेकिन ट्रम्प के भाषण में रोजाना की मीडिया ब्रीफिंग से ज्यादा कुछ नहीं था। हां, सबसे प्राचीन सभ्यताओं वाले देशों में से एक ईरान को अगले दो-तीन हफ्तों में पाषाण युग में भेजने का दम्भ जरूर उन्होंने दिखाया। सम्बोधन से कुछ घंटे पहले भड़ास निकालते हुए नाटो को भी कायर कहा, लेकिन सम्बोधन में जिक्र नहीं था। युद्ध के पहले दिन ईरान के सुप्रीम लीडर के मारे जाने के बाद ट्रम्प ने कहा था कि नेतृत्व परिवर्तन उनका मकसद था । लेकिन राष्ट्र के नाम सम्बोधन ट्रम्प ने सुधार करते हुए कहा कि ईरान में नेतृत्व परिवर्तन नहीं, उसे परमाणु बम बनाने से रोकना उनका उद्देश्य था । यह तो साफ है कि ट्रम्प मान चुके हैं होर्मुज मार्ग खुलवाना उनके बूते का नहीं है। लड़ाई लम्बी चली तो ट्रम्प को मध्यावधि चुनाव में नुकसान होगा, लिहाजा अब उन्होंने दावा किया है कि ईरान को इतना कमजोर कर दिया गया है कि वह कभी भी खतरा नहीं बन पाएगा। इससे स्पष्ट हो गया है कि होर्मु मार्ग खुलवाने के लिए कोई अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन नहीं होगा और इसकी जिम्मेदारी तेल आयातक देशों पर डाल दी जाएगी। दूसरा, युद्ध से निकलने से पहले ट्रम्प कुछ ऐसे हमले कर सकते हैं, जिनमें ईरान को भारी क्षति होगी, ताकि ट्रम्प अपने मतदाताओं को बता सकें कि अमेरिका फिर से ‘ग्रेट’ हो गया है।
Date: 03-04-26
अराजकता से घिरा बंगाल
संपादकीय

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के काम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से तैनात न्यायिक अधिकारियों को जिस तरह घंटों बंधक बनाए रखा गया, वह इस राज्य में अराजकता हावी हो जाने का एक और प्रमाण ही है। इसी कारण इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि मालदा जिले में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। इस घटना की गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जिन अधिकारियों को बंधक बनाया गया, उनमें महिलाएं भी थीं और उन्हें तब मुक्ति मिल सकी, जब खुद सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने सख्त आदेश दिए। चूंकि राज्य के शीर्ष अफसर बंधक बनाए गए न्यायिक अधिकारियों को छुड़ाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस घटना की जांच सीबीआइ या एनआइए से कराने के निर्देश दिए। इसका अर्थ है कि उसे राज्य के शासन-प्रशासन पर तनिक भी भरोसा नहीं। यह बंगाल सरकार के लिए शर्मिंदगी का विषय होना चाहिए, लेकिन यह तय है कि उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला । यदि ममता सत्ता में लौटीं तो बंगाल में कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली ऐसी अराजक घटनाएं फिर से आम हो सकती हैं। हिंसक घटनाओं के सामने पुलिस प्रशासन के मूकदर्शक बने रहने के मामलों में बंगाल सरकार को हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट से न जाने कितनी बार फटकार लग चुकी है, पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला है।
मालदा की शर्मनाक घटना पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी सारी शक्तियां छीन ली गई हैं। यदि सच में ऐसा है तो फिर उनकी सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह क्यों किया कि वह अपनी इस टिप्पणी को हटा ले कि कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई है ? वास्तव में ऐसा कोई निष्कर्ष निकालना निरा झूठ है कि चुनाव वाले राज्य में सरकार शक्तिहीन हो जाती है। सच यह है कि ममता शासन में बंगाल प्रशासन का बुरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है और कई पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के एजेंट के तौर पर काम करते हैं। जिन अराजक तत्वों ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया, उन्हें वोटर लिस्ट से नाम कट जाने वाले क्षुब्ध वोटरों की संज्ञा देना सुप्रीम कोर्ट को धोखा देना ही है। मालदा में मनमानी करने वाले अराजक तत्व ही थे, इसका पता इससे चलता है कि गत दिवस उन्होंने फिर से उत्पात मचाया और पुलिस पर हमला किया। अच्छा हो कि सुप्रीम कोर्ट इस पर ध्यान दे कि बंगाल प्रशासन अराजकता से दृढ़ता से निपटना सीखे – केवल चुनाव के वक्त ही नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी। यदि इस पर ध्यान नही दिया गया तो बंगाल में अराजकता और बढ़ेगी ही।
Date: 03-04-26
जरूरी था ट्रांसजेंडर कानून में बदलाव
विकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
गत दिनों ट्रांसजेंडर के अधिकारों से जुड़े संशोधन विधायक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। 2019 के अधिनियम में सुधार की दृष्टि से लाए गए ट्रांसजेंडर ( अधिकारों का संरक्षण ) संशोधन विधेयक में किसी को जबरन ट्रांसजेंडर दर्शाने या उससे भीख मंगवाने पर 10 वर्ष की सजा का प्रविधान है। बच्चों की ऐसी प्रस्तुति शोषण पर यह सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है। अंग-भंग पर भी कड़ी सजा का प्रविधान है। मौजूदा कानून में ट्रांसजेंडरों के प्रति भेदभाव – दुर्व्यवहार पर दो साल तक की सजा थी। पहले से व्यापक और कड़े प्रविधानों के बावजूद इस बिल का विरोध हो रहा है। विरोध का मूल कारण वह प्रस्ताव है, जो ट्रांसजेंडर पहचान को स्व-अनुभूत लिंग पहचान की अपेक्षा मेडिकल सत्यापन से तय करता है। अब ट्रांसजेंडर को उचित अधिकारी से मेडिकल प्रमाणपत्र लेना होगा।
नेशनल लीगल सर्विसेज अथारिटी, नालसा और द कर्नाटक स्टेट जेंडर एंड सेक्सुअलिटी माइनारिटीज फार कन्वर्जेंस जैसी संस्थाएं यह कह कर विरोध कर रही हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी आनुवांशिक संरचना से इतर इच्छानुसार अपना लिंग घोषित करने का अधिकार होना चाहिए। नालसा बनाम केंद्र सरकार वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने नालसा का यह तर्क माना था और 2019 का ट्रांसजेंडर अधिनियम उसी आधार पर बना था। अब संशोधन विधेयक ने पुनः ट्रांसजेंडर एक्टिविज्म और लिंग पहचान राजनीति को विमर्श का बिंदु बना दिया है। सामान्यजन को भले ही आश्चर्य हो कि किसी व्यक्ति का लिंग निर्धारण क्रोमोसोम जैविकी की अपेक्षा उसकी भावनाओं पर कैसे आधारित हो सकता है, परंतु ऐसा मत पश्चिम के अकादमिक जगत और राजनीति में प्रबल रूप ले चुका है। लिंग पहचान की स्वघोषणा से ऐसी विचित्र स्थिति बन गई है कि पुरुष महिला प्रसाधन कक्ष और महिला जेलों में प्रवेश पा रहे हैं एवं महिला खेल एवं प्रतिस्पर्धाओं में भाग ले रहे हैं। इसी तरह पश्चिम में ‘शी’ या ‘ही’ की बजाय ‘जी’ और ‘हिम’ या ‘हर’ के स्थान पर ‘हिअर’ जैसे लिंग निरपेक्ष सर्वनामों के उपयोग की हठ है। यह दुष्चेष्टा माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों को स्कूल में अपना नाम और सर्वनाम बदलने की अनुमति देती है और चिकित्सकों द्वारा अवयस्कों के लिंग परिवर्तन की पैरवी भी करती है। भारत में अभी तक अवयस्कों को ऐसे अधिकार नहीं हैं, परंतु यदि पश्चिम प्रेरित पैरवी रोकी नहीं गई तो इस सक्रियता की दिशा वही होगी। इस पूरे विमर्श में बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी विकृति को बढ़ावा देने का उद्देश्य आखिर क्या है ?
ट्रांसजेंडर सक्रियता, यौन स्वच्छंदता को बढ़ावा नए वाम की उस रणनीति का हिस्सा है, जो श्रमिक केंद्रित पुराने मार्क्सवाद से आगे बढ़ कर ऐसे राजनीतिक गठबंधन का निर्माण करना चाहती है, जिसमें श्रमिकों के साथ-साथ मजहबी भाषाई नस्लीय एवं लैंगिक अल्पसंख्यकों का समूह बने। नव वाम का मक्का माने जाने वाले फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों का मानना है कि सत्ता केवल पूंजीपति और राज्यों के पास नहीं बल्कि पंथ, राष्ट्र, परिवार जैसे सामाजिक संस्थान, भाषाई एवं सांस्कृतिक प्रभुत्व, सामाजिक और नैतिक मान्यताओं में निहित है। इसी विचार से संबद्ध जूडिथ बटलर की नजर में जैविक लिंग को महिला या पुरुष जैसी पहचान में बांधना उसी वर्चस्व का प्रतीक है। यौन क्रांति के जनक विल्हेम राईख के अनुसार पितृसत्तात्मक परिवार विनम्र, फासीवादी बनाने का कारखाना है। राईख के अनुसार बचपन से यौन मुक्ति को प्रोत्साहित कर व्यक्ति का चारित्रिक कवच तोड़ा जा सकता है और फिर वह सभी प्राधिकारों के खिलाफ विद्रोही बन जाएगा। ‘नव वामपंथ के पिता हर्बर्ट मार्क्यूस ने परिवार व्यवस्था को तोड़ने और पूंजीवादी पश्चिमी समाज की उत्पादकता को पंगु बनाने के लिए यौन स्वच्छंदता और बहुगामी व्यभिचार को बढ़ावा देने की बात कही। कट्टरपंथी नारीवादी शुलामिथ फायरस्टोन ने कहा कि लिंगों के बीच जैविक अंतर सभी उत्पीड़न की जड़ है। और द्विआधारी लिंग वर्ग का उन्मूलन होना चाहिए। उनके अनुसार जब तक महिलाएं ‘प्रजनन के अत्याचार’ और बच्चे अपने माता-पिता से ‘मुक्त’ नहीं हो जाते, तब तक सच्ची क्रांति असंभव है।
नव वामपंथ जेंडर फ्लुइडिटि यानी लिंग ‘तरलता’ की बात करता है। महिला और पुरुष रूपी पारंपरिक लिंग द्वैत को चुनौती देने और ट्रांसजेंडर अस्पष्टता को बढ़ावा देने में सबसे बड़ा योगदान जान मनी और अल्फ्रेड किंसे का है। मनोविज्ञानी जान मनी के मुताबिक लिंग पहचान जैविक संरचना की अपेक्षा काफी हद तक पालन-पोषण का परिणाम है। मनी ने शिशुओं की लिंग परिवर्तन सर्जरी एवं हार्मोनल थेरेपी की वकालत की और बच्चों को उनके विपरीत लिंग वाले परिवेश में पालने पर जोर दिया। तमाम सर्वेक्षण इसकी पुष्टि करते हैं कि बालपन में ऐसे विचित्र प्रयोग भोगने वालों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। ऐसे प्रकरण पश्चिम ही नहीं, बल्कि भारत में भी होते रहे हैं। 2021 में प्रमुख ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट और केरल की पहली ट्रांसजेंडर रेडियो जाकी अनन्या कुमारी ऐलेक्स ने गलत सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी को अपनी आत्महत्या का कारण बताया था। यह दुखद है कि सामाजिक व्यवस्था को गहरी क्षति पहुंचाने के बावजूद ऐसे मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री और अकादमिकों की विश्व पटल पर तूती बोल रही है। पश्चिम में भावनाओं को तथ्यों के ऊपर रखने वाली पोस्ट स्ट्रक्चलरिज्म, क्रिटिकल थ्योरी और क्वीयर थ्योरी लिबरल आर्ट्स के तहत पढ़ाई जा रही है। वहां सरकारें इन सिद्धांतों पर नीतियां बना रही हैं।
हमें समझना होगा कि क्वीयर एक्टिविज्म और जेंडर फ्लुइडिटी की आड़ में नव वामपंथ मानवाधिकारों के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि भाषा से लेकर सामाजिक मान्यताओं पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास कर रहा है। ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पारित कर भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि वह वास्तविक ट्रांसजेंडर समाज के हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, पर इसकी आड़ में समाज विरोधी एजेंडा नहीं चलने देगी।

Date: 03-04-26
रुपये की चुनौती
संपादकीय

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बुधवार को राष्ट्र के नाम जो संबोधन दिया वह ईरान युद्ध के अंत को लेकर स्पष्ट मार्ग दिखाने में विफल रहा। वास्तव में ट्रंप ने इस अवसर का इस्तेमाल ऐसी धमकियां देने के लिए किया कि ईरान पर बमबारी करके उसे पाषाणकाल जैसी हालत में पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है जबकि ईरान के अधिकारियों ने इस बात से बार-बार इनकार किया है। ऐसे में युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद भी अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह लड़ाई कब खत्म होगी तथा अमेरिका और इजरायल वास्तव में क्या हासिल करना चाहते हैं। यह बात शेष विश्व को जबरदस्त अनिश्चितता में छोड़ देती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्ध इस क्षेत्र की भूराजनीतिक व्यवस्था को कैसे नया आकार देगा। अतिरिक्त अनिश्चितता ने वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है और यह इस क्षेत्र के व्यापार को भी प्रभावित कर रहा है। भारत खासतौर पर इन अनजान कारकों की जद में है क्योंकि हम तेल, व्यापार और धनप्रेषण के लिए पश्चिम एशिया पर बहुत ज्यादा निर्भर है।
यह जंग जहां कई तरह से बृहद आर्थिक हालात को प्रभावित कर रही है और इसे लेकर हस्तक्षेप की आवश्यकता है, वहीं रिजर्व बैंक के लिए आर्थिक प्रबंधन काफी जटिल हो चला है। मुद्रा बाजार का उतारचढ़ाव इस संकट के सबसे स्पष्ट परिणामों में से एक है। रिजर्व बैंक मुद्रा का प्रबंधन करता है। मार्च में भारतीय रुपये में 4 फीसदी से अधिक की गिरावट आई। वास्तव में गत वित्त वर्ष जो कि इस सप्ताह के आरंभ में समाप्त हुआ, रुपये के लिए काफी मुश्किल साल था । 2025-26 में रुपया डॉलर के मुकाबले 10 फीसदी तक गिरा रुपया 2025 में इसलिए भी दबाव में रहा क्योंकि व्यापार संबंधी अनिश्चितताएं बनी हुई थीं। इसका परिणाम पूंजी के बड़े पैमाने पर बाहर जाने के रूप में भी सामने आया। उदाहरण के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2025 में करीब 19 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय शेयरों की बिकवाली की। 2026 में भी दबाव जारी रहा और ईरान युद्ध ने रुपये को मिलने वाली चुनौती को और मुश्किल बना दिया है।
डॉलर की बिकवाली के अलावा रिजर्व बैंक ने हाल के दिनों में रुपये की गिरावट को रोकने के लिए अन्य कदम भी उठाए हैं। पिछले सप्ताह उसने बैंकों से विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को दैनिक शुद्ध ओपन पोजीशन को 10 करोड़ डॉलर तक सीमित रखने को कहा। अब उसने बैंकों को रुपये से जुड़े नॉन-डिलिवरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (एक वित्तीय डेरिवेटिव, जिसका उपयोग मुद्रा विनिमय दरों पर हेजिंग या सट्टेबाजी के लिए किया जाता है) की पेशकश करने से रोक दिया है, जिसके परिणामस्वरूप गुरुवार को रुपये में तेजी से वापसी हुई। स्पष्ट है कि ये कदम सट्टेबाजी को रोकने के लिए उठाए गए हैं।
यह रेखांकित करना आवश्यक है कि समस्या बुनियादी ज्यादा है। भारत ने अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान 30 अरब डॉलर से अधिक का भुगतान संतुलन घाटा दर्ज किया। मार्च तिमाही में स्थिति बदलने की संभावना कम है। इसलिए रुपया विदेशी मुद्रा के लगातार शुद्ध बहिर्गमन की संभावना के अनुसार समायोजित हो रहा है। कम से कम निकट भविष्य में तो ऐसा ही हो रहा है। इस प्रकार, कारोबारी गतिविधि को रोकना बहुत मददगार नहीं होगा। नीति-निर्माताओं को मुद्रा बाजार के पूर्ण स्तरों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
रुपया वास्तविक रूप से भी अवमूल्यित हुआ है। 40 मुद्राओं वाले वास्तविक प्रभावी विनिमय दर सूचकांक ने दिखाया कि फरवरी में रुपया लगभग 6 फीसदी ही अवमूल्यित था। कुछ हद तक अवमूल्यन भारतीय निर्यातकों को इस कठिन आर्थिक माहौल में मदद करेगा। युद्ध की स्थिति स्पष्ट होते ही, यह न केवल निर्यातकों को बाजार वापस पाने में लाभ देगा बल्कि पूंजी प्रवाह को भी आकर्षित करेगा, क्योंकि भारतीय परिसंपत्तियां विदेशी निवेशकों के लिए सस्ती हो जाएंगी, जिससे भुगतान संतुलन की स्थिति सुधरेगी।
इस प्रकार, रिजर्व बैंक के मुद्रा बाजार में उठाए गए कदमों को सावधानीपूर्वक संतुलित करने की आवश्यकता होगी। निष्पक्ष रूप से देखें तो उसे युद्ध के अन्य प्रभावों से भी निपटना होगा। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि महंगाई दर को बढ़ा देगी। रिजर्व बैंक के मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के कारण बॉन्ड यील्ड आंशिक रूप से बढ़ गई हैं। इसने तरलता की स्थिति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। रिजर्व बैंक के दृष्टिकोण पर अधिक स्पष्टता अगले सप्ताह मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद सामने आएगी।
Date: 03-04-26
होर्मुज जलमार्ग पर फंस गई दुनिया
विवेक काटजू , ( पूर्व राजनयिक )
अमेरिका और इजरायल ने जबसे (28 फरवरी, 2026) ईरान पर हमला बोला है, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर तनाव बना हुआ है। इस जलमार्ग के जरिये विश्व का 20 प्रतिशत तेल और गैस पूरी दुनिया में जाता है, जिनका उत्पादन खाड़ी के देशों में होता है। विश्व की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से ये विशेष अहमियत रखते हैं। यहां तक कि इनकी आपूर्ति में रुकावट वैश्विक अर्थव्यवस्था को घुटने पर ला सकती है। इसीलिए, दुनिया भर के देश इस जलमार्ग पर आवागमन फिर से अबाध बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं।
जाहिर है, तेहरान के लिए बतौर युद्ध-नीति होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना आवश्यक था। उसका स्पष्ट उद्देश्य है, इस कदम के जरिये अमेरिका और पूरी दुनिया पर दबाव बनाना, ताकि इस युद्ध का जल्द अंत हो। शुरुआत में अमेरिका ने इस जलमार्ग को खोलने की ईरान से मांग की। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कई बयानों में यह धमकी भी दी कि अगर तेहरान ने बात नहीं मानी तो वह सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। लगे हाथ उन्होंने खर्ग द्वीप का भी जिक्र किया, जो ईरान के ऊर्जा उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि इस द्वीप के तेल उत्पादन केंद्र को क्षति पहुंचती है, तो ईरान ऊर्जा का निर्यात नहीं कर पाएगा।
हालांकि, होर्मुजको लेकर अब राष्ट्रपति ट्रंप के सुर बदलते दिख रहे हैं। अब वह नई बातें कहने लगे हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका के पास ऊर्जा के पर्याप्त भंडार व रास्ते हैं और वह इसके लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। उनके बयान का निहितार्थ यही है कि वे देश, जो खाड़ी की ऊर्जा पर निर्भर हैं, उनको होर्मुज संकट पर ध्यान देना चाहिए। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, अमेरिका ने ईरान की सैन्य शक्ति को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है, इसलिए अब अन्य देश आगे आएं और होर्मुज जलमार्ग को खोलने का भार उठाएं। यानी, रायता अमेरिका-इजरायल ने फैलाया, पर अब चूंकि राष्ट्रपति ट्रंप इस मामले से अपना पल्ला झाड़ना चाहते हैं, तो इसे समेटने का काम अन्य देश करें।
इधर ईरान की मंशा यही लगती है कि वह होर्मुज जलमार्ग पर युद्ध के दौरान ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी अपना नियंत्रण बनाए रखेगा। उसकी संसदीय समिति ने उस प्रस्ताव को मान लिया है, जिसमें होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से ‘टोल’ वसूलने की सिफारिश की गई थी। इसके साथ ही उसने यह प्रस्ताव भी रखा है कि अमेरिका और इजरायल ही नहीं, उन देशों के जहाजों का भी यहां से आना-जाना बंद हो, जिन्होंने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। लगता है, तेहरान ‘होर्मुज टोल’ के जरिये अपने नुकसान की कुछ हद तक भरपायी करना चाहता है।
हालांकि, ईरान की इस योजना को कोई भी देश मंजूर नहीं करेगा। समुद्री आवागमन ‘फ्रीडम ऑफ नेविगेशन’ के बुनियादी सिद्धांत पर टिका हुआ है, जिसका अर्थ है कि हरेक देश को आवागमन में पूर्ण स्वतंत्रता हासिल है। यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत तमाम देश मानते हैं, इसलिए कोई भी तटवर्ती देश असैन्य या व्यापारिक जहाजों को आने-जाने से नहीं रोक सकता। जाहिर है, होर्मुज जलमार्ग को बंद करने की ईरानी कोशिशों को किसी का साथ नहीं मिल सकेगा। उसकी यह दलील भी काम नहीं करेगी कि जहाजों से टैक्स वसूलकर वह अपने देश का पुनर्निर्माण करना चाहता है।
निस्संदेह, अंतरराष्ट्रीय नियम इस युद्ध में बेमानी साबित हुए हैं, इसलिए यदि यह मान भी लें कि ईरान जबरन होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से कर वसूलेगा, तो मुमकिन है कि उसका वैश्विक बहिष्कार हो जाए। अभी तक इस्लामी दुनिया और विश्व के कई खित्तों में ईरान के प्रति सहानुभूति बनी हुई है, लेकिन उसके इस कदम से वह सब खत्म हो सकता है। उसका ऊर्जा बाजार भी इस बहिष्कार का शिकार बन सकता है, जिससे उसे बड़े पैमाने पर नुकसान होगा। ईरान के तेल का बहिष्कार करने से पहले हिचकिचाहट जरूर होगी,क्योंकि वह विश्व ऊर्जा की पूर्ति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन यदि विश्व समुदाय के पास ईरान पर दबाव बनाने का और कोई जरिया नहीं रहा, तो वह ऐसा कदम जरूर उठाएगा।
उधर, ईरान समर्थित गुट हूती भी बाब अल-मंदेब पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा है। बाब अल- मंदेब जलमार्ग अदन की खाड़ी को लाल सागर से जोड़ता है और लाल सागर स्वेज नहर के जरिये भूमध्य सागर से जुड़ा हुआ है। यह विश्व का एक अन्य महत्वपूर्ण जलमार्ग है, जिसके जरिये करीब 10 प्रतिशत वैश्विक ऊर्जा का व्यापार होता है। इसका मतलब है कि यदि ईरान का होर्मुज पर और हूती का बाब अल-मंदेब पर नियंत्रण हो जाए, तो विश्व ऊर्जा व्यापार के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से पर तेहरान का कब्जा हो जाएगा, जो विश्व को कतई मंजूर नहीं होगा। ऐसे में, चीन और रूस जैसे देश भी ईरान का साथ नहीं देंगे, जिन्होंने अभी तक उसके प्रति सहानुभूति दिखाई है।
सवाल है कि क्या खाड़ी के देशों के पास अपनी ऊर्जा, खासतौर से तेल को निकालने का कोई अन्य मार्ग है? सऊदी अरब ने अपनी ऊर्जा के लिए एक पाइपलाइन बिछाई है, जो देश के पश्चिम भाग में यानबू बंदरगाह (लाल सागर में स्थित ) में निकलती है। उधर, संयुक्त अरब अमीरात ने फुजैराह बंदरगाह विकसित किया है, जो ओमान की खाड़ी में होर्मुज जलमार्ग से करीब 70 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यानबू और फुजैराह बंदरगाहों के जरिये खाड़ी देशों की कुछ ऊर्जा तो विश्व में जा सकती है, लेकिन दुनिया को जितनी ऊर्जा की जरूरत है, उसकी पूर्ति इनसे नहीं हो सकती। हां, आने वाले वर्षों में संभव है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात क्रमशः यानबू और फुजैराह बंदरगाहों को तेज गति से आगे बढ़ाएंगे।
भारत की बात करें, तो यहां सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि ऊर्जा की वैश्विक आपूर्ति में आई बाधा का नुकसान आम लोगों को कम-से-कम हो। किंतु सच यह भी है कि यदि यह युद्ध चलता रहा, तो भारत के सामने ऊर्जा का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसका हमारी अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। लिहाजा, भारत को और समान सोच वाले तमाम देशों को अमेरिका-इजरायल और ईरान से यह मजबूत अपील करनी चाहिए कि वे इस जंग को जल्द रोक दें। यही दुनिया के हित में भी है।
Date: 03-04-26
निर्माण मजदूरों की कमी के लिए कौन जिम्मेदार
अनुराग बेहर, ( सीईओ अजीम प्रेमजी फाउंडेशन )
पिछले 15 वर्षों में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने कई भवन परिसरों का निर्माण कराया है। ये परिसर महानगरों से लेकर छोटे कस्बों में और 80,000 वर्गफीट से लेकर 20 लाख वर्गफीट तक में बने हैं। हमने कुछ सबसे बड़ी निर्माण कंपनियों और कई छोटी कंपनियों के साथ भी काम किया है। मेरा अनुभव रहा कि इनमें से लगभग हरेक कंपनी को हर निर्माण स्थल पर एक जैसी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वहां मजदूरों को लेकर बहुत अनिश्चितता की स्थिति मिलती है। आए दिन उनको जरूरी कुशल और आम मजदूरों को जुटाने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ये श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर देश के पूर्वी हिस्सों से आते हैं। प्रभावशाली कंपनियां इन इलाकों से श्रमिकों की आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए कड़ा तंत्र और मजबूत नेटवर्क बनाए रखती हैं। फिर भी, उनकी सारी तैयारियां धरी की धरी रह जाती हैं और कोई भी काम इनकी योजना के मुताबिक नहीं हो पाता है । मैंने जब इसके बारे में आस- पास जानने की कोशिश की, तो मुझे हर जगह तीन वजहें गिनाई गई। पहली, जो लोग निर्माण मजदूर के तौर पर काम कर चुके हैं, वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी वही काम करें। यह शारीरिक रूप से तकलीफदेह है और फिर इसके लिए महीनों तक परिवार से दूर रहना पड़ता है। दूसरी, पिछले दो दशकों में केंद्र व राज्य सरकारों ने ग्रामीण इलाकों में रियायती योजनाओं का नेटवर्क तैयार कर दिया है। इसमें जन वितरण प्रणाली के जरिये मुफ्त अनाज व दूसरी खाद्य वस्तुएं मिल जाती हैं, शिक्षा मुफ्त है, रोजगार के लिए कर्ज मिल जाता है, साथ ही कई तरह की पेंशन योजनाएं चल रही हैं। निर्माण कंपनियों का मानना है कि एक ग्रामीण परिवार इन सरकारी योजनाओं से निर्माण मजदूर के तौर पर होने वाली कमाई का 60-70 प्रतिशत तक यूं ही पा लेता है, वह भी बिना घर परिवार छोड़े, बिना किसी शारीरिक कष्ट सहे तीसरी वजह, पर्व-त्योहार, चुनाव, कृषि और शादियों के मौकों पर श्रमिक अपने गांव चले जाते हैं, तो इनमें से कई फिर वापस भी नहीं आते।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं । इनका कहना है कि निर्माण उद्योग में मजदूरों के काम करने की परिस्थितियां और मजदूरी ऐसी है कि बहुत सारे श्रमिकों को अपने गांव में रहना ही बेहतर लगता है, जहां वे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और स्थानीय स्तर पर रोजी-रोजगार करके गुजारा कर लेते हैं। निर्माण उद्योग में इस बात पर जोरदार बहस चल रही है कि क्या ये योजनाएं कुविचारित हैं? क्या ये श्रम बाजार को बिगाड़ रही हैं? इस पूरी बहस का लब्बोलुआब यही निकाला जाता है कि सारी समस्याओं की जड़ ये जन-कल्याणकारी सरकारी योजनाएं ही हैं। इसमें निर्माण कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं। ये कंपनियां इस सच्चाई को भी नजरअंदाज करती हैं कि इन योजनाओं को अचूक रूप से लागू नहीं किया गया है, जिसके कारण लाखों लोग इनसे बाहर हैं।
निर्माण कंपनियों के तर्कों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि किसी भी निर्माण स्थल पर लगभग 80 प्रतिशत तक ‘अकुशल श्रमिक ही होते हैं। वे रोजाना 600 से 700 रुपये के बीच मजदूरी पाते हैं। महीने में 25 दिन काम करने के हिसाब से देखें, तो यह लगभग 15,000 रुपये महीना बैठता है। इसी राशि में मजदूरों को निर्माण स्थलों पर खाने और रहने का खर्च उठाना होता है, साथ ही कुछ पैसे उन्हें घर भी भेजने होते हैं। किसी भी ईमानदार हिसाब से, यह मजदूरी काम की इज्जत या श्रमिकों की जरूरतों के लायक नहीं है। असल में, निर्माण उद्योग की समस्या खुद उसी की बनाई हुई है और उसका समाधान भी उसी के पास है। वह हल है, मजदूरों को उचित मजदूरी देना ।
हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां लोग गरीबों की नाकामियों और सरकार की कमियों के छिद्रान्वेषण में माहिर हैं। हम पूंजी और अपने पूंजीपतियों को जवाबदेह ठहराना नहीं चाहते। मिसाल के तौर पर, निर्माण स्थलों या श्रमिकों के रहने की जगहों पर एक बार जाकर देखिए, तब पता चलेगा कि हमारे 80 प्रतिशत देशवासी किस दशा में रहते हैं। फिर सबसे पहले खुद की आमदनी और संपत्ति के बंटवारे पर नज़र डालने की कोशिश करें, जिसे हमने अपने जीने के लिए तय कर रखा है।