विधायिकाओं की निष्क्रियता क्यों ?
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गत दिनों हुए अखिल भारतीय अध्यक्ष सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री ने विधानसभाओं और संसद में विचार-विमर्श को पंगु बनाने वाले लगातार व्यवधानों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उनका कहना है कि ‘लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए’ बिल्कुल सही है। लेकिन सरकार का रवैया इस टिप्पणी से अलग दिखाई पड़ता है –
- विधायिकाओं की शिथिलता मुख्य कार्यपालिका, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों में सत्ता केंद्रित होने के कारण है।
- एक अध्ययन के अनुसार, राज्य विधानसभाओं की बैठकें 2024 में औसतन 20 दिनों के लिए हुईं, जो 2017 के 28 दिनों की तुलना में कम हैं।
- आधे से ज्यादा विधेयक प्रस्तावित होने के दिन ही पारित हो गए उन पर बहुत कम बहस हुई।
- आठ विधानसभाओं में उपाध्यक्ष नहीं हैं। जून 2019 से लोकसभा में उपाध्यक्ष नहीं है।
- यही हाल संसद में है। अधिकांश विधायी कार्य बहुत कम या बिना किसी बहस के संपन्न हो रहे हैं।
- 32 दिनों में 21 बैठकों वाले सत्र में 15 विधेयक पारित किए गए।
- पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विश्लेषण के अनुसार लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का 29% और राज्यसभा ने 34% कार्य किया। यह 18वीं लोकसभा के दौरान किया गया सबसे कम कामकाज रहा।
- लोकसभा में केवल 8% और राज्यसभा में 5% तारांकित प्रश्नों का मौखिक उत्तर दिया गया। वहीं 21 दिनों में से राज्यसभा में 12 दिन और लोकसभा में सात दिन किसी भी प्रश्न का मौखिक उत्तर नहीं दिया गया।
- प्रश्नकाल अप्रभावी हो गया है।
- संसदीय समितियाँ पक्षपातपूर्ण हो गई हैं।
लोकतंत्र में बहस होनी चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है, जब सरकार विपक्ष के साथ बातचीत करके ऐसा वातावरण बनने देगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 26 अगस्त 2025
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