विदेशी कंपनियों की कर-चोरी मामले पर बड़ा निर्णय
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हाल ही में उच्चतम-न्यायालय ने विदेशी निवेशकों को होने वाले पूंजीगत लाभ पर कर के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।
मामला क्या है?
टाइगर ग्लोबल को फ्लिपकार्ट में अपना हिस्सा वाला मार्ट को बेचने पर मिले लाभ पर कर अदायगी का आदेश दिया गया है। विवाद इसलिए हुआ था, क्योंकि टाइगर ग्लोबल के निवेश आरीशय के साथ हुई संधि में बदलाव से पहले किए गए थे। ज्ञातव्य हो कि भारत ने अप्रैल, 2017 से पहले के निवेशों को संरक्षण या ‘ग्रैंडफादरिंग’ दी थी। टाइगर ग्लोबल ने 2018 में अपनी हिस्सेदारी बेची, जिस पर वे मॉरीशस संधि के तहत कर-छूट का दावा कर रहे थे।
न्यायालय ने कहा कि मॉरीशस की कंपनी केवल कर चोरी के लिए बनाई गई है। इसलिए जनरल एंटी-अवॉयडेन्स रूल या जीएएआर के तहत उस पर टैक्स लग सकता है।
प्रभाव –
- इस निर्णय से भारत में टैक्स संधि का लाभ उठाकर चोरी करने वाले विदेशी निवेशकों को बड़ा झटका लगा है। अब केवल वैलिड टैक्स रेजीडेंसी सर्टिफिकेट होना पर्याप्त नहीं है। बल्कि वास्तविक व्यावसायिक पदार्थ या सब्सटेंस ओवर फॉर्म पदार्थ प्रमाण भी आवश्यक है।
- यह निर्णय भारत की कर संधियों की व्याख्या और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए शायद नई मिसाल बन सकता है। लेकिन ध्यान इस पर भी होना चाहिए कि निवेश करने के निर्णयों में कर अनुकूलन (ऑप्टिमाइजेशन) मुख्य नहीं होता है। निवेशकों को मिलने वाला रिटर्न आर्थिक तत्वों के कहीं ज्यादा पेचीदा ताल मेल से आता है।
- भारत के टैक्स रेट्स और नीति आधार वैश्विक परिदृश्य के अनुकूल हैं। अतः भारत को इसका लाभ मिलता रहेगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 जनवरी, 2026