वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट – 2025

Afeias
03 Jan 2026
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पिछले कुछ वर्षों में भूजल पर भारत की निर्भरता और बढ़ गई है। देश के 65% ग्रामीण परिवार और दो-तिहाई सिंचाई भूजल पर ही निर्भर है। भूजल की खराब होती गुणवत्ता के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 –

  • भारत अब अनेक प्रदूषकों के साथ आपात स्थिति का सामना कर रहा है। देश के कई क्षेत्रों में नाइट्रेट, फ्लोराइड, यूरेनिमय, लवणता और भारी धातुओं के लिए निर्धारित सुरक्षित सीमा पार हो गई है।
  • देश के उत्तरी राज्यों में यूरेनियम स्वीकार्य 30 पार्टस पर बिलियन (पीपीबी) सीमा से बहुत अधिक हो गया है।
  • 20% नमूनों में नाइट्रेट सीमा से अधिक है। इसका कारण उर्वरक के अत्यधिक उपयोग के कारण रसायनयुक्त पानी का खेतों से निकलकर जलस्रोतों में मिल जाना है।
  • 8% नमूनों में फ्लोराइड ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड मानक से ऊपर है। इसके कारण प्राकृतिक व कृत्रिम दोनों है। राजस्थान व पंजाब की भूगर्भीय संरचना ऐसी है कि भूजल स्तर गिरने से फ्लोराइड या यूरेनियम की मात्रा बढ़ने लगती है। औद्योगिक अपशिष्ट, अनियमित खनन व अनुपचारित सीवेज कृत्रिम रूप से पानी की गुणवत्ता खराब करते हैं।
  • अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन के कारण शहरी जलभृतों में सूक्ष्मजीव संदूषण अधिक रहता है। संदूषक पदार्थों की सूची में कई गाँव एक साथ नजर आते हैं, जो जलभृत स्तर में क्षरण का संकेत देते हैं, यह एक गंभीर समस्या है।
  • जो जल के लिए बोरवेल पर निर्भर है, उनमें फ्लोरोसिस, नाइट्रेट विषाक्तता, आर्सेनिक संबंधित बीमारियाँ व यूरेनियम से जुड़े दीर्घकालिक कैंसर का खतरा अधिक रहता है।
  • दूषित भूजल से उपज भी कम होती है तथा खाद्य श्रंखला के पदार्थ भी विषाक्त होते हैं।

आगे की राह –

  • एक सुसंगत राष्ट्रीय भूजल स्वास्थ्य मिशन की आवश्यकता है। 
  • फसल विविधीकरण, उर्वरकों का नियंत्रित प्रयोग, मिट्टी में नमी संरक्षण जैसे कृषि जल उपाय किए जा सकते हैं।
  • जहाँ पानी की गुणवत्ता अधिक खराब हो, वहाँ विकेंद्रीकृत निस्पंदन प्रणाली जैसे सामुदायिक आरओ या आयन एक्सचेंज इकाइयों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • शहरी क्षेत्रों में सख्त सीवेज उपचार मानकों, रिसाव का पता लगाने वाली प्रणालियों और औद्योगिक निर्वहन निगरानी की आवश्यकता होती है।
  • पाइप से जलापूर्ति, जल की गुणवत्ता तथा स्थानीय भूजल प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए।
  • भूजल का आकलन कर जल सुरक्षा योजनाएँ बने, व पुनर्भरण संरचनाओं का प्रबंधन समुदायिक स्तर पर हो।
  • स्पष्ट रूप से परिभाषित भूजल अधिकार भी बनाए जाएं जिससे सही ढंग से जल निष्कर्षण किया जा सके।

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