शोध-अनुसंधान के लिए एक अच्छी पहल
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पूरी दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शोध एवं अनुसंधान को बहुत महत्व दिया जाता है। इनकी तुलना में भारत काफी पिछड़ा रहा है। इसे देखते हुए हाल ही में प्राइम मिनिस्टर रिसर्च चेयर्स या पीएमआरसी प्रस्तावित किया गया है।
इससे जुड़े कुछ बिंदु –
- ये केंद्र देश के आईआईटी में खोले जाने हैं।
- इसका उद्देश्य भारतीय मूल के टॉप शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को आकर्षित करना है।
- इस योजना से 5 वर्षों में 120 रिसर्च फेलो और चेयर्स को सहायता देकर शोध एवं अनुसंधान के जरिए आर्थिक विकास किया जा सकेगा।
- इस पहल के साथ सरकार का अनुसंधान पर खर्च बढ़ना चाहिए। वर्तमान में जीडीपी का 0.64-0.66% ही इस पर खर्च होता है। कुल खर्च का 34% निजी भागीदारी से आता है। लेकिन यह खतरे नहीं उठाना चाहता और अल्पावधि में रिटर्न की मांग करता है।
- इस पहल के साथ सरकार को नीति एवं प्रशासन पर दूरदृष्टि से काम करना चाहिए। इस हेतु उद्योगों और शिक्षण संस्थानें के बीच तालमेल बिठाने की जरूरत है। मांग-आधारित, मिशन-प्रेरित मॉडल अपनाने की जरूरत है। ऐसे मॉडल में सरकार लक्ष्य तय करती है, जबकि उद्योग निजी पूंजी और अनुसंधानकर्ता उपलब्ध कराते हैं।
अंततः पीएमआरसी जैसी योजना की सफलता के लिए शोध एवं अनुसंधान में मौलिक सुधार किए जाने की जरूरत है। इसमें बौद्धिक संपदा के मालिकाना अधिकार की स्पष्टता और निजी पूंजी के बड़े प्रवाह को लाने के तरीके ढूंढने बहुत जरूरी हैं।
‘द इकॉनॅमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 जनवरी 2026
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