शहरीकरण की चाल ऐसी क्‍यों?

Afeias
30 Apr 2026
A+ A-

To Download Click Here.

भारत में शहरीकरण का एक अलग ही पैटर्न चलता है। हाल ही में दिल्‍ली से सटे नोएडा के एक गांव जेवर का उदाहरण सबके सामने है। यहाँ अंतरराष्‍ट्रीय हवाई अड्डे की घोषणा के साथ ही औद्योगिक पार्क और अन्‍य व्‍यावसायिक गतिविधियों के लिए देखते-ही-देखते जमीन की कीमतें आसमान छूने लगीं। इस गांव के किसान करोड़पति बन गए। 19वीं में गोल्‍ड रा के दौरान सैन फ्रांसिस्‍को 25 गुना बढ़ गया था। ऐसे ही पोटोसी, बोलीविया को 16वीं सदी में चांदी ने अमीर बना दिया था।

भारत के ‘बूमटाउन’ का आधार सोना, चांदी या तेल की जगह भूमि है। इस प्रकार के बदलाव से सामाजिक और सांस्‍कृतिक स्‍तर पर बहुत कुछ दांव पर लग जाता है –

  • सदियों पुराना समुदाय, गांव उजड़ जाता है।
  • कुछ जमीन के मालिक करोड़पति बन जाते हैं। लेकिन उनके भूमिहीन काश्‍तकारों से आजीविका के साधन छिन जाते हैं।
  • किसान अमीर हो जाते हैं। लेकिन खेती के अलावा उन्‍हें पता नहीं होता कि क्‍या करना है। फैक्‍ट्री में काम करना या कैब चलाना उन्‍हें सम्‍मानजनक नहीं लगता है।
  • अध्‍ययनों से पता चलता है कि ऐसे अमीर किसानों को अपना धन संजोना भी नहीं आता है। उनकी कमाई जल्‍द ही उड़ जाती है।
  • इलाके में अमीर लोगों के आने से कामगारों की औरतें घरेलू सहायिका बनकर आसपास ही किसी झोपड़ी में रहने लगती हैं। पुरुष गार्ड या सफाइकर्मी या उठाईकर्मी बन जाते हैं। ऐसे परिवार एक स्‍लम का निर्माण कर देते हैं।
  • सबसे बड़ी बात है कि ऐसे शहर के ज्‍यादातर निवासी विस्‍थापन के कटु अनुभव से भरे होते हैं।

यह सच है कि बूमटाउन के लिए ये शुरुआती दर्द हैं, लेकिन सवाल यह है कि 21वीं सदी में हम 16वीं या 19वीं सदी जैसे शहरीकरण पर निर्भर क्‍यों हैं?

‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित – 01/04/2026