मुक्त व्यापार समझौते पर कुछ बिंदु
To Download Click Here.

- विश्व व्यापार संगठन के अनुसार भारत ने 20 मुक्त व्यापार समझौते किए हैं।
- इसके अलावा यू.के. और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन से भी समझौते हुए हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा और दक्षिण अफ़्रीकी देशों से ऐसे समझौतों पर बातचीत चल रही है।
- भारत के जापान, आसियान और दक्षिण कोरिया से किए गए पिछले मुक्त व्यापार समझौतों का रुझान पार्टनर देशों के पक्ष में ही रहा है। इसके कुछ कारण रहे हैं, जिन पर भारत को ठीक से काम करने की जरूरत है। तभी नए समझौतों से लाभ की आशा की जा सकती है –
- यद्यपि भारत का निर्यात बढ़ा, लेकिन ज्यादा कीमत वाले पूंजी गहन सामानों का आयात बढ़ा। इसके लिए नीतियां जिम्मेदार रही हैं।
- गुणवत्ता मानदंडों, सर्टिफिकेशन्स, ओरिजिन के नियमों और शुल्क की बाधाओं पर ठीक से बातचीत नहीं की गई।
- कई समझौतों में भारत के मजबूत उद्योगों की क्षमता को ठीक से उभारा नहीं गया था। उद्योग जगत से भी इस पर सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
- इन समझौतों को देश में लोकप्रिय बनाने के लिए उस तरह से कम प्रचार किया गया था, जबकि पार्टनर देशों ने प्रेफरेंशियल मार्जिन का पूरा इस्तेमाल किया।
- इन कमियों से सबक लेकर इंडिया-यूएई काम्प्रिेहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट के नतीजे कुछ संतुलित हुए हैं। 2025 में गैर तेल व्यापार लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
- अब अमेरिका के मामले में सेवाओं, इंजीनियरिंग सामान, कपड़ा निर्यात आदि पर पर्याप्त सलाह के बाद ही कोई समझौता किया जाना चाहिए।
- यूरोपीय संघ के साथ पूरा ध्यान आयरन और स्टील जैसे कार्बन गहन क्षेत्रों में होना चाहिए। इनमें कार्बन बार्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म पर बातचीत जरूरी है।
- अगर इन समझौतों से लंबे समय तक लाभ लेना है, तो मानदण्डों, बुनियादी ढांचे, तकनीक और बाजार के विशेषज्ञों की सलाह पर आगे बढ़ना उचित होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 दिसंबर, 2025
Related Articles
×