मतदाता सूची का संशोधन: लोकतांत्रिक समावेशन और निर्वाचन आयोग की जवाबदेही

Afeias
28 Oct 2026
A+ A-

To Download Click Here.

निर्वाचन आयोग ने विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसएसआर) को पुनः शुरू करने का निर्णय लिया है। इससे 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं तथा मतदाता सूची से छूटे या हटाए गए नागरिकों को पंजीकरण का अवसर मिलता है।

हालांकि, नियमित एसएसआर को लगभग दो वर्षों तक स्थगित रखने से मतदाता सूची की समावेशिता और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। लेख का मुख्य तर्क है कि केवल जनविरोध के बाद सुधार करना पर्याप्त नहीं है। निर्वाचन आयोग को स्थगन के कारण स्पष्ट करने, और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।

  1. प्रमुख अवधारणाएँ

एसएसआर — स्पेशल समरी रिवीजन या विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण

मतदाता सूची को नियमित रूप से अपडेट करने की प्रक्रिया, जिसमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, नामों में सुधार तथा पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना प्रमुख है।

एसआईआर — स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन या विशेष गहन पुनरीक्षण

मतदाता सूची की अधिक व्यापक जाँच, और सत्यापन की प्रक्रिया। इसमें मौजूदा प्रविष्टियों का सत्यापन भी किया जाता है। प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित अवसर देना आवश्यक है।

समय पर एसएसआर न किए जाने से बहुत सी समस्याएं सामने आती हैं; जैसे –

  • नए मतदाताओं का बहिष्करण: समय पर पंजीकरण न होने से 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके पात्र नागरिक चुनाव में भाग लेने का अवसर खो सकते हैं।
  • मतदाता सूची से नाम हटने की समस्या: गलत विलोपन से नागरिकों को दोबारा आवेदन और सत्यापन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
  • पारदर्शिता का अभाव: एसएसआर में विलंब के कारण स्पष्ट न होने से निर्वाचन आयोग के निर्णयों पर संदेह बढ़ता है।
  • प्रशासनिक विवेक का प्रश्न: नियमित और समावेशी प्रक्रिया को बिना स्पष्ट कारण स्थगित करना संस्थागत जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • लोकतांत्रिक विश्वास में कमी: मतदाता सूची की त्रुटियाँ चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के प्रति नागरिकों के विश्वास को प्रभावित कर सकती हैं।

एसएसआर की बहाली आवश्यक कदम है। उसके स्थगन के कारणों का स्पष्टीकरण, और भविष्य के लिए संस्थागत सुरक्षा-उपाय उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17/10/26