
जीएसटी में केंद्र की भूमिका और सुधारों की आवश्यकता
Date:22-09-20
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महामारी के चलते कर-संग्रह में भारी गिरावट आई है, जबकि राज्यों के व्यय में बढ़ोत्तरी हुई है। अप्रत्याशित घटना खंड के समानांतर वाणिज्यिक अनुबंधों में, केंद्र को चाहिए कि वह राज्यों की भरपाई करे। केंद्र का अपनी जिम्मेदारी से अलग हट जाना कई अर्थों में गलत है –
- केंद्र की तरह राज्यों के पास कई विकल्पों का सहारा नहीं है। केंद्र के पास एक संप्रभु बांड (डॉलर या रुपए में) या आरबीआई से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के शेयरों के एवज में ऋण उपलब्ध रहता है।
- केंद्र की तरह राज्य, बाजार से बहुत कम दर पर उधार लेने की शक्ति नहीं रखते।
- सकल सार्वजनिक क्षेत्र के उधार के संदर्भ में, ऋण बाजार या रेंटिग एजेंसियों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे केंद्र या राज्यों की ऋणग्रस्तता बढ़ रही है।
- राजकोषीय प्रोत्साहन में वृद्धि के माध्यम से इस मंदी से निपटना, मूल रूप से मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरीकरण का काम केंद्र का है।
- केंद्र का यह रवैया राज्यों के साथ बने विश्वास को तोडता है।
सहकारी संघवाद की प्रकृति ही कुछ ऐसी है, जिसमें दो संस्थाओं के बीच कोई भी कार्यवाई तत्काल-प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि भविष्य के परिणामों के बारे में सोचकर की जाती है।
अगर हम आस्ट्रेलिया के जीएसटी पर एक नजर डालें, तो देखते हैं कि वहाँ की कर-दर दो सालों से 100% पर ही स्थिर है। माना कि भारत में केंद्र को राज्यों के राजस्व की पूर्ति के लिए इसे अतिरिक्त रखना एक जरूरत है। उस हिसाब से इसे 12% पर स्थिर किया जा सकता है। साथ ही स्थानीय निकायों के लिए भी इसमें कुछ भाग रखा जाना चाहिए।
कर संग्रह का वास्तविक तंत्र अत्यधिक जटिल और भारी है। दरअसल-जीएसटी एक महत्वपूर्ण और दीर्घकालीन ढांचागत सुधार है, जो भविष्य की राजकोषीय जरूरतों को पूरा कर सकता है। समय को देखते हुए इस तंत्र में कुछ सुधारों की जरूरत है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित विजय केलकर और अजित रानाडे के लेख पर आधारित। 1 सितंबर, 2020