ध्वनि प्रदूषण : कानूनों से अधिक जरूरी है प्रभावी और समान अनुपालन
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ध्वनि प्रदूषण आज के समय की गंभीर समस्या बन गया है। धार्मिक आयोजनों, विवाह समारोहों, राजनीतिक अभियानों में डी जी, लाउड स्पीकर तथा अनावश्यक हार्न के कारण अत्यधिक शोर नागरिकों के स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता और पर्यावरण को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।
इसे रोकने के लिए कानून की वर्तमान व्यवस्था और उसकी कमियोंसे जुड़े कुछ बिन्दु –
- ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए कानूनों की कमी नहीं है, लेकिन अनुपालन की कमी है। अक्सर देखा जाता है कि शिकायत मिलने के बाद ही कार्रवाई की जाती है। इससे कानून की निवारक क्षमता कमजोर पड़ती है।
- संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति को गैरकानूनी शोर से सुरक्षा पाने और शांतिपूर्ण जीवन का अधिकार दिया गया है। अत्यधिक शोर मानवीय मस्तिष्क के साथ-साथ पशु-पक्षियों पर भी दुष्प्रभाव डालता है। अत: यह केवल बाधा नहीं, अपितु मौलिक अधिकार के हनन का भी मामला है।
- पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ध्वनि प्रदूषण के विरूद्ध शिकायतों की प्रतीक्षा करने के बजाय नियमित प्रवर्तन पर जोर दिया है।
- हर मामले में नागरिकों की शिकायतों की प्रतीक्षा पर कार्रवाई करने वाला चलन व्यावहारिक नहीं है। पुलिस की तत्परता ज्यादा प्रभावी होती है।
- भारत की सांस्कृतिक धरोहर को देखते हुए तेज ध्वनि के प्रयोग को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन एक संतुलन जरूर बनाया जा सकता है।
- संतुलन के लिए जरूरी यह भी है कि कार्रवाई समान रूप से हो। ध्वनि ऑपरेटरों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने से कुछ समान नियंत्रण बन सकता है।
कुल मिलकार, ध्वनि प्रदूषण की समस्या पर कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि कानूनों को लगातार और समान रूप से लागू करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा-शिक्त की कमी है। न्यायपालिका का हस्तक्षेप तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में सामान्य रूप से कानून केअनुपालन में ही समाधान मिल सकता है।
(‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-22/08/26)