चोल विरासत से सबक
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हाल ही में प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु की यात्रा की। उन्होंने चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम के दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री अभियान के 1,000 वर्ष पूरे होने के उत्सव मे भाग लिया। यह यात्रा अतीत के समृद्ध भारत से बहुत से सबक भी सिखाती है।
कुछ बिंदु –
- चोल शासन की भव्यता के साथ-साथ उसका जल-प्रबंधन, कर और भू-राजस्व संग्रह और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं सीखने लायक हैं।
चोलों का केंद्र गंगईकोंडा चोलपुरम कावेरी डेल्टा पर स्थित है। आज यहाँ से बहुत से स्थानीय निकाय, निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना काम कर रहे हैं।
- चोलों का बनाया बृहदेश्वर मंदिर 1000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। अध्ययन दर्शाते हैं कि दक्षिणी प्रायद्वीप पिछले 200 वर्षों में कई भूकंपों का केंद्र रहा है। पुरातत्वविदों का मानना है कि भूकंपीय लचीलेपन के संदर्भ में मंदिरों की अधिरचना (सुपरस्ट्रक्चर) आधुनिक निर्माण तकनीकों को दिशा दे सकती है।
- चोल साम्राज्य में राज्य की संप्रभुता की रक्षा करते हुए व्यापार का विस्तार किया गया। समकालीन भारत भी ऐसी उद्यमशीलता अपना सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 जुलाई, 2025
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