भारत में अनुसंधान एवं विकास केवल बजट देने से नहीं बढ़ेगा
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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 1 लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान विकास एवं नवाचार योजना को स्वीकृति दी है। इसका उद्देश्य बुनियादी अनुसंधान में निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है।
योजना के कुछ मुख्य बिंदु –
- इस योजना में मुख्य निकाय अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) को बनाया गया है।
- योजना में एक स्पेशल पर्पस फंड बनाया जाना है। इसे एएनआरएफ के अधीन रखा जाएगा। इस निधि से कम ब्याज दर वाले ऋण दिए जा सकेंगे।
- यह निकाय शैक्षणिक संस्थानों में अनुसंधान एवं विकास के वित्त पोषण के लिए एकल खिड़की का काम करेगा।
- इसके बजट का लगभग 70% निजी स्रोतों से प्राप्त होने की उम्मीद है।
कमियां –
- सबसे पहले तो सरकार एएनआरएफ के माध्यम से यह दावा करती हुई लग रही है कि जहां आज सरकार 70% का भार उठाती रही है, उस अनुपात को उलटकर निजी क्षेत्र पर डालना होगा।
- दूसरे, धन उन्हीं को प्राप्त हो सकता है, जिनके उत्पाद विकास और बाजार क्षमता के टेक्नॉलॉजी रेडीनेस लेवल-4 (टीआरएल 4) तक पहुँच गए हैं। यह एक ऐसा स्तर है, जिसे अनुसंधान को समर्थन देने का मनमाना तरीका कहा जा सकता है। इस स्तर पर आधे रास्ते तक आगे बढ़े अनुसंधान को मान्य किया जाता है।
- योजना में ऐसी शर्त रखते हुए यह भूला जा रहा है कि बहुत से तकनीक समृद्ध देशों ने अपने सैन्य-औद्योगिक परिसरों में जोखिम भरी और महंगी तकनीक के विकास को प्रोत्साहित किया। तभी वे आज यहाँ पहुँच सके हैं।
- भारत में तकनीकी विकास के लिए जरूरी कुशल विनिर्माण क्षेत्र का अभाव है; एक ऐसा क्षेत्र, जो वैज्ञानिकों की कल्पना के अनुरूप उत्पाद बना सके।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 9 जुलाई, 2025
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